नवग्रह स्तोत्र (Navagraha Stotram) – अर्थ, महत्त्व और संपूर्ण पाठ
नवग्रह स्तोत्र (Navagraha Stotram) हिंदू धर्म का एक अत्यंत प्रभावशाली और पवित्र स्तोत्र है। इसकी रचना महर्षि वेदव्यास ने नौ ग्रहों (नवग्रहों) को शांत करने और उनकी कृपा प्राप्त करने के लिए की थी। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, मनुष्य के जीवन में सुख-दुःख ग्रहों की चाल पर निर्भर करते हैं। इस स्तोत्र का नियमित पाठ करने से कुंडली के ग्रह दोष दूर होते हैं।
नवग्रह स्तोत्र के बारे में (About)
नवग्रह स्तोत्र संस्कृत भाषा में रचित है और इसमें नौ श्लोक हैं, जो क्रमशः सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु और केतु को समर्पित हैं। इसे ‘ग्रह शांति’ का एक अचूक उपाय माना जाता है। चाहे शनि की साढ़ेसाती हो या राहु-केतु का दोष, श्रद्धालु सदियों से इस स्तोत्र का पाठ करके राहत और मानसिक शांति प्राप्त करते आ रहे हैं।
इतिहास (History)
इस दिव्य स्तोत्र की रचना महर्षि वेदव्यास (Maharishi Veda Vyasa) ने की थी। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, व्यास जी ने मानव कल्याण के लिए वेदों और पुराणों के साथ-साथ ऐसे स्तोत्रों की रचना भी की जो आम जनमानस को दैवीय प्रकोपों से बचा सकें। ‘नवग्रह स्तोत्र’ में ऋषि व्यास ने यह आश्वासन दिया है कि इसका पाठ करने से न केवल ग्रहों की पीड़ा शांत होती है, बल्कि चोर, अग्नि और बुरे सपनों का भय भी मिट जाता है।
नवग्रह स्तोत्र (मूल संस्कृत और हिंदी अर्थ)
१. सूर्य (Sun)
मूल श्लोक: जपाकुसुम संकाशं काश्यपेयं महद्युतिम् ।
तमोऽरिं सर्वपापघ्नं प्रणतोऽस्मि दिवाकरम् ॥ १ ॥
हिंदी अर्थ:
जिनकी कांति गुडहल (जपा) के फूल के समान लाल है, जो कश्यप ऋषि के पुत्र हैं, जो महातेजस्वी हैं, अंधकार के शत्रु हैं और सब पापों का नाश करने वाले हैं, उन सूर्य देव (दिवाकर) को मैं प्रणाम करता हूँ।
२. चन्द्र (Moon)
मूल श्लोक: दधिशंखतुषाराभं क्षीरोदार्णव सम्भवम् ।
नमामि शशिनं सोमं शम्भोर्मुकुट भूषणम् ॥ २ ॥
हिंदी अर्थ:
जिनका रंग दही, शंख और बर्फ (तुषार) के समान श्वेत है, जो क्षीरसागर से उत्पन्न हुए हैं और भगवान शिव के मुकुट की शोभा हैं, उन चन्द्र देव (सोम) को मैं नमस्कार करता हूँ।
३. मंगल (Mars)
मूल श्लोक: धरणीगर्भ संभूतं विद्युत्कान्ति समप्रभम् ।
कुमारं शक्तिहस्तं तं मंगलं प्रणमाम्यहम् ॥ ३ ॥
हिंदी अर्थ:
जो पृथ्वी देवी के गर्भ से उत्पन्न हुए हैं, जिनकी चमक बिजली की कौंध के समान है, जो कुमार स्वरूप हैं और हाथों में शक्ति (आयुध) धारण करते हैं, उन मंगल देव को मैं प्रणाम करता हूँ।
४. बुध (Mercury)
मूल श्लोक: प्रियंगुकलिकाश्यामं रूपेणाप्रतिमं बुधम् ।
सौम्यं सौम्यगुणोपेतं तं बुधं प्रणमाम्यहम् ॥ ४ ॥
हिंदी अर्थ:
जिनका वर्ण ‘प्रियंगु’ की कली के समान गहरा साँवला है, जिनका रूप अनुपम है, जो सौम्य हैं और सौम्य गुणों से संपन्न हैं, उन बुध देव को मैं प्रणाम करता हूँ।
५. गुरु (Jupiter)
मूल श्लोक: देवानांच ऋषीणांच गुरुं कांचनसन्निभम् ।
बुद्धिभूतं त्रिलोकेशं तं नमामि बृहस्पतिम् ॥ ५ ॥
हिंदी अर्थ:
जो देवताओं और ऋषियों के गुरु हैं, जिनकी आभा सोने (कांचन) के समान है, जो साक्षात बुद्धि के स्वरूप हैं और तीनों लोकों के स्वामी हैं, उन बृहस्पति देव को मैं नमन करता हूँ।
६. शुक्र (Venus)
मूल श्लोक: हिमकुन्दमृणालाभं दैत्यानां परमं गुरुम् ।
सर्वशास्त्रप्रवक्तारं भार्गवं प्रणमाम्यहम् ॥ ६ ॥
हिंदी अर्थ:
जिनकी कांति बर्फ, कुंद के फूल और कमलनाल (मृणाल) के समान श्वेत है, जो दैत्यों के परम गुरु हैं और सभी शास्त्रों के ज्ञाता/वक्ता हैं, उन भार्गव (शुक्र) को मैं प्रणाम करता हूँ।
७. शनि (Saturn)
मूल श्लोक: नीलांजनसमाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम् ।
छायामार्तण्ड संभूतं तं नमामि शनैश्चरम् ॥ ७ ॥
हिंदी अर्थ:
जिनकी आभा नीले अंजन (काजल) के समान है, जो सूर्यपुत्र हैं और यमराज के बड़े भाई हैं, जो छाया और सूर्य (मार्तण्ड) से उत्पन्न हुए हैं, उन शनि देव को मैं नमन करता हूँ।
८. राहु (Rahu)
मूल श्लोक: अर्धकायं महावीर्यं चन्द्रादित्य विमर्दनम् ।
सिंहिकागर्भसंभूतं तं राहुं प्रणमाम्यहम् ॥ ८ ॥
हिंदी अर्थ:
जिनका शरीर आधा है, जो महापराक्रमी हैं, जो सूर्य और चन्द्रमा को भी पीड़ित (ग्रहण) करते हैं और सिंहिका के गर्भ से उत्पन्न हुए हैं, उन राहु को मैं प्रणाम करता हूँ।
९. केतु (Ketu)
मूल श्लोक: पलाशपुष्पसंकाशं तारकाग्रहमस्तकम् ।
रौद्रं रौद्रात्मकं घोरं तं केतुं प्रणमाम्यहम् ॥ ९ ॥
हिंदी अर्थ:
जिनकी चमक पलाश के फूल के समान (धूम्र/लाल) है, जो तारों और ग्रहों में प्रधान हैं, जो रौद्र रूप वाले और भयानक हैं, उन केतु को मैं प्रणाम करता हूँ।
फलश्रुति (Benefits)
इति व्यासमुखोद्गीतं यः पठेत् सुसमाहितः ।
दिवा वा यदि वा रात्रौ विघ्नशान्तिर्भविष्यति ॥
नरनारीनृपाणांच भवेत् दुःस्वप्ननाशनम् ।
ऐश्वर्यमतुलं तेषां आरोग्यं पुष्टिवर्धनम् ॥
अर्थ:
व्यास जी के मुख से निकले इस स्तोत्र का जो भी व्यक्ति एकाग्रचित्त होकर (दिन या रात में) पाठ करता है, उसकी सभी बाधाएं शांत हो जाती हैं। स्त्री, पुरुष या राजा—सभी के बुरे सपने नष्ट हो जाते हैं और उन्हें अतुलनीय ऐश्वर्य, आरोग्य और पुष्टि (बल) की प्राप्ति होती है। व्यास जी कहते हैं कि इसमें कोई संदेह नहीं है।
रोचक तथ्य (Trivia)
रचयिता: इस स्तोत्र के रचयिता महर्षि वेदव्यास हैं, जिन्होंने महाभारत की रचना भी की थी।
पुष्प उपमा: सूर्य देव के लिए ‘जपाकुसुम’ (गुडहल) और केतु के लिए ‘पलाश पुष्प’ की उपमा का प्रयोग उनके रंग और तीव्रता को दर्शाने के लिए किया गया है।
शनि-यम संबंध: इस स्तोत्र में शनि देव को ‘यमाग्रज’ (यमराज का बड़ा भाई) कहकर संबोधित किया गया है, जो सूर्य की संतानों के रूप में उनके संबंध को दर्शाता है।
सुरक्षा कवच: फलश्रुति में विशेष रूप से उल्लेख है कि यह ‘दुःस्वप्न नाशनम्’ है, यानी यह बुरे सपनों और अज्ञात भय को दूर करता है।
शिव पंचाक्षर स्तोत्र – अर्थ और बोल | Shiv Panchakshar Stotra Lyrics & Meaning in Hindi
शिव पंचाक्षर स्तोत्र (Shiv Panchakshar Stotra)
रचयिता: आदि शंकराचार्य (Adi Shankaracharya)
परिचय (About)
शिव पंचाक्षर स्तोत्र भगवान शिव की उपासना में रचित सबसे लोकप्रिय और प्रभावशाली स्तोत्रों में से एक है। इसकी रचना आदि शंकराचार्य ने की थी। यह स्तोत्र भगवान शिव के पंचाक्षर मंत्र ‘नमः शिवाय’ पर आधारित है। इसमें कुल 5 मुख्य श्लोक हैं, और प्रत्येक श्लोक मंत्र के एक अक्षर (न, म, शि, वा, य) को समर्पित है। यह न केवल भक्ति का प्रतीक है, बल्कि यह पंचतत्वों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) के साथ शिव के संबंध को भी दर्शाता है।
Panchaksharamidam punyam yah pathechchiva sannidhau,
Shivalokamavapnoti shivena saha modate.
इतिहास (History)
शिव पंचाक्षर स्तोत्र की रचना 8वीं शताब्दी के महान दार्शनिक आदि शंकराचार्य द्वारा की गई थी। उस समय भारत में कई मत-मतांतर प्रचलित थे, और शंकराचार्य ने अद्वैत वेदांत और पंचायतन पूजा को पुनः स्थापित किया। उन्होंने वेदों के सार को आम जनमानस तक पहुँचाने के लिए सरल संस्कृत में कई स्तोत्र रचे। यह स्तोत्र यजुर्वेद में वर्णित ‘नमः शिवाय’ मंत्र की व्याख्या करता है।
अर्थ विश्लेषण (Meaning Analysis)
‘न’ कार (पृथ्वी तत्व): जो नागराज को हार के रूप में धारण करते हैं, जिनके तीन नेत्र हैं, और जो भस्म लगाए हुए हैं। ऐसे ‘न’ अक्षर स्वरूप भगवान शिव को नमस्कार है।
‘म’ कार (जल तत्व): जो गंगाजल और चंदन से सुशोभित हैं, जो नंदी और गणों के स्वामी हैं, और मंदार पुष्पों से पूजे जाते हैं। ऐसे ‘म’ अक्षर स्वरूप शिव को नमस्कार है।
‘शि’ कार (अग्नि तत्व): जो माता पार्वती (गौरी) के मुख कमल को खिलाने के लिए सूर्य समान हैं, जिन्होंने दक्ष के यज्ञ का नाश किया, और जिनका कंठ नीला है। ऐसे ‘शि’ अक्षर स्वरूप शिव को नमस्कार है।
‘व’ कार (वायु तत्व): जिनकी पूजा वसिष्ठ, अगस्त्य और गौतम जैसे महान ऋषि करते हैं, और जिनके नेत्र सूर्य, चंद्रमा और अग्नि हैं। ऐसे ‘व’ अक्षर स्वरूप शिव को नमस्कार है।
‘य’ कार (आकाश तत्व): जो यक्ष का रूप धारण करने वाले (या यक्षों द्वारा पूजित), जटाधारी, हाथ में पिनाक धनुष लिए हुए सनातन देव हैं। ऐसे ‘य’ अक्षर स्वरूप शिव को नमस्कार है।
रोचक तथ्य (Trivia)
यह स्तोत्र ‘नमः शिवाय’ मंत्र के प्रत्येक अक्षर (न, म, शि, वा, य) पर आधारित है।
माना जाता है कि इन 5 श्लोकों का संबंध पंचमहाभूतों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) से है।
आदि शंकराचार्य ने 8वीं शताब्दी में अद्वैत वेदांत के प्रचार के दौरान इसकी रचना की थी।
इस स्तोत्र को शिव मानस पूजा और शिव तांडव स्तोत्र के साथ भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए सबसे प्रभावी माना जाता है।
सिद्ध कुंजिका स्तोत्रम् (Siddha Kunjika Stotram) – अर्थ और महत्व
सिद्ध कुंजिका स्तोत्रम्: दुर्गा सप्तशती की गुप्त कुंजी
कलाकार/स्रोत: परंपरागत (रुद्रयामल तन्त्र)
परिचय (About)
सिद्ध कुंजिका स्तोत्र (Siddha Kunjika Stotram) हिंदू धर्म में शाक्त परंपरा का एक अत्यंत प्रभावशाली और पवित्र स्तोत्र है। रुद्रयामल तंत्र के अंतर्गत गौरी तंत्र में वर्णित यह स्तोत्र भगवान शिव द्वारा माता पार्वती को प्रदान किया गया था। ‘कुंजिका’ का अर्थ है चाबी। शास्त्रों के अनुसार, दुर्गा सप्तशती के मंत्र कीलित (locked) हैं। सिद्ध कुंजिका स्तोत्र का पाठ उन मंत्रों के कीलन को हटाकर उनकी सुप्त शक्ति को जगाता है।
इतिहास (History)
इस स्तोत्र का उद्गम रुद्रयामल तन्त्र से है। यह भगवान शिव और पार्वती के संवाद के रूप में है। शिव जी, देवी पार्वती को बताते हैं कि यह स्तोत्र देवताओं के लिए भी दुर्लभ है और इसे अत्यंत गुप्त रखा जाना चाहिए। यह दुर्गा सप्तशती पाठ का सार तत्व है।
सिद्ध कुंजिका स्तोत्रम् (मूल पाठ)
शिव उवाच
शृणु देवि प्रवक्ष्यामि, कुंजिकास्तोत्रमुत्तमम्।
येन मन्त्रप्रभावेण चण्डीजापः शुभो भवेत्॥१॥
न कवचं नार्गलास्तोत्रं कीलकं न रहस्यकम्।
न सूक्तं नापि ध्यानं च न न्यासो न च वार्चनम्॥२॥
कुंजिकापाठमात्रेण दुर्गापाठफलं लभेत्।
अति गुह्यतरं देवि देवानामपि दुर्लभम्॥३॥
गोपनीयं प्रयत्नेन स्वयोनिरिव पार्वति।
मारणं मोहनं वश्यं स्तम्भनोच्चाटनादिकम्।
पाठमात्रेण संसिद्ध्येत् कुंजिकास्तोत्रमुत्तमम्॥४॥
अथ मन्त्रः
सिद्ध कुंजिका स्तोत्र केवल शब्दों का संग्रह नहीं, बल्कि बीजाक्षरों का एक विद्युत-पुंज है।
सर्वोपरि महत्व: भगवान शिव कहते हैं कि इस स्तोत्र के पाठ से कवच, अर्गला, कीलक, ध्यान, और न्यास की आवश्यकता गौण हो जाती है, क्योंकि यह ‘कुंजी’ सीधे शक्ति को खोल देती है।
बीजाक्षर रहस्य:
ऐं (Aim): यह वाग्बीज है, जो ज्ञान और सृष्टि का प्रतीक है।
ह्रीं (Hreem): यह मायाबीज है, जो भुवनेश्वरश्वरी और पालन शक्ति का प्रतीक है।
क्लीं (Kleem): यह कामबीज है, जो आकर्षण और इच्छा पूर्ति का प्रतीक है।
चेतावनी: अंतिम श्लोक चेतावनी देता है कि कुंजिका के बिना सप्तशती का पाठ ‘अरण्य रोदन’ (जंगल में रोने) के समान व्यर्थ हो सकता है।
रोचक तथ्य (Trivia)
📚 समय की बचत: नवरात्रि में समयाभाव होने पर, भक्त अक्सर पूर्ण चंडी पाठ के विकल्प के रूप में केवल ‘सिद्ध कुंजिका स्तोत्र’ का पाठ करते हैं।
🔐 गुप्त साधना: इसे ‘स्वयोनिरिव’ गुप्त रखने को कहा गया है, जिसका अर्थ है कि यह अत्यंत व्यक्तिगत साधना है।
🔥 अग्नि तत्व: इसमें ‘ज्वालय ज्वालय’ जैसे शब्दों का प्रयोग अग्नि तत्व को प्रज्वलित करने और नकारात्मकता को भस्म करने के लिए किया गया है।
भज गोविन्दं भज गोविन्दं, गोविन्दं भज मूढ़मते । संप्राप्ते सन्निहिते काले, न हि न हि रक्षति डुकृञ् करणे ॥1॥ हे मोह से ग्रसित बुद्धि वाले मित्र, गोविंद को भजो, गोविन्द का नाम लो, गोविन्द से प्रेम करो क्योंकि मृत्यु के समय व्याकरण के नियम याद रखने से आपकी रक्षा नहीं हो सकती है । (1)
मूढ़ जहीहि धनागमतृष्णाम्, कुरु सद्बुद्धिमं मनसि वितृष्णाम् । यल्लभसे निजकर्मोपात्तम्, वित्तं तेन विनोदय चित्तं ॥2॥ हे मोहित बुद्धि ! धन एकत्र करने के लोभ को त्यागो । अपने मन से इन समस्त कामनाओं का त्याग करो । सत्यता के पथ का अनुसरण करो, अपने परिश्रम से जो धन प्राप्त हो उससे ही अपने मन को प्रसन्न रखो । (2)
नारीस्तनभरनाभीदेशम्, दृष्ट्वा मागा मोहावेशम् । एतन्मान्सवसादिविकारम्, मनसि विचिन्तय वारं वारम् ॥3॥ स्त्री शरीर पर मोहित होकर आसक्त मत हो । अपने मन में निरंतर स्मरण करो कि ये मांस-वसा आदि के विकार के अतिरिक्त कुछ और नहीं है । (3)
यावद्वित्तोपार्जनसक्त:, तावन्निजपरिवारो रक्तः। पश्चाज्जीवति जर्जरदेहे, वार्तां कोऽपि न पृच्छति गेहे ॥5॥ जब तक व्यक्ति धनोपार्जन में समर्थ है, तब तक परिवार में सभी उसके प्रति स्नेह प्रदर्शित करते हैं परन्तु अशक्त हो जाने पर उसे सामान्य बातचीत में भी नहीं पूछा जाता है । (5)
बालस्तावत् क्रीडासक्तः, तरुणस्तावत् तरुणीसक्तः । वृद्धस्तावच्चिन्तासक्तः, परे ब्रह्मणि कोऽपि न सक्तः ॥7॥ बचपन में खेल में रूचि होती है , युवावस्था में युवा स्त्री के प्रति आकर्षण होता है, वृद्धावस्था में चिंताओं से घिरे रहते हैं पर प्रभु से कोई प्रेम नहीं करता है । (7)
सत्संगत्वे निस्संगत्वं, निस्संगत्वे निर्मोहत्वं । निर्मोहत्वे निश्चलतत्त्वं निश्चलतत्त्वे जीवन्मुक्तिः ॥9॥ सत्संग से वैराग्य, वैराग्य से विवेक, विवेक से स्थिर तत्त्वज्ञान और तत्त्वज्ञान से मोक्ष की प्राप्ति होती है । (9)
