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Stotram

Navagraha Stotram (नवग्रह स्तोत्रम्)

नवग्रह स्तोत्र (Navagraha Stotram) – अर्थ और लाभ

नवग्रह स्तोत्र (Navagraha Stotram) – अर्थ, महत्त्व और संपूर्ण पाठ

नवग्रह स्तोत्र (Navagraha Stotram) हिंदू धर्म का एक अत्यंत प्रभावशाली और पवित्र स्तोत्र है। इसकी रचना महर्षि वेदव्यास ने नौ ग्रहों (नवग्रहों) को शांत करने और उनकी कृपा प्राप्त करने के लिए की थी। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, मनुष्य के जीवन में सुख-दुःख ग्रहों की चाल पर निर्भर करते हैं। इस स्तोत्र का नियमित पाठ करने से कुंडली के ग्रह दोष दूर होते हैं।

नवग्रह स्तोत्र के बारे में (About)

नवग्रह स्तोत्र संस्कृत भाषा में रचित है और इसमें नौ श्लोक हैं, जो क्रमशः सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु और केतु को समर्पित हैं। इसे ‘ग्रह शांति’ का एक अचूक उपाय माना जाता है। चाहे शनि की साढ़ेसाती हो या राहु-केतु का दोष, श्रद्धालु सदियों से इस स्तोत्र का पाठ करके राहत और मानसिक शांति प्राप्त करते आ रहे हैं।

इतिहास (History)

इस दिव्य स्तोत्र की रचना महर्षि वेदव्यास (Maharishi Veda Vyasa) ने की थी। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, व्यास जी ने मानव कल्याण के लिए वेदों और पुराणों के साथ-साथ ऐसे स्तोत्रों की रचना भी की जो आम जनमानस को दैवीय प्रकोपों से बचा सकें। ‘नवग्रह स्तोत्र’ में ऋषि व्यास ने यह आश्वासन दिया है कि इसका पाठ करने से न केवल ग्रहों की पीड़ा शांत होती है, बल्कि चोर, अग्नि और बुरे सपनों का भय भी मिट जाता है।


नवग्रह स्तोत्र (मूल संस्कृत और हिंदी अर्थ)

१. सूर्य (Sun)

मूल श्लोक:
जपाकुसुम संकाशं काश्यपेयं महद्युतिम् ।
तमोऽरिं सर्वपापघ्नं प्रणतोऽस्मि दिवाकरम् ॥ १ ॥

हिंदी अर्थ:
जिनकी कांति गुडहल (जपा) के फूल के समान लाल है, जो कश्यप ऋषि के पुत्र हैं, जो महातेजस्वी हैं, अंधकार के शत्रु हैं और सब पापों का नाश करने वाले हैं, उन सूर्य देव (दिवाकर) को मैं प्रणाम करता हूँ।

२. चन्द्र (Moon)

मूल श्लोक:
दधिशंखतुषाराभं क्षीरोदार्णव सम्भवम् ।
नमामि शशिनं सोमं शम्भोर्मुकुट भूषणम् ॥ २ ॥

हिंदी अर्थ:
जिनका रंग दही, शंख और बर्फ (तुषार) के समान श्वेत है, जो क्षीरसागर से उत्पन्न हुए हैं और भगवान शिव के मुकुट की शोभा हैं, उन चन्द्र देव (सोम) को मैं नमस्कार करता हूँ।

३. मंगल (Mars)

मूल श्लोक:
धरणीगर्भ संभूतं विद्युत्कान्ति समप्रभम् ।
कुमारं शक्तिहस्तं तं मंगलं प्रणमाम्यहम् ॥ ३ ॥

हिंदी अर्थ:
जो पृथ्वी देवी के गर्भ से उत्पन्न हुए हैं, जिनकी चमक बिजली की कौंध के समान है, जो कुमार स्वरूप हैं और हाथों में शक्ति (आयुध) धारण करते हैं, उन मंगल देव को मैं प्रणाम करता हूँ।

४. बुध (Mercury)

मूल श्लोक:
प्रियंगुकलिकाश्यामं रूपेणाप्रतिमं बुधम् ।
सौम्यं सौम्यगुणोपेतं तं बुधं प्रणमाम्यहम् ॥ ४ ॥

हिंदी अर्थ:
जिनका वर्ण ‘प्रियंगु’ की कली के समान गहरा साँवला है, जिनका रूप अनुपम है, जो सौम्य हैं और सौम्य गुणों से संपन्न हैं, उन बुध देव को मैं प्रणाम करता हूँ।

५. गुरु (Jupiter)

मूल श्लोक:
देवानांच ऋषीणांच गुरुं कांचनसन्निभम् ।
बुद्धिभूतं त्रिलोकेशं तं नमामि बृहस्पतिम् ॥ ५ ॥

हिंदी अर्थ:
जो देवताओं और ऋषियों के गुरु हैं, जिनकी आभा सोने (कांचन) के समान है, जो साक्षात बुद्धि के स्वरूप हैं और तीनों लोकों के स्वामी हैं, उन बृहस्पति देव को मैं नमन करता हूँ।

६. शुक्र (Venus)

मूल श्लोक:
हिमकुन्दमृणालाभं दैत्यानां परमं गुरुम् ।
सर्वशास्त्रप्रवक्तारं भार्गवं प्रणमाम्यहम् ॥ ६ ॥

हिंदी अर्थ:
जिनकी कांति बर्फ, कुंद के फूल और कमलनाल (मृणाल) के समान श्वेत है, जो दैत्यों के परम गुरु हैं और सभी शास्त्रों के ज्ञाता/वक्ता हैं, उन भार्गव (शुक्र) को मैं प्रणाम करता हूँ।

७. शनि (Saturn)

मूल श्लोक:
नीलांजनसमाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम् ।
छायामार्तण्ड संभूतं तं नमामि शनैश्चरम् ॥ ७ ॥

हिंदी अर्थ:
जिनकी आभा नीले अंजन (काजल) के समान है, जो सूर्यपुत्र हैं और यमराज के बड़े भाई हैं, जो छाया और सूर्य (मार्तण्ड) से उत्पन्न हुए हैं, उन शनि देव को मैं नमन करता हूँ।

८. राहु (Rahu)

मूल श्लोक:
अर्धकायं महावीर्यं चन्द्रादित्य विमर्दनम् ।
सिंहिकागर्भसंभूतं तं राहुं प्रणमाम्यहम् ॥ ८ ॥

हिंदी अर्थ:
जिनका शरीर आधा है, जो महापराक्रमी हैं, जो सूर्य और चन्द्रमा को भी पीड़ित (ग्रहण) करते हैं और सिंहिका के गर्भ से उत्पन्न हुए हैं, उन राहु को मैं प्रणाम करता हूँ।

९. केतु (Ketu)

मूल श्लोक:
पलाशपुष्पसंकाशं तारकाग्रहमस्तकम् ।
रौद्रं रौद्रात्मकं घोरं तं केतुं प्रणमाम्यहम् ॥ ९ ॥

हिंदी अर्थ:
जिनकी चमक पलाश के फूल के समान (धूम्र/लाल) है, जो तारों और ग्रहों में प्रधान हैं, जो रौद्र रूप वाले और भयानक हैं, उन केतु को मैं प्रणाम करता हूँ।


फलश्रुति (Benefits)

इति व्यासमुखोद्गीतं यः पठेत् सुसमाहितः ।
दिवा वा यदि वा रात्रौ विघ्नशान्तिर्भविष्यति ॥
नरनारीनृपाणांच भवेत् दुःस्वप्ननाशनम् ।
ऐश्वर्यमतुलं तेषां आरोग्यं पुष्टिवर्धनम् ॥

अर्थ:
व्यास जी के मुख से निकले इस स्तोत्र का जो भी व्यक्ति एकाग्रचित्त होकर (दिन या रात में) पाठ करता है, उसकी सभी बाधाएं शांत हो जाती हैं। स्त्री, पुरुष या राजा—सभी के बुरे सपने नष्ट हो जाते हैं और उन्हें अतुलनीय ऐश्वर्य, आरोग्य और पुष्टि (बल) की प्राप्ति होती है। व्यास जी कहते हैं कि इसमें कोई संदेह नहीं है।

रोचक तथ्य (Trivia)

  • रचयिता: इस स्तोत्र के रचयिता महर्षि वेदव्यास हैं, जिन्होंने महाभारत की रचना भी की थी।
  • पुष्प उपमा: सूर्य देव के लिए ‘जपाकुसुम’ (गुडहल) और केतु के लिए ‘पलाश पुष्प’ की उपमा का प्रयोग उनके रंग और तीव्रता को दर्शाने के लिए किया गया है।
  • शनि-यम संबंध: इस स्तोत्र में शनि देव को ‘यमाग्रज’ (यमराज का बड़ा भाई) कहकर संबोधित किया गया है, जो सूर्य की संतानों के रूप में उनके संबंध को दर्शाता है।
  • सुरक्षा कवच: फलश्रुति में विशेष रूप से उल्लेख है कि यह ‘दुःस्वप्न नाशनम्’ है, यानी यह बुरे सपनों और अज्ञात भय को दूर करता है।

शिव पंचाक्षर स्तोत्र (Shiv Panchakshar Stotra)

शिव पंचाक्षर स्तोत्र – अर्थ और बोल | Shiv Panchakshar Stotra Lyrics & Meaning in Hindi

शिव पंचाक्षर स्तोत्र (Shiv Panchakshar Stotra)

रचयिता: आदि शंकराचार्य (Adi Shankaracharya)

परिचय (About)

शिव पंचाक्षर स्तोत्र भगवान शिव की उपासना में रचित सबसे लोकप्रिय और प्रभावशाली स्तोत्रों में से एक है। इसकी रचना आदि शंकराचार्य ने की थी। यह स्तोत्र भगवान शिव के पंचाक्षर मंत्र ‘नमः शिवाय’ पर आधारित है। इसमें कुल 5 मुख्य श्लोक हैं, और प्रत्येक श्लोक मंत्र के एक अक्षर (न, म, शि, वा, य) को समर्पित है। यह न केवल भक्ति का प्रतीक है, बल्कि यह पंचतत्वों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) के साथ शिव के संबंध को भी दर्शाता है।

गीत के बोल (Lyrics)

श्लोक १

नागेन्द्रहाराय त्रिलोचनाय, भस्माङ्गरागाय महेश्वराय। नित्याय शुद्धाय दिगम्बराय, तस्मै ‘न’ काराय नमः शिवाय॥१॥

Nagendraharaya Trilochanaya, Bhasmangaragaya Maheshvaraya. Nityaya Shuddhaya Digambaraya, Tasmai ‘Na’ karaya Namah Shivaya. ||1||

श्लोक २

मन्दाकिनीसलिलचन्दनचर्चिताय, नन्दीश्वरप्रमथनाथमहेश्वराय। मन्दारपुष्पबहुपुष्पसुपूजिताय, तस्मै ‘म’ काराय नमः शिवाय॥२॥

Mandakini salila chandana charchitaya, Nandishvara pramathanatha maheshvaraya. Mandara pushpa bahupushpa supoojitaya, Tasmai ‘Ma’ karaya Namah Shivaya. ||2||

श्लोक ३

शिवाय गौरीवदनाब्जवृन्द-, सूर्याय दक्षाध्वरनाशकाय। श्रीनीलकण्ठाय वृषध्वजाय, तस्मै ‘शि’ काराय नमः शिवाय॥३॥

Shivaya Gauri vadanabja vrinda-, Suryaya dakshadhvara nashakaya. Shri Nilakanthaya Vrishadhvajaya, Tasmai ‘Shi’ karaya Namah Shivaya. ||3||

श्लोक ४

वसिष्ठकुम्भोद्भवगौतमार्य-, मुनीन्द्रदेवार्चितशेखराय। चन्द्रार्कवैश्वानरलोचनाय, तस्मै ‘व’ काराय नमः शिवाय॥४॥

Vasistha kumbhodbhava gautamarya-, Munindra devarchita shekharaya. Chandrarka vaishvanara lochanaya, Tasmai ‘Va’ karaya Namah Shivaya. ||4||

श्लोक ५

यक्षस्वरूपाय जटाधराय, पिनाकहस्ताय सनातनाय। दिव्याय देवाय दिगम्बराय, तस्मै ‘य’ काराय नमः शिवाय॥५॥

Yaksha svaroopaya jatadharaya, Pinakahastaya sanatanaya. Divyaya devaya digambaraya, Tasmai ‘Ya’ karaya Namah Shivaya. ||5||

फलश्रुति

पञ्चाक्षरमिदं पुण्यं यः पठेच्छिवसंनिधौ। शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते॥

Panchaksharamidam punyam yah pathechchiva sannidhau, Shivalokamavapnoti shivena saha modate.

इतिहास (History)

शिव पंचाक्षर स्तोत्र की रचना 8वीं शताब्दी के महान दार्शनिक आदि शंकराचार्य द्वारा की गई थी। उस समय भारत में कई मत-मतांतर प्रचलित थे, और शंकराचार्य ने अद्वैत वेदांत और पंचायतन पूजा को पुनः स्थापित किया। उन्होंने वेदों के सार को आम जनमानस तक पहुँचाने के लिए सरल संस्कृत में कई स्तोत्र रचे। यह स्तोत्र यजुर्वेद में वर्णित ‘नमः शिवाय’ मंत्र की व्याख्या करता है।

अर्थ विश्लेषण (Meaning Analysis)

  • ‘न’ कार (पृथ्वी तत्व): जो नागराज को हार के रूप में धारण करते हैं, जिनके तीन नेत्र हैं, और जो भस्म लगाए हुए हैं। ऐसे ‘न’ अक्षर स्वरूप भगवान शिव को नमस्कार है।
  • ‘म’ कार (जल तत्व): जो गंगाजल और चंदन से सुशोभित हैं, जो नंदी और गणों के स्वामी हैं, और मंदार पुष्पों से पूजे जाते हैं। ऐसे ‘म’ अक्षर स्वरूप शिव को नमस्कार है।
  • ‘शि’ कार (अग्नि तत्व): जो माता पार्वती (गौरी) के मुख कमल को खिलाने के लिए सूर्य समान हैं, जिन्होंने दक्ष के यज्ञ का नाश किया, और जिनका कंठ नीला है। ऐसे ‘शि’ अक्षर स्वरूप शिव को नमस्कार है।
  • ‘व’ कार (वायु तत्व): जिनकी पूजा वसिष्ठ, अगस्त्य और गौतम जैसे महान ऋषि करते हैं, और जिनके नेत्र सूर्य, चंद्रमा और अग्नि हैं। ऐसे ‘व’ अक्षर स्वरूप शिव को नमस्कार है।
  • ‘य’ कार (आकाश तत्व): जो यक्ष का रूप धारण करने वाले (या यक्षों द्वारा पूजित), जटाधारी, हाथ में पिनाक धनुष लिए हुए सनातन देव हैं। ऐसे ‘य’ अक्षर स्वरूप शिव को नमस्कार है।

रोचक तथ्य (Trivia)

  • यह स्तोत्र ‘नमः शिवाय’ मंत्र के प्रत्येक अक्षर (न, म, शि, वा, य) पर आधारित है।
  • माना जाता है कि इन 5 श्लोकों का संबंध पंचमहाभूतों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) से है।
  • आदि शंकराचार्य ने 8वीं शताब्दी में अद्वैत वेदांत के प्रचार के दौरान इसकी रचना की थी।
  • इस स्तोत्र को शिव मानस पूजा और शिव तांडव स्तोत्र के साथ भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए सबसे प्रभावी माना जाता है।

सिद्ध कुंजिका स्तोत्र (Siddha Kunjika Stotram)

सिद्ध कुंजिका स्तोत्रम् (Siddha Kunjika Stotram) – अर्थ और महत्व

सिद्ध कुंजिका स्तोत्रम्: दुर्गा सप्तशती की गुप्त कुंजी

कलाकार/स्रोत: परंपरागत (रुद्रयामल तन्त्र)

परिचय (About)

सिद्ध कुंजिका स्तोत्र (Siddha Kunjika Stotram) हिंदू धर्म में शाक्त परंपरा का एक अत्यंत प्रभावशाली और पवित्र स्तोत्र है। रुद्रयामल तंत्र के अंतर्गत गौरी तंत्र में वर्णित यह स्तोत्र भगवान शिव द्वारा माता पार्वती को प्रदान किया गया था। ‘कुंजिका’ का अर्थ है चाबी। शास्त्रों के अनुसार, दुर्गा सप्तशती के मंत्र कीलित (locked) हैं। सिद्ध कुंजिका स्तोत्र का पाठ उन मंत्रों के कीलन को हटाकर उनकी सुप्त शक्ति को जगाता है।

इतिहास (History)

इस स्तोत्र का उद्गम रुद्रयामल तन्त्र से है। यह भगवान शिव और पार्वती के संवाद के रूप में है। शिव जी, देवी पार्वती को बताते हैं कि यह स्तोत्र देवताओं के लिए भी दुर्लभ है और इसे अत्यंत गुप्त रखा जाना चाहिए। यह दुर्गा सप्तशती पाठ का सार तत्व है।

सिद्ध कुंजिका स्तोत्रम् (मूल पाठ)

शिव उवाच शृणु देवि प्रवक्ष्यामि, कुंजिकास्तोत्रमुत्तमम्। येन मन्त्रप्रभावेण चण्डीजापः शुभो भवेत्॥१॥ न कवचं नार्गलास्तोत्रं कीलकं न रहस्यकम्। न सूक्तं नापि ध्यानं च न न्यासो न च वार्चनम्॥२॥ कुंजिकापाठमात्रेण दुर्गापाठफलं लभेत्। अति गुह्यतरं देवि देवानामपि दुर्लभम्॥३॥ गोपनीयं प्रयत्नेन स्वयोनिरिव पार्वति। मारणं मोहनं वश्यं स्तम्भनोच्चाटनादिकम्। पाठमात्रेण संसिद्ध्येत् कुंजिकास्तोत्रमुत्तमम्॥४॥ अथ मन्त्रः
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे। ॐ ग्लौं हुं क्लीं जूं सः ज्वालय ज्वालय ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ज्वल हं सं लं क्षं फट् स्वाहा॥
॥इति मन्त्रः॥ नमस्ते रुद्ररूपिण्यै नमस्ते मधुमर्दिनि। नमः कैटभहारिण्यै नमस्ते महिषार्दिनि॥१॥ नमस्ते शुम्भहन्त्र्यै च निशुम्भासुरघातिनि। जाग्रतं हि महादेवि जपं सिद्धं कुरुष्व मे॥२॥ ऐंकारी सृष्टिरूपायै ह्रींकारी प्रतिपालिका। क्लींकारी कामरूपिण्यै बीजरूपे नमोऽस्तु ते॥३॥ चामुण्डा चण्डघाती च यैकारी वरदायिनी। विच्चे चाभयदा नित्यं नमस्ते मन्त्ररूपिणि॥४॥ धां धीं धूं धूर्जटेः पत्नी वां वीं वूं वागधीश्वरी। क्रां क्रीं क्रूं कालिका देवि शां शीं शूं मे शुभं कुरु॥५॥ हुं हुं हुंकाररूपिण्यै जं जं जं जम्भनादिनी। भ्रां भ्रीं भ्रूं भैरवी भद्रे भवान्यै ते नमो नमः॥६॥ अं कं चं टं तं पं यं शं वीं दुं ऐं वीं हं क्षं। धिजाग्रं धिजाग्रं त्रोटय त्रोटय दीप्तं कुरु कुरु स्वाहा॥७॥ पां पीं पूं पार्वती पूर्णा खां खीं खूं खेचरी तथा। सां सीं सूं सप्तशती देव्या मन्त्रसिद्धिं कुरुष्व मे॥८॥ इदं तु कुंजिकास्तोत्रं मन्त्रजागर्तिहेतवे। अभक्ते नैव दातव्यं गोपितं रक्ष पार्वति॥ यस्तु कुंजिकया देवि हीनां सप्तशतीं पठेत्। न तस्य जायते सिद्धिररण्ये रोदनं यथा॥ ॥इति श्रीरुद्रयामले गौरीतन्त्रे शिवपार्वतीसंवादे कुंजिकास्तोत्रं सम्पूर्णम्॥

अर्थ और विश्लेषण (Meaning & Analysis)

सिद्ध कुंजिका स्तोत्र केवल शब्दों का संग्रह नहीं, बल्कि बीजाक्षरों का एक विद्युत-पुंज है।

  • सर्वोपरि महत्व: भगवान शिव कहते हैं कि इस स्तोत्र के पाठ से कवच, अर्गला, कीलक, ध्यान, और न्यास की आवश्यकता गौण हो जाती है, क्योंकि यह ‘कुंजी’ सीधे शक्ति को खोल देती है।
  • बीजाक्षर रहस्य:
    • ऐं (Aim): यह वाग्बीज है, जो ज्ञान और सृष्टि का प्रतीक है।
    • ह्रीं (Hreem): यह मायाबीज है, जो भुवनेश्वरश्वरी और पालन शक्ति का प्रतीक है।
    • क्लीं (Kleem): यह कामबीज है, जो आकर्षण और इच्छा पूर्ति का प्रतीक है।
  • चेतावनी: अंतिम श्लोक चेतावनी देता है कि कुंजिका के बिना सप्तशती का पाठ ‘अरण्य रोदन’ (जंगल में रोने) के समान व्यर्थ हो सकता है।

रोचक तथ्य (Trivia)

  • 📚 समय की बचत: नवरात्रि में समयाभाव होने पर, भक्त अक्सर पूर्ण चंडी पाठ के विकल्प के रूप में केवल ‘सिद्ध कुंजिका स्तोत्र’ का पाठ करते हैं।
  • 🔐 गुप्त साधना: इसे ‘स्वयोनिरिव’ गुप्त रखने को कहा गया है, जिसका अर्थ है कि यह अत्यंत व्यक्तिगत साधना है।
  • 🔥 अग्नि तत्व: इसमें ‘ज्वालय ज्वालय’ जैसे शब्दों का प्रयोग अग्नि तत्व को प्रज्वलित करने और नकारात्मकता को भस्म करने के लिए किया गया है।

भज गोविन्दं  (BHAJ GOVINDAM)

आदि गुरु श्री शंकराचार्य विरचित 

Adi Shankara’s Bhaja Govindam

Bhaj Govindam In Sanskrit Verse Only

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Bhaj Govindam | भज गोविन्दम् | चर्पटपञ्जरिका स्तोत्र | Mohamudgara Stotram | Madhvi Madhukar Jha


भज गोविन्दम्  (हिंदी भावानुवाद)

SANSKRIT WITH HINDI AND ENGLISH TRANSLATION

भज गोविन्दं भज गोविन्दं, गोविन्दं भज मूढ़मते। 
संप्राप्ते सन्निहिते काले, न हि न हि रक्षति डुकृञ् करणे॥1॥
हे मोह से ग्रसित बुद्धि (-सोचने समझने, राह निकलने में असमर्थ व्यक्ति) वाले मनुष्य ! गोविंद को भजो, गोविन्द का नाम लो, गोविन्द से प्रेम करो; क्योंकि मृत्यु के समय व्याकरण के नियम याद रखने से आपकी रक्षा नहीं हो सकती है।
O deluded-confused-unable to find a way out, chant the names of Almighty-Govind, worship Govind, love Govind, since memorising the rules of grammar (-daily chores-routine) cannot save one at the time of death. One who is not thoughtful, insensitive, irresponsible should pray to the God.
मूढ़ जहीहि धनागमतृष्णाम्, कुरु सद्बुद्धिमं मनसि वितृष्णाम्।
यल्लभसे निजकर्मोपात्तम्,वित्तं तेन विनोदय चित्तं॥2॥
हे मोहित बुद्धि! धन एकत्र करने के लोभ को त्यागो। अपने मन से इन समस्त कामनाओं का त्याग करो। सत्य के पथ का अनुसरण करो, अपने परिश्रम से जो धन प्राप्त हो, उससे ही अपने मन को प्रसन्न रखो।
O deluded-illusioned! Give up the lust to amass wealth. Reject all desires such desires from the mind and take up the path of virtuousness-piousity-righteousness. One should be content-satisfied happy with the money earned through honest means. One should earn money through righteous means without fraud, cheating, deceiving, forgery etc.
नारीस्तनभरनाभीदेशम्, दृष्ट्वा मागा मोहावेशम्।
एतन्मान्सवसादिविकारम्, मनसि विचिन्तय वारं वारम्॥3॥
स्त्री शरीर पर मोहित होकर आसक्त मत हो। अपने मन में निरंतर स्मरण करो कि वह मांस-वसा आदि के विकार के अतिरिक्त कुछ और नहीं हैं।
One should not be governed by lust, sexuality, sensuality, passions towards women since they are nothing except a means to corrupt the mind.
The woman’s anatomy is nothing more than flesh. Under the influence of delusion, one is not able to isolate himself from vulgarity, wretchedness.One should deliberate-meditate over this again and again mentally.
नलिनीदलगतजलमतितरलम्, तद्वज्जीवितमतिशयचपलम्।
विद्धि व्याध्यभिमानग्रस्तं, लोक शोकहतं च समस्तम्॥4॥
जीवन कमल-पत्र पर पड़ी हुई पानी की बूंदों के समान अनिश्चित एवं अल्प (-क्षणभंगुर) है। यह समझ लो कि समस्त विश्व रोग, अहंकार और दु:ख में डूबा हुआ है।
Life is as ephemeral as water drops on a lotus leaf. Be aware that the whole world is troubled by disease, ego and grief. One did not exist before and he will not exist thereafter, as well.
यावद्वित्तोपार्जनसक्त:, तावन्निजपरिवारो रक्तः। पश्चाज्जीवति जर्जरदेहे, वार्तां कोऽपि न पृच्छति गेहे॥5॥
जब तक व्यक्ति धनोपार्जन में समर्थ है, तब तक परिवार में सभी उसके प्रति स्नेह प्रदर्शित करते हैं, परन्तु अशक्त हो जाने पर उसे सामान्य बातचीत में भी नहीं पूछा जाता है।
As long as one is fit and capable to earn money, everyone in the family show affection- respect towards him. But afterwards, when his body becomes weak-he turns old, no one cares-inquiries about him. No one feels the need to consult him. Even the servants ignore him.
यावत्पवनो निवसति देहे, तावत् पृच्छति कुशलं गेहे।
गतवति वायौ देहापाये, भार्या बिभ्यति तस्मिन्काये॥6॥
जब तक शरीर में प्राण रहते हैं तब तक ही लोग कुशल पूछते हैं। शरीर से प्राण वायु के निकलते ही पत्नी भी उस शरीर से डरती है।
People are concerned about one till he alive. As soon as the soul-vital air -Pran Vayu, escape the body, near and dear too wish to remain away-aloof from it. On the other hand they are afraid of it. Even the wife prefer to remain away from the corpse-dead body-remains, out of fear (-ghost).
बालस्तावत् क्रीडासक्तः, तरुणस्तावत् तरुणीसक्तः।
वृद्धस्तावच्चिन्तासक्तः, परे ब्रह्मणि कोऽपि न सक्तः॥7॥
बचपन में खेल में रूचि होती है, युवावस्था में युवा स्त्री के प्रति आकर्षण होता है, वृद्धावस्था में चिंताओं से घिरे रहते हैं, पर प्रभु से कोई प्रेम नहीं करता है।
One idles away-waste childhood in sports-play, during youth, he is attached to woman, in old age he keeps worrying about future, but it seldom that he prefers to be engrossed with Govind-the Par Brahmn Parmeshwar at any stage. In fact, he does not know, understand the significance-importance of it.
का ते कांता कस्ते पुत्रः, संसारोऽयमतीव विचित्रः।
कस्य त्वं वा कुत अयातः, तत्त्वं चिन्तय तदिह भ्रातः॥8॥
कौन तुम्हारी पत्नी है, कौन तुम्हारा पुत्र है, ये संसार अत्यंत विचित्र है, तुम कौन हो, कहाँ से आये हो, बन्धु ! इस बात पर तो पहले विचार कर लो।
Who is your wife ? Who is your son? Indeed, strange is this world. O dear, think again and again who are you and from where have you come. One does not know his origin, earlier incarnations-previous births.
सत्संगत्वे निस्संगत्वं, निस्संगत्वे निर्मोहत्वं। निर्मोहत्वे निश्चलतत्त्वं निश्चलतत्त्वे जीवन्मुक्तिः॥9॥
सत्संग से वैराग्य, वैराग्य से विवेक, विवेक से स्थिर तत्त्वज्ञान और तत्त्वज्ञान से मोक्ष की प्राप्ति होती है।
Interaction with saints brings detachment, detachment leads to gist-nectar-elixir pertaining to the Almighty and this leads to Salvation-Liberation-Assimilation in the Ultimate-Almighty.
वयसि गते कः कामविकारः, शुष्के नीरे कः कासारः। क्षीणे वित्ते कः परिवारः, ज्ञाते तत्त्वे कः संसारः॥10॥
आयु बीत जाने के बाद काम भाव नहीं रहता, पानी सूख जाने पर तालाब नहीं रहता, धन चले जाने पर परिवार नहीं रहता और तत्त्व ज्ञान होने के बाद संसार नहीं रहता।
As soon as one grows old he looses potency-vigour-strength, after drying ponds-lakes loose their status as reservoirs, loss of wealth-poverty drives away the relatives and with the awakening of gist of the understanding of the Almighty; one looses charm of this world.
मा कुरु धनजनयौवनगर्वं, हरति निमेषात्कालः सर्वं।
मायामयमिदमखिलम् हित्वा, ब्रह्मपदम् त्वं प्रविश विदित्वा॥11॥
धन, शक्ति और यौवन पर गर्व मत करो, समय क्षण भर में इनको नष्ट कर देता है| इस विश्व को माया से घिरा हुआ जान कर तुम ब्रह्म पद में प्रवेश करो।
One should not boast of wealth, strength-power-might and youth-vigor-vitality. The time-Kal will perish all these in a fraction of moment. He should consider this world to be illusion-perishable-destructible and make efforts to attain-achieve the Par Brahmn Parmeshwar.
दिनयामिन्यौ सायं प्रातः, शिशिरवसन्तौ पुनरायातः।
कालः क्रीडति गच्छत्यायुस्तदपि न मुन्च्त्याशावायुः॥12॥
दिन और रात, शाम और सुबह, सर्दी और बसंत बार-बार आते-जाते रहते हैं। काल की इस क्रीडा के साथ जीवन नष्ट होता रहता है; परन्तु इच्छाओ का अंत कभी नहीं होता है।
Desires never vanish-diminish-satisfied from the mind of one with the expiry of time. He has to control-rein them. This can be achieved by diverting oneself towards the Almighty, through prayers-devotion. Day and night, dusk and dawn, winter and spring come and go, cyclically. In this sport of Time entire life goes away, but the storm of desire never departs or diminishes.
द्वादशमंजरिकाभिरशेषः कथितो वैयाकरणस्यैषः।
उपदेशोऽभूद्विद्यानिपुणैः, श्रीमच्छंकरभगवच्चरणैः॥12-1॥
बारह गीतों का ये उपदेश (-पुष्पहार, bouquet, garland), सर्वज्ञ प्रभुपाद श्री शंकराचार्य द्वारा एक वैयाकरण को प्रदान किया गया।
This bouquet of twelve verses-Shlok-rhymes was imparted to a grammarian by the all-knowing, god-like Shri Shankrachary. This is apiece of preaching.
काते कान्ता धन गतचिन्ता, वातुल किं तव नास्ति नियन्ता।
त्रिजगति सज्जनसं गतिरैका, भवति भवार्णवतरणे नौका॥13॥
तुम्हें पत्नी और धन की इतनी चिंता क्यों है, क्या उनका कोई नियंत्रक नहीं है। तीनों लोकों में केवल सज्जनों का साथ ही इस भवसागर से पार जाने की नौका है।
One should not worry about his wealth, family all the time. He should have faith in God who controls every thing. The virtuous company of the diligent-righteous-pious helps one in sailing through this vast reservoir of deeds-actions-mistakes-vices. Oh deluded! Why do you worry about your wealth and wife? Is there no one to take care of them? Only the company of saints can act as a boat in three worlds to take you out from this ocean-cycle of births and rebirths.
जटिलो मुण्डी लुञ्छितकेशः, काषायाम्बरबहुकृतवेषः।
पश्यन्नपि च न पश्यति मूढः, उदरनिमित्तं बहुकृतवेषः॥14॥
बड़ी जटाएं, केश रहित सिर, बिखरे बाल, काषाय (-भगवा) वस्त्र और भांति भांति के वेश; ये सब अपना पेट भरने के लिए ही धारण किये जाते हैं, अरे मोहित मनुष्य तुम इसको देख कर भी क्यों नहीं देख पाते हो!
Matted and untidy hair, shaven heads, orange-saffron coloured cloths are all a way to earn livelihood by those who do not wish to earn their bread through righteous-honest means-hard work. O deluded man why don’t you understand it, even after seeing.
अङ्गं गलितं पलितं मुण्डं, दशनविहीनं जतं तुण्डम्।
वृद्धो याति गृहीत्वा दण्डं, तदपि न मुञ्चत्याशापिण्डम्॥15॥
क्षीण अंगों, पके हुए बालों, दांतों से रहित मुख और हाथ में दंड लेकर चलने वाला वृद्ध भी आशा-पाश से बंधा रहता है।
Even an old man with weak limbs, hairless head, toothless mouth, walking with the help of a stick, still has high hopes-unfulfilled desires. Desires are unending. Fulfilment of one desire leads to yet another new one.
अग्रे वह्निः पृष्ठेभानुः, रात्रौ चुबुकसमर्पितजानुः।
करतलभिक्षस्तरुतलवासः, तदपि न मुञ्चत्याशापाशः॥16॥
सूर्यास्त के बाद, रात्रि में आग जला कर और घुटनों में सर छिपाकर सर्दी बचाने वाला, हाथ में भिक्षा का अन्न खाने वाला, पेड़ के नीचे रहने वाला भी अपनी इच्छाओं के बंधन को छोड़ नहीं पाता है।
One who warms his body by fire after sunset living in the open under the sky-homeless, curls his body to his knees to avoid cold; eats the begged food and sleeps beneath the tree, he is also bound by desires, even in these difficult situations. Desires never die.
कुरुते गङ्गासागरगमनं, व्रतपरिपालनमथवा दानम्।
ज्ञानविहिनः सर्वमतेन, मुक्तिं न भजति जन्मशतेन॥17॥
किसी भी धर्म के अनुसार ज्ञान रहित रह कर गंगासागर जाने से, व्रत रखने से और दान देने से सौ जन्मों में भी मुक्ति नहीं प्राप्त हो सकती है।
Its not possible to attain Salvation by visiting religious places of worship-pilgrimages, fasting, donations-charity, without understanding the gist of the religiosity, even in hundred births, by following any of the religion-Varnashram Dharm.
सुर मंदिर तरु मूल निवासः, शय्या भूतल मजिनं वासः।
सर्व परिग्रह भोग त्यागः, कस्य सुखं न करोति विरागः॥18॥
देव मंदिर या पेड़ के नीचे निवास, पृथ्वी जैसी शय्या, अकेले ही रहने वाले, सभी संग्रहों और सुखों का त्याग करने वाले वैराग्य से किसको आनंद की प्राप्ति नहीं होगी।
Renunciation-detachment-relinquishment leads to bliss-Parmanand-Ultimate pleasure-Salvation. Reside in a temple or below a tree, sleep on mother earth as your bed, stay alone, leave all the belongings and comforts, such renunciation can give all the pleasures to anybody.
योगरतो वाभोगरतोवा, सङ्गरतो वा सङ्गवीहिनः।
यस्य ब्रह्मणि रमते चित्तं, नन्दति नन्दति नन्दत्येव॥19॥
कोई योग में लगा हो या भोग में, संग में आसक्त हो या निसंग हो, पर जिसका मन ब्रह्म में लगा है; वो ही आनंद करता है, आनन्द ही आनंद करता है।
One may like meditative practice or worldly pleasures, may be attached or detached. But only one who fixing-trains his mind on God lovingly enjoys bliss, enjoys bliss, enjoys bliss.
भगवद् गीता किञ्चिदधीता, गङ्गा जललव कणिकापीता।
सकृदपि येन मुरारि समर्चा, क्रियते तस्य यमेन न चर्चा॥20॥
जिन्होंने भगवद् गीता का थोडा सा भी अध्ययन किया है, भक्ति रूपी गंगा जल का कण भर भी पिया है, भगवान कृष्ण की एक बार भी समुचित प्रकार से पूजा की है, यम के द्वारा उनकी चर्चा नहीं की जाती है।
Those who have studied-understood-learnt Geeta, worship Bhagwan Shri Krashn with love & affection even for a while-once-a little-fraction of second, drink just a drop of water from the holy Ganga, Yam Raj-the deity of death has no control over them.
पुनरपि जननं पुनरपि मरणं, पुनरपि जननी जठरे शयनम्।
इह संसारे बहुदुस्तारे, कृपयाऽपारे पाहि मुरारे॥21॥
बार-बार जन्म, बार-बार मृत्यु, बार-बार माँ के गर्भ में शयन, इस संसार से पार जा पाना बहुत कठिन है। हे कृष्ण! कृपा करके मेरी इससे रक्षा करें।
Repeated births and death, stay in the mother’s womb, makes it extremely difficult to go beyond this universe. Hey Murari! Please help me pass through all this by extending your grace-mercy.
रथ्या चर्पट विरचित कन्थः, पुण्यापुण्य विवर्जित पन्थः।
योगी योगनियोजित चित्तो, रमते बालोन्मत्तवदेव॥22॥
रथ के नीचे आने से फटे हुए कपडे पहनने वाले, पुण्य और पाप से रहित पथ पर चलने वाले, योग में अपने चित्त को लगाने वाले योगी, बालक के समान आनंद में रहते हैं।
One who wears rags-teared cloths by coming under the chariot, travel-move on the path free from virtues and sins- a state of equanimity, trains their minds in the devotion to the Almighty through Yog-meditation, enjoys like a carefree exuberant child.
कस्त्वं कोऽहं कुत आयातः, का मे जननी को मे तातः।
इति परिभावय सर्वमसारम्, विश्वं त्यक्त्वा स्वप्न विचारम्॥23॥
तुम कौन हो, मैं कौन हूँ, कहाँ से आया हूँ, मेरी माँ कौन है, मेरा पिता कौन है? सब प्रकार से इस विश्व को असार समझ कर इसको एक स्वप्न के समान त्याग दो।
Who are you ? Who am I ? From where have I come ? Who is my mother, who is my father ? Ponder over these and after understanding-realizing this world to be meaningless like a dream, relinquish it.
त्वयि मयि चान्यत्रैको विष्णुः, व्यर्थं कुप्यसि मय्यसहिष्णुः।
भव समचित्तः सर्वत्र त्वं, वाञ्छस्यचिराद्यदि विष्णुत्वम्॥24॥
तुममें, मुझमें और अन्यत्र भी सर्वव्यापक विष्णु ही हैं, तुम व्यर्थ ही क्रोध करते हो, यदि तुम शाश्वत विष्णु पद को प्राप्त करना चाहते हो तो सर्वत्र समान चित्त वाले हो जाओ।
Bhagwan Vishnu resides in me, you and everything-every one else. So, your anger is meaningless-useless. If you wish to attain the eternal status of Vishnu, practice equanimity all the time, in all the things.
शत्रौ मित्रे पुत्रे बन्धौ, मा कुरु यत्नं विग्रहसन्धौ।
सर्वस्मिन्नपि पश्यात्मानं, सर्वत्रोत्सृज भेदाज्ञानम्॥25॥
शत्रु, मित्र, पुत्र, बन्धु-बांधवों से प्रेम और द्वेष मत करो, सबमें अपने आप को ही देखो, इस प्रकार सर्वत्र ही भेद रूपी अज्ञान को त्याग दो।
Bhagwan Vishnu is present in each and every one of us, in the form of soul. Its only the body which discriminate between the two. Try not to win the love of your friends, brothers, relatives and son(s) or to fight with your enemies. See yourself in each and everyone and give up ignorance of duality everywhere. Practice equanimity. [One must be ready to protect his kith and kin and him self, in stead of surrendering to situations, till he is a household undergoing Grahasthashram (-गृहस्थाश्रम) Varnashram Dharm.
कामं क्रोधं लोभं मोहं, त्यक्त्वाऽत्मानं भावय कोऽहम्।
आत्मज्ञान विहीना मूढाः, ते पच्यन्ते नरकनिगूढाः॥26॥
काम, क्रोध, लोभ, मोह को छोड़ कर, स्वयं में स्थित होकर विचार करो कि मैं कौन हूँ ? जो आत्म-ज्ञान से रहित मोहित व्यक्ति हैं; वो बार-बार छिपे हुए इस संसार रूपी नरक में पड़ते हैं।
Give up desires, anger, greed and delusion. Ponder over your real self-nature. Those devoid of the knowledge of self, come in this world-a hidden hell, endlessly.
गेयं गीता नाम सहस्रं, ध्येयं श्रीपति रूपमजस्रम्।
नेयं सज्जन सङ्गे चित्तं, देयं दीनजनाय च वित्तम्॥27॥
भगवान विष्णु के सहस्त्र नामों को गाते हुए उनके सुन्दर रूप का अनवरत ध्यान करो, सज्जनों के संग में अपने मन को लगाओ और गरीबों की अपने धन से सेवा करो।
Sing thousand glories of Bhagwan Vishnu, constantly remembering his various forms in your heart. Enjoy the company of virtuous-righteous-pious-noble people and do acts of charity for the poor, down trodden and the needy.
सुखतः क्रियते रामाभोगः,पश्चाद्धन्त शरीरे रोगः।
यद्यपि लोके मरणं शरणं, तदपि न मुञ्चति पापाचरणम्॥28॥
सुख के लिए लोग आनंद-भोग करते हैं, जिसके बाद इस शरीर में रोग हो जाते हैं। यद्यपि इस पृथ्वी पर सबका मरण सुनिश्चित है, फिर भी लोग पापमय आचरण को नहीं छोड़ते।
People use this body for pleasure-enjoyment-passions-sexuality-sensuality-lust, which gets diseased in the end. Though in this world everything ends in death, man does not give up the sinful conduct. Greed, unfulfilled desires always keep him pushing to wretchedness-vices-sins-misconduct.
अर्थंमनर्थम् भावय नित्यं, नास्ति ततः सुखलेशः सत्यम्।
पुत्रादपि धनभजाम् भीतिः, सर्वत्रैषा विहिता रीतिः॥29॥
धन अकल्याणकारी है और इससे जरा सा भी सुख नहीं मिल सकता है, ऐसा विचार प्रतिदिन करना चाहिए। धनवान व्यक्ति तो अपने पुत्रों से भी डरते हैं; ऐसा सबको पता ही है।
Keep on thinking that money is root cause of all troubles. It cannot give even a bit of happiness-pleasure. A rich man fears even his own sons, who are willing to kill him for the sake of wealth, luxuries. This is the law nature pertaining to riches and applicable to every one-everywhere.
प्राणायामं प्रत्याहारं, नित्यानित्य विवेकविचारम्।
जाप्यसमेत समाधिविधानं, कुर्ववधानं महदवधानम्॥30॥
प्राणायाम, उचित आहार, नित्य इस संसार की अनित्यता का विवेक पूर्वक विचार करो, प्रेम से प्रभु-नाम का जाप करते हुए समाधि में ध्यान दो, बहुत ध्यान दो।
Perform-conduct-practice Pranayam, the regulation of life forces, take proper food, constantly distinguish the permanent from the fleeting. Chant the holy names of God with love and meditate, with utmost attention. One must utilize his prudence-intelligence to abandon vices-sins-wretchedness.
गुरुचरणाम्बुज निर्भर भक्तः, संसारादचिराद्भव मुक्तः।
सेन्द्रियमानस नियमादेवं, द्रक्ष्यसि निज हृदयस्थं देवम्॥31॥
गुरु के चरण कमलों का ही आश्रय मानने वाले भक्त बनकर सदैव के लिए इस संसार में आवागमन से मुक्त हो जाओ, इस प्रकार मन एवं इन्द्रियों का निग्रह कर अपने हृदय में विराजमान प्रभु के दर्शन करो।
One must take shelter-asylum-protection under the auspiciousness of his Guru-guide like a devotee and set him self free from the clutches of this perishable world. This will help him in acquiring control over sensuality-vulgarity-useless thoughts-dirty ideas-irrational thoughts. One should become free from repeated cycles of death and births. This will lead to self control over mind, ideas and retain the Almighty in the heart.
मूढः कश्चन वैयाकरणो, डुकृञ्करणाध्ययन धुरिणः।
श्रीमच्छम्कर भगवच्छिष्यै, बोधित आसिच्छोधितकरणः॥32॥
इस प्रकार व्याकरण के नियमों को कंठस्थ करते हुए किसी मोहित वैयाकरण के माध्यम से बुद्धिमान श्री भगवान शंकर के शिष्य बोध प्राप्त करने के लिए प्रेरित किये गए।
Thus through a deluded grammarian lost in memorising rules of the grammar, the all knowing Shri Shankar motivated his disciples for enlightenment.
भजगोविन्दं भजगोविन्दं, गोविन्दं भजमूढमते।
नामस्मरणादन्यमुपायं, नहि पश्यामो भवतरणे॥33॥
गोविंद को भजो, गोविन्द का नाम लो, गोविन्द से प्रेम करो क्योंकि भगवान के नाम जप के अतिरिक्त इस भव-सागर से पार जाने का अन्य कोई मार्ग नहीं है।
O the deluded minded, chant Govind, worship Govind, love Govind; as there is no other way to cross the life’s ocean except lovingly remembering the holy names of God.

श्री राम रक्षा स्तोत्रम्

Shri Ram Raksha Stotram


विनियोग:

अस्य श्रीरामरक्षास्त्रोतमन्त्रस्य बुधकौशिक ऋषिः ।

श्री सीतारामचंद्रो देवता ।

अनुष्टुप छंदः। सीता शक्तिः ।

श्रीमान हनुमान कीलकम ।

श्री सीतारामचंद्रप्रीत्यर्थे रामरक्षास्त्रोतजपे विनियोगः ।

अथ ध्यानम्‌:

ध्यायेदाजानुबाहुं धृतशरधनुषं बद्धपदमासनस्थं,

पीतं वासो वसानं नवकमल दल स्पर्धिनेत्रम् प्रसन्नम ।

वामांकारूढ़ सीता मुखकमलमिलल्लोचनम्नी,

रदाभम् नानालंकारदीप्तं दधतमुरुजटामण्डलम् रामचंद्रम ॥


राम रक्षा स्तोत्रम्:

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Aigiri Nandini Lyrics In Hindi

| Mahishasura Mardini | महिषासुर मर्दिनी स्तोत्र

Aigiri Nandini Lyrics

अयि गिरिनन्दिनि नन्दितमेदिनि विश्वविनोदिनि नन्दिनुते
गिरिवरविन्ध्यशिरोऽधिनिवासिनि विष्णुविलासिनि जिष्णुनुते ।
भगवति हे शितिकण्ठकुटुम्बिनि भूरिकुटुम्बिनि भूरिकृते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १ ॥

सुरवरवर्षिणि दुर्धरधर्षिणि दुर्मुखमर्षिणि हर्षरते
त्रिभुवनपोषिणि शङ्करतोषिणि किल्बिषमोषिणि घोषरते
दनुजनिरोषिणि दितिसुतरोषिणि दुर्मदशोषिणि सिन्धुसुते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ २ ॥

अयि जगदम्ब मदम्ब कदम्ब वनप्रियवासिनि हासरते
शिखरि शिरोमणि तुङ्गहिमालय शृङ्गनिजालय मध्यगते ।
मधुमधुरे मधुकैटभगञ्जिनि कैटभभञ्जिनि रासरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ३ ॥

अयि शतखण्ड विखण्डितरुण्ड वितुण्डितशुण्द गजाधिपते
रिपुगजगण्ड विदारणचण्ड पराक्रमशुण्ड मृगाधिपते ।
निजभुजदण्ड निपातितखण्ड विपातितमुण्ड भटाधिपते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ४ ॥

अयि रणदुर्मद शत्रुवधोदित दुर्धरनिर्जर शक्तिभृते
चतुरविचार धुरीणमहाशिव दूतकृत प्रमथाधिपते ।
दुरितदुरीह दुराशयदुर्मति दानवदुत कृतान्तमते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ५ ॥

अयि शरणागत वैरिवधुवर वीरवराभय दायकरे
त्रिभुवनमस्तक शुलविरोधि शिरोऽधिकृतामल शुलकरे ।
दुमिदुमितामर धुन्दुभिनादमहोमुखरीकृत दिङ्मकरे
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ६ ॥

अयि निजहुङ्कृति मात्रनिराकृत धूम्रविलोचन धूम्रशते
समरविशोषित शोणितबीज समुद्भवशोणित बीजलते ।
शिवशिवशुम्भ निशुम्भमहाहव तर्पितभूत पिशाचरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ७ ॥

धनुरनुषङ्ग रणक्षणसङ्ग परिस्फुरदङ्ग नटत्कटके
कनकपिशङ्ग पृषत्कनिषङ्ग रसद्भटशृङ्ग हताबटुके ।
कृतचतुरङ्ग बलक्षितिरङ्ग घटद्बहुरङ्ग रटद्बटुके
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ८ ॥

सुरललना ततथेयि तथेयि कृताभिनयोदर नृत्यरते
कृत कुकुथः कुकुथो गडदादिकताल कुतूहल गानरते ।
धुधुकुट धुक्कुट धिंधिमित ध्वनि धीर मृदङ्ग निनादरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ९ ॥

जय जय जप्य जयेजयशब्द परस्तुति तत्परविश्वनुते
झणझणझिञ्झिमि झिङ्कृत नूपुरशिञ्जितमोहित भूतपते ।
नटित नटार्ध नटी नट नायक नाटितनाट्य सुगानरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १० ॥

अयि सुमनःसुमनःसुमनः सुमनःसुमनोहरकान्तियुते
श्रितरजनी रजनीरजनी रजनीरजनी करवक्त्रवृते ।
सुनयनविभ्रमर भ्रमरभ्रमर भ्रमरभ्रमराधिपते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ११ ॥

सहितमहाहव मल्लमतल्लिक मल्लितरल्लक मल्लरते
विरचितवल्लिक पल्लिकमल्लिक झिल्लिकभिल्लिक वर्गवृते ।
शितकृतफुल्ल समुल्लसितारुण तल्लजपल्लव सल्ललिते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १२ ॥

अविरलगण्ड गलन्मदमेदुर मत्तमतङ्ग जराजपते
त्रिभुवनभुषण भूतकलानिधि रूपपयोनिधि राजसुते ।
अयि सुदतीजन लालसमानस मोहन मन्मथराजसुते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १३ ॥

कमलदलामल कोमलकान्ति कलाकलितामल भाललते
सकलविलास कलानिलयक्रम केलिचलत्कल हंसकुले ।
अलिकुलसङ्कुल कुवलयमण्डल मौलिमिलद्बकुलालिकुले
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १४ ॥

करमुरलीरव वीजितकूजित लज्जितकोकिल मञ्जुमते
मिलितपुलिन्द मनोहरगुञ्जित रञ्जितशैल निकुञ्जगते ।
निजगणभूत महाशबरीगण सद्गुणसम्भृत केलितले
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १५ ॥