वयसि गते कः कामविकारः, शुष्के नीरे कः कासारः । क्षीणे वित्ते कः परिवारः, ज्ञाते तत्त्वे कः संसारः ॥10॥ आयु बीत जाने के बाद काम भाव नहीं रहता, पानी सूख जाने पर तालाब नहीं रहता, धन चले जाने पर परिवार नहीं रहता और तत्वज्ञान होने के बाद संसार नहीं रहता । (10)
मा कुरु धनजनयौवनगर्वं, हरति निमेषात्कालः सर्वं । मायामयमिदमखिलम् हित्वा, ब्रह्मपदम् त्वं प्रविश विदित्वा ॥11॥ धन, शक्ति और यौवन पर गर्व मत करो, समय क्षण भर में इनको नष्ट कर देता है | इस विश्व को माया से घिरा हुआ जान कर तुम ब्रह्म पद में प्रवेश करो । (11)
पुनरपि जननं पुनरपि मरणं, पुनरपि जननी जठरे शयनम् । इह संसारे बहुदुस्तारे, कृपयाऽपारे पाहि मुरारे ॥21॥ बार-बार जन्म, बार-बार मृत्यु, बार-बार माँ के गर्भ में शयन, इस संसार से पार जा पाना बहुत कठिन है, हे कृष्ण कृपा करके मेरी इससे रक्षा करें । (21)
कस्त्वं कोऽहं कुत आयातः, का मे जननी को मे तातः । इति परिभावय सर्वमसारम्, विश्वं त्यक्त्वा स्वप्न विचारम् ॥23॥ तुम कौन हो, मैं कौन हूँ, कहाँ से आया हूँ, मेरी माँ कौन है, मेरा पिता कौन है ? सब प्रकार से इस विश्व को असार समझ कर इसको एक स्वप्न के समान त्याग दो । (23)
शत्रौ मित्रे पुत्रे बन्धौ, मा कुरु यत्नं विग्रहसन्धौ । सर्वस्मिन्नपि पश्यात्मानं, सर्वत्रोत्सृज भेदाज्ञानम् ॥25॥ शत्रु, मित्र, पुत्र, बन्धु-बांधवों से प्रेम और द्वेष मत करो, सबमें अपने आप को ही देखो, इस प्रकार सर्वत्र ही भेद रूपी अज्ञान को त्याग दो । (25)
सुखतः क्रियते रामाभोगः, पश्चाद्धन्त शरीरे रोगः । यद्यपि लोके मरणं शरणं, तदपि न मुञ्चति पापाचरणम् ॥28॥ सुख के लिए लोग आनंद-भोग करते हैं जिसके बाद इस शरीर में रोग हो जाते हैं । यद्यपि इस पृथ्वी पर सबका मरण सुनिश्चित है फिर भी लोग पापमय आचरण को नहीं छोड़ते हैं । (28)
गुरुचरणाम्बुज निर्भर भक्तः, संसारादचिराद्भव मुक्तः । सेन्द्रियमानस नियमादेवं, द्रक्ष्यसि निज हृदयस्थं देवम् ॥31॥ गुरु के चरण कमलों का ही आश्रय मानने वाले भक्त बनकर सदैव के लिए इस संसार में आवागमन से मुक्त हो जाओ, इस प्रकार मन एवं इन्द्रियों का निग्रह कर अपने हृदय में विराजमान प्रभु के दर्शन करो । (31)
SANSKRIT WITH HINDI AND ENGLISH TRANSLATION
भज गोविन्दं भज गोविन्दं, गोविन्दं भज मूढ़मते। संप्राप्ते सन्निहिते काले, न हि न हि रक्षति डुकृञ् करणे॥1॥ हे मोह से ग्रसित बुद्धि (-सोचने समझने, राह निकलने में असमर्थ व्यक्ति) वाले मनुष्य ! गोविंद को भजो, गोविन्द का नाम लो, गोविन्द से प्रेम करो; क्योंकि मृत्यु के समय व्याकरण के नियम याद रखने से आपकी रक्षा नहीं हो सकती है। O deluded-confused-unable to find a way out, chant the names of Almighty-Govind, worship Govind, love Govind, since memorising the rules of grammar (-daily chores-routine) cannot save one at the time of death. One who is not thoughtful, insensitive, irresponsible should pray to the God. मूढ़ जहीहि धनागमतृष्णाम्, कुरु सद्बुद्धिमं मनसि वितृष्णाम्। यल्लभसे निजकर्मोपात्तम्,वित्तं तेन विनोदय चित्तं॥2॥ हे मोहित बुद्धि! धन एकत्र करने के लोभ को त्यागो। अपने मन से इन समस्त कामनाओं का त्याग करो। सत्य के पथ का अनुसरण करो, अपने परिश्रम से जो धन प्राप्त हो, उससे ही अपने मन को प्रसन्न रखो। O deluded-illusioned! Give up the lust to amass wealth. Reject all desires such desires from the mind and take up the path of virtuousness-piousity-righteousness. One should be content-satisfied happy with the money earned through honest means. One should earn money through righteous means without fraud, cheating, deceiving, forgery etc. नारीस्तनभरनाभीदेशम्, दृष्ट्वा मागा मोहावेशम्। एतन्मान्सवसादिविकारम्, मनसि विचिन्तय वारं वारम्॥3॥ स्त्री शरीर पर मोहित होकर आसक्त मत हो। अपने मन में निरंतर स्मरण करो कि वह मांस-वसा आदि के विकार के अतिरिक्त कुछ और नहीं हैं। One should not be governed by lust, sexuality, sensuality, passions towards women since they are nothing except a means to corrupt the mind. The woman’s anatomy is nothing more than flesh. Under the influence of delusion, one is not able to isolate himself from vulgarity, wretchedness.One should deliberate-meditate over this again and again mentally. नलिनीदलगतजलमतितरलम्, तद्वज्जीवितमतिशयचपलम्। विद्धि व्याध्यभिमानग्रस्तं, लोक शोकहतं च समस्तम्॥4॥ जीवन कमल-पत्र पर पड़ी हुई पानी की बूंदों के समान अनिश्चित एवं अल्प (-क्षणभंगुर) है। यह समझ लो कि समस्त विश्व रोग, अहंकार और दु:ख में डूबा हुआ है। Life is as ephemeral as water drops on a lotus leaf. Be aware that the whole world is troubled by disease, ego and grief. One did not exist before and he will not exist thereafter, as well. यावद्वित्तोपार्जनसक्त:, तावन्निजपरिवारो रक्तः। पश्चाज्जीवति जर्जरदेहे, वार्तां कोऽपि न पृच्छति गेहे॥5॥ जब तक व्यक्ति धनोपार्जन में समर्थ है, तब तक परिवार में सभी उसके प्रति स्नेह प्रदर्शित करते हैं, परन्तु अशक्त हो जाने पर उसे सामान्य बातचीत में भी नहीं पूछा जाता है। As long as one is fit and capable to earn money, everyone in the family show affection- respect towards him. But afterwards, when his body becomes weak-he turns old, no one cares-inquiries about him. No one feels the need to consult him. Even the servants ignore him. यावत्पवनो निवसति देहे, तावत् पृच्छति कुशलं गेहे। गतवति वायौ देहापाये, भार्या बिभ्यति तस्मिन्काये॥6॥ जब तक शरीर में प्राण रहते हैं तब तक ही लोग कुशल पूछते हैं। शरीर से प्राण वायु के निकलते ही पत्नी भी उस शरीर से डरती है। People are concerned about one till he alive. As soon as the soul-vital air -Pran Vayu, escape the body, near and dear too wish to remain away-aloof from it. On the other hand they are afraid of it. Even the wife prefer to remain away from the corpse-dead body-remains, out of fear (-ghost). बालस्तावत् क्रीडासक्तः, तरुणस्तावत् तरुणीसक्तः। वृद्धस्तावच्चिन्तासक्तः, परे ब्रह्मणि कोऽपि न सक्तः॥7॥ बचपन में खेल में रूचि होती है, युवावस्था में युवा स्त्री के प्रति आकर्षण होता है, वृद्धावस्था में चिंताओं से घिरे रहते हैं, पर प्रभु से कोई प्रेम नहीं करता है। One idles away-waste childhood in sports-play, during youth, he is attached to woman, in old age he keeps worrying about future, but it seldom that he prefers to be engrossed with Govind-the Par Brahmn Parmeshwar at any stage. In fact, he does not know, understand the significance-importance of it. का ते कांता कस्ते पुत्रः, संसारोऽयमतीव विचित्रः। कस्य त्वं वा कुत अयातः, तत्त्वं चिन्तय तदिह भ्रातः॥8॥ कौन तुम्हारी पत्नी है, कौन तुम्हारा पुत्र है, ये संसार अत्यंत विचित्र है, तुम कौन हो, कहाँ से आये हो, बन्धु ! इस बात पर तो पहले विचार कर लो। Who is your wife ? Who is your son? Indeed, strange is this world. O dear, think again and again who are you and from where have you come. One does not know his origin, earlier incarnations-previous births. सत्संगत्वे निस्संगत्वं, निस्संगत्वे निर्मोहत्वं। निर्मोहत्वे निश्चलतत्त्वं निश्चलतत्त्वे जीवन्मुक्तिः॥9॥ सत्संग से वैराग्य, वैराग्य से विवेक, विवेक से स्थिर तत्त्वज्ञान और तत्त्वज्ञान से मोक्ष की प्राप्ति होती है। Interaction with saints brings detachment, detachment leads to gist-nectar-elixir pertaining to the Almighty and this leads to Salvation-Liberation-Assimilation in the Ultimate-Almighty. वयसि गते कः कामविकारः, शुष्के नीरे कः कासारः। क्षीणे वित्ते कः परिवारः, ज्ञाते तत्त्वे कः संसारः॥10॥ आयु बीत जाने के बाद काम भाव नहीं रहता, पानी सूख जाने पर तालाब नहीं रहता, धन चले जाने पर परिवार नहीं रहता और तत्त्व ज्ञान होने के बाद संसार नहीं रहता। As soon as one grows old he looses potency-vigour-strength, after drying ponds-lakes loose their status as reservoirs, loss of wealth-poverty drives away the relatives and with the awakening of gist of the understanding of the Almighty; one looses charm of this world. मा कुरु धनजनयौवनगर्वं, हरति निमेषात्कालः सर्वं। मायामयमिदमखिलम् हित्वा, ब्रह्मपदम् त्वं प्रविश विदित्वा॥11॥ धन, शक्ति और यौवन पर गर्व मत करो, समय क्षण भर में इनको नष्ट कर देता है| इस विश्व को माया से घिरा हुआ जान कर तुम ब्रह्म पद में प्रवेश करो। One should not boast of wealth, strength-power-might and youth-vigor-vitality. The time-Kal will perish all these in a fraction of moment. He should consider this world to be illusion-perishable-destructible and make efforts to attain-achieve the Par Brahmn Parmeshwar. दिनयामिन्यौ सायं प्रातः, शिशिरवसन्तौ पुनरायातः। कालः क्रीडति गच्छत्यायुस्तदपि न मुन्च्त्याशावायुः॥12॥ दिन और रात, शाम और सुबह, सर्दी और बसंत बार-बार आते-जाते रहते हैं। काल की इस क्रीडा के साथ जीवन नष्ट होता रहता है; परन्तु इच्छाओ का अंत कभी नहीं होता है। Desires never vanish-diminish-satisfied from the mind of one with the expiry of time. He has to control-rein them. This can be achieved by diverting oneself towards the Almighty, through prayers-devotion. Day and night, dusk and dawn, winter and spring come and go, cyclically. In this sport of Time entire life goes away, but the storm of desire never departs or diminishes. द्वादशमंजरिकाभिरशेषः कथितो वैयाकरणस्यैषः। उपदेशोऽभूद्विद्यानिपुणैः, श्रीमच्छंकरभगवच्चरणैः॥12-1॥ बारह गीतों का ये उपदेश (-पुष्पहार, bouquet, garland), सर्वज्ञ प्रभुपाद श्री शंकराचार्य द्वारा एक वैयाकरण को प्रदान किया गया। This bouquet of twelve verses-Shlok-rhymes was imparted to a grammarian by the all-knowing, god-like Shri Shankrachary. This is apiece of preaching. काते कान्ता धन गतचिन्ता, वातुल किं तव नास्ति नियन्ता। त्रिजगति सज्जनसं गतिरैका, भवति भवार्णवतरणे नौका॥13॥ तुम्हें पत्नी और धन की इतनी चिंता क्यों है, क्या उनका कोई नियंत्रक नहीं है। तीनों लोकों में केवल सज्जनों का साथ ही इस भवसागर से पार जाने की नौका है। One should not worry about his wealth, family all the time. He should have faith in God who controls every thing. The virtuous company of the diligent-righteous-pious helps one in sailing through this vast reservoir of deeds-actions-mistakes-vices. Oh deluded! Why do you worry about your wealth and wife? Is there no one to take care of them? Only the company of saints can act as a boat in three worlds to take you out from this ocean-cycle of births and rebirths. जटिलो मुण्डी लुञ्छितकेशः, काषायाम्बरबहुकृतवेषः। पश्यन्नपि च न पश्यति मूढः, उदरनिमित्तं बहुकृतवेषः॥14॥ बड़ी जटाएं, केश रहित सिर, बिखरे बाल, काषाय (-भगवा) वस्त्र और भांति भांति के वेश; ये सब अपना पेट भरने के लिए ही धारण किये जाते हैं, अरे मोहित मनुष्य तुम इसको देख कर भी क्यों नहीं देख पाते हो! Matted and untidy hair, shaven heads, orange-saffron coloured cloths are all a way to earn livelihood by those who do not wish to earn their bread through righteous-honest means-hard work. O deluded man why don’t you understand it, even after seeing. अङ्गं गलितं पलितं मुण्डं, दशनविहीनं जतं तुण्डम्। वृद्धो याति गृहीत्वा दण्डं, तदपि न मुञ्चत्याशापिण्डम्॥15॥ क्षीण अंगों, पके हुए बालों, दांतों से रहित मुख और हाथ में दंड लेकर चलने वाला वृद्ध भी आशा-पाश से बंधा रहता है। Even an old man with weak limbs, hairless head, toothless mouth, walking with the help of a stick, still has high hopes-unfulfilled desires. Desires are unending. Fulfilment of one desire leads to yet another new one. अग्रे वह्निः पृष्ठेभानुः, रात्रौ चुबुकसमर्पितजानुः। करतलभिक्षस्तरुतलवासः, तदपि न मुञ्चत्याशापाशः॥16॥ सूर्यास्त के बाद, रात्रि में आग जला कर और घुटनों में सर छिपाकर सर्दी बचाने वाला, हाथ में भिक्षा का अन्न खाने वाला, पेड़ के नीचे रहने वाला भी अपनी इच्छाओं के बंधन को छोड़ नहीं पाता है। One who warms his body by fire after sunset living in the open under the sky-homeless, curls his body to his knees to avoid cold; eats the begged food and sleeps beneath the tree, he is also bound by desires, even in these difficult situations. Desires never die. कुरुते गङ्गासागरगमनं, व्रतपरिपालनमथवा दानम्। ज्ञानविहिनः सर्वमतेन, मुक्तिं न भजति जन्मशतेन॥17॥ किसी भी धर्म के अनुसार ज्ञान रहित रह कर गंगासागर जाने से, व्रत रखने से और दान देने से सौ जन्मों में भी मुक्ति नहीं प्राप्त हो सकती है। Its not possible to attain Salvation by visiting religious places of worship-pilgrimages, fasting, donations-charity, without understanding the gist of the religiosity, even in hundred births, by following any of the religion-Varnashram Dharm. सुर मंदिर तरु मूल निवासः, शय्या भूतल मजिनं वासः। सर्व परिग्रह भोग त्यागः, कस्य सुखं न करोति विरागः॥