कटितटपीत दुकूलविचित्र मयुखतिरस्कृत चन्द्ररुचे
प्रणतसुरासुर मौलिमणिस्फुर दंशुलसन्नख चन्द्ररुचे
जितकनकाचल मौलिमदोर्जित निर्भरकुञ्जर कुम्भकुचे
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १६ ॥

विजितसहस्रकरैक सहस्रकरैक सहस्रकरैकनुते
कृतसुरतारक सङ्गरतारक सङ्गरतारक सूनुसुते ।
सुरथसमाधि समानसमाधि समाधिसमाधि सुजातरते ।
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १७ ॥

पदकमलं करुणानिलये वरिवस्यति योऽनुदिनं सुशिवे
अयि कमले कमलानिलये कमलानिलयः स कथं न भवेत् ।
तव पदमेव परम्पदमित्यनुशीलयतो मम किं न शिवे
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १८ ॥

कनकलसत्कलसिन्धुजलैरनुषिञ्चति तेगुणरङ्गभुवम्
भजति स किं न शचीकुचकुम्भतटीपरिरम्भसुखानुभवम् ।
तव चरणं शरणं करवाणि नतामरवाणि निवासि शिवम्
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १९ ॥

तव विमलेन्दुकुलं वदनेन्दुमलं सकलं ननु कूलयते
किमु पुरुहूतपुरीन्दु मुखी सुमुखीभिरसौ विमुखीक्रियते ।
मम तु मतं शिवनामधने भवती कृपया किमुत क्रियते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ २० ॥

अयि मयि दीन दयालुतया कृपयैव त्वया भवितव्यमुमे
अयि जगतो जननी कृपयासि यथासि तथानुमितासिरते ।
यदुचितमत्र भवत्युररीकुरुतादुरुतापमपाकुरुते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ २१ ॥

Aigiri Nandini Lyrics in English

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Ayi Giri-Nandini Nandita-Medini
Vishva-Vinodini Nandi-Nute
Giri-Vara-Vindhya-Shiro-[A]dhi-Nivaasini
Vissnnu-Vilaasini Jissnnu-Nute |
Bhagavati He Shiti-Kannttha-Kuttumbini
Bhuri-Kuttumbini Bhuri-Krte
Jaya Jaya He Mahissaasura-Mardini
Ramya-Kapardini Shaila-Sute || 1 ||

Sura-Vara-Varssinni Durdhara-Dharssinni
Durmukha-Marssinni Harssa-Rate
Tribhuvana-Possinni Shangkara-Tossinni
Kilbissa-Mossinni Ghossa-Rate
Danuja-Nirossinni Diti-Suta-Rossinni
Durmada-Shossinni Sindhu-Sute
Jaya Jaya He Mahissaasura-Mardini
Ramya-Kapardini Shaila-Sute || 2 ||

Ayi Jagad[t]-Amba Mad-Amba Kadamba
Vana-Priya-Vaasini Haasa-Rate
Shikhari Shiro-Manni Tungga-Himalaya
Shrngga-Nija-[Aa]laya Madhya-Gate |
Madhu-Madhure Madhu-Kaittabha-Ganjjini
Kaittabha-Bhanjjini Raasa-Rate
Jaya Jaya He Mahissaasura-Mardini
Ramya-Kapardini Shaila-Sute || 3 ||

Ayi Shata-Khanndda Vikhannddita-Runndda
Vitunnddita-Shunnda Gaja-[A]dhipate
Ripu-Gaja-Ganndda Vidaaranna-Canndda
Paraakrama-Shunndda Mrga-[A]dhipate |
Nija-Bhuja-Danndda Nipaatita-Khanndda
Vipaatita-Munndda Bhatta-[A]dhipate
Jaya Jaya He Mahissaasura-Mardini
Ramya-Kapardini Shaila-Sute || 4 ||

Ayi Ranna-Durmada Shatru-Vadho[a-U]dita
Durdhara-Nirjara Shakti-Bhrte
Catura-Vicaara Dhuriinna-Mahaashiva
Duuta-Krta Pramatha-[A]dhipate |
Durita-Duriiha Duraashaya-Durmati
Daanava-Duta Krtaanta-Mate
Jaya Jaya He Mahissaasura-Mardini
Ramya-Kapardini Shaila-Sute || 5 ||

Ayi Sharannaagata Vairi-Vadhuvara
Viiravara-[A]bhaya Daaya-Kare
Tri-Bhuvana-Mastaka Shula-Virodhi
Shiro-[A]dhikrta-[A]mala Shula-Kare |
Dumi-Dumi-Taamara Dhundubhi-Naadam-Aho-Mukhariikrta Dingma-Kare
Jaya Jaya He Mahissaasura-Mardini
Ramya-Kapardini Shaila-Sute || 6 ||

Ayi Nija-Hungkrti Maatra-Niraakrta
Dhumravilocana Dhumra-Shate
Samara-Vishossita Shonnita-Biija
Samudbhava-Shonnita Biija-Late |
Shiva-Shiva-Shumbha Nishumbha-Mahaahava
Tarpita-Bhuta Pishaaca-Rate
Jaya Jaya He Mahissaasura-Mardini
Ramya-Kapardini Shaila-Sute || 7 ||

Dhanur-Anussangga Ranna-Kssanna-Sangga
Parisphurad-Angga Nattat-Kattake
Kanaka-Pishangga Prssatka-Nissangga
Rasad-Bhatta-Shrngga Hataa-Battuke |
Krta-Caturangga Bala-Kssiti-Rangga
Ghattad-Bahu-Rangga Rattad-Battuke
Jaya Jaya He Mahissaasura-Mardini
Ramya-Kapardini Shaila-Sute || 8 ||

Sura-Lalanaa Tatatheyi Tatheyi
Krta-Abhinayo-[U]dara Nrtya-Rate
Krta Kukuthah Kukutho Gaddadaadika-Taala
Kutuuhala Gaana-Rate |
Dhudhukutta Dhukkutta Dhimdhimita Dhvani
Dhiira Mrdamga Ninaada-Rate
Jaya Jaya He Mahissaasura-Mardini
Ramya-Kapardini Shaila-Sute || 9 ||

Jaya Jaya Japya Jaye-Jaya-Shabda
Para-Stuti Tat-Para-Vishva-Nute
Jhanna-Jhanna-Jhinjjhimi Jhingkrta
Nuupura-Shinjjita-Mohita Bhuuta-Pate |
Nattita Nattaardha Nattii Natta Naayaka
Naattita-Naattya Su-Gaana-Rate
Jaya Jaya He Mahissaasura-Mardini
Ramya-Kapardini Shaila-Sute || 10 ||

Ayi Sumanah-Sumanah-Sumanah
Sumanah-Sumanohara-Kaanti-Yute
Shrita-Rajanii Rajanii-Rajanii
Rajanii-Rajanii Kara-Vaktra-Vrte |
Sunayana-Vi-Bhramara Bhramara-Bhramara
Bhramara-Bhramara-[A]dhipate
Jaya Jaya He Mahissaasura-Mardini
Ramya-Kapardini Shaila-Sute || 11 ||

Sahita-Mahaahava Mallama-Tallika
Malli-Tarallaka Malla-Rate
Viracita-Vallika Pallika-Mallika
Jhillika-Bhillika Varga-Vrte |
Shita-Krta-Phulla Samullasita-[A]runna
Tallaja-Pallava Sal-Lalite
Jaya Jaya He Mahissaasura-Mardini
Ramya-Kapardini Shaila-Sute || 12 ||

Avirala-Ganndda Galan-Mada-Medura
Matta-Matangga ja-Raaja-Pate
Tri-Bhuvana-Bhussanna Bhuuta-Kalaanidhi
Ruupa-Payo-Nidhi Raaja-Sute |
Ayi Sudatii-Jana Laalasa-Maanasa
Mohana Manmatha-Raaja-Sute
Jaya Jaya He Mahissaasura-Mardini
Ramya-Kapardini Shaila-Sute || 13 ||

Kamala-Dala-[A]mala Komala-Kaanti
Kalaa-Kalita-[A]mala Bhaalalate
Sakala-Vilaasa Kalaa-Nilaya-Krama
Keli-Calat-Kala Hamsa-Kule |
Alikula-Sangkula Kuvalaya-Mannddala
Mouli-Milad-Bakula-Ali-Kule
Jaya Jaya He Mahissaasura-Mardini
Ramya-Kapardini Shaila-Sute || 14 ||

Kara-Muralii-Rava Viijita-Kuujita
Lajjita-Kokila Manjju-Mate
Milita-Pulinda Manohara-Gunjjita
Ranjjita-Shaila Nikunjja-Gate |
Nija-Ganna-Bhuuta Mahaa-Shabarii-Ganna
Sad-Gunna-Sambhrta Keli-Tale
Jaya Jaya He Mahissaasura-Mardini
Ramya-Kapardini Shaila-Sute || 15 ||

Kattitatta-Piita Dukuula-Vicitra
Mayukha-Tiraskrta Candra-Ruce
Prannata-Suraasura Mouli-Manni-Sphura
D-Amshula-Sannakha Candra-Ruce
Jita-Kanaka-[A]cala Mouli-Mado[a-Uu]rjita
Nirbhara-Kunjjara Kumbha-Kuce
Jaya Jaya He Mahissaasura-Mardini
Ramya-Kapardini Shaila-Sute || 16 ||

Vijita-Sahasra-Karaika Sahasra-Karaika
Sahasra-Karaika-Nute
Krta-Sura-Taaraka Sanggara-Taaraka
Sanggara-Taaraka Suunu-Sute |
Suratha-Samaadhi Samaana-Samaadhi
Samaadhi-Samaadhi Sujaata-Rate |
Jaya Jaya He Mahissaasura-Mardini
Ramya-Kapardini Shaila-Sute || 17 ||

Pada-Kamalam Karunnaa-Nilaye
Varivasyati Yo-[A]nudinam Su-Shive
Ayi Kamale Kamalaa-Nilaye
Kamalaa-Nilayah Sa Katham Na Bhavet |
Tava Padam-Eva Param-Padam-Ity-Anushiilayato
Mama Kim Na Shive
Jaya Jaya He Mahissaasura-Mardini
Ramya-Kapardini Shaila-Sute || 18 ||

Kanaka-Lasat-Kala-Sindhu-Jalair-Anussinccati
Te-Gunna-Rangga-Bhuvam
Bhajati Sa Kim Na
Shacii-Kuca-Kumbha-Tattii-Parirambha-Sukha-[A]nubhavam |
Tava Carannam Sharannam Kara-Vaanni
Nata-Amara-Vaanni Nivaasi Shivam
Jaya Jaya He Mahissaasura-Mardini
Ramya-Kapardini Shaila-Sute || 19 ||

Tava Vimale[a-I]ndu-Kulam Vadane[a-I]ndu-Malam
Sakalam Nanu Kuula-Yate
Kimu Puruhuuta-Purii-Indu Mukhii
Sumukhiibhir-Asou Vimukhii-Kriyate |
Mama Tu Matam Shiva-Naama-Dhane
Bhavatii Krpayaa Kimuta Kriyate
Jaya Jaya He Mahissaasura-Mardini
Ramya-Kapardini Shaila-Sute || 20 ||

Ayi Mayi Diina Dayaalu-Tayaa
Krpaya-Iva Tvayaa Bhavitavyam-Ume
Ayi Jagato Jananii Krpayaasi
Yathaasi Tathanu-mita-Asira-Te |
Yad-Ucitam-Atra Bhavatyurarii-Kurutaa-Duru-Taapam-Apaakurute
Jaya Jaya He Mahissaasura-Mardini
Ramya-Kapardini Shaila-Sute || 21 ||

प्रश्न

आईगिरीनंदिनी का क्या अर्थ है?

अयिगिरि का अर्थ है पर्वतराज कि पुत्री (गिरि का अर्थ है पर्वत) और नंदिनी का अर्थ है जो दुनिया को खुशी/आनंद देती है। यह दुर्गा अवतार में देवी पार्वती को संदर्भित करता है जिन्होंने महिषासुर राक्षस का वध किया था। यही कारण है कि उन्हें महिषासुर मर्दिनी भी कहा जाता है।

आईगिरी नंदिनी किसने लिखी है?

ऐगिरि नंदिनी की रचना आदि गुरु शंकराचार्य ने संस्कृत में की थी।

महिषासुर का क्या अर्थ है?

महिष शब्द का अर्थ है भैंसा और असुर का अर्थ है राक्षस। अतः महिषासुर का अर्थ भैंसा राक्षस है।

दुर्गा ने महिषासुर का वध कैसे किया?

महिषासुर एक राक्षस था जो जल्दी से अपना रूप बदल सकता था। उसे वरदान था कि वह कभी किसी मनुष्य के हाथों नहीं मारा जायेगा। जब इंद्र के नेतृत्व में भगवान और महिषासुर के नेतृत्व में राक्षसों के बीच युद्ध शुरू हुआ, तो देवता हार गए। निराश होकर देवताओं ने अपनी दिव्य शक्तियों को देवी दुर्गा में समाहित कर दिया। इसके बाद मां दुर्गा ने महिषासुर से 15 दिनों तक युद्ध किया और राक्षस महिषासुर का वध कर दिया।

एक प्रचलित लोककथा के अनुसार

यह स्तोत्र श्री आदि शंकराचार्य श्री मुख से गाया हुआ माँ भगवती का अत्यंत प्रिय स्तोत्र है। इसकी रचना उन्होंने स्वयं की थी।

   इसकी उत्पत्ति के बारे में एक पौराणिक कथा प्रचलित है, जो आदि गुरु के जीवन की एक घटना से ली गई है।

   एक बार वे अपने शिष्यों के साथ एक बहुत संकरी गली से स्नान के लिए मणिकर्णिका घाट जा रहे थे, मणिकर्णिका घाट एक श्मशान घाट भी है।

   सड़क पर एक युवती अपने मृत पति का सिर गोद में लेकर बैठी विलाप कर रही थी, सड़क संकरी होने के कारण शव को हटाना आवश्यक था, न कि उसे पार करना, सड़क पार करना, हमारे धर्म में किसी भी व्यक्ति को पार करना स्वयं भगवान को पार करना है, इसलिए यह बिल्कुल वर्जित है।

   उनके शिष्यों ने महिला से अपने पति के शव को हटाने और रास्ता देने की प्रार्थना की, किंतु महिला ने उनकी बात सुनकर भी अनसुनी कर दी और  सुने बिना ही रोती रही। तब आचार्य ने स्वयं उनसे शव हटाने का अनुरोध किया।

   उनकी विनती सुनकर वह स्त्री कहने लगी- ‘हे महात्मा! आप बार-बार मुझसे इस शरीर को हटाने के लिए कह रहे हैं। आप इसी शरीर को जाने के लिए क्यों नहीं कहते?’

   यह सुनकर आचार्य ने कहा-हे देवी! शायद तुम शोक में यह भूल गयी हो कि शव में स्वयं हिलने-डुलने की शक्ति नहीं होती।’

   स्त्री ने तुरंत उत्तर दिया – ‘महात्मा, आपके अनुसार शक्तिहीन ब्रह्म ही संसार का कर्ता है। तो फिर इस शरीर को बिना शक्ति के हटाया क्यों नहीं जा सकता?’

   उस स्त्री का इतना गंभीर, ज्ञानपूर्ण, रहस्यमय वाक्य सुनकर आचार्य वहीं बैठ गए, उन्हें समाधि लग गई और समाधि में निमग्न होकर  उन्होंने  सारे रहस्य को समझ लिया। 

   सर्वत्र आद्या शक्ति महामाया लीला का विलास है। उनका हृदय अवर्णनीय आनंद से भर गया और मातृवंदन के शब्द उनके मुख से इस महिषासुर मर्दिनी स्तोत्र के रूप में आविर्भूत होने लगे ।

महिषासुर मर्दिनी स्तोत्र के पाठ का बड़ा महत्व है |

   इस स्तोत्र को बहुत शक्तिशाली माना जाता है, मान्यताओं के अनुसार इस स्तोत्र का पाठ करने से व्यक्ति के जीवन में आने वाली बाधाएंँ दूर हो जाती हैं।

   यह भी माना जाता है कि जिसे शक्ति की इच्छा हो उसे इस स्तोत्र से मांँ भगवती की आराधना करनी चाहिए। इनकी पूजा करने से बड़े से बड़े दुःख भी तुरंत दूर हो जाते हैं।

   वैसे तो हिंदू धर्मग्रंथों में मां की पूजा के कई तरीके बताए गए हैं, लेकिन उनमें से इस स्तोत्र का पाठ करना अत्यंत कल्याणकारी माना गया है। आद्य शंकराचार्य स्वयं एक सिद्ध पुरुष थे और इस महान स्तोत्र में उनकी योग शक्ति का अलौकिक प्रभाव भी है जिससे यह अत्यधिक सकारात्मक ऊर्जा के साथ सक्रिय रूप से उत्तम प्रभाव को प्रदान करने वाला है।

   शास्त्रों में कहा गया है कि जो व्यक्ति दिन में एक बार भी मां महिषासुर मर्दिनी स्तोत्र का पाठ करता है, उसके जीवन में कोई खतरा/भय नहीं रहता और वह कभी नरक नहीं जाता। अर्थात उसके जीवन का जीते जी ही कल्याण हो जाता है।

स्तोत्र के रचयिता आदि शंकराचार्य

आदि शंकराचार्य, जिन्हें अक्सर आदि शंकराचार्य के रूप में जाना जाता है, हिंदू दर्शन में एक मौलिक व्यक्ति थे और अद्वैत वेदांत के एक प्रमुख प्रस्तावक थे, जो हिंदू धर्म में वेदांत दर्शन के मुख्य उप-विद्यालयों में से एक है। अद्वैत वेदांत, जो वेदों के “गैर-द्वैतवादी निष्कर्ष” का अनुवाद करता है, दावा करता है कि सच्चा आत्म, आत्मा, उच्चतम आध्यात्मिक वास्तविकता, ब्रह्म के समान है।

adi shankara

आठवीं शताब्दी ईस्वी के आसपास वर्तमान केरल, भारत में जन्मे, शंकर कम उम्र से ही अपनी विद्वता और आध्यात्मिक कौशल के लिए जाने जाते थे। उन्होंने उपनिषदों और अन्य हिंदू धर्मग्रंथों का अध्ययन करते हुए एक भटकते भिक्षु बनने के लिए कम उम्र में अपना घर छोड़ दिया।

शंकर हिंदू दर्शन के विभिन्न ग्रंथों पर अपनी टिप्पणियों के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने उपनिषदों, भगवद गीता और ब्रह्म सूत्र पर व्यापक टिप्पणियाँ लिखीं। इन कार्यों का हिंदू दर्शन पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ा है और पूरे भारत में अद्वैत वेदांत दर्शन को समझाने और फैलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

शंकर ने भारत के चार कोनों में चार मठों (मठों) की भी स्थापना की, जिससे अद्वैत वेदांत के ऐतिहासिक विकास, पुनरुद्धार और प्रसार में सहायता मिली। ऐसा माना जाता है कि आदि शंकराचार्य की मृत्यु 32 वर्ष की आयु में हुई थी, फिर भी भारत की दार्शनिक परंपराओं और आध्यात्मिकता पर उनका प्रभाव बहुत अधिक है।

यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि आदि शंकराचार्य को आधुनिक शंकराचार्यों के साथ भ्रमित नहीं किया जाना चाहिए, जो आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित मठों के प्रमुख हैं और हिंदू धर्म के भीतर विभिन्न संप्रदायों के आध्यात्मिक नेता माने जाते हैं।

आदि शंकराचार्य ने अपने पूरे जीवन में पारंपरिक हिंदू मान्यताओं और प्रथाओं की रक्षा और पुनर्स्थापना का लक्ष्य रखा। उन्होंने कुछ विचारधाराओं की कर्मकांडीय प्रथाओं के विरुद्ध जमकर बहस की और अपने समय के दौरान लोकप्रिय विभिन्न धार्मिक मान्यताओं, जैसे बौद्ध धर्म और जैन धर्म की आलोचना कि और उनकी कमियों कि ओर ध्यान दिलाया।

उनके दर्शन का मुख्य पहलू, अद्वैत वेदांत, बौद्ध विचार और अन्य द्वैतवादी दर्शन के प्रभुत्व की प्रतिक्रिया थी जो परमात्मा और व्यक्तिगत स्व के बीच अंतर मानते थे। जवाब में, शंकर ने वास्तविकता का एक अद्वैतवादी (अद्वैत) दृष्टिकोण विकसित और प्रचारित किया, यह तर्क देते हुए कि व्यक्तिगत स्व और अंतिम वास्तविकता, या ब्रह्म, एक ही हैं।

इसे उपनिषदों के महान कथनों (महावाक्य) में से एक में संक्षेपित किया गया है: “तत् त्वम असि” या “आप वह हैं”, जिसमें “वह” ब्रह्म का संदर्भ देता है। शंकर के अनुसार, हमारे वास्तविक स्वरूप की अज्ञानता (अविद्या) दुख (संसार) का कारण है, और मुक्ति (मोक्ष) व्यक्तिगत स्व (आत्मान) और सार्वभौमिक स्व (ब्राह्मण) की एकता की प्राप्ति से प्राप्त होती है।

शंकर ने अपनी शिक्षाओं का प्रचार करने के तरीकों में एक कई भजनों और ग्रंथों की रचना की थी जो आज भी हिंदू धार्मिक प्रथाओं में व्यापक रूप से उपयोग किए जाते हैं। उदाहरण के लिए, उन्होंने विवेकचूड़ामणि (भेदभाव का शिखर रत्न), आध्यात्मिक पथ पर साधकों के लिए एक मैनुअल, और भज गोविंदम (गोविंदा की पूजा करें), एक लोकप्रिय भक्ति भजन की रचना की।

संक्षेप में, आदि शंकराचार्य को हिंदू दर्शन में एक महान व्यक्ति के रूप में सम्मानित किया जाता है। उनका अद्वैत वेदांत हिंदू धर्म में प्रमुख दार्शनिक विद्यालयों में से एक है, और उनकी शिक्षाएं दुनिया भर में लाखों लोगों को प्रेरित और मार्गदर्शन करती रहती हैं। हिंदू धर्म को एकजुट करने और पुनर्जीवित करने के उनके प्रयासों का धर्म और समग्र रूप से भारतीय संस्कृति पर स्थायी प्रभाव पड़ा है।

Sri Vishnu Sahasranama Stotram

श्री विष्णु सहस्रनाम स्तोत्रम्

श्री विष्णु सहस्रनाम स्तोत्रम्

॥ पूर्वपीठिका ॥

शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम् ।

प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये ॥ १ ॥

यस्य द्विरदवक्त्राद्याः पारिषद्याः परश्शतम् ।

विघ्नं निघ्नन्ति सततं विष्वक्सेनं तमाश्रये ॥ २ ॥

व्यासं वसिष्ठनप्तारं शक्तेः पौत्रमकल्मषम् ।

पराशरात्मजं वन्दे शुकतातं तपोनिधिम् ॥ ३ ॥

व्यासाय विष्णुरूपाय व्यासरूपाय विष्णवे ।

नमो वै ब्रह्मनिधये वासिष्ठाय नमो नमः ॥ ४ ॥

अविकाराय शुद्धाय नित्याय परमात्मने ।

सदैकरूपरूपाय विष्णवे सर्वजिष्णवे ॥ ५ ॥

यस्य स्मरणमात्रेण जन्मसंसारबन्धनात् ।

विमुच्यते नमस्तस्मै विष्णवे प्रभविष्णवे ॥ ६ ॥

ओं नमो विष्णवे प्रभविष्णवे ।

श्रीवैशम्पायन उवाच ।

श्रुत्वा धर्मानशेषेण पावनानि च सर्वशः ।

युधिष्ठिरः शान्तनवं पुनरेवाभ्यभाषत ॥ ७ ॥

युधिष्ठिर उवाच ।

किमेकं दैवतं लोके किं वाप्येकं परायणम् ।

स्तुवन्तः कं कमर्चन्तः प्राप्नुयुर्मानवाः शुभम् ॥ ८ ॥

को धर्मः सर्वधर्माणां भवतः परमो मतः ।

किं जपन्मुच्यते जन्तुर्जन्मसंसारबन्धनात् ॥ ९ ॥

श्री भीष्म उवाच ।

जगत्प्रभुं देवदेवमनन्तं पुरुषोत्तमम् ।

स्तुवन्नामसहस्रेण पुरुषः सततोत्थितः ॥ १० ॥

तमेव चार्चयन्नित्यं भक्त्या पुरुषमव्ययम् ।

ध्यायन् स्तुवन्नमस्यंश्च यजमानस्तमेव च ॥ ११ ॥

अनादिनिधनं विष्णुं सर्वलोकमहेश्वरम् ।

लोकाध्यक्षं स्तुवन्नित्यं सर्वदुःखातिगो भवेत् ॥ १२ ॥

ब्रह्मण्यं सर्वधर्मज्ञं लोकानां कीर्तिवर्धनम् ।

लोकनाथं महद्भूतं सर्वभूतभवोद्भवम् ॥ १३ ॥

एष मे सर्वधर्माणां धर्मोऽधिकतमो मतः ।

यद्भक्त्या पुण्डरीकाक्षं स्तवैरर्चेन्नरः सदा ॥ १४ ॥

परमं यो महत्तेजः परमं यो महत्तपः ।

परमं यो महद्ब्रह्म परमं यः परायणम् ॥ १५ ॥

पवित्राणां पवित्रं यो मङ्गलानां च मङ्गलम् ।

दैवतं दैवतानां च भूतानां योऽव्ययः पिता ॥ १६ ॥

यतः सर्वाणि भूतानि भवन्त्यादियुगागमे ।

यस्मिंश्च प्रलयं यान्ति पुनरेव युगक्षये ॥ १७ ॥

तस्य लोकप्रधानस्य जगन्नाथस्य भूपते ।

विष्णोर्नामसहस्रं मे शृणु पापभयापहम् ॥ १८ ॥

यानि नामानि गौणानि विख्यातानि महात्मनः ।

ऋषिभिः परिगीतानि तानि वक्ष्यामि भूतये ॥ १९ ॥

ऋषिर्नाम्नां सहस्रस्य वेदव्यासो महामुनिः ।

छन्दोऽनुष्टुप् तथा देवो भगवान् देवकीसुतः ॥ २० ॥

अमृतांशूद्भवो बीजं शक्तिर्देवकिनन्दनः ।

त्रिसामा हृदयं तस्य शान्त्यर्थे विनियुज्यते ॥ २१ ॥

विष्णुं जिष्णुं महाविष्णुं प्रभविष्णुं महेश्वरम् ।

अनेकरूप दैत्यान्तं नमामि पुरुषोत्तमम् ॥ २२ ॥

अस्य श्रीविष्णोर्दिव्यसहस्रनामस्तोत्र महामन्त्रस्य श्री वेदव्यासो भगवानृषिः अनुष्टुप् छन्दः, श्रीमहाविष्णुः परमात्मा श्रीमन्नारायणो देवता, अमृतांशूद्भवो भानुरिति बीजम्, देवकीनन्दनः स्रष्टेति शक्तिः, उद्भवः क्षोभणो देव इति परमो मन्त्रः, शङ्खभृन्नन्दकी चक्रीति कीलकम्, शार्‍ङ्गधन्वा गदाधर इत्यस्त्रम्, रथाङ्गपाणिरक्षोभ्य इति नेत्रम्, त्रिसामा सामगस्सामेति कवचम्, आनन्दं परब्रह्मेति योनिः, ऋतुस्सुदर्शनः काल इति दिग्बन्धः, श्री विश्वरूप इति ध्यानम्, श्रीमहाविष्णु प्रीत्यर्थे सहस्रनाम जपे विनियोगः ॥