18॥ देव मंदिर या पेड़ के नीचे निवास, पृथ्वी जैसी शय्या, अकेले ही रहने वाले, सभी संग्रहों और सुखों का त्याग करने वाले वैराग्य से किसको आनंद की प्राप्ति नहीं होगी। Renunciation-detachment-relinquishment leads to bliss-Parmanand-Ultimate pleasure-Salvation. Reside in a temple or below a tree, sleep on mother earth as your bed, stay alone, leave all the belongings and comforts, such renunciation can give all the pleasures to anybody. योगरतो वाभोगरतोवा, सङ्गरतो वा सङ्गवीहिनः। यस्य ब्रह्मणि रमते चित्तं, नन्दति नन्दति नन्दत्येव॥19॥ कोई योग में लगा हो या भोग में, संग में आसक्त हो या निसंग हो, पर जिसका मन ब्रह्म में लगा है; वो ही आनंद करता है, आनन्द ही आनंद करता है। One may like meditative practice or worldly pleasures, may be attached or detached. But only one who fixing-trains his mind on God lovingly enjoys bliss, enjoys bliss, enjoys bliss. भगवद् गीता किञ्चिदधीता, गङ्गा जललव कणिकापीता। सकृदपि येन मुरारि समर्चा, क्रियते तस्य यमेन न चर्चा॥20॥ जिन्होंने भगवद् गीता का थोडा सा भी अध्ययन किया है, भक्ति रूपी गंगा जल का कण भर भी पिया है, भगवान कृष्ण की एक बार भी समुचित प्रकार से पूजा की है, यम के द्वारा उनकी चर्चा नहीं की जाती है। Those who have studied-understood-learnt Geeta, worship Bhagwan Shri Krashn with love & affection even for a while-once-a little-fraction of second, drink just a drop of water from the holy Ganga, Yam Raj-the deity of death has no control over them. पुनरपि जननं पुनरपि मरणं, पुनरपि जननी जठरे शयनम्। इह संसारे बहुदुस्तारे, कृपयाऽपारे पाहि मुरारे॥21॥ बार-बार जन्म, बार-बार मृत्यु, बार-बार माँ के गर्भ में शयन, इस संसार से पार जा पाना बहुत कठिन है। हे कृष्ण! कृपा करके मेरी इससे रक्षा करें। Repeated births and death, stay in the mother’s womb, makes it extremely difficult to go beyond this universe. Hey Murari! Please help me pass through all this by extending your grace-mercy. रथ्या चर्पट विरचित कन्थः, पुण्यापुण्य विवर्जित पन्थः। योगी योगनियोजित चित्तो, रमते बालोन्मत्तवदेव॥22॥ रथ के नीचे आने से फटे हुए कपडे पहनने वाले, पुण्य और पाप से रहित पथ पर चलने वाले, योग में अपने चित्त को लगाने वाले योगी, बालक के समान आनंद में रहते हैं। One who wears rags-teared cloths by coming under the chariot, travel-move on the path free from virtues and sins- a state of equanimity, trains their minds in the devotion to the Almighty through Yog-meditation, enjoys like a carefree exuberant child. कस्त्वं कोऽहं कुत आयातः, का मे जननी को मे तातः। इति परिभावय सर्वमसारम्, विश्वं त्यक्त्वा स्वप्न विचारम्॥23॥ तुम कौन हो, मैं कौन हूँ, कहाँ से आया हूँ, मेरी माँ कौन है, मेरा पिता कौन है? सब प्रकार से इस विश्व को असार समझ कर इसको एक स्वप्न के समान त्याग दो। Who are you ? Who am I ? From where have I come ? Who is my mother, who is my father ? Ponder over these and after understanding-realizing this world to be meaningless like a dream, relinquish it. त्वयि मयि चान्यत्रैको विष्णुः, व्यर्थं कुप्यसि मय्यसहिष्णुः। भव समचित्तः सर्वत्र त्वं, वाञ्छस्यचिराद्यदि विष्णुत्वम्॥24॥ तुममें, मुझमें और अन्यत्र भी सर्वव्यापक विष्णु ही हैं, तुम व्यर्थ ही क्रोध करते हो, यदि तुम शाश्वत विष्णु पद को प्राप्त करना चाहते हो तो सर्वत्र समान चित्त वाले हो जाओ। Bhagwan Vishnu resides in me, you and everything-every one else. So, your anger is meaningless-useless. If you wish to attain the eternal status of Vishnu, practice equanimity all the time, in all the things. शत्रौ मित्रे पुत्रे बन्धौ, मा कुरु यत्नं विग्रहसन्धौ। सर्वस्मिन्नपि पश्यात्मानं, सर्वत्रोत्सृज भेदाज्ञानम्॥25॥ शत्रु, मित्र, पुत्र, बन्धु-बांधवों से प्रेम और द्वेष मत करो, सबमें अपने आप को ही देखो, इस प्रकार सर्वत्र ही भेद रूपी अज्ञान को त्याग दो। Bhagwan Vishnu is present in each and every one of us, in the form of soul. Its only the body which discriminate between the two. Try not to win the love of your friends, brothers, relatives and son(s) or to fight with your enemies. See yourself in each and everyone and give up ignorance of duality everywhere. Practice equanimity. [One must be ready to protect his kith and kin and him self, in stead of surrendering to situations, till he is a household undergoing Grahasthashram (-गृहस्थाश्रम) Varnashram Dharm. कामं क्रोधं लोभं मोहं, त्यक्त्वाऽत्मानं भावय कोऽहम्। आत्मज्ञान विहीना मूढाः, ते पच्यन्ते नरकनिगूढाः॥26॥ काम, क्रोध, लोभ, मोह को छोड़ कर, स्वयं में स्थित होकर विचार करो कि मैं कौन हूँ ? जो आत्म-ज्ञान से रहित मोहित व्यक्ति हैं; वो बार-बार छिपे हुए इस संसार रूपी नरक में पड़ते हैं। Give up desires, anger, greed and delusion. Ponder over your real self-nature. Those devoid of the knowledge of self, come in this world-a hidden hell, endlessly. गेयं गीता नाम सहस्रं, ध्येयं श्रीपति रूपमजस्रम्। नेयं सज्जन सङ्गे चित्तं, देयं दीनजनाय च वित्तम्॥27॥ भगवान विष्णु के सहस्त्र नामों को गाते हुए उनके सुन्दर रूप का अनवरत ध्यान करो, सज्जनों के संग में अपने मन को लगाओ और गरीबों की अपने धन से सेवा करो। Sing thousand glories of Bhagwan Vishnu, constantly remembering his various forms in your heart. Enjoy the company of virtuous-righteous-pious-noble people and do acts of charity for the poor, down trodden and the needy. सुखतः क्रियते रामाभोगः,पश्चाद्धन्त शरीरे रोगः। यद्यपि लोके मरणं शरणं, तदपि न मुञ्चति पापाचरणम्॥28॥ सुख के लिए लोग आनंद-भोग करते हैं, जिसके बाद इस शरीर में रोग हो जाते हैं। यद्यपि इस पृथ्वी पर सबका मरण सुनिश्चित है, फिर भी लोग पापमय आचरण को नहीं छोड़ते। People use this body for pleasure-enjoyment-passions-sexuality-sensuality-lust, which gets diseased in the end. Though in this world everything ends in death, man does not give up the sinful conduct. Greed, unfulfilled desires always keep him pushing to wretchedness-vices-sins-misconduct. अर्थंमनर्थम् भावय नित्यं, नास्ति ततः सुखलेशः सत्यम्। पुत्रादपि धनभजाम् भीतिः, सर्वत्रैषा विहिता रीतिः॥29॥ धन अकल्याणकारी है और इससे जरा सा भी सुख नहीं मिल सकता है, ऐसा विचार प्रतिदिन करना चाहिए। धनवान व्यक्ति तो अपने पुत्रों से भी डरते हैं; ऐसा सबको पता ही है। Keep on thinking that money is root cause of all troubles. It cannot give even a bit of happiness-pleasure. A rich man fears even his own sons, who are willing to kill him for the sake of wealth, luxuries. This is the law nature pertaining to riches and applicable to every one-everywhere. प्राणायामं प्रत्याहारं, नित्यानित्य विवेकविचारम्। जाप्यसमेत समाधिविधानं, कुर्ववधानं महदवधानम्॥30॥ प्राणायाम, उचित आहार, नित्य इस संसार की अनित्यता का विवेक पूर्वक विचार करो, प्रेम से प्रभु-नाम का जाप करते हुए समाधि में ध्यान दो, बहुत ध्यान दो। Perform-conduct-practice Pranayam, the regulation of life forces, take proper food, constantly distinguish the permanent from the fleeting. Chant the holy names of God with love and meditate, with utmost attention. One must utilize his prudence-intelligence to abandon vices-sins-wretchedness. गुरुचरणाम्बुज निर्भर भक्तः, संसारादचिराद्भव मुक्तः। सेन्द्रियमानस नियमादेवं, द्रक्ष्यसि निज हृदयस्थं देवम्॥31॥ गुरु के चरण कमलों का ही आश्रय मानने वाले भक्त बनकर सदैव के लिए इस संसार में आवागमन से मुक्त हो जाओ, इस प्रकार मन एवं इन्द्रियों का निग्रह कर अपने हृदय में विराजमान प्रभु के दर्शन करो। One must take shelter-asylum-protection under the auspiciousness of his Guru-guide like a devotee and set him self free from the clutches of this perishable world. This will help him in acquiring control over sensuality-vulgarity-useless thoughts-dirty ideas-irrational thoughts. One should become free from repeated cycles of death and births. This will lead to self control over mind, ideas and retain the Almighty in the heart. मूढः कश्चन वैयाकरणो, डुकृञ्करणाध्ययन धुरिणः। श्रीमच्छम्कर भगवच्छिष्यै, बोधित आसिच्छोधितकरणः॥32॥ इस प्रकार व्याकरण के नियमों को कंठस्थ करते हुए किसी मोहित वैयाकरण के माध्यम से बुद्धिमान श्री भगवान शंकर के शिष्य बोध प्राप्त करने के लिए प्रेरित किये गए। Thus through a deluded grammarian lost in memorising rules of the grammar, the all knowing Shri Shankar motivated his disciples for enlightenment. भजगोविन्दं भजगोविन्दं, गोविन्दं भजमूढमते। नामस्मरणादन्यमुपायं, नहि पश्यामो भवतरणे॥33॥ गोविंद को भजो, गोविन्द का नाम लो, गोविन्द से प्रेम करो क्योंकि भगवान के नाम जप के अतिरिक्त इस भव-सागर से पार जाने का अन्य कोई मार्ग नहीं है। O the deluded minded, chant Govind, worship Govind, love Govind; as there is no other way to cross the life’s ocean except lovingly remembering the holy names of God.
नवग्रह स्तोत्र (Navagraha Stotram) – अर्थ और लाभ नवग्रह स्तोत्र (Navagraha Stotram) – अर्थ, महत्त्व और संपूर्ण पाठ नवग्रह स्तोत्र (Navagraha Stotram) हिंदू धर्म का एक अत्यंत प्रभावशाली और पवित्र स्तोत्र है। इसकी रचना महर्षि वेदव्यास ने नौ ग्रहों (नवग्रहों) को शांत करने और उनकी कृपा प्राप्त करने के लिए की थी। ज्योतिष शास्त्र के… Read more: Navagraha Stotram (नवग्रह स्तोत्रम्)
शिव पंचाक्षर स्तोत्र – अर्थ और बोल | Shiv Panchakshar Stotra Lyrics & Meaning in Hindi शिव पंचाक्षर स्तोत्र (Shiv Panchakshar Stotra) रचयिता: आदि शंकराचार्य (Adi Shankaracharya) परिचय (About) शिव पंचाक्षर स्तोत्र भगवान शिव की उपासना में रचित सबसे लोकप्रिय और प्रभावशाली स्तोत्रों में से एक है। इसकी रचना आदि शंकराचार्य ने की थी। यह… Read more: शिव पंचाक्षर स्तोत्र (Shiv Panchakshar Stotra)
सिद्ध कुंजिका स्तोत्रम् (Siddha Kunjika Stotram) – अर्थ और महत्व सिद्ध कुंजिका स्तोत्रम्: दुर्गा सप्तशती की गुप्त कुंजी कलाकार/स्रोत: परंपरागत (रुद्रयामल तन्त्र) परिचय (About) सिद्ध कुंजिका स्तोत्र (Siddha Kunjika Stotram) हिंदू धर्म में शाक्त परंपरा का एक अत्यंत प्रभावशाली और पवित्र स्तोत्र है। रुद्रयामल तंत्र के अंतर्गत गौरी तंत्र में वर्णित यह स्तोत्र भगवान शिव… Read more: सिद्ध कुंजिका स्तोत्र (Siddha Kunjika Stotram)
श्रीरामरक्षास्तोत्रम् (Ram Raksha Stotra) – अर्थ और महात्म्य श्रीरामरक्षास्तोत्रम् (Ram Raksha Stotra): सुरक्षा और भक्ति का दिव्य कवच रचियता: बुधकौशिक ऋषि (Budha Kaushika Rishi) श्रीरामरक्षास्तोत्रम्, जिसे भगवान राम का ‘रक्षा कवच’ भी कहा जाता है, वैदिक परंपरा के सबसे शक्तिशाली और लोकप्रिय स्तोत्रों में से एक है। यह स्तोत्र न केवल मन को शांति देता… Read more: श्रीरामरक्षास्तोत्रम् (Ram Raksha Stotra)
By Anuradha Paudwal (अनुराधा पौडवाल) जय अम्बे गौरी आरती – अनुराधा पौडवाल | Jai Ambe Gauri Lyrics & Meaning जय अम्बे गौरी आरती: लिरिक्स और अर्थ कलाकार: अनुराधा पौडवाल (Anuradha Paudwal) | शैली: भक्ति संगीत यह पृष्ठ प्रसिद्ध दुर्गा आरती ‘जय अम्बे गौरी’ को समर्पित है। यहाँ आप इसके हिंदी लिरिक्स, रोमन लिप्यंतरण, और इसके गहरे… Read more: Jai Ambe Gauri (जय अम्बे गौरी)
अयि गिरिनन्दिनि नन्दितमेदिनि विश्वविनोदिनि नन्दिनुते गिरिवरविन्ध्यशिरोऽधिनिवासिनि विष्णुविलासिनि जिष्णुनुते । भगवति हे शितिकण्ठकुटुम्बिनि भूरिकुटुम्बिनि भूरिकृते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १ ॥
सुरवरवर्षिणि दुर्धरधर्षिणि दुर्मुखमर्षिणि हर्षरते त्रिभुवनपोषिणि शङ्करतोषिणि किल्बिषमोषिणि घोषरते दनुजनिरोषिणि दितिसुतरोषिणि दुर्मदशोषिणि सिन्धुसुते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ २ ॥
अयि जगदम्ब मदम्ब कदम्ब वनप्रियवासिनि हासरते शिखरि शिरोमणि तुङ्गहिमालय शृङ्गनिजालय मध्यगते । मधुमधुरे मधुकैटभगञ्जिनि कैटभभञ्जिनि रासरते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ३ ॥
अयि शतखण्ड विखण्डितरुण्ड वितुण्डितशुण्द गजाधिपते रिपुगजगण्ड विदारणचण्ड पराक्रमशुण्ड मृगाधिपते । निजभुजदण्ड निपातितखण्ड विपातितमुण्ड भटाधिपते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ४ ॥
अयि रणदुर्मद शत्रुवधोदित दुर्धरनिर्जर शक्तिभृते चतुरविचार धुरीणमहाशिव दूतकृत प्रमथाधिपते । दुरितदुरीह दुराशयदुर्मति दानवदुत कृतान्तमते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ५ ॥
अयि शरणागत वैरिवधुवर वीरवराभय दायकरे त्रिभुवनमस्तक शुलविरोधि शिरोऽधिकृतामल शुलकरे । दुमिदुमितामर धुन्दुभिनादमहोमुखरीकृत दिङ्मकरे जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ६ ॥
अयि निजहुङ्कृति मात्रनिराकृत धूम्रविलोचन धूम्रशते समरविशोषित शोणितबीज समुद्भवशोणित बीजलते । शिवशिवशुम्भ निशुम्भमहाहव तर्पितभूत पिशाचरते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ७ ॥
धनुरनुषङ्ग रणक्षणसङ्ग परिस्फुरदङ्ग नटत्कटके कनकपिशङ्ग पृषत्कनिषङ्ग रसद्भटशृङ्ग हताबटुके । कृतचतुरङ्ग बलक्षितिरङ्ग घटद्बहुरङ्ग रटद्बटुके जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ८ ॥
सुरललना ततथेयि तथेयि कृताभिनयोदर नृत्यरते कृत कुकुथः कुकुथो गडदादिकताल कुतूहल गानरते । धुधुकुट धुक्कुट धिंधिमित ध्वनि धीर मृदङ्ग निनादरते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ९ ॥
जय जय जप्य जयेजयशब्द परस्तुति तत्परविश्वनुते झणझणझिञ्झिमि झिङ्कृत नूपुरशिञ्जितमोहित भूतपते । नटित नटार्ध नटी नट नायक नाटितनाट्य सुगानरते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १० ॥
अयि सुमनःसुमनःसुमनः सुमनःसुमनोहरकान्तियुते श्रितरजनी रजनीरजनी रजनीरजनी करवक्त्रवृते । सुनयनविभ्रमर भ्रमरभ्रमर भ्रमरभ्रमराधिपते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ११ ॥
सहितमहाहव मल्लमतल्लिक मल्लितरल्लक मल्लरते विरचितवल्लिक पल्लिकमल्लिक झिल्लिकभिल्लिक वर्गवृते । शितकृतफुल्ल समुल्लसितारुण तल्लजपल्लव सल्ललिते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १२ ॥
अविरलगण्ड गलन्मदमेदुर मत्तमतङ्ग जराजपते त्रिभुवनभुषण भूतकलानिधि रूपपयोनिधि राजसुते । अयि सुदतीजन लालसमानस मोहन मन्मथराजसुते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १३ ॥
कमलदलामल कोमलकान्ति कलाकलितामल भाललते सकलविलास कलानिलयक्रम केलिचलत्कल हंसकुले । अलिकुलसङ्कुल कुवलयमण्डल मौलिमिलद्बकुलालिकुले जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १४ ॥
करमुरलीरव वीजितकूजित लज्जितकोकिल मञ्जुमते मिलितपुलिन्द मनोहरगुञ्जित रञ्जितशैल निकुञ्जगते । निजगणभूत महाशबरीगण सद्गुणसम्भृत केलितले जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १५ ॥
कटितटपीत दुकूलविचित्र मयुखतिरस्कृत चन्द्ररुचे प्रणतसुरासुर मौलिमणिस्फुर दंशुलसन्नख चन्द्ररुचे जितकनकाचल मौलिमदोर्जित निर्भरकुञ्जर कुम्भकुचे जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १६ ॥
विजितसहस्रकरैक सहस्रकरैक सहस्रकरैकनुते कृतसुरतारक सङ्गरतारक सङ्गरतारक सूनुसुते । सुरथसमाधि समानसमाधि समाधिसमाधि सुजातरते । जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १७ ॥
पदकमलं करुणानिलये वरिवस्यति योऽनुदिनं सुशिवे अयि कमले कमलानिलये कमलानिलयः स कथं न भवेत् । तव पदमेव परम्पदमित्यनुशीलयतो मम किं न शिवे जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १८ ॥
कनकलसत्कलसिन्धुजलैरनुषिञ्चति तेगुणरङ्गभुवम् भजति स किं न शचीकुचकुम्भतटीपरिरम्भसुखानुभवम् । तव चरणं शरणं करवाणि नतामरवाणि निवासि शिवम् जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १९ ॥
तव विमलेन्दुकुलं वदनेन्दुमलं सकलं ननु कूलयते किमु पुरुहूतपुरीन्दु मुखी सुमुखीभिरसौ विमुखीक्रियते । मम तु मतं शिवनामधने भवती कृपया किमुत क्रियते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ २० ॥
अयि मयि दीन दयालुतया कृपयैव त्वया भवितव्यमुमे अयि जगतो जननी कृपयासि यथासि तथानुमितासिरते । यदुचितमत्र भवत्युररीकुरुतादुरुतापमपाकुरुते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ २१ ॥
Pada-Kamalam Karunnaa-Nilaye Varivasyati Yo-[A]nudinam Su-Shive Ayi Kamale Kamalaa-Nilaye Kamalaa-Nilayah Sa Katham Na Bhavet | Tava Padam-Eva Param-Padam-Ity-Anushiilayato Mama Kim Na Shive Jaya Jaya He Mahissaasura-Mardini Ramya-Kapardini Shaila-Sute || 18 ||
Kanaka-Lasat-Kala-Sindhu-Jalair-Anussinccati Te-Gunna-Rangga-Bhuvam Bhajati Sa Kim Na Shacii-Kuca-Kumbha-Tattii-Parirambha-Sukha-[A]nubhavam | Tava Carannam Sharannam Kara-Vaanni Nata-Amara-Vaanni Nivaasi Shivam Jaya Jaya He Mahissaasura-Mardini Ramya-Kapardini Shaila-Sute || 19 ||
Tava Vimale[a-I]ndu-Kulam Vadane[a-I]ndu-Malam Sakalam Nanu Kuula-Yate Kimu Puruhuuta-Purii-Indu Mukhii Sumukhiibhir-Asou Vimukhii-Kriyate | Mama Tu Matam Shiva-Naama-Dhane Bhavatii Krpayaa Kimuta Kriyate Jaya Jaya He Mahissaasura-Mardini Ramya-Kapardini Shaila-Sute || 20 ||
अयिगिरि का अर्थ है पर्वतराज कि पुत्री (गिरि का अर्थ है पर्वत) और नंदिनी का अर्थ है जो दुनिया को खुशी/आनंद देती है। यह दुर्गा अवतार में देवी पार्वती को संदर्भित करता है जिन्होंने महिषासुर राक्षस का वध किया था। यही कारण है कि उन्हें महिषासुर मर्दिनी भी कहा जाता है।
आईगिरी नंदिनी किसने लिखी है?
ऐगिरि नंदिनी की रचना आदि गुरु शंकराचार्य ने संस्कृत में की थी।
महिषासुर का क्या अर्थ है?
महिष शब्द का अर्थ है भैंसा और असुर का अर्थ है राक्षस। अतः महिषासुर का अर्थ भैंसा राक्षस है।
दुर्गा ने महिषासुर का वध कैसे किया?
महिषासुर एक राक्षस था जो जल्दी से अपना रूप बदल सकता था। उसे वरदान था कि वह कभी किसी मनुष्य के हाथों नहीं मारा जायेगा। जब इंद्र के नेतृत्व में भगवान और महिषासुर के नेतृत्व में राक्षसों के बीच युद्ध शुरू हुआ, तो देवता हार गए। निराश होकर देवताओं ने अपनी दिव्य शक्तियों को देवी दुर्गा में समाहित कर दिया। इसके बाद मां दुर्गा ने महिषासुर से 15 दिनों तक युद्ध किया और राक्षस महिषासुर का वध कर दिया।
एक प्रचलित लोककथा के अनुसार
यह स्तोत्र श्री आदि शंकराचार्य श्री मुख से गाया हुआ माँ भगवती का अत्यंत प्रिय स्तोत्र है। इसकी रचना उन्होंने स्वयं की थी।
इसकी उत्पत्ति के बारे में एक पौराणिक कथा प्रचलित है, जो आदि गुरु के जीवन की एक घटना से ली गई है।
एक बार वे अपने शिष्यों के साथ एक बहुत संकरी गली से स्नान के लिए मणिकर्णिका घाट जा रहे थे, मणिकर्णिका घाट एक श्मशान घाट भी है।
सड़क पर एक युवती अपने मृत पति का सिर गोद में लेकर बैठी विलाप कर रही थी, सड़क संकरी होने के कारण शव को हटाना आवश्यक था, न कि उसे पार करना, सड़क पार करना, हमारे धर्म में किसी भी व्यक्ति को पार करना स्वयं भगवान को पार करना है, इसलिए यह बिल्कुल वर्जित है।
उनके शिष्यों ने महिला से अपने पति के शव को हटाने और रास्ता देने की प्रार्थना की, किंतु महिला ने उनकी बात सुनकर भी अनसुनी कर दी और सुने बिना ही रोती रही। तब आचार्य ने स्वयं उनसे शव हटाने का अनुरोध किया।
उनकी विनती सुनकर वह स्त्री कहने लगी- ‘हे महात्मा! आप बार-बार मुझसे इस शरीर को हटाने के लिए कह रहे हैं। आप इसी शरीर को जाने के लिए क्यों नहीं कहते?’
यह सुनकर आचार्य ने कहा-हे देवी! शायद तुम शोक में यह भूल गयी हो कि शव में स्वयं हिलने-डुलने की शक्ति नहीं होती।’
स्त्री ने तुरंत उत्तर दिया – ‘महात्मा, आपके अनुसार शक्तिहीन ब्रह्म ही संसार का कर्ता है। तो फिर इस शरीर को बिना शक्ति के हटाया क्यों नहीं जा सकता?’
उस स्त्री का इतना गंभीर, ज्ञानपूर्ण, रहस्यमय वाक्य सुनकर आचार्य वहीं बैठ गए, उन्हें समाधि लग गई और समाधि में निमग्न होकर उन्होंने सारे रहस्य को समझ लिया।
सर्वत्र आद्या शक्ति महामाया लीला का विलास है। उनका हृदय अवर्णनीय आनंद से भर गया और मातृवंदन के शब्द उनके मुख से इस महिषासुर मर्दिनी स्तोत्र के रूप में आविर्भूत होने लगे ।
महिषासुर मर्दिनी स्तोत्र के पाठ का बड़ा महत्व है |
इस स्तोत्र को बहुत शक्तिशाली माना जाता है, मान्यताओं के अनुसार इस स्तोत्र का पाठ करने से व्यक्ति के जीवन में आने वाली बाधाएंँ दूर हो जाती हैं।
यह भी माना जाता है कि जिसे शक्ति की इच्छा हो उसे इस स्तोत्र से मांँ भगवती की आराधना करनी चाहिए। इनकी पूजा करने से बड़े से बड़े दुःख भी तुरंत दूर हो जाते हैं।
वैसे तो हिंदू धर्मग्रंथों में मां की पूजा के कई तरीके बताए गए हैं, लेकिन उनमें से इस स्तोत्र का पाठ करना अत्यंत कल्याणकारी माना गया है। आद्य शंकराचार्य स्वयं एक सिद्ध पुरुष थे और इस महान स्तोत्र में उनकी योग शक्ति का अलौकिक प्रभाव भी है जिससे यह अत्यधिक सकारात्मक ऊर्जा के साथ सक्रिय रूप से उत्तम प्रभाव को प्रदान करने वाला है।
शास्त्रों में कहा गया है कि जो व्यक्ति दिन में एक बार भी मां महिषासुर मर्दिनी स्तोत्र का पाठ करता है, उसके जीवन में कोई खतरा/भय नहीं रहता और वह कभी नरक नहीं जाता। अर्थात उसके जीवन का जीते जी ही कल्याण हो जाता है।
स्तोत्र के रचयिता आदि शंकराचार्य
आदि शंकराचार्य, जिन्हें अक्सर आदि शंकराचार्य के रूप में जाना जाता है, हिंदू दर्शन में एक मौलिक व्यक्ति थे और अद्वैत वेदांत के एक प्रमुख प्रस्तावक थे, जो हिंदू धर्म में वेदांत दर्शन के मुख्य उप-विद्यालयों में से एक है। अद्वैत वेदांत, जो वेदों के “गैर-द्वैतवादी निष्कर्ष” का अनुवाद करता है, दावा करता है कि सच्चा आत्म, आत्मा, उच्चतम आध्यात्मिक वास्तविकता, ब्रह्म के समान है।
आठवीं शताब्दी ईस्वी के आसपास वर्तमान केरल, भारत में जन्मे, शंकर कम उम्र से ही अपनी विद्वता और आध्यात्मिक कौशल के लिए जाने जाते थे। उन्होंने उपनिषदों और अन्य हिंदू धर्मग्रंथों का अध्ययन करते हुए एक भटकते भिक्षु बनने के लिए कम उम्र में अपना घर छोड़ दिया।
शंकर हिंदू दर्शन के विभिन्न ग्रंथों पर अपनी टिप्पणियों के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने उपनिषदों, भगवद गीता और ब्रह्म सूत्र पर व्यापक टिप्पणियाँ लिखीं। इन कार्यों का हिंदू दर्शन पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ा है और पूरे भारत में अद्वैत वेदांत दर्शन को समझाने और फैलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
शंकर ने भारत के चार कोनों में चार मठों (मठों) की भी स्थापना की, जिससे अद्वैत वेदांत के ऐतिहासिक विकास, पुनरुद्धार और प्रसार में सहायता मिली। ऐसा माना जाता है कि आदि शंकराचार्य की मृत्यु 32 वर्ष की आयु में हुई थी, फिर भी भारत की दार्शनिक परंपराओं और आध्यात्मिकता पर उनका प्रभाव बहुत अधिक है।
यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि आदि शंकराचार्य को आधुनिक शंकराचार्यों के साथ भ्रमित नहीं किया जाना चाहिए, जो आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित मठों के प्रमुख हैं और हिंदू धर्म के भीतर विभिन्न संप्रदायों के आध्यात्मिक नेता माने जाते हैं।
आदि शंकराचार्य ने अपने पूरे जीवन में पारंपरिक हिंदू मान्यताओं और प्रथाओं की रक्षा और पुनर्स्थापना का लक्ष्य रखा। उन्होंने कुछ विचारधाराओं की कर्मकांडीय प्रथाओं के विरुद्ध जमकर बहस की और अपने समय के दौरान लोकप्रिय विभिन्न धार्मिक मान्यताओं, जैसे बौद्ध धर्म और जैन धर्म की आलोचना कि और उनकी कमियों कि ओर ध्यान दिलाया।
उनके दर्शन का मुख्य पहलू, अद्वैत वेदांत, बौद्ध विचार और अन्य द्वैतवादी दर्शन के प्रभुत्व की प्रतिक्रिया थी जो परमात्मा और व्यक्तिगत स्व के बीच अंतर मानते थे। जवाब में, शंकर ने वास्तविकता का एक अद्वैतवादी (अद्वैत) दृष्टिकोण विकसित और प्रचारित किया, यह तर्क देते हुए कि व्यक्तिगत स्व और अंतिम वास्तविकता, या ब्रह्म, एक ही हैं।
इसे उपनिषदों के महान कथनों (महावाक्य) में से एक में संक्षेपित किया गया है: “तत् त्वम असि” या “आप वह हैं”, जिसमें “वह” ब्रह्म का संदर्भ देता है। शंकर के अनुसार, हमारे वास्तविक स्वरूप की अज्ञानता (अविद्या) दुख (संसार) का कारण है, और मुक्ति (मोक्ष) व्यक्तिगत स्व (आत्मान) और सार्वभौमिक स्व (ब्राह्मण) की एकता की प्राप्ति से प्राप्त होती है।
शंकर ने अपनी शिक्षाओं का प्रचार करने के तरीकों में एक कई भजनों और ग्रंथों की रचना की थी जो आज भी हिंदू धार्मिक प्रथाओं में व्यापक रूप से उपयोग किए जाते हैं। उदाहरण के लिए, उन्होंने विवेकचूड़ामणि (भेदभाव का शिखर रत्न), आध्यात्मिक पथ पर साधकों के लिए एक मैनुअल, और भज गोविंदम (गोविंदा की पूजा करें), एक लोकप्रिय भक्ति भजन की रचना की।
संक्षेप में, आदि शंकराचार्य को हिंदू दर्शन में एक महान व्यक्ति के रूप में सम्मानित किया जाता है। उनका अद्वैत वेदांत हिंदू धर्म में प्रमुख दार्शनिक विद्यालयों में से एक है, और उनकी शिक्षाएं दुनिया भर में लाखों लोगों को प्रेरित और मार्गदर्शन करती रहती हैं। हिंदू धर्म को एकजुट करने और पुनर्जीवित करने के उनके प्रयासों का धर्म और समग्र रूप से भारतीय संस्कृति पर स्थायी प्रभाव पड़ा है।
कामानवाप्नुयात्कामी प्रजार्थी चाप्नुयात्प्रजाः ॥ ४ ॥
भक्तिमान् यस्सदोत्थाय शुचिस्तद्गतमानसः ।
सहस्रं वासुदेवस्य नाम्नामेतत्प्रकीर्तयेत् ॥ ५ ॥
यशः प्राप्नोति विपुलं याति प्राधान्यमेव च ।
अचलां श्रियमाप्नोति श्रेयः प्राप्नोत्यनुत्तमम् ॥ ६ ॥
न भयं क्वचिदाप्नोति वीर्यं तेजश्च विन्दति ।
भवत्यरोगो द्युतिमान्बलरूपगुणान्वितः ॥ ७ ॥
रोगार्तो मुच्यते रोगाद्बद्धो मुच्येत बन्धनात् ।
भयान्मुच्येत भीतस्तु मुच्येतापन्न आपदः ॥ ८ ॥
दुर्गाण्यतितरत्याशु पुरुषः पुरुषोत्तमम् ।
स्तुवन्नामसहस्रेण नित्यं भक्तिसमन्वितः ॥ ९ ॥
वासुदेवाश्रयो मर्त्यो वासुदेवपरायणः ।
सर्वपापविशुद्धात्मा याति ब्रह्म सनातनम् ॥ १० ॥
न वासुदेवभक्तानामशुभं विद्यते क्वचित् ।
जन्ममृत्युजराव्याधिभयं नैवोपजायते ॥ ११ ॥
इमं स्तवमधीयानः श्रद्धाभक्तिसमन्वितः ।
युज्येतात्मा सुखक्षान्ति श्रीधृतिस्मृतिकीर्तिभिः ॥ १२ ॥
न क्रोधो न च मात्सर्यं न लोभो नाशुभामतिः ।
भवन्ति कृत पुण्यानां भक्तानां पुरुषोत्तमे ॥ १३ ॥
द्यौस्सचन्द्रार्कनक्षत्रं खं दिशो भूर्महोदधिः ।
वासुदेवस्य वीर्येण विधृतानि महात्मनः ॥ १४ ॥
स सुरासुरगन्धर्वं सयक्षोरगराक्षसम् ।
जगद्वशे वर्ततेदं कृष्णस्य सचराचरम् ॥ १५ ॥
इन्द्रियाणि मनो बुद्धिस्सत्त्वं तेजो बलं धृतिः ।