ध्यानम् ।

क्षीरोदन्वत्प्रदेशे शुचिमणिविलसत्सैकते मौक्तिकानां

मालाक्लुप्तासनस्थः स्फटिकमणिनिभैर्मौक्तिकैर्मण्डिताङ्गः ।

शुभ्रैरभ्रैरदभ्रैरुपरिविरचितैर्मुक्तपीयूषवर्षै-

-रानन्दी नः पुनीयादरिनलिनगदाशङ्खपाणिर्मुकुन्दः ॥ १ ॥

भूः पादौ यस्य नाभिर्वियदसुरनिलश्चन्द्र सूर्यौ च नेत्रे

कर्णावासाः शिरो द्यौर्मुखमपि दहनो यस्य वास्तेयमब्धिः ।

अन्तःस्थं यस्य विश्वं सुरनरखगगोभोगिगन्धर्वदैत्यैः

चित्रं रंरम्यते तं त्रिभुवनवपुषं विष्णुमीशं नमामि ॥ २ ॥

शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं

विश्वाकारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम् ।

लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिहृद्ध्यानगम्यं

वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम् ॥ ३ ॥

मेघश्यामं पीतकौशेयवासं

श्रीवत्साङ्कं कौस्तुभोद्भासिताङ्गम् ।

पुण्योपेतं पुण्डरीकायताक्षं

विष्णुं वन्दे सर्वलोकैकनाथम् ॥ ४ ॥

[** अधिकश्लोकं –

नमः समस्तभूतानामादिभूताय भूभृते ।

अनेकरूपरूपाय विष्णवे प्रभविष्णवे ॥ ५ ॥

**]

सशङ्खचक्रं सकिरीटकुण्डलं

सपीतवस्त्रं सरसीरुहेक्षणम् ।

सहारवक्षःस्थलशोभिकौस्तुभं

नमामि विष्णुं शिरसा चतुर्भुजम् ॥ ६ ॥

[** अधिकश्लोकं –

छायायां पारिजातस्य हेमसिंहासनोपरि

आसीनमम्बुदश्याममायताक्षमलङ्कृतम् ।

चन्द्राननं चतुर्बाहुं श्रीवत्साङ्कित वक्षसं

रुक्मिणी सत्यभामाभ्यां सहितं कृष्णमाश्रये ॥ ७ ॥

**]

हरिः ओं ।

विश्वं विष्णुर्वषट्कारो भूतभव्यभवत्प्रभुः ।

भूतकृद्भूतभृद्भावो भूतात्मा भूतभावनः ॥ १ ॥

पूतात्मा परमात्मा च मुक्तानां परमागतिः ।

अव्ययः पुरुषस्साक्षी क्षेत्रज्ञोऽक्षर एव च ॥ २ ॥

योगो योगविदां नेता प्रधानपुरुषेश्वरः ।

नारसिंहवपुः श्रीमान् केशवः पुरुषोत्तमः ॥ ३ ॥

सर्वश्शर्वश्शिवस्स्थाणुर्भूतादिर्निधिरव्ययः ।

सम्भवो भावनो भर्ता प्रभवः प्रभुरीश्वरः ॥ ४ ॥

स्वयम्भूश्शम्भुरादित्यः पुष्कराक्षो महास्वनः ।

अनादिनिधनो धाता विधाता धातुरुत्तमः ॥ ५ ॥

अप्रमेयो हृषीकेशः पद्मनाभोऽमरप्रभुः ।

विश्वकर्मा मनुस्त्वष्टा स्थविष्ठः स्थविरो ध्रुवः ॥ ६ ॥

अग्राह्यश्शाश्वतः कृष्णो लोहिताक्षः प्रतर्दनः ।

प्रभूतस्त्रिककुब्धाम पवित्रं मङ्गलं परम् ॥ ७ ॥

ईशानः प्राणदः प्राणो ज्येष्ठः श्रेष्ठः प्रजापतिः ।

हिरण्यगर्भो भूगर्भो माधवो मधुसूदनः ॥ ८ ॥

ईश्वरो विक्रमी धन्वी मेधावी विक्रमः क्रमः ।

अनुत्तमो दुराधर्षः कृतज्ञः कृतिरात्मवान् ॥ ९ ॥

सुरेशश्शरणं शर्म विश्वरेताः प्रजाभवः ।

अहस्संवत्सरो व्यालः प्रत्ययस्सर्वदर्शनः ॥ १० ॥

अजस्सर्वेश्वरस्सिद्धस्सिद्धिस्सर्वादिरच्युतः ।

वृषाकपिरमेयात्मा सर्वयोगविनिस्सृतः ॥ ११ ॥

वसुर्वसुमनास्सत्यस्समात्मा सम्मितस्समः ।

अमोघः पुण्डरीकाक्षो वृषकर्मा वृषाकृतिः ॥ १२ ॥

रुद्रो बहुशिरा बभ्रुर्विश्वयोनिश्शुचिश्रवाः ।

अमृतश्शाश्वतस्स्थाणुर्वरारोहो महातपाः ॥ १३ ॥

सर्वगस्सर्वविद्भानुर्विष्वक्सेनो जनार्दनः ।

वेदो वेदविदव्यङ्गो वेदाङ्गो वेदवित्कविः ॥ १४ ॥

लोकाध्यक्षस्सुराध्यक्षो धर्माध्यक्षः कृताकृतः ।

चतुरात्मा चतुर्व्यूहश्चतुर्दम्ष्ट्रश्चतुर्भुजः ॥ १५ ॥

भ्राजिष्णुर्भोजनं भोक्ता सहिष्णुर्जगदादिजः ।

अनघो विजयो जेता विश्वयोनिः पुनर्वसुः ॥ १६ ॥

उपेन्द्रो वामनः प्रांशुरमोघश्शुचिरूर्जितः ।

अतीन्द्रस्सङ्ग्रहस्सर्गो धृतात्मा नियमो यमः ॥ १७ ॥

वेद्यो वैद्यस्सदायोगी वीरहा माधवो मधुः ।

अतीन्द्रियो महामायो महोत्साहो महाबलः ॥ १८ ॥

महाबुद्धिर्महावीर्यो महाशक्तिर्महाद्युतिः ।

अनिर्देश्यवपुः श्रीमानमेयात्मा महाद्रिधृत् ॥ १९ ॥

महेष्वासो महीभर्ता श्रीनिवासस्सतां‍गतिः ।

अनिरुद्धस्सुरानन्दो गोविन्दो गोविदां‍पतिः ॥ २० ॥

मरीचिर्दमनो हंसस्सुपर्णो भुजगोत्तमः ।

हिरण्यनाभस्सुतपाः पद्मनाभः प्रजापतिः ॥ २१ ॥

अमृत्युस्सर्वदृक्सिंहस्सन्धाता सन्धिमान् स्थिरः ।

अजो दुर्मर्षणश्शास्ता विश्रुतात्मा सुरारिहा ॥ २२ ॥

गुरुर्गुरुतमो धाम सत्यस्सत्यपराक्रमः ।

निमिषोऽनिमिषस्स्रग्वी वाचस्पतिरुदारधीः ॥ २३ ॥

अग्रणीर्ग्रामणीः श्रीमान्न्यायो नेता समीरणः ।

सहस्रमूर्धा विश्वात्मा सहस्राक्षस्सहस्रपात् ॥ २४ ॥

आवर्तनो निवृत्तात्मा संवृतस्सम्प्रमर्दनः ।

अहस्संवर्तको वह्निरनिलो धरणीधरः ॥ २५ ॥

सुप्रसादः प्रसन्नात्मा विश्वसृड्विश्वभुग्विभुः ।

सत्कर्ता सत्कृतस्साधुर्जह्नुर्नारायणो नरः ॥ २६ ॥

असङ्ख्येयोऽप्रमेयात्मा विशिष्टश्शिष्टकृच्छुचिः ।

सिद्धार्थस्सिद्धसङ्कल्पस्सिद्धिदस्सिद्धिसाधनः ॥ २७ ॥

वृषाही वृषभो विष्णुर्वृषपर्वा वृषोदरः ।

वर्धनो वर्धमानश्च विविक्तः श्रुतिसागरः ॥ २८ ॥

सुभुजो दुर्धरो वाग्मी महेन्द्रो वसुदो वसुः ।

नैकरूपो बृहद्रूपः शिपिविष्टः प्रकाशनः ॥ २९ ॥

ओजस्तेजो द्युतिधरः प्रकाशात्मा प्रतापनः ।

ऋद्धस्स्पष्टाक्षरो मन्त्रश्चन्द्रांशुर्भास्करद्युतिः ॥ ३० ॥

अमृतांशूद्भवो भानुः शशबिन्दुस्सुरेश्वरः ।

औषधं जगतस्सेतुस्सत्यधर्मपराक्रमः ॥ ३१ ॥

भूतभव्यभवन्नाथः पवनः पावनोऽनलः ।

कामहा कामकृत्कान्तः कामः कामप्रदः प्रभुः ॥ ३२ ॥

युगादिकृद्युगावर्तो नैकमायो महाशनः ।

अदृश्यो व्यक्तरूपश्च सहस्रजिदनन्तजित् ॥ ३३ ॥

इष्टोऽविशिष्टश्शिष्टेष्टः शिखण्डी नहुषो वृषः ।

क्रोधहा क्रोधकृत्कर्ता विश्वबाहुर्महीधरः ॥ ३४ ॥

अच्युतः प्रथितः प्राणः प्राणदो वासवानुजः ।

अपांनिधिरधिष्ठानमप्रमत्तः प्रतिष्ठितः ॥ ३५ ॥

स्कन्दः स्कन्दधरो धुर्यो वरदो वायुवाहनः ।

वासुदेवो बृहद्भानुरादिदेवः पुरन्दरः ॥ ३६ ॥

अशोकस्तारणस्तारः शूरश्शौरिर्जनेश्वरः ।

अनुकूलश्शतावर्तः पद्मी पद्मनिभेक्षणः ॥ ३७ ॥

पद्मनाभोऽरविन्दाक्षः पद्मगर्भश्शरीरभृत् ।

महर्धिरृद्धो वृद्धात्मा महाक्षो गरुडध्वजः ॥ ३८ ॥

अतुलश्शरभो भीमस्समयज्ञो हविर्हरिः ।

सर्वलक्षणलक्षण्यो लक्ष्मीवान् समितिञ्जयः ॥ ३९ ॥

विक्षरो रोहितो मार्गो हेतुर्दामोदरस्सहः ।

महीधरो महाभागो वेगवानमिताशनः ॥ ४० ॥

उद्भवः क्षोभणो देवः श्रीगर्भः परमेश्वरः ।

करणं कारणं कर्ता विकर्ता गहनो गुहः ॥ ४१ ॥

व्यवसायो व्यवस्थानः संस्थानः स्थानदो ध्रुवः ।

परर्धिः परमस्पष्टस्तुष्टः पुष्टश्शुभेक्षणः ॥ ४२ ॥

रामो विरामो विरजो मार्गो नेयो नयोऽनयः ।

वीरश्शक्तिमतां श्रेष्ठो धर्मो धर्मविदुत्तमः ॥ ४३ ॥

वैकुण्ठः पुरुषः प्राणः प्राणदः प्रणवः पृथुः ।

हिरण्यगर्भश्शत्रुघ्नो व्याप्तो वायुरधोक्षजः ॥ ४४ ॥

ऋतुस्सुदर्शनः कालः परमेष्ठी परिग्रहः ।

उग्रस्संवत्सरो दक्षो विश्रामो विश्वदक्षिणः ॥ ४५ ॥

विस्तारस्स्थावरस्थाणुः प्रमाणं बीजमव्ययम् ।

अर्थोऽनर्थो महाकोशो महाभोगो महाधनः ॥ ४६ ॥

अनिर्विण्णस्स्थविष्ठो भूर्धर्मयूपो महामखः ।

नक्षत्रनेमिर्नक्षत्री क्षमः क्षामस्समीहनः ॥ ४७ ॥

यज्ञ इज्यो महेज्यश्च क्रतुस्सत्रं सतां‍गतिः ।

सर्वदर्शी विमुक्तात्मा सर्वज्ञो ज्ञानमुत्तमम् ॥ ४८ ॥

सुव्रतस्सुमुखस्सूक्ष्मः सुघोषस्सुखदस्सुहृत् ।

मनोहरो जितक्रोधो वीरबाहुर्विदारणः ॥ ४९ ॥

स्वापनस्स्ववशो व्यापी नैकात्मा नैककर्मकृत् ।

वत्सरो वत्सलो वत्सी रत्नगर्भो धनेश्वरः ॥ ५० ॥

धर्मगुब्धर्मकृद्धर्मी सदसत्क्षरमक्षरम् । [**सदक्षरमसत्क्षरम्**]

अविज्ञाता सहस्रां‍शुर्विधाता कृतलक्षणः ॥ ५१ ॥

गभस्तिनेमिस्सत्त्वस्थस्सिंहो भूतमहेश्वरः ।

आदिदेवो महादेवो देवेशो देवभृद्गुरुः ॥ ५२ ॥

उत्तरो गोपतिर्गोप्ता ज्ञानगम्यः पुरातनः ।

शरीरभूतभृद्भोक्ता कपीन्द्रो भूरिदक्षिणः ॥ ५३ ॥

सोमपोऽमृतपस्सोमः पुरुजित्पुरुसत्तमः ।

विनयो जयस्सत्यसन्धो दाशार्हस्सात्त्वताम्पतिः ॥ ५४ ॥

जीवो विनयिता साक्षी मुकुन्दोऽमितविक्रमः ।

अम्भोनिधिरनन्तात्मा महोदधिशयोऽन्तकः ॥ ५५ ॥

अजो महार्हस्स्वाभाव्यो जितामित्रः प्रमोदनः ।

आनन्दो नन्दनो नन्दस्सत्यधर्मा त्रिविक्रमः ॥ ५६ ॥

महर्षिः कपिलाचार्यः कृतज्ञो मेदिनीपतिः ।

त्रिपदस्त्रिदशाध्यक्षो महाशृङ्गः कृतान्तकृत् ॥ ५७ ॥

महावराहो गोविन्दस्सुषेणः कनकाङ्गदी ।

गुह्यो गभीरो गहनो गुप्तश्चक्रगदाधरः ॥ ५८ ॥

वेधास्स्वाङ्गोऽजितः कृष्णो दृढस्सङ्कर्षणोऽच्युतः ।

वरुणो वारुणो वृक्षः पुष्कराक्षो महामनाः ॥ ५९ ॥

भगवान् भगहाऽऽनन्दी वनमाली हलायुधः ।

आदित्यो ज्योतिरादित्यस्सहिष्णुर्गतिसत्तमः ॥ ६० ॥

सुधन्वा खण्डपरशुर्दारुणो द्रविणप्रदः ।

दिविस्पृक्सर्वदृग्व्यासो वाचस्पतिरयोनिजः ॥ ६१ ॥

त्रिसामा सामगस्साम निर्वाणं भेषजं भिषक् ।

सन्न्यासकृच्छमश्शान्तो निष्ठा शान्तिः परायणम् ॥ ६२ ॥

शुभाङ्गश्शान्तिदस्स्रष्टा कुमुदः कुवलेशयः ।

गोहितो गोपतिर्गोप्ता वृषभाक्षो वृषप्रियः ॥ ६३ ॥

अनिवर्ती निवृत्तात्मा सङ्क्षेप्ता क्षेमकृच्छिवः ।

श्रीवत्सवक्षाः श्रीवासः श्रीपतिः श्रीमतांवरः ॥ ६४ ॥

श्रीदः श्रीशः श्रीनिवासः श्रीनिधिः श्रीविभावनः ।

श्रीधरः श्रीकरः श्रेयः श्रीमान् लोकत्रयाश्रयः ॥ ६५ ॥

स्वक्षस्स्वङ्गश्शतानन्दो नन्दिर्ज्योतिर्गणेश्वरः ।

विजितात्मा विधेयात्मा सत्कीर्तिश्छिन्नसंशयः ॥ ६६ ॥

उदीर्णस्सर्वतश्चक्षुरनीशश्शाश्वतस्थिरः ।

भूशयो भूषणो भूतिर्विशोकश्शोकनाशनः ॥ ६७ ॥

अर्चिष्मानर्चितः कुम्भो विशुद्धात्मा विशोधनः ।

अनिरुद्धोऽप्रतिरथः प्रद्युम्नोऽमितविक्रमः ॥ ६८ ॥

कालनेमिनिहा वीरश्शौरिश्शूरजनेश्वरः ।

त्रिलोकात्मा त्रिलोकेशः केशवः केशिहा हरिः ॥ ६९ ॥

कामदेवः कामपालः कामी कान्तः कृतागमः ।

अनिर्देश्यवपुर्विष्णुर्वीरोऽनन्तो धनञ्जयः ॥ ७० ॥

ब्रह्मण्यो ब्रह्मकृद्ब्रह्मा ब्रह्म ब्रह्मविवर्धनः ।

ब्रह्मविद्ब्राह्मणो ब्रह्मी ब्रह्मज्ञो ब्राह्मणप्रियः ॥ ७१ ॥

महाक्रमो महाकर्मा महातेजा महोरगः ।

महाक्रतुर्महायज्वा महायज्ञो महाहविः ॥ ७२ ॥

स्तव्यस्स्तवप्रियस्स्तोत्रम् स्तुतिस्स्तोता रणप्रियः ।

पूर्णः पूरयिता पुण्यः पुण्यकीर्तिरनामयः ॥ ७३ ॥

मनोजवस्तीर्थकरो वसुरेता वसुप्रदः ।

वसुप्रदो वासुदेवो वसुर्वसुमना हविः ॥ ७४ ॥

सद्गतिस्सत्कृतिस्सत्ता सद्भूतिस्सत्परायणः ।

शूरसेनो यदुश्रेष्ठस्सन्निवासस्सुयामुनः ॥ ७५ ॥

भूतावासो वासुदेवः सर्वासुनिलयोऽनलः ।

दर्पहा दर्पदोऽदृप्तो दुर्धरोऽथापराजितः ॥ ७६ ॥

विश्वमूर्तिर्महामूर्तिर्दीप्तमूर्तिरमूर्तिमान् ।

अनेकमूर्तिरव्यक्तश्शतमूर्तिश्शताननः ॥ ७७ ॥

एको नैकस्स्तवः कः किं यत्तत्पदमनुत्तमम् ।

लोकबन्धुर्लोकनाथो माधवो भक्तवत्सलः ॥ ७८ ॥

सुवर्णवर्णो हेमाङ्गो वराङ्गश्चन्दनाङ्गदी ।

वीरहा विषमश्शून्यो घृताशीरचलश्चलः ॥ ७९ ॥

अमानी मानदो मान्यो लोकस्वामी त्रिलोकधृत् ।

सुमेधा मेधजो धन्यस्सत्यमेधा धराधरः ॥ ८० ॥

तेजोवृषो द्युतिधरस्सर्वशस्त्रभृतां वरः ।

प्रग्रहो निग्रहो व्यग्रो नैकशृङ्गो गदाग्रजः ॥ ८१ ॥

चतुर्मूर्तिश्चतुर्बाहुश्चतुर्व्यूहश्चतुर्गतिः ।

चतुरात्मा चतुर्भावश्चतुर्वेदविदेकपात् ॥ ८२ ॥

समावर्तोऽनिवृत्तात्मा दुर्जयो दुरतिक्रमः ।

दुर्लभो दुर्गमो दुर्गो दुरावासो दुरारिहा ॥ ८३ ॥

शुभाङ्गो लोकसारङ्गस्सुतन्तुस्तन्तुवर्धनः ।

इन्द्रकर्मा महाकर्मा कृतकर्मा कृतागमः ॥ ८४ ॥

उद्भवस्सुन्दरस्सुन्दो रत्ननाभस्सुलोचनः ।

अर्को वाजसनश्शृङ्गी जयन्तस्सर्वविज्जयी ॥ ८५ ॥

सुवर्णबिन्दुरक्षोभ्यस्सर्ववागीश्वरेश्वरः ।

महाह्रदो महागर्तो महाभूतो महानिधिः ॥ ८६ ॥

कुमुदः कुन्दरः कुन्दः पर्जन्यः पावनोऽनिलः ।

अमृतांशोऽमृतवपुस्सर्वज्ञस्सर्वतोमुखः ॥ ८७ ॥

सुलभस्सुव्रतस्सिद्धः शत्रुजिच्छत्रुतापनः ।

न्यग्रोधोदुम्बरोऽश्वत्थश्चाणूरान्ध्रनिषूदनः ॥ ८८ ॥

सहस्रार्चिस्सप्तजिह्वस्सप्तैधास्सप्तवाहनः ।

अमूर्तिरनघोऽचिन्त्यो भयकृद्भयनाशनः ॥ ८९ ॥

अणुर्बृहत्कृशः स्थूलो गुणभृन्निर्गुणो महान् ।

अधृतः स्वधृतस्स्वास्थ्यः प्राग्वंशो वंशवर्धनः ॥ ९० ॥

भारभृत्कथितो योगी योगीशस्सर्वकामदः ।

आश्रमः श्रमणः क्षामः सुपर्णो वायुवाहनः ॥ ९१ ॥

धनुर्धरो धनुर्वेदो दण्डो दमयिता दमः ।

अपराजितस्सर्वसहो नियन्ता नियमो यमः ॥ ९२ ॥

सत्त्ववान् सात्त्विकस्सत्यस्सत्यधर्मपरायणः ।

अभिप्रायः प्रियार्होऽर्हः प्रियकृत्प्रीतिवर्धनः ॥ ९३ ॥

विहायसगतिर्ज्योतिस्सुरुचिर्हुतभुग्विभुः ।

रविर्विलोचनस्सूर्यस्सविता रविलोचनः ॥ ९४ ॥

अनन्तो हुतभुग्भोक्ता सुखदो नैकजोऽग्रजः ।

अनिर्विण्णस्सदामर्षी लोकाधिष्ठानमद्भुतः ॥ ९५ ॥

सनात्सनातनतमः कपिलः कपिरव्ययः ।

स्वस्तिदस्स्वस्तिकृत्स्वस्ति स्वस्तिभुक्स्वस्तिदक्षिणः ॥ ९६ ॥

अरौद्रः कुण्डली चक्री विक्रम्यूर्जितशासनः ।

शब्दातिगश्शब्दसहः शिशिरश्शर्वरीकरः ॥ ९७ ॥

अक्रूरः पेशलो दक्षो दक्षिणः क्षमिणां‍वरः ।

विद्वत्तमो वीतभयः पुण्यश्रवणकीर्तनः ॥ ९८ ॥

उत्तारणो दुष्कृतिहा पुण्यो दुस्स्वप्ननाशनः ।

वीरहा रक्षणस्सन्तो जीवनं पर्यवस्थितः ॥ ९९ ॥

अनन्तरूपोऽनन्तश्रीर्जितमन्युर्भयापहः ।

चतुरश्रो गभीरात्मा विदिशो व्यादिशो दिशः ॥ १०० ॥

अनादिर्भूर्भुवो लक्ष्मीस्सुवीरो रुचिराङ्गदः ।

जननो जनजन्मादिर्भीमो भीमपराक्रमः ॥ १०१ ॥

आधारनिलयो धाता पुष्पहासः प्रजागरः ।

ऊर्ध्वगस्सत्पथाचारः प्राणदः प्रणवः पणः ॥ १०२ ॥

प्रमाणं प्राणनिलयः प्राणभृत्प्राणजीवनः ।

तत्त्वं तत्त्वविदेकात्मा जन्ममृत्युजरातिगः ॥ १०३ ॥

भूर्भुवस्स्वस्तरुस्तारस्सविता प्रपितामहः ।

यज्ञो यज्ञपतिर्यज्वा यज्ञाङ्गो यज्ञवाहनः ॥ १०४ ॥

यज्ञभृद्यज्ञकृद्यज्ञी यज्ञभुग्यज्ञसाधनः ।

यज्ञान्तकृद्यज्ञगुह्यमन्नमन्नाद एव च ॥ १०५ ॥

आत्मयोनिस्स्वयञ्जातो वैखानस्सामगायनः ।

देवकीनन्दनस्स्रष्टा क्षितीशः पापनाशनः ॥ १०६ ॥

शङ्खभृन्नन्दकी चक्री शार्‍ङ्गधन्वा गदाधरः ।

रथाङ्गपाणिरक्षोभ्यस्सर्वप्रहरणायुधः ॥ १०७ ॥

श्रीसर्वप्रहरणायुध ओं नम इति ।

वनमाली गदी शार्‍ङ्गी शङ्खी चक्री च नन्दकी ।

श्रीमान्नारायणो विष्णुर्वासुदेवोऽभिरक्षतु ॥ १०८ ॥

[** श्री वासुदेवोऽभिरक्षतु ओं नम इति । **]