वासुदेवात्मकान्याहुः क्षेत्रं क्षेत्रज्ञ एव च ॥ १६ ॥
सर्वागमानामाचारः प्रथमं परिकल्पितः ।
आचारप्रभवो धर्मो धर्मस्य प्रभुरच्युतः ॥ १७ ॥
ऋषयः पितरो देवा महाभूतानि धातवः ।
जङ्गमाजङ्गमं चेदं जगन्नारायणोद्भवम् ॥ १८ ॥
योगो ज्ञानं तथा साङ्ख्यं विद्याश्शिल्पादि कर्म च ।
वेदाश्शास्त्राणि विज्ञानमेतत्सर्वं जनार्दनात् ॥ १९ ॥
एको विष्णुर्महद्भूतं पृथग्भूतान्यनेकशः ।
त्रीन्लोकान्व्याप्य भूतात्मा भुङ्क्ते विश्वभुगव्ययः ॥ २० ॥
इमं स्तवं भगवतो विष्णोर्व्यासेन कीर्तितम् ।
पठेद्य इच्छेत्पुरुषः श्रेयः प्राप्तुं सुखानि च ॥ २१ ॥
विश्वेश्वरमजं देवं जगतः प्रभुमव्ययम् ।
भजन्ति ये पुष्कराक्षं न ते यान्ति पराभवम् ॥ २२ ॥
न ते यान्ति पराभवम् ओं नम इति ।
अर्जुन उवाच ।
पद्मपत्रविशालाक्ष पद्मनाभ सुरोत्तम ।
भक्तानामनुरक्तानां त्राता भव जनार्दन ॥ २३ ॥
श्री भगवानुवाच ।
यो मां नामसहस्रेण स्तोतुमिच्छति पाण्डव ।
सोऽहमेकेन श्लोकेन स्तुत एव न संशयः ॥ २४ ॥
स्तुत एव न संशय ओं नम इति ।
व्यास उवाच ।
वासनाद्वासुदेवस्य वासितं ते जगत्त्रयम् ।
सर्वभूतनिवासोऽसि वासुदेव नमोऽस्तु ते ॥ २५ ॥
श्री वासुदेव नमोऽस्तुत ओं नम इति ।
पार्वत्युवाच ।
केनोपायेन लघुना विष्णोर्नामसहस्रकम् ।
पठ्यते पण्डितैर्नित्यं श्रोतुमिच्छाम्यहं प्रभो ॥ २६ ॥
ईश्वर उवाच ।
श्रीराम राम रामेति रमे रामे मनोरमे ।
सहस्रनाम तत्तुल्यं राम नाम वरानने ॥ २७ ॥
श्रीरामनाम वरानन ओं नम इति ।
ब्रह्मोवाच ।
नमोऽस्त्वनन्ताय सहस्रमूर्तये
सहस्रपादाक्षिशिरोरुबाहवे ।
सहस्रनाम्ने पुरुषाय शाश्वते
सहस्रकोटीयुगधारिणे नमः ॥ २८ ॥
सहस्रकोटीयुगधारिणे ओं नम इति ।
सञ्जय उवाच ।
यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः ।
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम ॥ २९ ॥
श्री भगवानुवाच ।
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते ।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ॥ ३० ॥
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥ ३१ ॥
आर्ता विषण्णाश्शिथिलाश्च भीताः
घोरेषु च व्याधिषु वर्तमानाः ।
सङ्कीर्त्य नारायणशब्दमात्रं
विमुक्तदुःखास्सुखिनो भवन्ति ॥ ३२ ॥
[** अधिकश्लोकाः –
यदक्षर पदभ्रष्टं मात्राहीनं तु यद्भवेत् ।
तत्सर्वं क्षम्यतां देव नारायण नमोऽस्तु ते ॥
कायेन वाचा मनसेन्द्रियैर्वा
बुद्ध्यात्मना वा प्रकृतेस्स्वभावात् ।
करोमि यद्यत्सकलं परस्मै
नारायणायेति समर्पयामि ॥
**]
इति श्रीमहाभारते शतसहस्रिकायां संहितायां वैयासिक्यां अनुशासनपर्वान्तर्गत अनुशासनिकपर्वणि मोक्षधर्मे भीष्म युधिष्ठिर संवादे श्री विष्णोर्दिव्यसहस्रनामस्तोत्रम् नाम एकोनपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ।
इति श्रीविष्णुसहस्रनाम स्तोत्रम् ॥
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Vishnu Sahasranamam Stotram Lyrics 1000 Names
Vishnu Sahasranama Stotra or Venkateshwara Sahasra Namam Stothram is the devotional Vedic Hymns which explains the thousand (1000) names of Lord Vishnu. Vishnusahasranama Stotra is found in the 149th chapter Anushasanika Parvam of the Great Epic Mahabharatha. The famous warrior Bhishma Pitamaha teaches the Vishnu Sahasranama sloka to Yudishtra, the eldest of Pancha Pandavas.
There is another version of Vishnu Sahasranama Stotra found in the Padma Purana, one of the major eighteen Puranas. However, the Vishnu Sahasranamam found in the Mahabharatha is the most popular version.
Vishnu Sahasranamam Stotram Lyrics In English – 1000 Names of Vishnu
Aeshame Sarva Dharmanam Dharmadhika Tamo Matha, Yad Bhaktyo Pundarikaksham Stuvyr-Archanayr-Nara Sada, Paramam Yo Mahatteja, Paramam Yo Mahattapa Paramam Yo Mahad Brahma Paramam Ya Parayanam
Pavithranam Pavithram Yo Mangalanam Cha Mangalam, Dhaivatham Devathanam Cha Bhootanam Yo Vya Pitha Yatha Sarvani Bhoothani Bhavandyathi Yugagame Yasmincha Pralayam Yanthi Punareve Yuga Kshaye
Tasya Loka Pradhanasya Jagannatathasya Bhoopathe Vishno Nama Sahasram Me Srunu Papa Bhayapaham Yani Namani Gounani Vikhyatani Mahatmanah Rishibhih Parigeetani Tani Vakshyami Bhootaye
Namo Stvana-Ntaya Saha-Sramurtaye Saha-Srapaa-Dakshi Shiroru-Bahave Saha-Sranaamne Puru-Shaya Shashvate Saha-Srakoti-Yuga-Dharine Namah Saha-Srakoti Yuga-Dharina Om Nama Iti
श्री विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र का श्रद्धा भाव से किया गया पाठ अद्भुत शक्तियां प्रदान करता है !
श्री विष्णु सहस्रनाम की उत्पत्ति महाभारत से मानी जाती है, जब पितामह भीष्म, पांडवों से घिरे मृत्यु शैय्या पर अपनी मृत्यु का इंतजार कर रहे थे, उस समय युधिष्ठिर ने उनसे पूछा, ” हे पितामह ! कृपया हमें बताएं कि सभी के लिए सर्वोच्च आश्रय कौन है ? जिससे व्यक्ति को शांति प्राप्त हो सके, वह नाम कोनसा है जिससे इस भवसागर से मुक्ति प्राप्त हो सके, इस सवाल के जबाब में भीष्म ने कहा की वह नाम विष्णु सहस्रनाम है ।
यह नकारात्मक ज्योतिषीय प्रभावों को वश में करने में मदद करता है, इनमें उन दोषों को शामिल किया जाता है जो जन्म समय की ग्रहों की खराब स्थिति से उत्पन्न होते हैं, विष्णु सहस्त्रनाम दुर्भाग्य और श्राप से दूर कर सकता है । जो व्यक्ति विष्णु सहस्त्रनाम का जाप करता है उसका भाग्य हमेशा उसका साथ देता है ।
इसका मनोवैज्ञानिक लाभ भी है , दैनिक विष्णु सहस्रनाम का जप करते हुए मन को काफी आराम मिलता हैं और अवांछित चिंताओं और विचलित करने वाले विचारों से मुक्ति मिलती है, इससे मन में सकारात्मक पहलुओं पर ध्यान केंद्रित करने और कुशलता सीखने की शक्ति प्राप्त होती है ।
श्री विष्णु सहस्त्रनाम अपने जीवन में बाधाओं को दूर करने का अंतिम उपाय है, यह आपके जीवन में मौजूद महत्वपूर्ण योजनाओं को तेज़ी से और आपके रास्ते पर बाधाओं और चुनौतियों को दूर करने में मदद कर सकता है, बढ़ती ऊर्जा स्तर और आत्मविश्वास के साथ, आप अपने जीवन के लक्ष्यों की ओर जल्दी और ऊर्जावान रूप से आगे बढ़ सकते हैं ।
Aditya Hridaya Stotram – Lyrics, Meaning, and History
Aditya Hridaya Stotram
The Divine Hymn of Victory from the Valmiki Ramayana
Aditya Hridaya Stotram is one of the most revered and powerful hymns in the Vedic tradition, found in the Yuddha Kanda (Book of War) of Valmiki’s Ramayana. Dedicated to Lord Surya (the Sun God), this anthem of victory was imparted to Lord Rama by the great sage Agastya during a critical moment in the battle against the demon king Ravana.
The Aditya Hridaya Stotram originates from the 107th Canto (Sarga) of the Yuddha Kanda in Valmiki’s Ramayana. The context is dramatic: the war between Rama and Ravana has dragged on, and Rama, having fought valiantly, is physically exhausted and deep in thought (‘Chintaya sthitam’). It is at this vulnerable moment that Sage Agastya, a witness to the battle along with the Devas, steps onto the battlefield. He teaches Rama this hymn, which is described as ‘Sanatanam’ (Eternal) and ‘Guhyam’ (Secret). The history of this hymn underscores the Vedic belief that external victory requires internal alignment with cosmic forces.
Meaning Analysis
The hymn is a masterpiece of devotional poetry and philosophy. It can be analyzed in four key sections:
The Invitation (Verses 1-5): Agastya approaches Rama and explains the benefits of the hymn. He calls it the ‘destroyer of all enemies’ and ‘supreme bliss’. This section prepares the mind of the listener (Rama) to receive the knowledge.
The Cosmic Identification (Verses 6-15): Here, the Sun God is identified not merely as a star, but as the Supreme Reality. He is equated with Brahma (Creator), Vishnu (Preserver), and Shiva (Destroyer). He is described as the ‘Golden Womb’ (Hiranyagarbha) and the soul of all gods (Sarva Deva Atmako). This reflects the Advaita (non-dual) philosophy where all forms of divinity merge into one light.
The Salutations (Verses 16-21): The tone shifts to rhythmic reverence. The devotee bows to the Sun in the East, West, South, and North. He is saluted as the ‘Terrible One’ (Ugra), the ‘Compassionate One’, and the ‘Witness of the World’ (Loka Sakshine). This section is meant for deep meditation.
The Result (Phalasruti) (Verses 25-31): Agastya promises that reciting this hymn three times guarantees victory. Rama, obeying the sage, sips water three times (Achamanam), looks at the sun, and recites the hymn. The result is instantaneous: his sorrow vanishes, his strength returns, and he prepares to slay Ravana. The hymn ends with the Sun God himself cheering Rama on.
Trivia
The Power of Three: Lord Rama chanted this hymn exactly three times (‘Etat trigunitam japtva’) before taking up his bow to deliver the final blow to Ravana.
Divine Encouragement: The very last verse is unique because it describes Surya (the Sun God) himself speaking. Standing amidst the Devas, he looks at Rama with great delight and says “Tvareti!” meaning “Hurry up!” or “Be quick!”—signaling that the time for Ravana’s end has come.
Agastya’s Role: Sage Agastya is a pivotal figure in the Ramayana; he not only gave Rama the Aditya Hridaya Stotram but earlier in the epic, he also gifted Rama the divine bow of Vishnu and the inexhaustible quivers that were crucial for the war.
Health Benefits: Beyond victory in battle, this stotram is traditionally believed to cure heart diseases and eye ailments, and to bring prosperity and long life.
श्रावण मास में भोलेनाथ शंकर की सादगी का वर्णन करने से शिव प्रसन्न होते हैं। शिव के इस महिम्न स्तोत्रम् में शिव के दिव्य स्वरूप एवं उनकी सादगी का वर्णन है। इस महिम्न स्तोत्र के पीछे अनूठी और सुंदर कथा प्रचलित है।
कथा
एक समय में चित्ररथ नाम का राजा था। वो परम शिव भक्त था। उसने एक अद्भुत सुंदर बाग का निर्माण करवाया। जिसमें विभिन्न प्रकार के पुष्प लगे थे। प्रत्येक दिन राजा उन पुष्पों से शिव जी की पूजा करते थे।
फिर एक दिन पुष्पदंत नामक गन्धर्व उस राजा के उद्यान की तरफ से जा रहे थे। उद्यान की सुंदरता ने उसे आकृष्ट कर लिया। मोहित पुष्पदंत ने बाग के पुष्पों को चुरा लिया। अगले दिन चित्ररथ को पूजा हेतु पुष्प प्राप्त नहीं हुए।
फिर क्या हुआ
बाग के सौंदर्य से मुग्ध पुष्पदंत प्रत्येक दिन पुष्प की चोरी करने लगा। इस रहस्य को सुलझाने के राजा के प्रत्येक प्रयास विफल रहे। पुष्पदंत अपनी दिव्य शक्तियों के कारण अदृश्य बना रहे।
राजा ने निकाला समाधान: राजा चित्ररथ ने एक अनोखा समाधान निकाला। उन्होंने शिव को अर्पित पुष्प एवं विल्व पत्र बाग में बिछा दिया। राजा के उपाय से अनजान पुष्पदंत ने उन पुष्पों को अपने पैरो से कुचल दिया। इससे पुष्पदंत की दिव्य शक्तिओं का क्षय हो गया। पुष्पदंत स्वयं भी शिव भक्त था। अपनी गलती का बोध होने पर उसने इस परम स्तोत्र के रचना की जिससे प्रसन्न हो महादेव ने उसकी भूल को क्षमा कर पुष्पदंत के दिव्य स्वरूप को पुनः प्रदान किया।
शिव महिम्न स्तोत्रम् (अर्थ सहित )
Shiva Mahimna Stotram with hindi meaning
महिम्नः पारं ते परमविदुषो यद्यसदृशी
स्तुतिर्ब्रह्मादीनामपि तदवसन्नास्त्वयि गिरः
अथाऽवाच्यः सर्वः स्वमतिपरिणामावधि गृणन्
ममाप्येष स्तोत्रे हर निरपवादः परिकरः
हे हर !!! आप प्राणी मात्र के कष्टों को हराने वाले हैं। मैं इस स्तोत्र द्वारा आपकी वंदना कर रहा हूं जो कदाचित आपके वंदना के योग्य न भी हो पर हे महादेव स्वयं ब्रह्मा और अन्य देवगण भी आपके चरित्र की पूर्ण गुणगान करने में सक्षम नहीं हैं। जिस प्रकार एक पक्षी अपनी क्षमता के अनुसार ही आसमान में उड़ान भर सकता है उसी प्रकार मैं भी अपनी यथाशक्ति आपकी आराधना करता हूं।
अतीतः पंथानं तव च महिमा वाङ्मनसयोः
अतद्व्यावृत्त्या यं चकितमभिधत्ते श्रुतिरपि
स कस्य स्तोत्रव्यः कतिविधगुणः कस्य विषयः
पदे त्वर्वाचीने पतति न मनः कस्य न वचः
हे शिव !!! आपकी व्याख्या न तो मन, ना ही वचन द्वारा ही संभव है। आपके सन्दर्भ में वेद भी अचंभित हैं तथा नेति नेति का प्रयोग करते हैं अर्थात यह भी नहीं और वो भी नहीं… आपका संपूर्ण गुणगान भला कौन कर सकता है? यह जानते हुए भी कि आप आदि व अंत रहित हैं परमात्मा का गुणगान कठिन है मैं आपकी वंदना करता हूं।
मधुस्फीता वाचः परमममृतं निर्मितवतः
तव ब्रह्मन् किं वागपि सुरगुरोर्विस्मयपदम्
मम त्वेतां वाणीं गुणकथनपुण्येन भवतः
पुनामीत्यर्थेऽस्मिन् पुरमथन बुद्धिर्व्यवसिता
हे वेद और भाषा के सृजक जब स्वयं देवगुरु बृहस्पति भी आपके स्वरूप की व्याख्या करने में असमर्थ हैं तो फिर मेरा कहना ही क्या? हे त्रिपुरारी, अपनी सीमित क्षमता का बोध होते हुए भी मैं इस विश्वास से इस स्तोत्र की रचना कर रहा हूं कि इससे मेरी वाणी शुद्ध होगी तथा मेरी बुद्धि का विकास होगा।
तवैश्वर्यं यत्तज्जगदुदयरक्षाप्रलयकृत्
त्रयीवस्तु व्यस्तं तिस्रुषु गुणभिन्नासु तनुषु .