॥ उत्तरपीठिका ॥

श्री भीष्म उवाच ।

इतीदं कीर्तनीयस्य केशवस्य महात्मनः ।

नाम्नां सहस्रं दिव्यानामशेषेण प्रकीर्तितम् ॥ १ ॥

य इदं शृणुयान्नित्यं यश्चापि परिकीर्तयेत् ।

नाऽशुभं प्राप्नुयात्किञ्चित्सोऽमुत्रेह च मानवः ॥ २ ॥

वेदान्तगो ब्राह्मणस्स्यात् क्षत्रियो विजयी भवेत् ।

वैश्यो धनसमृद्धस्स्याच्छूद्रस्सुखमवाप्नुयात् ॥ ३ ॥

धर्मार्थी प्राप्नुयाद्धर्ममर्थार्थी चार्थमाप्नुयात् ।

कामानवाप्नुयात्कामी प्रजार्थी चाप्नुयात्प्रजाः ॥ ४ ॥

भक्तिमान् यस्सदोत्थाय शुचिस्तद्गतमानसः ।

सहस्रं वासुदेवस्य नाम्नामेतत्प्रकीर्तयेत् ॥ ५ ॥

यशः प्राप्नोति विपुलं याति प्राधान्यमेव च ।

अचलां श्रियमाप्नोति श्रेयः प्राप्नोत्यनुत्तमम् ॥ ६ ॥

न भयं क्वचिदाप्नोति वीर्यं तेजश्च विन्दति ।

भवत्यरोगो द्युतिमान्बलरूपगुणान्वितः ॥ ७ ॥

रोगार्तो मुच्यते रोगाद्बद्धो मुच्येत बन्धनात् ।

भयान्मुच्येत भीतस्तु मुच्येतापन्न आपदः ॥ ८ ॥

दुर्गाण्यतितरत्याशु पुरुषः पुरुषोत्तमम् ।

स्तुवन्नामसहस्रेण नित्यं भक्तिसमन्वितः ॥ ९ ॥

वासुदेवाश्रयो मर्त्यो वासुदेवपरायणः ।

सर्वपापविशुद्धात्मा याति ब्रह्म सनातनम् ॥ १० ॥

न वासुदेवभक्तानामशुभं विद्यते क्वचित् ।

जन्ममृत्युजराव्याधिभयं नैवोपजायते ॥ ११ ॥

इमं स्तवमधीयानः श्रद्धाभक्तिसमन्वितः ।

युज्येतात्मा सुखक्षान्ति श्रीधृतिस्मृतिकीर्तिभिः ॥ १२ ॥

न क्रोधो न च मात्सर्यं न लोभो नाशुभामतिः ।

भवन्ति कृत पुण्यानां भक्तानां पुरुषोत्तमे ॥ १३ ॥

द्यौस्सचन्द्रार्कनक्षत्रं खं दिशो भूर्महोदधिः ।

वासुदेवस्य वीर्येण विधृतानि महात्मनः ॥ १४ ॥

स सुरासुरगन्धर्वं सयक्षोरगराक्षसम् ।

जगद्वशे वर्ततेदं कृष्णस्य सचराचरम् ॥ १५ ॥

इन्द्रियाणि मनो बुद्धिस्सत्त्वं तेजो बलं धृतिः ।

वासुदेवात्मकान्याहुः क्षेत्रं क्षेत्रज्ञ एव च ॥ १६ ॥

सर्वागमानामाचारः प्रथमं परिकल्पितः ।

आचारप्रभवो धर्मो धर्मस्य प्रभुरच्युतः ॥ १७ ॥

ऋषयः पितरो देवा महाभूतानि धातवः ।

जङ्गमाजङ्गमं चेदं जगन्नारायणोद्भवम् ॥ १८ ॥

योगो ज्ञानं तथा साङ्ख्यं विद्याश्शिल्पादि कर्म च ।

वेदाश्शास्त्राणि विज्ञानमेतत्सर्वं जनार्दनात् ॥ १९ ॥

एको विष्णुर्महद्भूतं पृथग्भूतान्यनेकशः ।

त्रीन्लोकान्व्याप्य भूतात्मा भुङ्क्ते विश्वभुगव्ययः ॥ २० ॥

इमं स्तवं भगवतो विष्णोर्व्यासेन कीर्तितम् ।

पठेद्य इच्छेत्पुरुषः श्रेयः प्राप्तुं सुखानि च ॥ २१ ॥

विश्वेश्वरमजं देवं जगतः प्रभुमव्ययम् ।

भजन्ति ये पुष्कराक्षं न ते यान्ति पराभवम् ॥ २२ ॥

न ते यान्ति पराभवम् ओं नम इति ।

अर्जुन उवाच ।

पद्मपत्रविशालाक्ष पद्मनाभ सुरोत्तम ।

भक्तानामनुरक्तानां त्राता भव जनार्दन ॥ २३ ॥

श्री भगवानुवाच ।

यो मां नामसहस्रेण स्तोतुमिच्छति पाण्डव ।

सोऽहमेकेन श्लोकेन स्तुत एव न संशयः ॥ २४ ॥

स्तुत एव न संशय ओं नम इति ।

व्यास उवाच ।

वासनाद्वासुदेवस्य वासितं ते जगत्त्रयम् ।

सर्वभूतनिवासोऽसि वासुदेव नमोऽस्तु ते ॥ २५ ॥

श्री वासुदेव नमोऽस्तुत ओं नम इति ।

पार्वत्युवाच ।

केनोपायेन लघुना विष्णोर्नामसहस्रकम् ।

पठ्यते पण्डितैर्नित्यं श्रोतुमिच्छाम्यहं प्रभो ॥ २६ ॥

ईश्वर उवाच ।

श्रीराम राम रामेति रमे रामे मनोरमे ।

सहस्रनाम तत्तुल्यं राम नाम वरानने ॥ २७ ॥

श्रीरामनाम वरानन ओं नम इति ।

ब्रह्मोवाच ।

नमोऽस्त्वनन्ताय सहस्रमूर्तये

सहस्रपादाक्षिशिरोरुबाहवे ।

सहस्रनाम्ने पुरुषाय शाश्वते

सहस्रकोटीयुगधारिणे नमः ॥ २८ ॥

सहस्रकोटीयुगधारिणे ओं नम इति ।

सञ्जय उवाच ।

यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः ।

तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम ॥ २९ ॥

श्री भगवानुवाच ।

अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते ।

तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ॥ ३० ॥

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।

धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥ ३१ ॥

आर्ता विषण्णाश्शिथिलाश्च भीताः

घोरेषु च व्याधिषु वर्तमानाः ।

सङ्कीर्त्य नारायणशब्दमात्रं

विमुक्तदुःखास्सुखिनो भवन्ति ॥ ३२ ॥

[** अधिकश्लोकाः –

यदक्षर पदभ्रष्टं मात्राहीनं तु यद्भवेत् ।

तत्सर्वं क्षम्यतां देव नारायण नमोऽस्तु ते ॥

कायेन वाचा मनसेन्द्रियैर्वा

बुद्ध्यात्मना वा प्रकृतेस्स्वभावात् ।

करोमि यद्यत्सकलं परस्मै

नारायणायेति समर्पयामि ॥

**]

इति श्रीमहाभारते शतसहस्रिकायां संहितायां वैयासिक्यां अनुशासनपर्वान्तर्गत अनुशासनिकपर्वणि मोक्षधर्मे भीष्म युधिष्ठिर संवादे श्री विष्णोर्दिव्यसहस्रनामस्तोत्रम् नाम एकोनपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ।

इति श्रीविष्णुसहस्रनाम स्तोत्रम् ॥

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Vishnu Sahasranamam Stotram Lyrics 1000 Names

Vishnu Sahasranama Stotra or Venkateshwara Sahasra Namam Stothram is the devotional Vedic Hymns which explains the thousand (1000) names of Lord Vishnu. Vishnusahasranama Stotra is found in the 149th chapter Anushasanika Parvam of the Great Epic Mahabharatha. The famous warrior Bhishma Pitamaha teaches the Vishnu Sahasranama sloka to Yudishtra, the eldest of Pancha Pandavas.

There is another version of Vishnu Sahasranama Stotra found in the Padma Purana, one of the major eighteen Puranas. However, the Vishnu Sahasranamam found in the Mahabharatha is the most popular version.

Vishnu Sahasranamam Stotram Lyrics 1000 Names

Vishnu Sahasranamam Stotram Lyrics In English – 1000 Names of Vishnu

Shuklam Baradaram Vishnum, Sasi Varnam Chatur Bhujam,
Prasanna Vadanan Dyayet, Sarva Vignoba Sandaye

Vyasam Vasishtanaptharam, Sakthe Poutramakalmasham,
Parasarathmajam vande, Shukathatham Taponidhim.

Vyasa Vishnu Roopaya, Vyasa Roopaya Vishnave,
Namo Vai Brahma Vidaya, Vasishtaya Namo Nama.

Avikaraya Shuddhaya, Nityaya Paramatmane,
Sadaika Roopa Roopaya, Vishnave Sarva Jishnave.

Yasya Smarana Mathrena, Janma Samsara Bandhanath.
Vimuchayate Nama Tasmai, Vishnave Prabha Vishnave
OM Namo Vishnave Prabha Vishnave

Shri Vaisampayana Uvacha

Shrutva Dharmaneshena, Pavanani Cha Sarvasha,
Yudishtra Santhanavam Puneravabhya Bhashata

Yudishtra Uvacha

Kimekam Daivatham Loke, Kim Vapyegam Parayanam,
Sthuvantha Kam Kamarchanda Prapnyur Manava Shubham,

Ko Dharma sarva Dharmanam Paramo Matha
Kim Japanmuchyathe Jandur Janma Samsara Bhandanat

Sri Bheeshma Uvacha

Jagat Prabhum Devadevam Anantham Purushottamam,
Stuvan Nama Sahasrena, Purusha Sathathothida,
Tameva Charchayan Nityam, Bhaktya Purushamavyayam,
Dhyayan Sthuvan Namasyancha Yajamanasthameva Cha,

Anadi Nidhanam Vishnum Sarva Loka Maheswaram
Lokadyaksham Stuvannityam Sarva Dukkhago Bhaved,
Brahmanyam Sarva Dharmagnam Lokanam Keerthi Vardhanam,
Lokanatham Mahadbhootham Sarva Bhootha Bhavodbhavam

Aeshame Sarva Dharmanam Dharmadhika Tamo Matha,
Yad Bhaktyo Pundarikaksham Stuvyr-Archanayr-Nara Sada,
Paramam Yo Mahatteja, Paramam Yo Mahattapa
Paramam Yo Mahad Brahma Paramam Ya Parayanam

Pavithranam Pavithram Yo Mangalanam Cha Mangalam,
Dhaivatham Devathanam Cha Bhootanam Yo Vya Pitha
Yatha Sarvani Bhoothani Bhavandyathi Yugagame
Yasmincha Pralayam Yanthi Punareve Yuga Kshaye

Tasya Loka Pradhanasya Jagannatathasya Bhoopathe
Vishno Nama Sahasram Me Srunu Papa Bhayapaham
Yani Namani Gounani Vikhyatani Mahatmanah
Rishibhih Parigeetani Tani Vakshyami Bhootaye

Rishir Namnam Sahsrasya Veda Vyaso Maha Munih
Chando Aunustup Stada Devo Bhagawan Devaki Sutha
Amruthamsu Bhavo Bhhejam Shakthir Devaki Nandana
Trisama Hridayam Tasya Santhyarthe Viniyujyade

Vishnum Jishnum Mahavishnum Prabha Vishnun Maheswaram
Aneka Roopa Daityantham Namami Purushottamam

Sri Vishnu Sahasranama Stotra

Asya Shriivishhnor-Divyasahasranaama Stotra Mahaa Mantrasya
Shri Vedavyaaso Bhagavaan Rishhih
Anushhtuph Chhandah
Shri Mahaavishnuh Paramaatmaa Shriimannaaraayano Devataa
Amritaam Shuudbhavo Bhaanuriti Bieejam
Devakee Nandanah Srashteti Shaktih
Udbhavah Kshobhano Deva Iti Paramo Mantrah
Shankha-Bhrinnandakii Chakriiti Keelakam
Shaarngadhanvaa Gadaadhara Ityastram
Rathaangapaani Rakshobhya Iti Netram
Trisaamaa Saamagah Saameti Kavacham
Aanandam Parabrahmeti Yonih
Rituh Sudarshanah Kaala Iti Digbandhah
Shri Vishvaruupa Iti Dhyaanam
Shri Mahaavishhnu Priityartham Sahasranaama Jape Viniyogah

Dhyanam

Ksheerodanvath Pradese Suchimani Vilasad Saikathe Maukthikanam
Malaklupthasanastha Spatikamani Nibhai Maukthiker Mandithangah

Shubrai-Rabrai-Rathabrai Ruparivirachitai Muktha Peeyusha Varshai
Anandi Na Puniyadari Nalina Gadha Sankapanir Mukundaha

Bhoo Padau Yasya Nabhi R Viyadasu Ranila Schandra Suryaau Cha Nether
Karnavasasiro Dhaumugamabhi Dhahano Yasya Vasteyamabhdhi
Anthastham Yasya Viswam Sura Nara Khaga Go Bhogi Gandharva Dhaityai,

Chitram Ram Ramyathe Tham Thribhuvana Vapusham Vishnumeesam Namami

Om Namo Bhagavate Vasudevaya

Santhakaram Bujaga Sayanam Padmanabham Suresam,
Viswadharam Gagana sadrusam Megha Varnam Shubangam
Lakshmi Kantham Kamala Nayanam Yogi Hrid Dyana Gamyam
Vande Vishnum Bava Bhayaharam Sarva Lokaika Nadham

Megha Syamam Peetha Kouseya Vasam Srivatsangam Kausthuboth Bhasithangam
Punyopetham Pundareekayathaksham Vishnum Vande Sarva Lokaika Natham

Namah Samasta Bhutanam-Adi-Bhutaya Bhubrite
Aneka-Ruparupaya Vishnave Prabha-Vishnave

Sasanga Chakram Sakerita Kundalam Sappeethavastram Saraseruhekshanam,
Sahara Vaksha Sthala Shobhi Kousthubham Namai Vishnum Sirasa Chaturbhujam

Chayayam Parijatasys Hemasimhasanopari,
Aseenamam Budha Syama Mayathakashamalangrutham,
Chandranana Chathurbahum Sreevatsangitha Vakshasam,
Rukmani Satyabhamabhyam Sahitham Krishnamasraye.

Vishnu Sahasranamam Stotra Lyrics

Om Vishvam Vishnur-Vashatkaro Bhuta-Bhavya-Bhavat-Prabhuh
Bhutakrud Bhutabhrud Bhavo Bhutatma Bhuta-Bhavanah
Putatma Paramatma Cha Muktanam Parama Gatih
Avyayah Purusha Sakshi Kshetrajno-Kshara Eva Cha

Yogo Yogavidam Neta Pradhana-Purushesvarah
Narasimha-Vapu Shriman Kesavah Purushottamah
Sarvah Sarvah Sivah Sthanur-Bhutadir-Nidhir-Avyayah
Sambhavo Bhavano Bharta Prabhavah Prabhur-Isvarah

Svayambhuh Sambhur-Adityah Pushkaraksho Mahasvanah
Anandi-Nidhano Dhata Vidhata Dhaturuttamah
Aprameyo Hrishikesah Padma-Nabho-Mara-Prabhuh
Visvakarma Manustvashta Sthavishtah Sthaviro-Dhruvah

Agrahyah Sasvatah Krishno Lohitakshah Pratardanah
Prabhutas-Trikakubdhama Pavitram Mangalam Param
Isanah Pranadah Prano Jyeshthah Sreshthah Prajapatih
Hiranyagarbho Bhugarbho Madhavo Madhusudanah

Ishvaro Vikrami Dhanvi Medhavi Vikramah Kramah
Anuttamo Duradharsah Krutajnah Krutiratmavan
Suresah Sharanam Sharma Vishvaretah Prajabhavah
Ahah Samvasaro Vyalah Pratyayah Sarvadarshanah

Ajah Sarveshvarah Siddhah Siddhih Sarvadir Acyutah
Vrushakapir Ameyatma Sarva-Yoga-Vinihshrutah
Vasur Vasumanah Satyah Samatma Sammitah Samah
Amoghah Pundarikaksho Vrusha-Karma Vrushakrutih

Rudro Bahushira Babhrur Vishva-Yonih Shuchi Sravah
Amrutah Shashvata-Sthanur Vararoho Maha-Tapah
Sarvagah Sarva-Vid-Bhanur Vishvaksheno Janardanah
Vedo Vedavid Avyango Vedango Vedavit Kavih

Lokadhyakshah Suradhyaksho Dharmadhyakshah Krutakrutah
Chaturatma Chaturvyuhas Chaturdamstras Chatur-Bhujah

Bhrajishnur-Bhojanam Bhokta Sahishnur Jagad-Adhijah
Anagho Vijayo Jeta Vishva-Yonih Punar-Vasuh

Upendro Vamanah Pramshur Amoghah Suchir Urjitah
Atindrah Samgrahah Sargo Dhrutatma Niyamo Yamah
Vedyo Vaidyah Sada-Yogi Viraha Madhavo Madhuh
Atindriyo Mahamayo Mahotsaho Mahabalah

Mahabuddir Mahaviryo Mahasaktir Mahadyutih
Anirdesyavapuh Shriman Ameyatma Mahadridhruk
Maheshvaso Mahibharta Shrinivasah Satam Gatih
Aniruddhah Suranando Govindo Govidam Patih

Marichir-Damano Hamsah Suparno Bhujagottamah
Hiranya-Nabha Sutapah Padmanabhah Prajapatih
Amrutyuh Sarva-Druk Simhah Sandhata Sandhiman Sthirah
Ajo Durmarshanah Shasta Vishrutatma Surariha

Gurur Gurutamo Dhama Satyah Satya-Parakramah
Nimisho Animishah Sragvi Vachaspatir Udaradhih
Agranir Gramanih Shriman Nyayo Neta Samiranah
Sahsra-Murdha Vishvatma Sahasraksha Sahasrapat

Avrtano Nivrutatma Samvrutah Sampramardanah
Ahah Samvartako Vahnir Anilo Dharani-Dharah
Suprasadah Prasannatma Vishva-Dhrug Vishva-Bhug Vibhuh
Sat-Karta Sat-Krutah Sadhur Jahnur Narayano Narah

Asankhyeyo Prameyatma Visistah Shishtakruch Chucih
Siddharthah Siddha-Sankalpah Siddhidah Siddhisadhanah
Vrushahi Vrushabho Vishnur Vrushaparva Vrushodarah
Vardhano Vardhamanascha Viviktah Shruti-Sagarah

Subhujo Durdharo Vagmi Mahendro Vasodo Vasuh
Naikarupo Bruhad-Rupah Shipivishtah Prakashana
Ojas Tejo Dyuti-Dharah Prakashatma Pratapanah
Vruddhah Spahstaksharo Mantras Chandramshur Bhaskaradyutih

Amrtamshu Dbhavo Bhanuh Shashabinduh Sureshvarah
Aushadham Jagatah Setuh Satya-Dharma-Prarakramah
Bhuta-Bhavya-Bhavan-Nathah Pavanah Pavano Analah
Kamaha Kamakrut Kantah Kamah Kamapradah Prabhuh

Yugadikrud Yugavarto Naikamayo Mahashanah
Adrushyo Vyakta-Rupascha Sahasrajid Anantajit
Ishtovishistah Shishtestah Sikhandi Nahusho Vrushah
Krodhaha Krodhakrut Karta Vishva-Bahur Mahidharah

Achyutah Prathitah Pranah Pranado Vasavanujah
Apam-Nidhir Adhishthanam Apramattah Pratishtitah
Skandah Skanda-Dharo Dhuryo Varado Vayuvahanah
Vashudevo Bruhad-Bhanur Adidevah Purandarah

Ashokas-Taranas-Tarah Surah Saurir Janeshvarah
Anukulah Shatavartah Padmi Padma-Nibhekshanah
Padmanabho Aravindakshah Padmagarbhah Sarirabhrut
Mahardhir Ruddho Vruddhatma Mahaksho Garuda-Dhvajah

Atulah Sarabho Bhimah Samayagno Havirharih
Sarvalakshana Lakshanyo Lakshmivan Samitinjayah
Viksharo Rohito Margo Hetur-Damodarah Sahah
Mahidharo Mahabhago Vegavan Amitashanah

Udbhavah Kshobhano Devan Shrigarbhah Parameshvarah
Karanam Kaaranam Karta Vikarta Gahano Guhah
Vyavasayo Vyavasthanah Samsthanah Sthanado Dhruvah
Parardhih Parama-Spashtas Tushtah Pushtah Subhekshanah

Ramo Viramo Virato Margo Neyo Nayonayah
Virah Shaktimatam Shreshtho Dharmo Dharma-Vid Uttamah
Vaikunthah Purushah Pranah Pranadah Pranavah Pruthuh

Hiranya-Garbhah Shatrughno Vyapto Vayur Adhokshajah

Rituh Sudarshanah Kalah Parameshti Parigrahah
Ugrah Samvatsaro Daksho Vishramo Vishva-Dakshinah
Vistarah Sthavara-Sthanuh Pramanam Bijam Avyayam
Arthonartho Mahakosho Mahabhogo Mahadhanah

Anirvinnah Sthavishthobhur Dharma-Yupo Maha-Makhah
Nakshatra-Nemir Nakshatri Kshamah Kshamah Samihanah
Yajna Ijyo Mahejyas Cha Kratuh Satram Satamgatih
Sarvadarshi Vimuktatma Sarvagyo Gynanam-Uttamam

Suvratah Sumukhah Sukshmah Sughoshah Sukhadah Suhrut
Manoharo Jita-Krodho Virabahur Vidaranah
Svapanah svavasho Vyapi Naikatma Naika-Karma-Krut
Vatsaro Vatsalo Vatsi Ratna-Garbho Dhaneshvarah

Dharmagub Dharmakrud Dharmi Sad-Asatksharam Aksharam
Avigyata Sahashramsur Vidhata Kruta-Lakshanah
Gabhasti-Nemih Sattvasthah Simho Bhuta-Maheshvarah
Adidevo Mahadevo Devesho Devabhrud-Guruh

Uttaro Gopatir Gopta Gyanagamyah Puratanah
Sharira-Bhuta-Bhrud Bhokta Kapindro Bhuridakshinah
Somapo Amrutapah Somah Purujit Purushottamah
Vinayo Jayah Satyasandho Dasharhah Satvatampatih

Jivo Vinayita-Sakshi Mukundo Amita Vikramah
Ambhonidhir Anantatma Mahodadhishayonatakah
Ajo Maharhah Svabhavyo Jitamitrah Pramodanah
Anando Nandano Nandah Satya-Dharma Trivikramah

Maharshih Kapilacharyah Krutagyo Medini-Patih
Tripadas Tridashadhyaksho Mahashrungah Krutantakrut
Mahavaraho Goivindah Sushenah Kanakangadi
Guhyo Gabhiro Gahano Guptas Chakra-Gadadharah

Vedhah Svango Ajitah Krishno Drudhah Sankarshano Acyutah
Varuno Vaaruno Vrukshah Pushkaraksho Mahamanah
Bhagavan Bhagahanandi Vanamali Halayudhah
Adityo Jyotir-Adityah Sahishnur Gatisattamah

Sudhanva-Khandaparashur-Daruno Dravinapradah
Divah-Spruk Sarva-Drug Vyaso Vachaspatir Ayonijah
Trisama Samagah Sama Nirvanam Bheshajam Bhishak
Sanyasakrut Chamah Santo Nishtha Shantih Parayanam

Shubhangah Shantidah Srashta Kumudah Kuvalesayah
Gohito Gopatir Gopta Vrushabhaksho Vrushapriyah
Anivarti Nivrutatma Samkshepta Kshema-Kruchivah
Shrivasta-Vakshah Shrivasah Shripatih Shrimatam-Varah

Shridah Shrishah Shrinivasah Shrinidhih Shri-Vibhavanah

Shridharah Shrikarah Shreyah Shriman Loka-Trayashrayah
Svakshah Svangah Shatanando Nandir Jyotir-Ganeshvarah
Vijitatma Vidheyatma Satkirtischinna-Samsayah

Udirnah Sarvata-Chakshur-Anisah Sasvata-Sthirah
Bhushayo Bhushano Bhutir Vishokah Shoka-Nashanah
Archishman Architah Kumbho Vishuddhatma Vishodhanah
Aniruddho Pratirathah Pradyumno Amita-Vikramah

Kalaneminiha Virah Saurih Sura-Janeshvarah
Trilokatma Trilokeshah Keshavah Keshiha Harih
Kamadevah Kamapalah Kami Kantah Krutagamah
Anirdeshya-Vapur Vishnur Viro Ananto Dhananjayah

Brahmanyo Brahmakrud-Brahma Brahma Brahma-Vivardhanah
Brahmavid Brahmano Brahmi Brahmgno Brahmana-Priyah
Mahakramo Mahakarma Mahateja Mahoragah
Mahakratur Mahayajva Mahayagyo Mahahavih

Stavyah Stavapriyah Stotram Stutih Stota Ranapriyah
Purnah Purayita Punyah Punyakirtir Anamayah
Manojavas Tirthakaro Vasureta Vasupradah
Vasuprado Vasudevo Vasur Vasumana Havih

Sadgatih Sat-Krutih Satta Sad-Bhutih Sat-Parayanah
Suraseno Yadushreshthah Sannivasah Suyamunah
Bhutavaso Vasudevah Sarvasu-Nilayo Analah
Darpaha Darpado Drupto Durdharo-Atha-Parajitah

Vishvamurtir Mahamurtir Diptamurtir Amurtiman
Anekamurtir Avyaktah Shatamurtih Shatananah
Eko Naikah Savah Kah Kim Yat Tat Padam-Anuttamam
Lokabandhur Lokanatho Madhavo Bhakta-Vastalah

Suvarna Varno Hemango Varangas Chandanangadi
Viraha Vishamah Sunyo Ghrutasir Achalaschalah
Amani Manado Manyo Lokasvami Triloka-Dhruk
Sumedha Medhajo Dhanyah Satyamedha Dharadharah

Tejovrusho Dyuti-Dharah Sarva-Shastra-Bhrutam-Varah
Pragrahonigraho Vyagro Naikashrungo Gadagrajah
Chaturmurtis Chaturbahus Chaturvyuhas Chaturgatih
Chaturatma Chaturbhavas Chaturvedavid Ekapat

Samavarto Anivrutatma Durjayo Duratikramah
Durlabho Durgamo Durgo Duravaso Durariha
Shubhango Lokasarangah Sutantus Tantu-Vardhanah
Indrakarma Mahakarma Krutakarma Krutagamah

Udbhavah Sundarah Sundo Ratnanabhah Sulochanah
Arko Vajasanah Shrungi Jayantah Sarva-Vij-Jayi
Suvarna-Bindur-Akshobhyah Sarva-Vagishvareshvarah
Mahahrado Maha-Garto Maha-Bhuto Maha-Nidhih

Kumudah Kundarah Kundah Parjanyah Pavano Anilah
Amrutasho Amrutavapuh Sarvagyah Sarvato-Mukha
Sulabhah Suvratah Siddhah Shatru-Jit Shatru-Tapanah
Nyagrodho Adumbaro-Svatthas Chanurandhra-Nishudhanah

Sahasrarchi Sapta-Jihvah Saptaidhah Sapta-Vahanah
Amurtir Anagho Achintyo Bhayakrud Bhaya-Nashanah
Anur Bruhat Krusah Sthulo Gunabrun Nirguno Mahan
Adhrutah Svadhrutah Svasyah Pragvamsho Vamshavardhanah

Bhara-Bhrut Kathito Yogi Yogishah Sarva-Kamadah
Ashramah Shramanah Kshamah Suparno Vayu-Vahanah
Dhanurdharo Dhanurvedo Dando Damayita Damah
Aparajitah Sarvasaho Niyanta Niyamo Yamah

Satvavan Satvikah Satyah Satya-Dharma-Parayanah
Abhiprayah Priyarho-Rhah Priyakrut Pritivardhanah
Vihayasagatir Jyotih Suruchir Huta-Bhug Vibhuh
Ravir Virochanah Suryah Savita Ravilochanah

Ananto Huta-Bhug Bhokta Sukhado Naikajo-Grajah
Anirvinnah Sadamarshi Lokadhishthana-Madbhutah
Sanat Sanatana-Tamah Kapilah Kapir Avyayah
Svastidah Svastikrut Svasti Svastibhuk Svasti-Dakshinah

Araudrah Kundali Chakri Vikramyurjita-Shasanah
Shabdatigah Shabdasahah Sisirah Sarvari-Karah
Akrurah Peshalo Daksho Dakshinah Kshiminam Varah
Vidvattamo Vitabhayah Punya-Shravana-Kirtanah

Uttarano Dushkrutiha Punyo Duh-Svapna-Nasanah
Viraha Rakshanah Santo Jivanah Paryavasthitah
Ananta-Rupo Ananta-Shri Jitamanyur Bhayapahah
Chaturashro Gabhiratma Vidisho Vyadisho Dishah

Anadi Bhurbhuvo Lakshmih Suviro Ruchirangadah
Janano Janajanmadir Bhimo Bhima-Parakramah
Adharanilayo Dhata Pushpahasah Prajagarah
Urdhvagah Sat-Pathacharah Pranadah Pranavah Panah

Pramanam Prananilayah Pranabhrut Pranajivanah
Tatvam Tatvavidekatma Janma-Mrutyu-Jaratigah
Bhurbhuvah Svastarus-Tarah Savita Prapitamahah
Yagyo Yagya-Patir-Yajva Yagyango Yagya-Vahanah

Yagyabhrud Yagyakrud Yagyi Yagyabhrug Yagyasadhanah
Yagyanantakrud Yagyaguhyam Annam Annada Eva Cha
Atmayonih Svayamjato Vaikhanah Samagayanah
Devaki-Nandanah Srashtha Kshitishah Papanashanah

Shankhabrun -Nandaki Chakri Sharangadhnva Gadadharah
Rathanga Panirakshobhyah Sarva-Praharanayudhah

Sree Sarva-Praha-Rana-Yudha Om Naman Ithi

Vanamali Gadi Sharangi Shankhi Chakri Cha Nandaki
Shriman Narayano Vishnur-Vasudevo-Abhirakshatu (repeat these 2 times)

Iteedam Keerta-Neeyasya Kesha-Vasya Maha-Tmanah |

Namnam sahasram divya-nam ashe-shena prakeer-titam

Ya Edam Shrunuyat Nityam Yaschhapi Parikeertayet
Nashubham-Prapnuyat-Kinchit So Mutreha-Cha-Manavah

Vedan-Tago Bramhana-Syat Kshatriyo Vijayee Bavet
Vaisyo Dhana-Samru-Ddhasyat Shhoodra Sukha Mavap-Nuyat

Dharmarthee Prapnu-Yatdharmam Artharthee Chartha Mapnuyat
Kamana-Vapnuyat-Kamee Prajarthee Chapnu-Yat-Prajam

Bhakt-Imanya Sadotthaya Shuchi-Stadgata Manasah
Sahasram Vasu-Devasya Namna Metat Prakee-Rtayet

Yashah Prapnoti Vipulam Ynati Praadhanya Meva-Cha
Achalam shriya mapnothi shreyah prapnotya-nuttamam

Na Bhayam Kvachi Dapnoti Veeryam Tejachha Vindati
Bhava Tyarogo Dhyu-Timan Bala-Roopa Gunan-Vitah

Rogarto Muchyate Rogat Baddho Muchyeta Bandhanat
Bhaya Nmuchyeta Bheetastu Muchye Tapanna Apadha

Durganya-Titara Tyashu Purushah Purusho-Ttamam
Stuva Nnama-Saha-Srena Nityam Bhakti Saman-Vitah

Vasu-Deva-Shrayo Marthyo Vasu-Deva Para-Yanah
Sarva-Papa Vishu-Ddhatma Yati Bramha Sana-Tanam

Na Vasu-Deva Bhakta-Nam Ashubham Vidyate Kvachit
Janma Mrithyu Jara Vyadhi Bhayam Naivapa Jayate

Emam Stava Madhee-Yanah Shraddha-Bhakti Sama-Nvitah
Yujye Tatam Sukha-Kshantih Shree-Dhrati Smruti Keertibhih

Na Krodho Na Matsaryam Na Lobho Na Shubha-Matih
Bhavanti Kruta Punyanam Bhakta-Nam Puru-Shottame

Dhyou Sachan-Drarka Nakshatra Kham Disho Bhoorma-Hodadhih
Vasu-Devasya Veeryena Vidhrutani Mahat-Manah

Sa-Sura-Sura Gandharvam Sa-Yaksho-Raga Raksha-Sam
Jaga-Dvashe Varta-Tedam Krishnasya Sachara-Charam

Indri-Yani Mano-Buddhih Satvam Tejo-Balam Dhrutih|
Vasu-Devatma Kanyahuh Kshetram-Kshetragyna Eva Cha

Sarva-Gamana Macharah Prathamam Pari-Kalpate
Aachara Prabhavo Dharmo Dharmasya Pradhu-Rachyutah

Rushayah Pitaro Devah Maha-Bhootani Dhatavah |
Jangama-Jangamam Chedam Jagannaraya-Nodbhavam

Yogo Gynanam Tatha Sankhyam Vidya Shilpadi Karma-Cha
Vedah Shasthrani Vigynana Etat-Sarvam Janar-Danat

Eko-Vishnu Rmaha-Dbhootam Prutha-Gbhoota Nyanekasah
Trilon-Lokan-Vyapya-Bhootatma Bhujkte Vishva-Bhugavyayah

Emam Stavam Bhagavato Vishnor-Vyasena Keertitam
Pathedya Echhet Purushah Shreyah Praptum Sukhani-Cha

Vishve-Shvara Majam Devam Jagatah Prabhu Mavyam
Bhajanti Ye Pushka-Raksham Nate Yanti Para-Bhavam

Na Te Yanti Para-Bhavam Om Nama Iti

Arjuna Uvacha

Padma-Patra Visha-Laksha Padma-Nabha Suro-Ttama
Bhaktana Manu-Raktanam Trata Bhava Janar-Dana

Shree Bhagavan Uvacha

Yo-Mam Nama Saha-Srena Stotu Michhati Pandava
Sho Ha Mekena Shlokena Stuta Eva Na Samshayah

Stita Eva Na Samshaya Om Nama Iti

Vyasa Uvacha

Vasa-Naad Vasu Devsaya Vasitham Te Jaga-Thrayam
Sarva-Butha Nivaso Si Vaasu-Deva Namo Stute

Vasu-Deva Namostute Om Nama Iti

Parvati Uyvachv

Keno-Paayena Laghunaa Vishnur-Nama Saha-Skrakam
Patyate Pamditeh Nityam Shortu Michha Myaham Prabho

Eshwara Uvacha

Shree-Rama Ram Rameti Rame Raame Mano-Rame
Saha-Sranaama Tattulyam Raama-Naama Varaa-Nane

(Read the above 2 lines 2 more times)

Raama-Naama Varaa-Nana Om Nama Iti

Bramho Uvacha

Namo Stvana-Ntaya Saha-Sramurtaye
Saha-Srapaa-Dakshi Shiroru-Bahave
Saha-Sranaamne Puru-Shaya Shashvate
Saha-Srakoti-Yuga-Dharine Namah
Saha-Srakoti Yuga-Dharina Om Nama Iti

Sanjaya Uvacha

Yatra Yoge-Shvarah Krushno Yatra Paardho Dhanur-Dharah
Tatra-Shreeh Vijayo Bhutih Dhruva Neetih Mati Rmama

Shree Bhagawan Uvacha

Ananya-Schanta-Yanto Mam Ye Janaah Paryu-Panate
Tesham Nitya-Bhiyuktanaam Yoga-Kshemam Vaha-Myaham

Parithrayana Sadhunam Vinasaya Cha Dushkritham,
Dharma Samsthapanarthaya Sambhavami Yuge Yuge

Aartha-Vishanna-Shithila-Schabhitah Ghoreshucha-Vyadhi-Varthamanah
Samkeertya-Narayana-Shabda-Matram Vimukta-Duhghah-Sukhino-Bhavanti

Kayena-Vaacha Mana-Sendhriyerva
Buddhyatma-Naavaa Prakrute-Swabhawat
Karomi Yadyat Sakalam Parasmai
Naaraa-Yanayeti Samarpayami

Sarvam Shree-Krishnar-Panamastu

Vishnu Sahasranamam – M.S. Subbalakshmi

श्री विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र के पाठ का महत्व !

श्री विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र का श्रद्धा भाव से किया गया पाठ अद्भुत शक्तियां प्रदान करता है !

श्री विष्णु सहस्रनाम की उत्पत्ति महाभारत से मानी जाती है, जब पितामह भीष्म, पांडवों से घिरे मृत्यु शैय्या पर अपनी मृत्यु का इंतजार कर रहे थे, उस समय युधिष्ठिर ने उनसे पूछा, ” हे पितामह ! कृपया हमें बताएं कि सभी के लिए सर्वोच्च आश्रय कौन है ? जिससे व्यक्ति को शांति प्राप्त हो सके, वह नाम कोनसा है जिससे इस भवसागर से मुक्ति प्राप्त हो सके, इस सवाल के जबाब में भीष्म ने कहा की वह नाम विष्णु सहस्रनाम है ।

यह नकारात्मक ज्योतिषीय प्रभावों को वश में करने में मदद करता है, इनमें उन दोषों को शामिल किया जाता है जो जन्म समय की ग्रहों की खराब स्थिति से उत्पन्न होते हैं, विष्णु सहस्त्रनाम दुर्भाग्य और श्राप से दूर कर सकता है । जो व्यक्ति विष्णु सहस्त्रनाम का जाप करता है उसका भाग्य हमेशा उसका साथ देता है ।

इसका मनोवैज्ञानिक लाभ भी है , दैनिक विष्णु सहस्रनाम का जप करते हुए मन को काफी आराम मिलता हैं और अवांछित चिंताओं और विचलित करने वाले विचारों से मुक्ति मिलती है, इससे मन में सकारात्मक पहलुओं पर ध्यान केंद्रित करने और कुशलता सीखने की शक्ति प्राप्त होती है ।

श्री विष्णु सहस्त्रनाम अपने जीवन में बाधाओं को दूर करने का अंतिम उपाय है, यह आपके जीवन में मौजूद महत्वपूर्ण योजनाओं को तेज़ी से और आपके रास्ते पर बाधाओं और चुनौतियों को दूर करने में मदद कर सकता है, बढ़ती ऊर्जा स्तर और आत्मविश्वास के साथ, आप अपने जीवन के लक्ष्यों की ओर जल्दी और ऊर्जावान रूप से आगे बढ़ सकते हैं ।

आदित्य हृदय स्तोत्र(aditya hridaya stotra)

Aditya Hridaya Stotram – Lyrics, Meaning, and History

Aditya Hridaya Stotram

The Divine Hymn of Victory from the Valmiki Ramayana

Aditya Hridaya Stotram is one of the most revered and powerful hymns in the Vedic tradition, found in the Yuddha Kanda (Book of War) of Valmiki’s Ramayana. Dedicated to Lord Surya (the Sun God), this anthem of victory was imparted to Lord Rama by the great sage Agastya during a critical moment in the battle against the demon king Ravana.

Aditya Hridaya Stotram Lyrics

Original Lyrics (Sanskrit/Devanagari)

ततो युद्धपरिश्रान्तं समरे चिन्तया स्थितम् । रावणं चाग्रतो दृष्ट्वा युद्धाय समुपस्थितम् ॥ १ ॥ दैवतैश्च समागम्य द्रष्टुमभ्यागतो रणम् । उपागम्याब्रवीद्राममगस्त्यो भगवान् ऋषिः ॥ २ ॥ राम राम महाबाहो शृणु गुह्यं सनातनम् । येन सर्वानरीन् वत्स समरे विजयिष्यसि ॥ ३ ॥ आदित्यहृदयं पुण्यं सर्वशत्रुविनाशनम् । जयावहं जपेन्नित्यमक्षय्यं परमं शिवम् ॥ ४ ॥ सर्वमङ्गलमाङ्गल्यं सर्वपापप्रणाशनम् । चिन्ताशोकप्रशमनमायुर्वर्धनमुत्तमम् ॥ ५ ॥ रश्मिमन्तं समुद्यन्तं देवासुरनमस्कृतम् । पूजयस्व विवस्वन्तं भास्करं भुवनेश्वरम् ॥ ६ ॥ सर्वदेवात्मको ह्येष तेजस्वी रश्मिभावनः । एष देवासुरगणाँल्लोकान् पाति गभस्तिभिः ॥ ७ ॥ एष ब्रह्मा च विष्णुश्च शिवः स्कन्दः प्रजापतिः । महेन्द्रो धनदः कालो यमः सोमो ह्यपां पतिः ॥ ८ ॥ पितरो वसवः साध्या ह्यश्विनौ मरुतो मनुः । वायुर्वह्निः प्रजाप्राण ऋतुकर्ता प्रभाकरः ॥ ९ ॥ आदित्यः सविता सूर्यः खगः पूषा गभस्तिमान् । सुवर्णसदृशो भानुर्हिरण्यरेता दिवाकरः ॥ १० ॥ हरिदश्वः सहस्रार्चिः सप्तसप्तिर्मरीचिमान् । तिमिरोन्मथनः शम्भुस्त्वष्टा मार्ताण्ड अंशुमान् ॥ ११ ॥ हिरण्यगर्भः शिशिरस्तपनो भास्करो रविः । अग्निगर्भोऽदितेः पुत्रः शङ्खः शिशिरनाशनः ॥ १२ ॥ व्योमनाथस्तमोभेदी ऋग्यजुःसामपारगः । घनवृष्टिरपां मित्रो विन्ध्यवीथीप्लवङ्गमः ॥ १३ ॥ आतपी मण्डली मृत्युः पिङ्गलः सर्वतापनः । कविर्विश्वो महातेजा रक्तः सर्वभवोद्भवः ॥ १४ ॥ नक्षत्रग्रहताराणामधिपो विश्वभावनः । तेजसामपि तेजस्वी द्वादशात्मन्नमोऽस्तु ते ॥ १५ ॥ नमः पूर्वाय गिरये पश्चिमायाद्रये नमः । ज्योतिर्गणानां पतये दिनाधिपतये नमः ॥ १६ ॥ जयाय जयभद्राय हर्यश्वाय नमो नमः । नमो नमः सहस्रांशो आदित्याय नमो नमः ॥ १७ ॥ नम उग्राय वीराय सारङ्गाय नमो नमः । नमः पद्मप्रबोधाय मार्ताण्डाय नमो नमः ॥ १८ ॥ ब्रह्मेशानाच्युतेशाय सूर्यायादित्यवर्चसे । भास्वते सर्वभक्षाय रौद्राय वपुषे नमः ॥ १९ ॥ तमोघ्नाय हिमघ्नाय शत्रुघ्नायामितात्मने । कृतघ्नघ्नाय देवाय ज्योतिषां पतये नमः ॥ २० ॥ तप्तचामीकराभाय वह्नये विश्वकर्मणे । नमस्तमोऽभिनिघ्नाय रुचये लोकसाक्षिणे ॥ २१ ॥ नाशयत्येष वै भूतं तदेव सृजति प्रभुः । पायत्येष तपत्येष वर्षत्येष गभस्तिभिः ॥ २२ ॥ एष सुप्तेषु जागर्ति भूतेषु परिनिष्ठितः । एष एवाग्निहोत्रं च फलं चैवाग्निहोत्रिणाम् ॥ २३ ॥ वेदाश्च क्रतवश्चैव क्रतूनां फलमेव च । यानि कृत्यानि लोकेषु सर्व एष रविः प्रभुः ॥ २४ ॥ एनमापत्सु कृच्छ्रेषु कान्तारेषु भयेषु च । कीर्तयन् पुरुषः कश्चिन्नावसीदति राघव ॥ २५ ॥ पूजयस्वैनमेकाग्रो देवदेवं जगत्पतिम् । एतत्त्रिगुणितं जप्त्वा युद्धेषु विजयिष्यसि ॥ २६ ॥ अस्मिन् क्षणे महाबाहो रावणं त्वं वधिष्यसि । एवमुक्त्वा तदागस्त्यो जगाम च यथागतम् ॥ २७ ॥ एतच्छ्रुत्वा महातेजा नष्टशोकोऽभवत्तदा । धारयामास सुप्रीतो राघवः प्रयतात्मवान् ॥ २८ ॥ आदित्यं प्रेक्ष्य जप्त्वा तु परं हर्षमवाप्तवान् । त्रिराचम्य शुचिर्भूत्वा धनुरादाय वीर्यवान् ॥ २९ ॥ रावणं प्रेक्ष्य हृष्टात्मा युद्धाय समुपागमत् । सर्वयत्नेन महता वधे तस्य धृतोऽभवत् ॥ ३० ॥ अथ रविरवदन्निरीक्ष्य रामं मुदितमनाः परमं प्रहृष्यमाणः । निशिचरपतिसंक्षयं विदित्वा सुरगणमध्यगतो वचस्त्वरेति ॥ ३१ ॥

Romanized Lyrics (Transliteration)

tato yuddhapariśrāntaṃ samare cintayā sthitam | rāvaṇaṃ cāgrato dṛṣṭvā yuddhāya samupasthitam || 1 || daivataiśca samāgamya draṣṭumabhyāgato raṇam | upāgamyābravīdrāmamagastyo bhagavān ṛṣiḥ || 2 || rāma rāma mahābāho śṛṇu guhyaṃ sanātanam | yena sarvānarīn vatsa samare vijayiṣyasi || 3 || ādityahṛdayaṃ puṇyaṃ sarvaśatruvināśanam | jayāvahaṃ japennityamakṣayyaṃ paramaṃ śivam || 4 || sarvamaṅgalamāṅgalyaṃ sarvapāpapraṇāśanam | cintāśokapraśamanamāyurvardhanamuttamam || 5 || raśmimantaṃ samudyantaṃ devāsuranamaskṛtam | pūjayasva vivasvantaṃ bhāskaraṃ bhuvaneśvaram || 6 || sarvadevātmako hyeṣa tejasvī raśmibhāvanaḥ | eṣa devāsuragaṇāṃllokān pāti gabhastibhiḥ || 7 || eṣa brahmā ca viṣṇuśca śivaḥ skandaḥ prajāpatiḥ | mahendro dhanadaḥ kālo yamaḥ somo hyapāṃ patiḥ || 8 || pitaro vasavaḥ sādhyā hyaśvinau maruto manuḥ | vāyurvahniḥ prajāprāṇa ṛtukartā prabhākaraḥ || 9 || ādityaḥ savitā sūryaḥ khagaḥ pūṣā gabhastimān | suvarṇasadṛśo bhānurhiraṇyaretā divākaraḥ || 10 || haridaśvaḥ sahasrārciḥ saptasaptirmarīcimān | timironmathanaḥ śambhustvaṣṭā mārtāṇḍa aṃśumān || 11 || hiraṇyagarbhaḥ śiśirastapano bhāskaro raviḥ | agnigarbho’diteḥ putraḥ śaṅkhaḥ śiśiranāśanaḥ || 12 || vyomanāthastamobhedī ṛgyajuḥsāmapāragaḥ | ghanavṛṣṭirapāṃ mitro vindhyavīthīplavaṅgamaḥ || 13 || ātapī maṇḍalī mṛtyuḥ piṅgalaḥ sarvatāpanaḥ | kavirviśvo mahātejā raktaḥ sarvabhavodbhavaḥ || 14 || nakṣatragrahatārāṇāmadhipo viśvabhāvanaḥ | tejasāmapi tejasvī dvādaśātmannamo’stu te || 15 || namaḥ pūrvāya giraye paścimāyādraye namaḥ | jyotirgaṇānāṃ pataye dinādhipataye namaḥ || 16 || jayāya jayabhadrāya haryaśvāya namo namaḥ | namo namaḥ sahasrāṃśo ādityāya namo namaḥ || 17 || nama ugrāya vīrāya sāraṅgāya namo namaḥ | namaḥ padmaprabodhāya mārtāṇḍāya namo namaḥ || 18 || brahmeśānācyuteśāya sūryāyādityavarchase | bhāsvate sarvabhakṣāya raudrāya vapuṣe namaḥ || 19 || tamoghnāya himaghnāya śatrughnāyāmitātmane | kṛtaghnaghnāya devāya jyotiṣāṃ pataye namaḥ || 20 || taptacāmīkarābhāya vahnaye viśvakarmaṇe | namastamo’bhinighnāya rucaye lokasākṣiṇe || 21 || nāśayatyeṣa vai bhūtaṃ tadeva sṛjati prabhuḥ | pāyatyeṣa tapatyeṣa varṣatyeṣa gabhastibhiḥ || 22 || eṣa supteṣu jāgarti bhūteṣu pariniṣṭhitaḥ | eṣa evāgnihotraṃ ca phalaṃ caivāgnihotriṇām || 23 || vedāśca kratavaścaiva kratūnāṃ phalameva ca | yāni kṛtyāni lokeṣu sarva eṣa raviḥ prabhuḥ || 24 || enamāpatsu kṛcchreṣu kāntāreṣu bhayeषु ca | kīrtayan puruṣaḥ kaścinnāvasīdati rāghava || 25 || pūjayasvainamekāgro devadevaṃ jagatpatim | etattriguṇitaṃ japtvā yuddheṣu vijayiṣyasi || 26 || asmin kṣaṇe mahābāho rāvaṇaṃ tvaṃ vadhiṣyasi | evamuktvā tadāgastyo jagāma ca yathāgatam || 27 || etacchrutvā mahātejā naṣṭaśoko’bhavattadā | dhārayāmāsa suprīto rāghavaḥ prayatātmavān || 28 || ādityaṃ prekṣya japtvā tu paraṃ harṣamavāptavān | trirācamya śucirbhūtvā dhanurādāya vīryavān || 29 || rāvaṇaṃ prekṣya hṛṣṭātmā yuddhāya samupāgamat | sarvayatnena mahatā vadhe tasya dhṛto’bhavat || 30 || atha raviravadannirīkṣya rāmaṃ muditamanāḥ paramaṃ prahṛṣyamāṇaḥ | niśicarapatisaṃkṣayaṃ viditvā suragaṇamadhyagato vacastvareti || 31 ||

History and Significance

The Aditya Hridaya Stotram originates from the 107th Canto (Sarga) of the Yuddha Kanda in Valmiki’s Ramayana. The context is dramatic: the war between Rama and Ravana has dragged on, and Rama, having fought valiantly, is physically exhausted and deep in thought (‘Chintaya sthitam’). It is at this vulnerable moment that Sage Agastya, a witness to the battle along with the Devas, steps onto the battlefield. He teaches Rama this hymn, which is described as ‘Sanatanam’ (Eternal) and ‘Guhyam’ (Secret). The history of this hymn underscores the Vedic belief that external victory requires internal alignment with cosmic forces.