अभव्यानामस्मिन् वरद रमणीयामरमणीं
विहन्तुं व्याक्रोशीं विदधत इहैके जडधियः
हे देव, आप ही इस संसार के सृजक, पालनकर्ता एवं विलयकर्ता हैं। तीनों वेद आपकी ही संहिता गाते हैं, तीनों गुण (सतो-रजो-तमो) आपसे ही प्रकाशित हैं। आपकी ही शक्ति त्रिदेवों में निहित है। इसके बाद भी कुछ मूढ़ प्राणी आपका उपहास करते हैं तथा आपके बारे भ्रम फैलाने का प्रयास करते हैं जो की सर्वथा अनुचित है।
किमीहः किंकायः स खलु किमुपायस्त्रिभुवनं
किमाधारो धाता सृजति किमुपादान इति च
अतर्क्यैश्वर्ये त्वय्यनवसर दुःस्थो हतधियः
कुतर्कोऽयं कांश्चित् मुखरयति मोहाय जगतः
हे महादेव !!! वो मूढ़ प्राणी जो स्वयं ही भ्रमित हैं इस प्रकार से तर्क-वितर्क द्वारा आपके अस्तित्व को चुनौती देने की कोशिश करते हैं। वह कहते हैं कि अगर कोई परम पुरुष है तो उसके क्या गुण हैं? वह कैसा दिखता है? उसके क्या साधन हैं? वह इस सृष्टि को किस प्रकार धारण करता है? ये प्रश्न वास्तव में भ्रामक मात्र हैं। वेद ने भी स्पष्ट किया है कि तर्क द्वारा आपको नहीं जाना जा सकता।
अजन्मानो लोकाः किमवयववन्तोऽपि जगतां
अधिष्ठातारं किं भवविधिरनादृत्य भवति
अनीशो वा कुर्याद् भुवनजनने कः परिकरो
यतो मन्दास्त्वां प्रत्यमरवर संशेरत इमे…
हे परमपिता !!! इस सृष्टि में सात लोक हैं (भूलोक, भुवर्लोक, स्वर्गलोक, सत्यलोक,महर्लोक, जनलोक, एवं तपलोक)। इनका सृजन भला सृजक (आपके) के बिना कैसे संभव हो सका? यह किस प्रकार से और किस साधन से निर्मित हुए? तात्पर्य यह है कि आप पर किसी प्रकार का संशय नहीं किया जा सकता।
त्रयी साङ्ख्यं योगः पशुपतिमतं वैष्णवमिति
प्रभिन्ने प्रस्थाने परमिदमदः पथ्यमिति च
रुचीनां वैचित्र्यादृजुकुटिल नानापथजुषां
नृणामेको गम्यस्त्वमसि पयसामर्णव इव।
विविध प्राणी सत्य तक पहुंचने के लिए विभिन्न वेद पद्धतियों का अनुसरण करते हैं। पर जिस प्रकार सभी नदी अंतत: सागर में समाहित हो जाती है ठीक उसी प्रकार हर मार्ग आप तक ही पहुंचता है।
महोक्षः खट्वाङ्गं परशुरजिनं भस्म फणिनः
कपालं चेतीयत्तव वरद तन्त्रोपकरणम् .
सुरास्तां तामृद्धिं दधति तु भवद्भूप्रणिहितां
न हि स्वात्मारामं विषयमृगतृष्णा भ्रमयति।
हे शिव !!! आपके भृकुटी के इशारे मात्र से सभी देवगण ऐश्वर्य एवं संपदाओं का भोग करते हैं। पर आपके स्वयं के लिए सिर्फ बैल (नंदी), कपाल, बाघम्बर, त्रिशुल, कपाल एवं नाग्माला एवं भस्म मात्र है। अगर कोई संशय करें कि आप देवों के असीम ऐश्वर्य के स्त्रोत हैं तो आप स्वयं उन ऐश्वर्यों का भोग क्यों नहीं करते तो इस प्रश्न का उत्तर सहज ही है आप इच्छा रहित हैं तथा स्वयं में ही स्थितप्रज्ञ रहते हैं।
ध्रुवं कश्चित् सर्वं सकलमपरस्त्वध्रुवमिदं
परो ध्रौव्याऽध्रौव्ये जगति गदति व्यस्तविषये
समस्तेऽप्येतस्मिन् पुरमथन तैर्विस्मित इव
स्तुवन् जिह्रेमि त्वां न खलु ननु धृष्टा मुखरता।
हे त्रिपुरहंता !!! इस संसार के बारे में विभिन्न विचारकों के भिन्न-भिन्न मत हैं। कोई इसे नित्य जानता है तो कोई इसे अनित्य समझता है। अन्य इसे नित्यानित्य बताते हैं। इन विभिन्न मतों के कारण मेरी बुद्धि भ्रमित होती है पर मेरी भक्ति आप में और दृढ़ होती जा रही है।
तवैश्वर्यं यत्नाद् यदुपरि विरिञ्चिर्हरिरधः
परिच्छेतुं यातावनिलमनलस्कन्धवपुषः
ततो भक्तिश्रद्धा-भरगुरु-गृणद्भ्यां गिरिश यत्
स्वयं तस्थे ताभ्यां तव किमनुवृत्तिर्न फलति।
एक समय आपके पूर्ण स्वरूप का भेद जानने हेतु ब्रह्मा एवं विष्णु क्रमश:प्रत्येक दिशा में गए। पर उनके सारे प्रयास विफल हुए। जब उन्होंने भक्ति मार्ग अपनाया तभी आपको जान पाए। क्या आपकी भक्ति कभी विफल हो सकती है?
अयत्नादासाद्य त्रिभुवनमवैरव्यतिकरं
दशास्यो यद्बाहूनभृत-रणकण्डू-परवशान्
शिरःपद्मश्रेणी-रचितचरणाम्भोरुह-बलेः
स्थिरायास्त्वद्भक्तेस्त्रिपुरहर विस्फूर्जितमिदम्।
हे त्रिपुरान्तक !!! दशानन रावण किस प्रकार विश्व को शत्रु विहीन कर सका? उसके महाबाहू हर पल युद्ध के लिए व्यग्र रहे। हे प्रभु! रावण ने भक्तिवश अपने ही शीश को काट-काट कर आपके चरण कमलों में अर्पित कर दिया, यह उसी भक्ति का प्रभाव था।
अमुष्य त्वत्सेवा-समधिगतसारं भुजवनं
बलात् कैलासेऽपि त्वदधिवसतौ विक्रमयतः
अलभ्यापातालेऽप्यलसचलितांगुष्ठशिरसि
प्रतिष्ठा त्वय्यासीद् ध्रुवमुपचितो मुह्यति खलः
हे शिव !!! एक समय उसी रावण ने मद् में चूर आपके कैलाश को उठाने की धृष्टता करने की भूल की। हे महादेव आपने अपने सहज पांव के अंगूठे मात्र से उसे दबा दिया। फिर क्या था रावण कष्ट में रूदन करा उठा। वेदना ने पटल लोक में भी उसका पीछा नहीं छोड़ा। अंततः आपकी शरणागति के बाद ही वह मुक्त हो सका।
यदृद्धिं सुत्राम्णो वरद परमोच्चैरपि सतीं
अधश्चक्रे बाणः परिजनविधेयत्रिभुवनः
न तच्चित्रं तस्मिन् वरिवसितरि त्वच्चरणयोः
न कस्याप्युन्नत्यै भवति शिरसस्त्वय्यवनतिः
हे शम्भो !!! आपकी कृपा मात्र से ही बाणासुर दानव इन्द्रादि देवों से भी अधिक ऐश्वर्यशाली बन सका तथा तीनों लोकों पर राज्य किया। हे ईश्वर, आपकी भक्ति से क्या कुछ संभव नहीं है?
अकाण्ड-ब्रह्माण्ड-क्षयचकित-देवासुरकृपा
विधेयस्याऽऽसीद् यस्त्रिनयन विषं संहृतवतः
स कल्माषः कण्ठे तव न कुरुते न श्रियमहो
विकारोऽपि श्लाघ्यो भुवन-भय-भङ्ग-व्यसनिनः देवताओं एव असुरों ने अमृत प्राप्ति हेतु समुन्द्र मंथन किया। समुद्र से मूल्यवान वस्तुएं प्रकट हुईं जो देव तथा दानवों ने आपस में बांट ली। पर जब समुद्र से अत्यधिक भयावह कालकूट विष प्रकट हुआ तो असमय ही सृष्टि समाप्त होने का भय उत्पन्न हो गया और सभी भयभीत हो गए। हे हर, तब आपने संसार रक्षार्थ विषपान कर लिया। वह विष आपके कंठ में निष्क्रिय हो कर पड़ा है। विष के प्रभाव से आपका कंठ नीला पड़ गया। हे नीलकंठ, आश्चर्य है की यह स्थिति भी आपकी शोभा ही बढ़ाती है। कल्याण कार्य सुन्दर ही होता है।
असिद्धार्था नैव क्वचिदपि सदेवासुरनरे
निवर्तन्ते नित्यं जगति जयिनो यस्य विशिखाः
स पश्यन्नीश त्वामितरसुरसाधारणमभूत्
स्मरः स्मर्तव्यात्मा न हि वशिषु पथ्यः परिभवः हे प्रभु !!! कामदेव के वार से कभी कोई भी नहीं बच सका चाहे वो मनुष्य हों, देव या दानव ही पर जब कामदेव ने आपकी शक्ति समझे बिना आप की ओर अपने पुष्प बाण को साधा तो आपने उसे तत्क्षण ही भस्म कर दिया। श्रेष्ठ जनों के अपमान का परिणाम हितकर नहीं होता।
मही पादाघाताद् व्रजति सहसा संशयपदं
पदं विष्णोर्भ्राम्यद् भुज-परिघ-रुग्ण-ग्रह-गणम्
मुहुर्द्यौर्दौस्थ्यं यात्यनिभृत-जटा-ताडित-तटा
जगद्रक्षायै त्वं नटसि ननु वामैव विभुता। हे नटराज !!! जब संसार कल्याण के हेतु आप तांडव करने लगते हैं तो आपके पांव के नीचे धरा कांप उठती है, आपके हाथों की परिधि से टकरा कर ग्रह-नक्षत्र भयभीत हो उठते हैं। विष्णु लोक भी हिल जाता है। आपकी जटा के स्पर्श मात्र से स्वर्गलोग व्याकुल हो उठता है। आश्चर्य ही है हे महादेव कि अनेक बार कल्याणकारी कार्य भी भय उत्पन्न करते हैं।
वियद्व्यापी तारा-गण-गुणित-फेनोद्गम-रुचिः
प्रवाहो वारां यः पृषतलघुदृष्टः शिरसि ते
जगद्द्वीपाकारं जलधिवलयं तेन कृतमिति
अनेनैवोन्नेयं धृतमहिम दिव्यं तव वपुः
आकाश गंगा से निकलती तारागणों के बीच से गुजरती गंगा जल अपनी धारा से धरती पर टापू तथा अपने वेग से चक्रवात उत्पन्न करती हैं। पर य उफान से परिपूर्ण गंगा आपके मस्तक पर एक बूंद के सामन ही दृष्टिगोचर होती है। यह आपके दिव्य स्वरूप का ही परिचायक है।
रथः क्षोणी यन्ता शतधृतिरगेन्द्रो धनुरथो
रथाङ्गे चन्द्रार्कौ रथ-चरण-पाणिः शर इति
दिधक्षोस्ते कोऽयं त्रिपुरतृणमाडम्बर विधिः
विधेयैः क्रीडन्त्यो न खलु परतन्त्राः प्रभुधियः हे शिव !!! आपने त्रिपुरासुर का वध करने हेतु पृथ्वी को रथ, ब्रह्मा को सारथी, सूर्य-चन्द्र को पहिया एवं स्वयं इन्द्र को बाण बनाया। हे शम्भु, इस वृहत प्रयोजन की क्या आवश्यकता थी? आपके लिए तो संसार मात्र का विलय करना अत्यंत ही छोटी बात है। आपको किसी सहायता की क्या आवश्यकता?
हरिस्ते सहस्रं कमल बलिमाधाय पदयोः
यदेकोने तस्मिन् निजमुदहरन्नेत्रकमलम्
गतो भक्त्युद्रेकः परिणतिमसौ चक्रवपुषः
त्रयाणां रक्षायै त्रिपुरहर जागर्ति जगताम्।
जब भगवान विष्णु ने आपकी सहस्र कमलों एवं सहस्र नामों द्वारा पूजा प्रारम्भ की तो उन्होंने एक कमल कम पाया। तब भक्ति भाव से हरी ने अपनी एक आंख को कमल के स्थान पर अर्पित कर दिया। उनकी यही अदम्य भक्ति ने सुदर्शन चक्र का स्वरूप धारण कर लिया जिसे भगवान विष्णु संसार रक्षार्थ उपयोग करते हैं।
क्रतौ सुप्ते जाग्रत् त्वमसि फलयोगे क्रतुमतां
क्व कर्म प्रध्वस्तं फलति पुरुषाराधनमृते
अतस्त्वां सम्प्रेक्ष्य क्रतुषु फलदान-प्रतिभुवं
श्रुतौ श्रद्धां बध्वा दृढपरिकरः कर्मसु जनः हे देवाधिदेव !!! आपने ही कर्म-फल का विधान बनाया। आपके ही विधान से अच्छे कर्मो तथा यज्ञ कर्म का फल प्राप्त होता है। आपके वचनों में श्रद्धा रख कर सभी वेद कर्मो में आस्था बनाए रखते हैं तथा यज्ञ कर्म में संलग्न रहते हैं।
क्रियादक्षो दक्षः क्रतुपतिरधीशस्तनुभृतां
ऋषीणामार्त्विज्यं शरणद सदस्याः सुर-गणाः
क्रतुभ्रंशस्त्वत्तः क्रतुफल-विधान-व्यसनिनः
ध्रुवं कर्तुं श्रद्धा विधुरमभिचाराय हि मखाः हे प्रभु !!! यद्यपि आपने यज्ञ कर्म और फल का विधान बनाया है तदपि जो यज्ञ शुद्ध विचारों और कर्मो से प्रेरित न हो और आपकी अवहेलना करने वाला हो उसका परिणाम कदाचित विपरीत और अहितकर ही होता है। दक्षप्रजापति के महायज्ञ से उपयुक्त उदाहरण भला और क्या हो सकता है? दक्षप्रजापति के यज्ञ में स्वयं ब्रह्मा पुरोहित तथा अनेकानेक देवगण तथा ऋषि-मुनि सम्मिलित हुए। फिर भी शिव की अवहेलना के कारण यज्ञ का नाश हुआ। आप अनीति को सहन नहीं करते भले ही शुभकर्म के संदर्भ में क्यों न हो।
प्रजानाथं नाथ प्रसभमभिकं स्वां दुहितरं
गतं रोहिद् भूतां रिरमयिषुमृष्यस्य वपुषा
धनुष्पाणेर्यातं दिवमपि सपत्राकृतममुं
त्रसन्तं तेऽद्यापि त्यजति न मृगव्याधरभसः एक समय में ब्रह्मा अपनी पुत्री पर ही मोहित हो गए जब उनकी पुत्री ने हिरनी का स्वरूप धारण कर भागने की कोशिश की तो कामातुर ब्रह्मा भी हिरन भेष में उसका पीछा करने लगे। हे शंकर तब आपने व्याघ्र स्वरूप में धनुष-बाण लेकर ब्रह्मा की और कूच किया। आपके रौद्र रूप से भयभीत ब्रह्मा आकाश दिशा की ओर भाग निकले तथा आजे भी आपसे भयभीत हैं।
स्वलावण्याशंसा धृतधनुषमह्नाय तृणवत्
पुरः प्लुष्टं दृष्ट्वा पुरमथन पुष्पायुधमपि
यदि स्त्रैणं देवी यमनिरत-देहार्ध-घटनात्
अवैति त्वामद्धा बत वरद मुग्धा युवतयः हे योगेश्वर! जब आपने माता पार्वती को अपनी सहधर्मिणी बनाया तो उन्हें आपके योगी होने पर शंका उत्पन्न हुई। यह शंका निर्मूल ही थी क्योंकि जब स्वयं कामदेव ने आप पर अपना प्रभाव दिखलाने की कोशिश की तो आपने काम को जला करा नष्ट करा दिया।
श्मशानेष्वाक्रीडा स्मरहर पिशाचाः सहचराः
चिता-भस्मालेपः स्रगपि नृकरोटी-परिकरः
अमङ्गल्यं शीलं तव भवतु नामैवमखिलं
तथापि स्मर्तॄणां वरद परमं मङ्गलमसि हे भोलेनाथ!!! आप श्मशान में रमण करते हैं, भुत-प्रेत आपके संगी होते हैं, आप चिता भस्म का लेप करते हैं तथा मुंडमाल धारण करते हैं। यह सारे गुण ही अशुभ एवं भयावह जान पड़ते हैं। तब भी हे श्मशान निवासी आपके भक्तो को आप इस स्वरूप में भी शुभकारी एव आनंददायी ही प्रतीत होते हैं क्योंकि हे शंकर आप मनोवांछित फल प्रदान करने में तनिक भी विलम्ब नहीं करते।
मनः प्रत्यक् चित्ते सविधमविधायात्त-मरुतः
प्रहृष्यद्रोमाणः प्रमद-सलिलोत्सङ्गति-दृशः
यदालोक्याह्लादं ह्रद इव निमज्यामृतमये
दधत्यन्तस्तत्त्वं किमपि यमिनस्तत् किल भवान्
हे योगिराज!!! मनुष्य नाना प्रकार के योग्य पद्धति को अपनाते हैं जैसे की सांस पर नियंत्रण, उपवास, ध्यान इत्यादि। इन योग क्रियाओं द्वारा वो जिस आनंद, जिस सुख को प्राप्त करते हैं वह वास्तव में आप ही हैं। हे महादेव!!!