Meaning Analysis

The hymn is a masterpiece of devotional poetry and philosophy. It can be analyzed in four key sections:

  • The Invitation (Verses 1-5): Agastya approaches Rama and explains the benefits of the hymn. He calls it the ‘destroyer of all enemies’ and ‘supreme bliss’. This section prepares the mind of the listener (Rama) to receive the knowledge.
  • The Cosmic Identification (Verses 6-15): Here, the Sun God is identified not merely as a star, but as the Supreme Reality. He is equated with Brahma (Creator), Vishnu (Preserver), and Shiva (Destroyer). He is described as the ‘Golden Womb’ (Hiranyagarbha) and the soul of all gods (Sarva Deva Atmako). This reflects the Advaita (non-dual) philosophy where all forms of divinity merge into one light.
  • The Salutations (Verses 16-21): The tone shifts to rhythmic reverence. The devotee bows to the Sun in the East, West, South, and North. He is saluted as the ‘Terrible One’ (Ugra), the ‘Compassionate One’, and the ‘Witness of the World’ (Loka Sakshine). This section is meant for deep meditation.
  • The Result (Phalasruti) (Verses 25-31): Agastya promises that reciting this hymn three times guarantees victory. Rama, obeying the sage, sips water three times (Achamanam), looks at the sun, and recites the hymn. The result is instantaneous: his sorrow vanishes, his strength returns, and he prepares to slay Ravana. The hymn ends with the Sun God himself cheering Rama on.

Trivia

  • The Power of Three: Lord Rama chanted this hymn exactly three times (‘Etat trigunitam japtva’) before taking up his bow to deliver the final blow to Ravana.
  • Divine Encouragement: The very last verse is unique because it describes Surya (the Sun God) himself speaking. Standing amidst the Devas, he looks at Rama with great delight and says “Tvareti!” meaning “Hurry up!” or “Be quick!”—signaling that the time for Ravana’s end has come.
  • Agastya’s Role: Sage Agastya is a pivotal figure in the Ramayana; he not only gave Rama the Aditya Hridaya Stotram but earlier in the epic, he also gifted Rama the divine bow of Vishnu and the inexhaustible quivers that were crucial for the war.
  • Health Benefits: Beyond victory in battle, this stotram is traditionally believed to cure heart diseases and eye ailments, and to bring prosperity and long life.

शिवमहिम्न: स्तोत्रम् 

shiva mahimna stotram

महिम्न: पारं ते परमविदुषो यद्यसदृशी 

स्तुतिर्ब्रह्मादीनामपि तदवसन्नास्त्वयि गिर: ।

अथावाच्य: सर्व: स्वमतिपरिणामावधि गृणन्

ममाप्येष स्तोत्रे हर निरपवाद: परिकर: ।।1।।

अतीत: पन्थानं तव च महिमा वाड्मनसयो – 

रतद्व्यावृत्त्या यं चकितमभिधत्ते श्रुतिरपि ।

स कस्य स्तोतव्य: कतिविधगुण: कस्य विषय:

पदे त्वर्वाचीने पतति न मन: कस्य न वच: ।।2।।

मधुस्फीता वाच: परमममृतं निर्मितवत –

स्तव ब्रह्मन् किं वागपि सुरगुरोर्विस्मयपदम् ।

मम त्वेतां वाणीं गुणकथनपुण्येन भवत: 

पुनामीत्यर्थेsस्मिन् पुरमथन बुद्धिर्व्यवसिता ।।3।।

तवैश्चर्यं यत्तज्जगदुदयरक्षाप्रलयकृत्

त्रयीवस्तुव्यस्तं तिसृषु गुणभिन्नासु तनुषु ।

अभव्यानामस्मिन् वरद रमणीयामरमणीं 

विहन्तुं व्याक्रोशीं विदधत इहैके जडधिय: ।।4।।

किमीह: किंकाय स खलु किमुपायस्त्रिभुवनं 

किमाधारो धाता सृजति किमुपादान इति च ।

अतर्क्यैश्वर्ये त्वय्यनवसरदु:स्तो हतधिय: 

कुतर्कोsयं कांश्चिन्मुखरयति मोहाय जगत: ।।5।।

अजन्मानो लोका: किमवयववन्तोsपि जगता – 

मधिष्ठातारं किं भवविधिरनादृत्य भवति ।

अनीशो वा कुर्याद् भुवनजनने क: परिकरो 

यतो मन्दास्त्वां प्रत्यमरवर संशेरत इमे ।।6।।

त्रयी सांख्यं योग: पशुपतिमतं वैष्णवमिति 

प्रभिन्ने प्रस्थाने परमिदमद: पथ्यमिति च ।

रुचीनां वैचित्र्यादृजुकुटिलनानापथजुषां 

नृणामेको गम्यस्त्वमसि पयसामर्णव इव ।।7।।

महोक्ष: खट्वांगं परशुरजिनं भस्म फणिन: 

कपालं चेतीयत्तव वरद तन्त्रोपकरणम् ।

सुरास्तां तामृधिं दधति च भवद्भ्रूप्रणिहितां 

न हि स्वात्मारामं विषयमृगतृष्णा भ्रमयति ।।8।।

ध्रुवं कश्चित् सर्वं सकलमपरस्त्वध्रुवमिदं 

परो ध्रौव्याध्रौव्ये जगति गदति व्यस्तविषये ।

समस्ते sप्येतस्मिन् पुरमथन तैर्विस्मित इव 

स्तुवंजिह्रेमि त्वां न खलु ननु धृष्टा मुखरता ।।9।।

तवैश्चर्यं यत्नाद् यदुपरि विरिंचो हरिरध: 

परिच्छेत्तुं यातावनलमनलस्कन्धवपुष: ।

ततो भक्तिश्रद्धाभरगुरुगृणद्भ्यां गिरिश यत्

स्वयं तस्थे ताभ्यां तव किमनुवृत्तिर्न फलति ।।10।।

अयत्नादापाद्य त्रिभुवनमवैरव्यतिकरं 

दशास्यो यद् बाहूनभृत रणकण्डूपरवशान् ।

शिर:पद्मश्रेणीरचितचरणाम्भोरुहबले: 

स्थिरायास्त्वद्भक्तेस्त्रिपुरहर विस्फूर्जितमिदम् ।।11।।

अमुष्य त्वत्सेवासमधिगतसारं भुजवनं 

बलात् कैलासेsपि त्वदधिवसतौ विक्रमयत: ।

अलभ्या पातालेsप्यलसचलितांगुष्ठशिरसि 

प्रतिष्ठा त्वय्यासीद् ध्रुवमुपचितो मुह्यति खल: ।।12।।

यदृद्धिं सुत्राम्णो वरद परमोच्चैरपि सती – 

मधश्चक्रे बाण: परिजनविधेयत्रिभुवन: ।

न तच्चित्रं तस्मिन् वरिवसितरि त्वच्चरणयो – 

र्न कस्याप्युन्नत्यै भवति शिरसस्त्वय्यवनति: ।।13।।

अकाण्डब्रह्माण्डक्षयचकितदेवासुरकृपा – 

विधेयस्यासीद्यस्त्रिनयनविषं संहृतवत: ।

स कल्माष: कण्ठे तव न कुरुते न श्रियमहो 

विकारोsपि श्लाघ्यो भुवनभयभंगव्यसनिन: ।।14।।

असिद्धार्था नैव क्वचिदपि सदेवासुरनरे 

निवर्तन्ते नित्यं जगति जयिनो यस्य विशिखा: ।

स पश्यन्नीश त्वामितरसुरसाधारणमभूत्

स्मर: स्मर्तव्यात्मा नहि वशिषु पथ्य: परिभव: ।।15।।

मही पादाघाताद् व्रजति सहसा संशयपदं 

पदं विष्णोर्भ्राम्यद्भुजपरिघरुग्णग्रहगणम् ।

मुहुर्द्यौर्दौ:स्थ्यं यात्यनिभृतजटाताडिततटा 

जगद्रक्षायै त्वं नटसि ननु वामैव विभुता ।।16।।

वियद्व्यापी तारागणगुणितफेनोद्ग्मरुचि: 

प्रवाहो वारां य: पृषतलघुदृष्ट: शिरसि ते ।

जगद् द्वीपाकारं जलधिवलयं तेन कृतमि – 

त्यनेनैवोन्नेयं धृतमहिम दिव्यं तव वपु: ।।17।।

रथ: क्षोणी यन्ता शतधृतिरगेन्द्रो धनुरथो 

रथांगे चन्द्रार्कौ रथचरणपाणि: शर इति ।

दिधक्षोस्ते कोsयं त्रिपुरतृणमाडम्बरविधि – 

र्विधेयै: क्रीडन्त्यो न खलु परतन्त्रा: प्रभुधिय: ।।18।।

हरिस्ते साहस्त्रं कमलबलिमाधाय पदयो – 

र्यदेकोने तस्मिन् निजमुदहरन्नेत्रकमलम् ।

गतो भक्त्युद्रेक: परिणतिमसौ चक्रवपुषा 

त्रयाणां रक्षायै त्रिपुरहर जागर्ति जगताम् ।।19।।

क्रतौ सुप्ते जाग्रत्त्वमसि फलयोगे क्रतुमतां 

क्व कर्म प्रध्वस्तं फलति पुरुषाराधनमृते ।

अतस्त्वां सम्प्रेक्ष्य क्रतुषु फलदानप्रतिभुवं 

श्रुतौ श्रद्धां बद्ध्वा दृढपरिकर: कर्मसु जन: ।।20।।

क्रियादक्षो दक्ष: क्रतुपतिरधीशस्तनुभृता – 

मृषीणामार्त्विज्यं शरणद सदस्या: सुरगणा: ।

क्रतुभ्रेषस्त्वत्त: क्रतुफलविधानव्यसनिनो 

ध्रुवं कर्तु: श्रद्धाविधुरमभिचाराय हि मखा: ।।21।।

प्रजानाथं नाथ प्रसभमभिकं स्वां दुहितरं 

गतं रोहिद्भूतां रिरमयिषुमृष्यस्य वपुषा ।

धनुष्पाणेर्यातं दिवमपि सपत्राकृतममुं 

त्रसन्तं तेsद्यापि त्यजति न मृगव्याधरभस: ।।22।।

स्वलावण्याशंसाधृतधनुषमह्नाय तृणवत्

पुर: प्लुष्टं दृष्ट्वा पुरमथन पुष्पायुधमपि ।

यदि स्त्रैणं देवी यमनिरतदेहार्धघटना – 

दवैति त्वामद्धा बत वरद मुग्धा युवतय: ।।23।।

श्मशानेष्वाक्रीडा स्मरहर पिशाचा: सहचरा – 

श्चिताभस्मलेप: स्त्रगपि नृकरोटीपरिकर: ।

अमंगलल्यं शीलं तव भवतु नामैवमखिलं 

तथापि स्मर्तृणां वरद परमं मंगलमसि ।।24।।

मन: प्रत्यक्चित्ते सविधमवधायात्तमरुत: 

प्रहृष्यद्रोमाण: प्रमदसलिलोत्संगितदृश: ।

यदालोक्याह्लादं हृद इव निमज्यामृतमये 

दधत्यन्तस्तत्त्वं किमपि यमिनस्तत् किल भवान् ।।25।।

त्वमर्कस्त्वं सोमस्त्वमसि पवनस्त्वं हुतवह – 

स्त्वमापस्त्वं व्योम त्वमु धरणिरात्मा त्वमिति च ।

परिच्छिन्नामेवं त्वयि परिणता बिभ्रतु गिरं 

न विद्मस्तत्तत्त्वं वयमिह तु यत्त्वं न भवसि ।।26।।

त्रयीं तिस्त्रो वृत्तीस्त्रिभुवनमथो त्रीनपि सुरा – 

नकाराद्यैर्वर्णैस्त्रिभिरभिदधत् तीर्णविकृति ।

तुरीयं ते धाम ध्वनिभिरवरुन्धानमणुभि: 

समस्तं व्यस्तं त्वं शरणद गृणात्योमिति पदम् ।।27।।

भव: शर्वो रुद्र: पशुपतिरथोग्र: सहमहां – 

स्तथा भीमेशानाविति यदभिधानाष्टकमिदम् ।

अमुष्मिन् प्रत्येकं प्रविचरति देव श्रुतिरपि 

प्रियायास्मै धाम्ने प्रविहितनमस्योsस्मि भवते ।।28।।

नमो नेदिष्ठाय प्रियदव दविष्ठाय च नमो 

नम: क्षोदिष्ठाय स्मरहर महिष्ठाय च नम: ।

नमो वर्षिष्ठाय त्रिनयन यविष्ठाय च नमो 

नम: सर्वस्मै ते तदिदमिति शर्वाय च नम: ।।29।।

बहुलरजसे विश्वोत्पत्तौ भवाय नमो नम: 

प्रबलतमसे तत्संहारे हराय नमो नम: ।

जनसुखकृते सत्त्वोद्रिक्तौ मृडाय नमो नम: 

प्रमहसि पदे निस्त्रैगुण्ये शिवाय नमो नम: ।।30।।

कृशपरिणति चेत: क्लेशवश्यं क्व चेदं 

क्व च तव गुणसीमोल्लंघिनी शश्वदृद्धि: ।

इति चकितममन्दीकृत्य मां भक्तिराधाद्  

वरद चरणयोस्ते वाक्यपुष्पोपहारम् ।।31।।

असितगिरिसमं स्यात् कज्जलं सिन्धुपात्रे 

सुरतरुवरशाखा लेखनी पत्रमुर्वी ।

लिखति यदि गृहीत्वा शारदा सर्वकालं 

तदपि तव गुणानामीश पारं न याति ।।32।।

असुरसुरमुनीन्द्रैरर्चितस्येन्दुमौले – 

र्ग्रथितगुणमहिम्नो निर्गुणस्येश्वरस्य ।

सकलगणवरिष्ठ: पुष्पदन्ताभिधानो 

रुचिरमलघुवृत्तै: स्तोत्रमेतच्चकार ।।33।।

अहरहरनवद्यं धूर्जटे: स्तोत्रमेतत् 

पठति परमभक्त्या शुद्धचित्त: पुमान् य: ।

स भवति शिवलोके रुद्रतुल्यस्तथात्र 

प्रचुरतरधनायु: पुत्रवान् कीर्तिमांश्च ।।34।।

महेशान्नापरो देवो महिम्नो नापरा स्तुति: ।

अघोरान्नापरो मन्त्रो नास्ति तत्त्वं गुरो: परम् ।।35।।

दीक्षा दानं तपस्तीर्थं ज्ञानं यागादिका: क्रिया: ।

महिम्न: स्तवपाठस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम् ।।36।।

कुसुमदशननामा सर्वगन्धर्वराज: 

शिशुशशिधरमौलेर्देवदेवस्य दास: ।

स खलु निजमहिम्नो भ्रष्ट एवास्य रोषात् 

स्तवनमिदमकार्षीद् दिव्यदिव्यं महिम्न: ।।37।।

सुरवरमुनिपूज्यं स्वर्गमोक्षैकहेतुं 

पठति यदि मनुष्य: प्रांजलिर्नान्यचेता: ।

व्रजति शिवसमीपं किन्नरै: स्तूयमान: 

स्तवनमिदममोघं पुष्पदन्तप्रणितम्  ।।38।।

आसमाप्तमिदं स्तोत्रं पुण्यं गन्धर्वभाषितम् ।

अनौपम्यं मनोहारि शिवमीश्वरवर्णनम् ।।39।।

इत्येषा वाड्मयी पूजा श्रीमच्छंकरपादयो: ।

अर्पिता तेन देवेश: प्रीयतां मे सदाशिव: ।।40।।

तव तत्त्वं न जानामि कीदृशोsसि महेश्वर ।

यादृशोsसि महादेव तादृशाय नमो नम: ।।41।।

एककालं द्विकालं वा त्रिकालं य: पठेन्नर: ।

सर्वपापविनिर्मुक्त: शिवलोके महीयते ।।42।।

श्रीपुष्पदन्तमुखपंकजनिर्गतेन 

स्तोत्रेण किल्बिषहरेण हरप्रियेण ।

कण्ठस्थितेन पठितेन समाहितेन 

सुप्रीणितो भवति भूतपतिर्महेश: ।।43।।

।।इति गन्ध्र्वराजपुष्पदन्तकृतं शिवमहिम्न: स्तोत्रं सम्पूर्णम् ।।

Shiva Mahimna Stotram | ।।शिव महिम्न स्तोत्रम्।।

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।।शिवमहिम्न स्तोत्रम्।।

Shiva Mahimna Stotram

श्रावण मास में भोलेनाथ शंकर की सादगी का वर्णन करने से ‍शिव प्रसन्न होते हैं। शिव के इस महिम्न स्तोत्रम् में शिव के दिव्य स्वरूप एवं उनकी सादगी का वर्णन है। इस महिम्न स्तोत्र के पीछे अनूठी और सुंदर कथा प्रचलित है।

कथा

एक समय में चित्ररथ नाम का राजा था। वो परम शिव भक्त था। उसने एक अद्भुत सुंदर बाग का निर्माण करवाया। जिसमें विभिन्न प्रकार के पुष्प लगे थे। प्रत्येक दिन राजा उन पुष्पों से शिव जी की पूजा करते थे।

फिर एक दिन पुष्पदंत नामक गन्धर्व उस राजा के उद्यान की तरफ से जा रहे थे। उद्यान की सुंदरता ने उसे आकृष्ट कर लिया। मोहित पुष्पदंत ने बाग के पुष्पों को चुरा लिया। अगले दिन चित्ररथ को पूजा हेतु पुष्प प्राप्त नहीं हुए।

फिर क्या हुआ

बाग के सौंदर्य से मुग्ध पुष्पदंत प्रत्येक दिन पुष्प की चोरी करने लगा। इस रहस्य को सुलझाने के राजा के प्रत्येक प्रयास विफल रहे। पुष्पदंत अपनी दिव्य शक्तियों के कारण अदृश्य बना रहे।

राजा ने निकाला समाधान: राजा चित्ररथ ने एक अनोखा समाधान निकाला। उन्होंने शिव को अर्पित पुष्प एवं विल्व पत्र बाग में बिछा दिया। राजा के उपाय से अनजान पुष्पदंत ने उन पुष्पों को अपने पैरो से कुचल दिया। इससे पुष्पदंत की दिव्य शक्तिओं का क्षय हो गया।  पुष्पदंत स्वयं भी शिव भक्त था। अपनी गलती का बोध होने पर उसने इस परम स्तोत्र के रचना की जिससे प्रसन्न हो महादेव ने उसकी भूल को क्षमा कर पुष्पदंत के दिव्य स्वरूप को पुनः प्रदान किया।

शिव महिम्न स्तोत्रम् (अर्थ सहित )

Shiva Mahimna Stotram with hindi meaning

महिम्नः पारं ते परमविदुषो यद्यसदृशी

स्तुतिर्ब्रह्मादीनामपि तदवसन्नास्त्वयि गिरः

अथाऽवाच्यः सर्वः स्वमतिपरिणामावधि गृणन्

ममाप्येष स्तोत्रे हर निरपवादः परिकरः

हे हर !!! आप प्राणी मात्र के कष्टों को हराने वाले हैं। मैं इस स्तोत्र द्वारा आपकी वंदना कर रहा हूं जो कदाचित आपके वंदना के योग्य न भी हो पर हे महादेव स्वयं ब्रह्मा और अन्य देवगण भी आपके चरित्र की पूर्ण गुणगान करने में सक्षम नहीं हैं। जिस प्रकार एक पक्षी अपनी क्षमता के अनुसार ही आसमान में उड़ान भर सकता है उसी प्रकार मैं भी अपनी यथाशक्ति आपकी आराधना करता हूं।

अतीतः पंथानं तव च महिमा वाङ्मनसयोः

अतद्व्यावृत्त्या यं चकितमभिधत्ते श्रुतिरपि

स कस्य स्तोत्रव्यः कतिविधगुणः कस्य विषयः

पदे त्वर्वाचीने पतति न मनः कस्य न वचः

हे शिव !!! आपकी व्याख्या न तो मन, ना ही वचन द्वारा ही संभव है। आपके सन्दर्भ में वेद भी अचंभित हैं तथा नेति नेति का प्रयोग करते हैं अर्थात यह भी नहीं और वो भी नहीं… आपका संपूर्ण गुणगान भला कौन कर सकता है? यह जानते हुए भी कि आप आदि व अंत रहित हैं परमात्मा का गुणगान कठिन है मैं आपकी वंदना करता हूं।

मधुस्फीता वाचः परमममृतं निर्मितवतः

तव ब्रह्मन् किं वागपि सुरगुरोर्विस्मयपदम्

मम त्वेतां वाणीं गुणकथनपुण्येन भवतः

पुनामीत्यर्थेऽस्मिन् पुरमथन बुद्धिर्व्यवसिता

हे वेद और भाषा के सृजक जब स्वयं देवगुरु बृहस्पति भी आपके स्वरूप की व्याख्या करने में असमर्थ हैं तो फिर मेरा कहना ही क्या? हे त्रिपुरारी, अपनी सीमित क्षमता का बोध होते हुए भी मैं इस विश्वास से इस स्तोत्र की रचना कर रहा हूं कि इससे मेरी वाणी शुद्ध होगी तथा मेरी बुद्धि का विकास होगा।

तवैश्वर्यं यत्तज्जगदुदयरक्षाप्रलयकृत्

त्रयीवस्तु व्यस्तं तिस्रुषु गुणभिन्नासु तनुषु .

अभव्यानामस्मिन् वरद रमणीयामरमणीं

विहन्तुं व्याक्रोशीं विदधत इहैके जडधियः

हे देव, आप ही इस संसार के सृजक, पालनकर्ता एवं विलयकर्ता हैं। तीनों वेद आपकी ही संहिता गाते हैं, तीनों गुण (सतो-रजो-तमो) आपसे ही प्रकाशित हैं। आपकी ही शक्ति त्रिदेवों में निहित है। इसके बाद भी कुछ मूढ़ प्राणी आपका उपहास करते हैं तथा आपके बारे भ्रम फैलाने का प्रयास करते हैं जो की सर्वथा अनुचित है।

किमीहः किंकायः स खलु किमुपायस्त्रिभुवनं

किमाधारो धाता सृजति किमुपादान इति च

अतर्क्यैश्वर्ये त्वय्यनवसर दुःस्थो हतधियः

कुतर्कोऽयं कांश्चित् मुखरयति मोहाय जगतः

हे महादेव !!! वो मूढ़ प्राणी जो स्वयं ही भ्रमित हैं इस प्रकार से तर्क-वितर्क द्वारा आपके अस्तित्व को चुनौती देने की कोशिश करते हैं। वह कहते हैं कि अगर कोई परम पुरुष है तो उसके क्या गुण हैं? वह कैसा दिखता है? उसके क्या साधन हैं? वह इस सृष्टि को किस प्रकार धारण करता है? ये प्रश्न वास्तव में भ्रामक मात्र हैं। वेद ने भी स्पष्ट किया है कि तर्क द्वारा आपको नहीं जाना जा सकता।

अजन्मानो लोकाः किमवयववन्तोऽपि जगतां

अधिष्ठातारं किं भवविधिरनादृत्य भवति

अनीशो वा कुर्याद् भुवनजनने कः परिकरो

यतो मन्दास्त्वां प्रत्यमरवर संशेरत इमे…

हे परमपिता !!! इस सृष्टि में सात लोक हैं (भूलोक, भुवर्लोक, स्वर्गलोक, सत्यलोक,महर्लोक, जनलोक, एवं तपलोक)। इनका सृजन भला सृजक (आपके) के बिना कैसे संभव हो सका? यह किस प्रकार से और किस साधन से निर्मित हुए? तात्पर्य यह है कि आप पर किसी प्रकार का संशय नहीं किया जा सकता।

त्रयी साङ्ख्यं योगः पशुपतिमतं वैष्णवमिति

प्रभिन्ने प्रस्थाने परमिदमदः पथ्यमिति च

रुचीनां वैचित्र्यादृजुकुटिल नानापथजुषां

नृणामेको गम्यस्त्वमसि पयसामर्णव इव।

वि‍विध प्राणी सत्य तक पहुंचने के लिए विभिन्न वेद पद्धतियों का अनुसरण करते हैं। पर जिस प्रकार सभी नदी अंतत: सागर में समाहित हो जाती है ठीक उसी प्रकार हर मार्ग आप तक ही पहुंचता है।

महोक्षः खट्वाङ्गं परशुरजिनं भस्म फणिनः

कपालं चेतीयत्तव वरद तन्त्रोपकरणम् .