त्वमर्कस्त्वं सोमस्त्वमसि पवनस्त्वं हुतवहः
त्वमापस्त्वं व्योम त्वमु धरणिरात्मा त्वमिति च
परिच्छिन्नामेवं त्वयि परिणता बिभ्रति गिरं
न विद्मस्तत्तत्त्वं वयमिह तु यत् त्वं न भवसि हे शिव !!! आप ही सूर्य, चन्द्र, धरती, आकाश, अग्नि, जल एवं वायु हैं। आप ही आत्मा भी हैं। हे देव मुझे ऐसा कुछ भी ज्ञात नहीं जो आप न हों।
त्रयीं तिस्रो वृत्तीस्त्रिभुवनमथो त्रीनपि सुरान्
अकाराद्यैर्वर्णैस्त्रिभिरभिदधत् तीर्णविकृति
तुरीयं ते धाम ध्वनिभिरवरुन्धानमणुभिः
समस्त-व्यस्तं त्वां शरणद गृणात्योमिति पदम्
हे सर्वेश्वर!!! ॐ तीन तत्वों से बना है अ, ऊ, मं जो तीन वेदों (ऋग, साम, यजु), तीन अवस्था (जाग्रत, स्वप्न, सुशुप्त), तीन लोकों, तीन कालों, तीन गुणों तथा त्रिदेवों को इंगित करता है। हे ॐकार आपही इस त्रिगुण, त्रिकाल, त्रिदेव, त्रिअवस्था, और त्रिवेद के समागम हैं।
भवः शर्वो रुद्रः पशुपतिरथोग्रः सहमहान्
तथा भीमेशानाविति यदभिधानाष्टकमिदम्
अमुष्मिन् प्रत्येकं प्रविचरति देव श्रुतिरपि
प्रियायास्मैधाम्ने प्रणिहित-नमस्योऽस्मि भवते
हे शिव, वेद एवं देवगन आपकी इन आठ नामों से वंदना करते हैं – भव, सर्व, रूद्र, पशुपति, उग्र, महादेव, भीम, एवं इशान। हे शम्भू मैं भी आपकी इन नामों से स्तुति करता हूं।
नमो नेदिष्ठाय प्रियदव दविष्ठाय च नमः
नमः क्षोदिष्ठाय स्मरहर महिष्ठाय च नमः
नमो वर्षिष्ठाय त्रिनयन यविष्ठाय च नमः
नमः सर्वस्मै ते तदिदमतिसर्वाय च नमः
हे त्रिलोचन, आप अत्यधिक दूर हैं और अत्यंत पास भी, आप महाविशाल भी हैं तथा परमसूक्ष्म भी, आप श्रेठ भी हैं तथा कनिष्ठ भी। आप ही सभी कुछ हैं साथ ही आप सभी कुछ से परे भी हैं।
बहुल-रजसे विश्वोत्पत्तौ भवाय नमो नमः
प्रबल-तमसे तत् संहारे हराय नमो नमः
जन-सुखकृते सत्त्वोद्रिक्तौ मृडाय नमो नमः
प्रमहसि पदे निस्त्रैगुण्ये शिवाय नमो नमः
हे भव, मैं आपको रजोगुण से युक्त सृजनकर्ता जान कर आपका नमन करता हूं। हे हर, मैं आपको तामस गुण से युक्त, विलयकर्ता मान आपका नमन करता हूं। हे मृड, आप सतोगुण से व्याप्त सभी का पालन करने वाले हैं। आपको नमस्कार है। आप ही ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश हैं। हे परमात्मा, मैं आपको इन तीन गुणों से परे जान कर शिव रूप में नमस्कार करता हूं।
कृश-परिणति-चेतः क्लेशवश्यं क्व चेदं
क्व च तव गुण-सीमोल्लङ्घिनी शश्वदृद्धिः
इति चकितममन्दीकृत्य मां भक्तिराधाद्
वरद चरणयोस्ते वाक्य-पुष्पोपहारम्
हे शिव आप गुणातीत हैं और आपका विस्तार नित बढ़ता ही जाता है। अपनी सीमित क्षमता से मैं कैसे आपकी वंदना कर सकता हूं? पर भक्ति से ये दूरी मिट जाती है तथा मैं आपने कर कमलों में अपनी स्तुति प्रस्तुत करता हूं।
असित-गिरि-समं स्यात् कज्जलं सिन्धु-पात्रे
सुर-तरुवर-शाखा लेखनी पत्रमुर्वी
लिखति यदि गृहीत्वा शारदा सर्वकालं
तदपि तव गुणानामीश पारं न याति
”हे शिव, यदि नीले पर्वत को समुद्र में मिला कर स्याही तैयार की जाए, देवताओं के उद्यान के वृक्ष की शाखाओं को लेखनी बनाया जाए और पृथ्वीको कागद बनाकर भगवती शारदा देवी अर्थात सरस्वती देवी अनंतकाल तक लिखती रहें तब भी हे प्रभो! आपके गुणों का संपूर्ण व्याख्यान संभव नहीं होगा।”
असुर-सुर-मुनीन्द्रैरर्चितस्येन्दु-मौलेः
ग्रथित-गुणमहिम्नो निर्गुणस्येश्वरस्य
सकल-गण-वरिष्ठः पुष्पदन्ताभिधानः
रुचिरमलघुवृत्तैः स्तोत्रमेतच्चकार
इस स्तोत्र की रचना पुष्पदंत गंधर्व ने चन्द्रमौलेश्वर शिव जी के गुणगान के लिए की है जो गुणातीत हैं।
अहरहरनवद्यं धूर्जटेः स्तोत्रमेतत्
पठति परमभक्त्या शुद्ध-चित्तः पुमान् यः
स भवति शिवलोके रुद्रतुल्यस्तथाऽत्र
प्रचुरतर-धनायुः पुत्रवान् कीर्तिमांश्च
जो भी इस स्तोत्र का शुद्ध मन से नित्य पाठ करता है वह जीवन काल में विभिन्न ऐश्वर्यों का भोग करता है तथा अंततः शिवधाम को प्राप्त करता है तथा शिवतुल्य हो जाता है।
महेशान्नापरो देवो महिम्नो नापरा स्तुतिः
अघोरान्नापरो मन्त्रो नास्ति तत्त्वं गुरोः परम्
महेश से श्रेष्ठ कोई देव नहीं, महिम्न स्तोत्र से श्रेष्ठ कोई स्तोत्र नहीं, ॐ से बढकर कोई मंत्र नहीं तथा गुरु से उपर कोई सत्य नहीं।
दीक्षा दानं तपस्तीर्थं ज्ञानं
योगादिकाः क्रियाः
महिम्नस्तव पाठस्य कलां
नार्हन्ति षोडशीम्
दान, यज्ञ, ज्ञान एवं त्याग इत्यादि सत्कर्म इस स्तोत्र के पाठ के सोलहवें अंश के बराबर भी फल नहीं प्रदान कर सकते।
कुसुमदशन-नामा सर्व-गन्धर्व-राजः
शशिधरवर-मौलेर्देवदेवस्य दासः
स खलु निज-महिम्नो भ्रष्ट एवास्य रोषात्
स्तवनमिदमकार्षीद् दिव्य-दिव्यं महिम्नः
कुसुमदंत नामक गंधर्वों का राजा चंद्रमौलेश्वर शिव जी का परम भक्त था। अपने अपराध (पुष्प की चोरी) के कारण वह अपने दिव्य स्वरूप से वंचित हो गया तब उसने इस स्तोत्र की रचना कर शिव को प्रसन्न किया तथा अपने दिव्य स्वरूप को पुनः प्राप्त किया।
सुरगुरुमभिपूज्य स्वर्ग-मोक्षैक-हेतुं
पठति यदि मनुष्यः प्राञ्जलिर्नान्य-चेताः
व्रजति शिव-समीपं किन्नरैः स्तूयमानः
स्तवनमिदममोघं पुष्पदन्तप्रणीतम्
जो इस स्तोत्र का पठन करता है वो शिवलोक पाता है तथा ऋषि-मुनियों द्वारा भी पूजित हो जाता है।
आसमाप्तमिदं स्तोत्रं पुण्यं गन्धर्व-भाषितम्
अनौपम्यं मनोहारि सर्वमीश्वरवर्णनम्
पुष्पदंत रचित ये स्तोत्र दोषरहित है तथा इसका नित्य पाठ करने से परम सुख की प्राप्ति होती है।
इत्येषा वाङ्मयी पूजा श्रीमच्छङ्कर-पादयोः
अर्पिता तेन देवेशः प्रीयतां मे सदाशिवः
ये स्तोत्र शंकर भगवान को समर्पित है। प्रभु महादेव हमसे प्रसन्न हों।
तव तत्त्वं न जानामि कीदृशोऽसि महेश्वर,
यादृशोऽसि महादेव तादृशाय नमो नमः
हे शिव !!! मैं आपके वास्तविक स्वरुप को नहीं जानता। हे शिव आपके उस वास्तविक स्वरूप जिसे मैं नहीं जान सकता उसको नमस्कार है।
एककालं द्विकालं वा त्रिकालं यः पठेन्नरः
सर्वपाप-विनिर्मुक्तः शिव लोके महीयते
जो इस स्तोत्र का दिन में एक, दो या तीन बार पाठ करता है वो पाप मुक्त हो जाता है तथा शिव लोक को प्राप्त करता है।
श्री पुष्पदन्त-मुख-पंकज-निर्गतेन
स्तोत्रेण किल्बिष-हरेण हर-प्रियेण
कण्ठस्थितेन पठितेन समाहितेन
सुप्रीणितो भवति भूतपतिर्महेशः
पुष्पदंत द्वारा रचित ये स्तोत्र शिव जी को अत्यंत ही प्रिय है। इसका पाठ करने वाला अपने संचित पापों से मुक्ति पाता है।
।। इति श्री पुष्पदंत विरचितं शिवमहिम्नः स्तोत्रं समाप्तम्।।
अर्थ : इस राम रक्षा स्तोत्र मंत्र के रचयिता बुध कौशिक ऋषि हैं, सीता और रामचंद्र देवता हैं, अनुष्टुप छंद हैं, सीता शक्ति हैं, हनुमान जी कीलक है तथा श्री रामचंद्र जी की प्रसन्नता के लिए राम रक्षा स्तोत्र के जप में विनियोग किया जाता हैं |
अर्थ : ध्यान : जो धनुष-बाण धारण किए हुए हैं, बद्दपद्मासन की मुद्रा में विराजमान हैं और पीतांबर पहने हुए हैं, जिनके आलोकित नेत्र नए कमल दल के समान स्पर्धा करते हैं, जो बाएँ ओर स्थित सीताजी के मुख कमल से मिले हुए हैं- उन आजानु बाहु, मेघश्याम,विभिन्न अलंकारों से विभूषित तथा जटाधारी श्रीराम का ध्यान करें |
॥श्री राम रक्षा स्तोत्रम् ॥ Shri Ram Raksha Stotram॥
वामाङ्कारूढसीता मुखकमलमिलल्लोचनं नीरदाभं ।
नानालङ्कारदीप्तं दधतमुरुजटामण्डनं रामचंद्रम् ॥
ध्यात्वा नीलोत्पलश्यामं रामं राजीवलोचनम् ।
जानकीलक्ष्मणॊपेतं जटामुकुटमण्डितम् ॥२॥
सासितूणधनुर्बाणपाणिं नक्तं चरान्तकम् ।
स्वलीलया जगत्त्रातुमाविर्भूतमजं विभुम् ॥३॥
रामरक्षां पठॆत्प्राज्ञ: पापघ्नीं सर्वकामदाम् ।
शिरो मे राघव: पातु भालं दशरथात्मज: ॥४॥
कौसल्येयो दृशौ पातु विश्वामित्रप्रिय: श्रुती ।
घ्राणं पातु मखत्राता मुखं सौमित्रिवत्सल: ॥५॥
जिव्हां विद्दानिधि: पातु कण्ठं भरतवंदित: ।
स्कन्धौ दिव्यायुध: पातु भुजौ भग्नेशकार्मुक: ॥६॥
करौ सीतपति: पातु हृदयं जामदग्न्यजित् ।
मध्यं पातु खरध्वंसी नाभिं जाम्बवदाश्रय: ॥७॥
सुग्रीवेश: कटी पातु सक्थिनी हनुमत्प्रभु: ।
ऊरू रघुत्तम: पातु रक्ष:कुलविनाशकृत् ॥८॥
जानुनी सेतुकृत्पातु जङ्घे दशमुखान्तक: ।
पादौ बिभीषणश्रीद: पातु रामोSखिलं वपु: ॥९॥
एतां रामबलोपेतां रक्षां य: सुकृती पठॆत् ।
स चिरायु: सुखी पुत्री विजयी विनयी भवेत् ॥१०॥
पातालभूतलव्योम चारिणश्छद्मचारिण: ।
न द्र्ष्टुमपि शक्तास्ते रक्षितं रामनामभि: ॥११॥
रामेति रामभद्रेति रामचंद्रेति वा स्मरन् ।
नरो न लिप्यते पापै भुक्तिं मुक्तिं च विन्दति ॥१२॥
जगज्जेत्रैकमन्त्रेण रामनाम्नाभिरक्षितम् ।
य: कण्ठे धारयेत्तस्य करस्था: सर्वसिद्द्दय: ॥१३॥
आदिष्टवान् यथा स्वप्ने रामरक्षामिमां हर: ।
तथा लिखितवान् प्रात: प्रबुद्धो बुधकौशिक: ॥१५॥
आराम: कल्पवृक्षाणां विराम: सकलापदाम् ।
अभिरामस्त्रिलोकानां राम: श्रीमान् स न: प्रभु: ॥१६॥
राम रक्षा स्तोत्र अर्थ: इस राम रक्षा स्तोत्र मंत्र के रचयिता ऋषि बुध कौशिक हैं, माता सीता और श्री रामचंद्र देवता हैं, अनुष्टुप छंद हैं, माता सीता शक्ति रूप हैं, हनुमान जी कीलक है तथा प्रभु रामचंद्र जी की प्रसन्नता के लिए राम रक्षा स्तोत्र ( Ram Raksha Stotra)के जप में विनियोग किया जाता हैं |
॥ अथ ध्यानम् ॥
ध्यायेदाजानुबाहुं धृतशरधनुषं बद्दद्पद्मासनस्थं ।
पीतं वासोवसानं नवकमलदलस्पर्धिनेत्रं प्रसन्नम् ॥
वामाङ्कारूढसीता मुखकमलमिलल्लोचनं नीरदाभं ।
नानालङ्कारदीप्तं दधतमुरुजटामण्डनं रामचंद्रम् ॥
ध्यान कीजिये :- प्रभु राम जो धनुष-बाण धारण किए हुए हैं,पद्मासन की मुद्रा में विराजमान हैं और पीतांबर बस्त्र पहने हुए हैं, जिनके आलोकित नेत्र नए कमल दल के समान स्पर्धा करते हैं, जो बाएँ ओर स्थित सीताजी के मुख कमल से मिले हुए हैं ।
उन आजानु बाहु, मेघश्याम,विभिन्न अलंकारों से विभूषित तथा जटाधारी श्रीराम का ध्यान करें |
॥ इति ध्यानम् ॥
चरितं रघुनाथस्य शतकोटिप्रविस्तरम् ।
एकैकमक्षरं पुंसां महापातकनाशनम् ॥१॥
राम रक्षा स्तोत्र अर्थ: श्री रघुनाथजी का चरित्र सौ करोड़ विस्तार वाला हैं | उसका एक-एक अक्षर महापातकों को नष्ट करने वाला है |
ध्यात्वा नीलोत्पलश्यामं रामं राजीवलोचनम् ।
जानकीलक्ष्मणॊपेतं जटामुकुटमण्डितम् ॥२॥
राम रक्षा स्तोत्र अर्थ: नीले कमल के श्याम वर्ण वाले, कमलनेत्र वाले , जटाओं के मुकुट से सुशोभित, जानकी तथा लक्ष्मण सहित ऐसे भगवान् श्री राम का स्मरण करके,
सासितूणधनुर्बाणपाणिं नक्तं चरान्तकम् ।
स्वलीलया जगत्त्रातुमाविर्भूतमजं विभुम् ॥३॥
राम रक्षा स्तोत्र अर्थ: जो अजन्मा एवं सर्वव्यापक, हाथों में खड्ग, तुणीर, धनुष-बाण धारण किए राक्षसों के संहार तथा अपनी लीलाओं से जगत रक्षा हेतु अवतीर्ण श्रीराम का स्मरण करके,
रामरक्षां पठॆत्प्राज्ञ: पापघ्नीं सर्वकामदाम् ।
शिरो मे राघव: पातु भालं दशरथात्मज: ॥४॥
राम रक्षा स्तोत्र अर्थ: मैं सर्वकामप्रद और पापों को नष्ट करने वाले राम रक्षा स्तोत्र का पाठ करता हूँ | राघव मेरे सिर की और दशरथ के पुत्र मेरे ललाट की रक्षा करें |
कौसल्येयो दृशौ पातु विश्वामित्रप्रिय: श्रुती ।
घ्राणं पातु मखत्राता मुखं सौमित्रिवत्सल: ॥५॥
राम रक्षा स्तोत्र अर्थ: कौशल्या नंदन मेरे नेत्रों की, विश्वामित्र के प्रिय मेरे कानों की, यज्ञरक्षक मेरे घ्राण की और सुमित्रा के वत्सल मेरे मुख की रक्षा करें |
जिव्हां विद्दानिधि: पातु कण्ठं भरतवंदित: ।
स्कन्धौ दिव्यायुध: पातु भुजौ भग्नेशकार्मुक: ॥६॥
राम रक्षा स्तोत्र अर्थ: मेरी जिह्वा की विधानिधि रक्षा करें, कंठ की भरत-वंदित, कंधों की दिव्यायुध और भुजाओं की महादेवजी का धनुष तोड़ने वाले भगवान् श्रीराम रक्षा करें |
करौ सीतपति: पातु हृदयं जामदग्न्यजित् ।
मध्यं पातु खरध्वंसी नाभिं जाम्बवदाश्रय: ॥७॥
राम रक्षा स्तोत्र अर्थ: मेरे हाथों की सीता पति श्रीराम रक्षा करें, हृदय की जमदग्नि ऋषि के पुत्र (परशुराम) को जीतने वाले, मध्य भाग की खर (नाम के राक्षस) के वधकर्ता और नाभि की जांबवान के आश्रयदाता रक्षा करें |
सुग्रीवेश: कटी पातु सक्थिनी हनुमत्प्रभु: ।
ऊरू रघुत्तम: पातु रक्ष:कुलविनाशकृत् ॥८॥
राम रक्षा स्तोत्र अर्थ: मेरे कमर की सुग्रीव के स्वामी, हडियों की हनुमान के प्रभु और रानों की राक्षस कुल का विनाश करने वाले रघुश्रेष्ठ रक्षा करें |
जानुनी सेतुकृत्पातु जङ्घे दशमुखान्तक: ।
पादौ बिभीषणश्रीद: पातु रामोSखिलं वपु: ॥९॥
राम रक्षा स्तोत्र अर्थ: मेरे जानुओं की सेतुकृत, जंघाओं की दशानन वधकर्ता, चरणों की विभीषण को ऐश्वर्य प्रदान करने वाले और सम्पूर्ण शरीर की श्रीराम रक्षा करें |
एतां रामबलोपेतां रक्षां य: सुकृती पठॆत् ।
स चिरायु: सुखी पुत्री विजयी विनयी भवेत् ॥१०॥
राम रक्षा स्तोत्र अर्थ: शुभ कार्य करने वाला जो भक्त भक्ति एवं श्रद्धा के साथ रामबल से संयुक्त होकर इस स्तोत्र का पाठ करता हैं, वह दीर्घायु, सुखी, पुत्रवान, विजयी और विनयशील हो जाता हैं |
पातालभूतलव्योम चारिणश्छद्मचारिण: ।
न द्र्ष्टुमपि शक्तास्ते रक्षितं रामनामभि: ॥११॥
राम रक्षा स्तोत्र अर्थ: जो जीव पाताल, पृथ्वी और आकाश में विचरते रहते हैं अथवा छद्दम वेश में घूमते रहते हैं , वे राम नामों से सुरक्षित मनुष्य को देख भी नहीं पाते |
रामेति रामभद्रेति रामचंद्रेति वा स्मरन् ।
नरो न लिप्यते पापै भुक्तिं मुक्तिं च विन्दति ॥१२॥
राम रक्षा स्तोत्र अर्थ: राम, रामभद्र तथा रामचंद्र आदि नामों का स्मरण करने वाला रामभक्त पापों से लिप्त नहीं होता. इतना ही नहीं, वह अवश्य ही भोग और मोक्ष दोनों को प्राप्त करता है |
जगज्जेत्रैकमन्त्रेण रामनाम्नाभिरक्षितम् ।
य: कण्ठे धारयेत्तस्य करस्था: सर्वसिद्द्दय: ॥१३॥
राम रक्षा स्तोत्र अर्थ: जो संसार पर विजय करने वाले मंत्र राम-नाम से सुरक्षित इस स्तोत्र को कंठस्थ कर लेता हैं, उसे सम्पूर्ण सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती हैं |
वज्रपंजरनामेदं यो रामकवचं स्मरेत् ।
अव्याहताज्ञ: सर्वत्र लभते जयमंगलम् ॥१४॥
राम रक्षा स्तोत्र अर्थ: जो मनुष्य वज्रपंजर नामक इस राम कवच का स्मरण करता हैं, उसकी आज्ञा का कहीं भी उल्लंघन नहीं होता तथा उसे सदैव विजय और मंगल की ही प्राप्ति होती हैं |
आदिष्टवान्यथा स्वप्ने रामरक्षामिमां हर: ।
तथा लिखितवान् प्रात: प्रबुद्धो बुधकौशिक: ॥१५॥
राम रक्षा स्तोत्र अर्थ: भगवान् शंकर ने स्वप्न में इस रामरक्षा स्तोत्र का आदेश बुध कौशिक ऋषि को दिया था, उन्होंने प्रातः काल जागने पर उसे वैसा ही लिख दिया |
आराम: कल्पवृक्षाणां विराम: सकलापदाम् ।
अभिरामस्त्रिलोकानां राम: श्रीमान् स न: प्रभु: ॥१६॥
राम रक्षा स्तोत्र अर्थ: जो कल्प वृक्षों के बगीचे के समान विश्राम देने वाले हैं, जो समस्त विपत्तियों को दूर करने वाले हैं (विराम माने थमा देना, किसको थमा देना/दूर कर देना ? सकलापदाम = सकल आपदा = सारी विपत्तियों को) और जो तीनो लोकों में सुंदर (अभिराम + स्+ त्रिलोकानाम) हैं, वही श्रीमान राम हमारे प्रभु हैं |
तरुणौ रूपसंपन्नौ सुकुमारौ महाबलौ ।
पुण्डरीकविशालाक्षौ चीरकृष्णाजिनाम्बरौ ॥१७॥
राम रक्षा स्तोत्र अर्थ: जो युवा,सुन्दर, सुकुमार,महाबली और कमल (पुण्डरीक) के समान विशाल नेत्रों वाले हैं, मुनियों की तरह वस्त्र एवं काले मृग का चर्म धारण करते हैं |
फलमूलशिनौ दान्तौ तापसौ ब्रह्मचारिणौ ।
पुत्रौ दशरथस्यैतौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ ॥१८॥
राम रक्षा स्तोत्र अर्थ: जो फल और कंद का आहार ग्रहण करते हैं, जो संयमी , तपस्वी एवं ब्रह्रमचारी हैं , वे दशरथ के पुत्र राम और लक्ष्मण दोनों भाई हमारी रक्षा करें |
शरण्यौ सर्वसत्वानां श्रेष्ठौ सर्वधनुष्मताम् ।
रक्ष:कुलनिहन्तारौ त्रायेतां नो रघुत्तमौ ॥१९॥
राम रक्षा स्तोत्र अर्थ: ऐसे महाबली – रघुश्रेष्ठ मर्यादा पुरूषोतम समस्त प्राणियों के शरणदाता, सभी धनुर्धारियों में श्रेष्ठ और राक्षसों के कुलों का समूल नाश करने में समर्थ हमारा त्राण करें |
राम रक्षा स्तोत्र अर्थ: संघान किए धनुष धारण किए, बाण का स्पर्श कर रहे, अक्षय बाणों से युक्त तुणीर लिए हुए राम और लक्ष्मण मेरी रक्षा करने के लिए मेरे आगे चलें |
संनद्ध: कवची खड्गी चापबाणधरो युवा ।
गच्छन्मनोरथोSस्माकं राम: पातु सलक्ष्मण: ॥२१॥
राम रक्षा स्तोत्र अर्थ: हमेशा तत्पर, कवचधारी, हाथ में खडग, धनुष-बाण तथा युवावस्था वाले भगवान् राम लक्ष्मण सहित आगे-आगे चलकर हमारी रक्षा करें |
रामो दाशरथि: शूरो लक्ष्मणानुचरो बली ।
काकुत्स्थ: पुरुष: पूर्ण: कौसल्येयो रघुत्तम: ॥२२॥
राम रक्षा स्तोत्र अर्थ: भगवान् का कथन है की श्रीराम, दाशरथी, शूर, लक्ष्मनाचुर, बली, काकुत्स्थ , पुरुष, पूर्ण, कौसल्येय, रघुतम,
वेदान्तवेद्यो यज्ञेश: पुराणपुरुषोत्तम: ।
जानकीवल्लभ: श्रीमानप्रमेय पराक्रम: ॥२३॥
राम रक्षा स्तोत्र अर्थ: वेदान्त्वेघ, यज्ञेश,पुराण पुरूषोतम , जानकी वल्लभ, श्रीमान और अप्रमेय पराक्रम आदि नामों का
इत्येतानि जपेन्नित्यं मद्भक्त: श्रद्धयान्वित: ।
अश्वमेधाधिकं पुण्यं संप्राप्नोति न संशय: ॥२४॥
राम रक्षा स्तोत्र अर्थ: नित्यप्रति श्रद्धापूर्वक जप करने वाले को निश्चित रूप से अश्वमेध यज्ञ से भी अधिक फल प्राप्त होता हैं |
रामं दूर्वादलश्यामं पद्माक्षं पीतवाससम् ।
स्तुवन्ति नामभिर्दिव्यैर्न ते संसारिणो नर: ॥२५॥
राम रक्षा स्तोत्र अर्थ: दूर्वादल के समान श्याम वर्ण, कमल-नयन एवं पीतांबरधारी श्रीराम की उपरोक्त दिव्य नामों से स्तुति करने वाला संसारचक्र में नहीं पड़ता |
राम रक्षा स्तोत्र अर्थ: लक्ष्मण जी के पूर्वज , सीताजी के पति, काकुत्स्थ, कुल-नंदन, करुणा के सागर , गुण-निधान , विप्र भक्त, परम धार्मिक , राजराजेश्वर, सत्यनिष्ठ, दशरथ के पुत्र, श्याम और शांत मूर्ति, सम्पूर्ण लोकों में सुन्दर, रघुकुल तिलक , राघव एवं रावण के शत्रु भगवान् राम की मैं वंदना करता हूँ |
रामाय रामभद्राय रामचंद्राय वेधसे ।
रघुनाथाय नाथाय सीताया: पतये नम: ॥२७॥
राम रक्षा स्तोत्र अर्थ: राम, रामभद्र, रामचंद्र, विधात स्वरूप , रघुनाथ, प्रभु एवं सीताजी के स्वामी की मैं वंदना करता हूँ |
श्रीराम राम रघुनन्दन राम राम ।
श्रीराम राम भरताग्रज राम राम ।
श्रीराम राम रणकर्कश राम राम ।
श्रीराम राम शरणं भव राम राम ॥२८॥
राम रक्षा स्तोत्र अर्थ: हे रघुनन्दन श्रीराम ! हे भरत के अग्रज भगवान् राम! हे रणधीर, मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ! आप मुझे शरण दीजिए |
श्रीरामचन्द्रचरणौ मनसा स्मरामि ।
श्रीरामचन्द्रचरणौ वचसा गृणामि ।
श्रीरामचन्द्रचरणौ शिरसा नमामि ।
श्रीरामचन्द्रचरणौ शरणं प्रपद्ये ॥२९॥
राम रक्षा स्तोत्र अर्थ: मैं एकाग्र मन से श्रीरामचंद्रजी के चरणों का स्मरण और वाणी से गुणगान करता हूँ, वाणी द्धारा और पूरी श्रद्धा के साथ भगवान् रामचन्द्र के चरणों को प्रणाम करता हुआ मैं उनके चरणों की शरण लेता हूँ |
माता रामो मत्पिता रामचंन्द्र: ।
स्वामी रामो मत्सखा रामचंद्र: ।
सर्वस्वं मे रामचन्द्रो दयालु ।
नान्यं जाने नैव जाने न जाने ॥३०॥
राम रक्षा स्तोत्र अर्थ: श्रीराम मेरे माता, मेरे पिता , मेरे स्वामी और मेरे सखा हैं | इस प्रकार दयालु श्रीराम मेरे सर्वस्व हैं. उनके सिवा में किसी दुसरे को नहीं जानता |
दक्षिणे लक्ष्मणो यस्य वामे तु जनकात्मजा ।
पुरतो मारुतिर्यस्य तं वन्दे रघुनंदनम् ॥३१॥
राम रक्षा स्तोत्र अर्थ: जिनके दाईं और लक्ष्मण जी, बाईं और जानकी जी और सामने हनुमान ही विराजमान हैं, मैं उन्ही रघुनाथ जी की वंदना करता हूँ |
राम रक्षा स्तोत्र अर्थ: मैं सम्पूर्ण लोकों में सुन्दर तथा रणक्रीड़ा में धीर, कमलनेत्र, रघुवंश नायक, करुणा की मूर्ति और करुणा के भण्डार की श्रीराम की शरण में हूँ |
राम रक्षा स्तोत्र अर्थ: जिनकी गति मन के समान और वेग वायु के समान (अत्यंत तेज) है, जो परम जितेन्द्रिय एवं बुद्धिमानों में श्रेष्ठ हैं, मैं उन पवन-नंदन वानारग्रगण्य श्रीराम दूत की शरण लेता हूँ |
कूजन्तं रामरामेति मधुरं मधुराक्षरम् ।
आरुह्य कविताशाखां वन्दे वाल्मीकिकोकिलम् ॥३४॥
राम रक्षा स्तोत्र अर्थ: मैं कवितामयी डाली पर बैठकर, मधुर अक्षरों वाले ‘राम-राम’ के मधुर नाम को कूजते हुए वाल्मीकि रुपी कोयल की वंदना करता हूँ |
आपदामपहर्तारं दातारं सर्वसंपदाम् ।
लोकाभिरामं श्रीरामं भूयो भूयो नमाम्यहम् ॥३५॥
राम रक्षा स्तोत्र अर्थ: मैं इस संसार के प्रिय एवं सुन्दर उन भगवान् राम को बार-बार नमन करता हूँ, जो सभी आपदाओं को दूर करने वाले तथा सुख-सम्पति प्रदान करने वाले हैं |
भर्जनं भवबीजानामर्जनं सुखसंपदाम् ।
तर्जनं यमदूतानां रामरामेति गर्जनम् ॥३६॥
राम रक्षा स्तोत्र अर्थ: ‘राम-राम’ का जप करने से मनुष्य के सभी कष्ट समाप्त हो जाते हैं | वह समस्त सुख-सम्पति तथा ऐश्वर्य प्राप्त कर लेता हैं | राम-राम की गर्जना से यमदूत सदा भयभीत रहते हैं |
रामो राजमणि: सदा विजयते रामं रमेशं भजे ।
रामेणाभिहता निशाचरचमू रामाय तस्मै नम: ।
रामान्नास्ति परायणं परतरं रामस्य दासोSस्म्यहम् ।
रामे चित्तलय: सदा भवतु मे भो राम मामुद्धर ॥३७॥
राम रक्षा स्तोत्र अर्थ: राजाओं में श्रेष्ठ श्रीराम सदा विजय को प्राप्त करते हैं | मैं लक्ष्मीपति भगवान् श्रीराम का भजन करता हूँ | सम्पूर्ण राक्षस सेना का नाश करने वाले श्रीराम को मैं नमस्कार करता हूँ |
श्रीराम के समान अन्य कोई आश्रयदाता नहीं | मैं उन शरणागत वत्सल का दास हूँ | मैं हमेशा श्रीराम मैं ही लीन रहूँ | हे श्रीराम! आप मेरा (इस संसार सागर से) उद्धार करें |
राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे ।
सहस्रनाम तत्तुल्यं रामनाम वरानने ॥३८॥
राम रक्षा स्तोत्र अर्थ: शिव पार्वती से बोले – हे सुमुखी ! राम- नाम ‘विष्णु सहस्त्रनाम’ के समान है | मैं सदा राम का स्तवन करता हूँ और राम-नाम में ही रमण करता हूँ |
इति श्रीबुधकौशिकविरचितं श्रीराम रक्षा स्तोत्र संपूर्णम् ॥