सुरास्तां तामृद्धिं दधति तु भवद्भूप्रणिहितां

न हि स्वात्मारामं विषयमृगतृष्णा भ्रमयति।

हे शिव !!! आपके भृकुटी के इशारे मात्र से सभी देवगण ऐश्वर्य एवं संपदाओं का भोग करते हैं। पर आपके स्वयं के लिए सिर्फ बैल (नंदी), कपाल, बाघम्बर, त्रिशुल, कपाल एवं नाग्माला एवं भस्म मात्र है। अगर कोई संशय करें कि आप देवों के असीम ऐश्वर्य के स्त्रोत हैं तो आप स्वयं उन ऐश्वर्यों का भोग क्यों नहीं करते तो इस प्रश्न का उत्तर सहज ही है आप इच्छा रहित हैं तथा स्वयं में ही स्थितप्रज्ञ रहते हैं।

ध्रुवं कश्चित् सर्वं सकलमपरस्त्वध्रुवमिदं

परो ध्रौव्याऽध्रौव्ये जगति गदति व्यस्तविषये

समस्तेऽप्येतस्मिन् पुरमथन तैर्विस्मित इव

स्तुवन् जिह्रेमि त्वां न खलु ननु धृष्टा मुखरता।

हे त्रिपुरहंता !!! इस संसार के बारे में विभिन्न विचारकों के भिन्न-भिन्न मत हैं। कोई इसे नित्य जानता है तो कोई इसे अनित्य समझता है। अन्य इसे नित्यानित्य बताते हैं। इन विभिन्न मतों के कारण मेरी बुद्धि भ्रमित होती है पर मेरी भक्ति आप में और दृढ़ होती जा रही है।


तवैश्वर्यं यत्नाद् यदुपरि विरिञ्चिर्हरिरधः

परिच्छेतुं यातावनिलमनलस्कन्धवपुषः

ततो भक्तिश्रद्धा-भरगुरु-गृणद्भ्यां गिरिश यत्

स्वयं तस्थे ताभ्यां तव किमनुवृत्तिर्न फलति।

एक समय आपके पूर्ण स्वरूप का भेद जानने हेतु ब्रह्मा एवं विष्णु क्रमश:प्रत्येक दिशा में गए। पर उनके सारे प्रयास विफल हुए। जब उन्होंने भक्ति मार्ग अपनाया तभी आपको जान पाए। क्या आपकी भक्ति कभी विफल हो सकती है?


अयत्नादासाद्य त्रिभुवनमवैरव्यतिकरं

दशास्यो यद्बाहूनभृत-रणकण्डू-परवशान्

शिरःपद्मश्रेणी-रचितचरणाम्भोरुह-बलेः

स्थिरायास्त्वद्भक्तेस्त्रिपुरहर विस्फूर्जितमिदम्।

हे त्रिपुरान्तक !!! दशानन रावण किस प्रकार विश्व को शत्रु विहीन कर सका? उसके महाबाहू हर पल युद्ध के लिए व्यग्र रहे। हे प्रभु! रावण ने भक्तिवश अपने ही शीश को काट-काट कर आपके चरण कमलों में अर्पित कर दिया, यह उसी भक्ति का प्रभाव था।

अमुष्य त्वत्सेवा-समधिगतसारं भुजवनं

बलात् कैलासेऽपि त्वदधिवसतौ विक्रमयतः

अलभ्यापातालेऽप्यलसचलितांगुष्ठशिरसि

प्रतिष्ठा त्वय्यासीद् ध्रुवमुपचितो मुह्यति खलः

हे शिव !!! एक समय उसी रावण ने मद् में चूर आपके कैलाश को उठाने की धृष्टता करने की भूल की। हे महादेव आपने अपने सहज पांव के अंगूठे मात्र से उसे दबा दिया। फिर क्या था रावण कष्ट में रूदन करा उठा। वेदना ने पटल लोक में भी उसका पीछा नहीं छोड़ा। अंततः आपकी शरणागति के बाद ही वह मुक्त हो सका।

यदृद्धिं सुत्राम्णो वरद परमोच्चैरपि सतीं

अधश्चक्रे बाणः परिजनविधेयत्रिभुवनः

न तच्चित्रं तस्मिन् वरिवसितरि त्वच्चरणयोः

न कस्याप्युन्नत्यै भवति शिरसस्त्वय्यवनतिः

हे शम्भो !!! आपकी कृपा मात्र से ही बाणासुर दानव इन्द्रादि देवों से भी अधिक ऐश्वर्यशाली बन सका तथा तीनों लोकों पर राज्य किया। हे ईश्वर, आपकी भक्ति से क्या कुछ संभव नहीं है?

अकाण्ड-ब्रह्माण्ड-क्षयचकित-देवासुरकृपा

विधेयस्याऽऽसीद् यस्त्रिनयन विषं संहृतवतः

स कल्माषः कण्ठे तव न कुरुते न श्रियमहो

विकारोऽपि श्लाघ्यो भुवन-भय-भङ्ग-व्यसनिनः
देवताओं एव असुरों ने अमृत प्राप्ति हेतु समुन्द्र मंथन किया। समुद्र से मूल्यवान वस्तुएं प्रकट हुईं जो देव तथा दानवों ने आपस में बांट ली। पर जब समुद्र से अत्यधिक भयावह कालकूट विष प्रकट हुआ तो असमय ही सृष्टि समाप्त होने का भय उत्पन्न हो गया और सभी भयभीत हो गए। हे हर, तब आपने संसार रक्षार्थ विषपान कर लिया। वह विष आपके कंठ में निष्क्रिय हो कर पड़ा है। विष के प्रभाव से आपका कंठ नीला पड़ गया। हे नीलकंठ, आश्चर्य है की यह स्थिति भी आपकी शोभा ही बढ़ाती है। कल्याण कार्य सुन्दर ही होता है।

असिद्धार्था नैव क्वचिदपि सदेवासुरनरे

निवर्तन्ते नित्यं जगति जयिनो यस्य विशिखाः

स पश्यन्नीश त्वामितरसुरसाधारणमभूत्

स्मरः स्मर्तव्यात्मा न हि वशिषु पथ्यः परिभवः
हे प्रभु !!! कामदेव के वार से कभी कोई भी नहीं बच सका चाहे वो मनुष्य हों, देव या दानव ही पर जब कामदेव ने आपकी शक्ति समझे बिना आप की ओर अपने पुष्प बाण को साधा तो आपने उसे तत्क्षण ही भस्म कर दिया। श्रेष्ठ जनों के अपमान का परिणाम हितकर नहीं होता।


मही पादाघाताद् व्रजति सहसा संशयपदं

पदं विष्णोर्भ्राम्यद् भुज-परिघ-रुग्ण-ग्रह-गणम्

मुहुर्द्यौर्दौस्थ्यं यात्यनिभृत-जटा-ताडित-तटा

जगद्रक्षायै त्वं नटसि ननु वामैव विभुता।
हे नटराज !!! जब संसार कल्याण के हेतु आप तांडव करने लगते हैं तो आपके पांव के नीचे धरा कांप उठती है, आपके हाथों की परिधि से टकरा कर ग्रह-नक्षत्र भयभीत हो उठते हैं। विष्णु लोक भी हिल जाता है। आपकी जटा के स्पर्श मात्र से स्वर्गलोग व्याकुल हो उठता है। आश्चर्य ही है हे महादेव कि अनेक बार कल्याणकारी कार्य भी भय उत्पन्न करते हैं।

वियद्व्यापी तारा-गण-गुणित-फेनोद्गम-रुचिः

प्रवाहो वारां यः पृषतलघुदृष्टः शिरसि ते

जगद्द्वीपाकारं जलधिवलयं तेन कृतमिति

अनेनैवोन्नेयं धृतमहिम दिव्यं तव वपुः


आकाश गंगा से निकलती तारागणों के बीच से गुजरती गंगा जल अपनी धारा से धरती पर टापू तथा अपने वेग से चक्रवात उत्पन्न करती हैं। पर य उफान से परिपूर्ण गंगा आपके मस्तक पर एक बूंद के सामन ही दृष्टिगोचर होती है। यह आपके दिव्य स्वरूप का ही परिचायक है।

रथः क्षोणी यन्ता शतधृतिरगेन्द्रो धनुरथो

रथाङ्गे चन्द्रार्कौ रथ-चरण-पाणिः शर इति

दिधक्षोस्ते कोऽयं त्रिपुरतृणमाडम्बर विधिः

विधेयैः क्रीडन्त्यो न खलु परतन्त्राः प्रभुधियः
हे शिव !!! आपने त्रिपुरासुर का वध करने हेतु पृथ्वी को रथ, ब्रह्मा को सारथी, सूर्य-चन्द्र को पहिया एवं स्वयं इन्द्र को बाण बनाया। हे शम्भु, इस वृहत प्रयोजन की क्या आवश्यकता थी? आपके लिए तो संसार मात्र का विलय करना अत्यंत ही छोटी बात है। आपको किसी सहायता की क्या आवश्यकता?

हरिस्ते सहस्रं कमल बलिमाधाय पदयोः

यदेकोने तस्मिन् निजमुदहरन्नेत्रकमलम्

गतो भक्त्युद्रेकः परिणतिमसौ चक्रवपुषः

त्रयाणां रक्षायै त्रिपुरहर जागर्ति जगताम्।

जब भगवान विष्णु ने आपकी सहस्र कमलों एवं सहस्र नामों द्वारा पूजा प्रारम्भ की तो उन्होंने एक कमल कम पाया। तब भक्ति भाव से हरी ने अपनी एक आंख को कमल के स्थान पर अर्पित कर दिया। उनकी यही अदम्य भक्ति ने सुदर्शन चक्र का स्वरूप धारण कर लिया जिसे भगवान विष्णु संसार रक्षार्थ उपयोग करते हैं।

क्रतौ सुप्ते जाग्रत् त्वमसि फलयोगे क्रतुमतां

क्व कर्म प्रध्वस्तं फलति पुरुषाराधनमृते

अतस्त्वां सम्प्रेक्ष्य क्रतुषु फलदान-प्रतिभुवं

श्रुतौ श्रद्धां बध्वा दृढपरिकरः कर्मसु जनः
हे देवाधिदेव !!! आपने ही कर्म-फल का विधान बनाया। आपके ही विधान से अच्छे कर्मो तथा यज्ञ कर्म का फल प्राप्त होता है। आपके वचनों में श्रद्धा रख कर सभी वेद कर्मो में आस्था बनाए रखते हैं तथा यज्ञ कर्म में संलग्न रहते हैं।

क्रियादक्षो दक्षः क्रतुपतिरधीशस्तनुभृतां

ऋषीणामार्त्विज्यं शरणद सदस्याः सुर-गणाः

क्रतुभ्रंशस्त्वत्तः क्रतुफल-विधान-व्यसनिनः

ध्रुवं कर्तुं श्रद्धा विधुरमभिचाराय हि मखाः
हे प्रभु !!! यद्यपि आपने यज्ञ कर्म और फल का विधान बनाया है तदपि जो यज्ञ शुद्ध विचारों और कर्मो से प्रेरित न हो और आपकी अवहेलना करने वाला हो उसका परिणाम कदाचित विपरीत और अहितकर ही होता है। दक्षप्रजापति के महायज्ञ से उपयुक्त उदाहरण भला और क्या हो सकता है? दक्षप्रजापति के यज्ञ में स्वयं ब्रह्मा पुरोहित तथा अनेकानेक देवगण तथा ऋषि-मुनि सम्मिलित हुए। फिर भी शिव की अवहेलना के कारण यज्ञ का नाश हुआ। आप अनीति को सहन नहीं करते भले ही शुभकर्म के संदर्भ में क्यों न हो।

प्रजानाथं नाथ प्रसभमभिकं स्वां दुहितरं

गतं रोहिद् भूतां रिरमयिषुमृष्यस्य वपुषा

धनुष्पाणेर्यातं दिवमपि सपत्राकृतममुं

त्रसन्तं तेऽद्यापि त्यजति न मृगव्याधरभसः
एक समय में ब्रह्मा अपनी पुत्री पर ही मोहित हो गए जब उनकी पुत्री ने हिरनी का स्वरूप धारण कर भागने की कोशिश की तो कामातुर ब्रह्मा भी हिरन भेष में उसका पीछा करने लगे। हे शंकर तब आपने व्याघ्र स्वरूप में धनुष-बाण लेकर ब्रह्मा की और कूच किया। आपके रौद्र रूप से भयभीत ब्रह्मा आकाश दिशा की ओर भाग निकले तथा आजे भी आपसे भयभीत हैं।

स्वलावण्याशंसा धृतधनुषमह्नाय तृणवत्

पुरः प्लुष्टं दृष्ट्वा पुरमथन पुष्पायुधमपि

यदि स्त्रैणं देवी यमनिरत-देहार्ध-घटनात्

अवैति त्वामद्धा बत वरद मुग्धा युवतयः
हे योगेश्वर! जब आपने माता पार्वती को अपनी सहधर्मिणी बनाया तो उन्हें आपके योगी होने पर शंका उत्पन्न हुई। यह शंका निर्मूल ही थी क्योंकि जब स्वयं कामदेव ने आप पर अपना प्रभाव दिखलाने की कोशिश की तो आपने काम को जला करा नष्ट करा दिया।

श्मशानेष्वाक्रीडा स्मरहर पिशाचाः सहचराः

चिता-भस्मालेपः स्रगपि नृकरोटी-परिकरः

अमङ्गल्यं शीलं तव भवतु नामैवमखिलं

तथापि स्मर्तॄणां वरद परमं मङ्गलमसि
हे भोलेनाथ!!! आप श्मशान में रमण करते हैं, भुत-प्रेत आपके संगी होते हैं, आप चिता भस्म का लेप करते हैं तथा मुंडमाल धारण करते हैं। यह सारे गुण ही अशुभ एवं भयावह जान पड़ते हैं। तब भी हे श्मशान निवासी आपके भक्तो को आप इस स्वरूप में भी शुभकारी एव आनंददायी ही प्रतीत होते हैं क्योंकि हे शंकर आप मनोवांछित फल प्रदान करने में तनिक भी विलम्ब नहीं करते।

मनः प्रत्यक् चित्ते सविधमविधायात्त-मरुतः

प्रहृष्यद्रोमाणः प्रमद-सलिलोत्सङ्गति-दृशः

यदालोक्याह्लादं ह्रद इव निमज्यामृतमये

दधत्यन्तस्तत्त्वं किमपि यमिनस्तत् किल भवान्


हे योगिराज!!! मनुष्य नाना प्रकार के योग्य पद्धति को अपनाते हैं जैसे की सांस पर नियंत्रण, उपवास, ध्यान इत्यादि। इन योग क्रियाओं द्वारा वो जिस आनंद, जिस सुख को प्राप्त करते हैं वह वास्तव में आप ही हैं। हे महादेव!!!

त्वमर्कस्त्वं सोमस्त्वमसि पवनस्त्वं हुतवहः

त्वमापस्त्वं व्योम त्वमु धरणिरात्मा त्वमिति च

परिच्छिन्नामेवं त्वयि परिणता बिभ्रति गिरं

न विद्मस्तत्तत्त्वं वयमिह तु यत् त्वं न भवसि
हे शिव !!! आप ही सूर्य, चन्द्र, धरती, आकाश, अग्नि, जल एवं वायु हैं। आप ही आत्मा भी हैं। हे देव मुझे ऐसा कुछ भी ज्ञात नहीं जो आप न हों।

त्रयीं तिस्रो वृत्तीस्त्रिभुवनमथो त्रीनपि सुरान्

अकाराद्यैर्वर्णैस्त्रिभिरभिदधत् तीर्णविकृति

तुरीयं ते धाम ध्वनिभिरवरुन्धानमणुभिः

समस्त-व्यस्तं त्वां शरणद गृणात्योमिति पदम्


हे सर्वेश्वर!!! ॐ तीन तत्वों से बना है अ, ऊ, मं जो तीन वेदों (ऋग, साम, यजु), तीन अवस्था (जाग्रत, स्वप्न, सुशुप्त), तीन लोकों, तीन कालों, तीन गुणों तथा त्रिदेवों को इंगित करता है। हे ॐकार आपही इस त्रिगुण, त्रिकाल, त्रिदेव, त्रिअवस्था, और त्रिवेद के समागम हैं।

भवः शर्वो रुद्रः पशुपतिरथोग्रः सहमहान्

तथा भीमेशानाविति यदभिधानाष्टकमिदम्

अमुष्मिन् प्रत्येकं प्रविचरति देव श्रुतिरपि

प्रियायास्मैधाम्ने प्रणिहित-नमस्योऽस्मि भवते


हे शिव, वेद एवं देवगन आपकी इन आठ नामों से वंदना करते हैं – भव, सर्व, रूद्र, पशुपति, उग्र, महादेव, भीम, एवं इशान। हे शम्भू मैं भी आपकी इन नामों से स्तुति करता हूं।

नमो नेदिष्ठाय प्रियदव दविष्ठाय च नमः

नमः क्षोदिष्ठाय स्मरहर महिष्ठाय च नमः

नमो वर्षिष्ठाय त्रिनयन यविष्ठाय च नमः

नमः सर्वस्मै ते तदिदमतिसर्वाय च नमः


हे त्रिलोचन, आप अत्यधिक दूर हैं और अत्यंत पास भी, आप महाविशाल भी हैं तथा परमसूक्ष्म भी, आप श्रेठ भी हैं तथा कनिष्ठ भी। आप ही सभी कुछ हैं साथ ही आप सभी कुछ से परे भी हैं।

बहुल-रजसे विश्वोत्पत्तौ भवाय नमो नमः

प्रबल-तमसे तत् संहारे हराय नमो नमः

जन-सुखकृते सत्त्वोद्रिक्तौ मृडाय नमो नमः

प्रमहसि पदे निस्त्रैगुण्ये शिवाय नमो नमः


हे भव, मैं आपको रजोगुण से युक्त सृजनकर्ता जान कर आपका नमन करता हूं। हे हर, मैं आपको तामस गुण से युक्त, विलयकर्ता मान आपका नमन करता हूं। हे मृड, आप सतोगुण से व्याप्त सभी का पालन करने वाले हैं। आपको नमस्कार है। आप ही ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश हैं। हे परमात्मा, मैं आपको इन तीन गुणों से परे जान कर शिव रूप में नमस्कार करता हूं।

कृश-परिणति-चेतः क्लेशवश्यं क्व चेदं

क्व च तव गुण-सीमोल्लङ्घिनी शश्वदृद्धिः

इति चकितममन्दीकृत्य मां भक्तिराधाद्

वरद चरणयोस्ते वाक्य-पुष्पोपहारम्

हे शिव आप गुणातीत हैं और आपका विस्तार नित बढ़ता ही जाता है। अपनी सीमित क्षमता से मैं कैसे आपकी वंदना कर सकता हूं? पर भक्ति से ये दूरी मिट जाती है तथा मैं आपने कर कमलों में अपनी स्तुति प्रस्तुत करता हूं।

असित-गिरि-समं स्यात् कज्जलं सिन्धु-पात्रे

सुर-तरुवर-शाखा लेखनी पत्रमुर्वी

लिखति यदि गृहीत्वा शारदा सर्वकालं

तदपि तव गुणानामीश पारं न याति

”हे शिव, यदि नीले पर्वत को समुद्र में मिला कर स्याही तैयार की जाए, देवताओं के उद्यान के वृक्ष की शाखाओं को लेखनी बनाया जाए और पृथ्वीको कागद बनाकर भगवती शारदा देवी अर्थात सरस्वती देवी अनंतकाल तक लिखती रहें तब भी हे प्रभो! आपके गुणों का संपूर्ण व्याख्यान संभव नहीं होगा।”

असुर-सुर-मुनीन्द्रैरर्चितस्येन्दु-मौलेः

ग्रथित-गुणमहिम्नो निर्गुणस्येश्वरस्य

सकल-गण-वरिष्ठः पुष्पदन्ताभिधानः

रुचिरमलघुवृत्तैः स्तोत्रमेतच्चकार

इस स्तोत्र की रचना पुष्पदंत गंधर्व ने चन्द्रमौलेश्वर शिव जी के गुणगान के लिए की है जो गुणातीत हैं।

अहरहरनवद्यं धूर्जटेः स्तोत्रमेतत्

पठति परमभक्त्या शुद्ध-चित्तः पुमान् यः

स भवति शिवलोके रुद्रतुल्यस्तथाऽत्र

प्रचुरतर-धनायुः पुत्रवान् कीर्तिमांश्च


जो भी इस स्तोत्र का शुद्ध मन से नित्य पाठ करता है वह जीवन काल में विभिन्न ऐश्वर्यों का भोग करता है तथा अंततः शिवधाम को प्राप्त करता है तथा शिवतुल्य हो जाता है।

महेशान्नापरो देवो महिम्नो नापरा स्तुतिः

अघोरान्नापरो मन्त्रो नास्ति तत्त्वं गुरोः परम्


महेश से श्रेष्ठ कोई देव नहीं, महिम्न स्तोत्र से श्रेष्ठ कोई स्तोत्र नहीं, ॐ से बढकर कोई मंत्र नहीं तथा गुरु से उपर कोई सत्य नहीं।

दीक्षा दानं तपस्तीर्थं ज्ञानं

योगादिकाः क्रियाः

महिम्नस्तव पाठस्य कलां

नार्हन्ति षोडशीम्


दान, यज्ञ, ज्ञान एवं त्याग इत्यादि सत्कर्म इस स्तोत्र के पाठ के सोलहवें अंश के बराबर भी फल नहीं प्रदान कर सकते।

कुसुमदशन-नामा सर्व-गन्धर्व-राजः

शशिधरवर-मौलेर्देवदेवस्य दासः

स खलु निज-महिम्नो भ्रष्ट एवास्य रोषात्

स्तवनमिदमकार्षीद् दिव्य-दिव्यं महिम्नः


कुसुमदंत नामक गंधर्वों का राजा चंद्रमौलेश्वर शिव जी का परम भक्त था। अपने अपराध (पुष्प की चोरी) के कारण वह अपने दिव्य स्वरूप से वंचित हो गया तब उसने इस स्तोत्र की रचना कर शिव को प्रसन्न किया तथा अपने दिव्य स्वरूप को पुनः प्राप्त किया।

सुरगुरुमभिपूज्य स्वर्ग-मोक्षैक-हेतुं

पठति यदि मनुष्यः प्राञ्जलिर्नान्य-चेताः

व्रजति शिव-समीपं किन्नरैः स्तूयमानः

स्तवनमिदममोघं पुष्पदन्तप्रणीतम्


जो इस स्तोत्र का पठन करता है वो शिवलोक पाता है तथा ऋषि-मुनियों द्वारा भी पूजित हो जाता है।

आसमाप्तमिदं स्तोत्रं पुण्यं गन्धर्व-भाषितम्

अनौपम्यं मनोहारि सर्वमीश्वरवर्णनम्


पुष्पदंत रचित ये स्तोत्र दोषरहित है तथा इसका नित्य पाठ करने से परम सुख की प्राप्ति होती है।

इत्येषा वाङ्मयी पूजा श्रीमच्छङ्कर-पादयोः

अर्पिता तेन देवेशः प्रीयतां मे सदाशिवः


ये स्तोत्र शंकर भगवान को समर्पित है। प्रभु महादेव हमसे प्रसन्न हों।

तव तत्त्वं न जानामि कीदृशोऽसि महेश्वर,

यादृशोऽसि महादेव तादृशाय नमो नमः


हे शिव !!! मैं आपके वास्तविक स्वरुप को नहीं जानता। हे शिव आपके उस वास्तविक स्वरूप जिसे मैं नहीं जान सकता उसको नमस्कार है।

एककालं द्विकालं वा त्रिकालं यः पठेन्नरः

सर्वपाप-विनिर्मुक्तः शिव लोके महीयते


जो इस स्तोत्र का दिन में एक, दो या तीन बार पाठ करता है वो पाप मुक्त हो जाता है तथा शिव लोक को प्राप्त करता है।

श्री पुष्पदन्त-मुख-पंकज-निर्गतेन

स्तोत्रेण किल्बिष-हरेण हर-प्रियेण

कण्ठस्थितेन पठितेन समाहितेन

सुप्रीणितो भवति भूतपतिर्महेशः


पुष्पदंत द्वारा रचित ये स्तोत्र शिव जी को अत्यंत ही प्रिय है। इसका पाठ करने वाला अपने संचित पापों से मुक्ति पाता है।

।। इति श्री पुष्पदंत विरचितं शिवमहिम्नः स्तोत्रं समाप्तम्।।



Shri Ram Raksha Stotram

श्रीगणेशायनम:

ॐ अस्य श्रीरामरक्षास्तोत्रमन्त्रस्य बुधकौशिक ऋषि: श्रीसीतारामचंद्रोदेवता अनुष्टुप्‌छन्द: सीता शक्ति: श्रीमद्‌हनुमान्‌ कीलकम्‌ श्रीरामचंद्रप्रीत्यर्थे रामरक्षास्तोत्रजपे विनियोग: ॥

अर्थ : इस राम रक्षा स्तोत्र मंत्र के रचयिता बुध कौशिक ऋषि हैं, सीता और रामचंद्र देवता हैं, अनुष्टुप छंद हैं, सीता शक्ति हैं, हनुमान जी कीलक है तथा श्री रामचंद्र जी की प्रसन्नता के लिए राम रक्षा स्तोत्र के जप में विनियोग किया जाता हैं |

॥ अथ ध्यानम्‌ ॥

ध्यायेदाजानुबाहुं धृतशरधनुषं बद्दद्पद्‌मासनस्थं ।
पीतं वासोवसानं नवकमलदलस्पर्धिनेत्रं प्रसन्नम्‌ ॥
वामाङ्‌कारूढसीता मुखकमलमिलल्लोचनं नीरदाभं ।
नानालङ्‌कारदीप्तं दधतमुरुजटामण्डनं रामचंद्रम्‌ ॥

अर्थ : ध्यान : जो धनुष-बाण धारण किए हुए हैं, बद्दपद्मासन की मुद्रा में विराजमान हैं और पीतांबर पहने हुए हैं, जिनके आलोकित नेत्र नए कमल दल के समान स्पर्धा करते हैं, जो बाएँ ओर स्थित सीताजी के मुख कमल से मिले हुए हैं- उन आजानु बाहु, मेघश्याम,विभिन्न अलंकारों से विभूषित तथा जटाधारी श्रीराम का ध्यान करें |

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श्री राम रक्षा स्तोत्रम्   Shri Ram Raksha Stotram

वामाङ्‌कारूढसीता मुखकमलमिलल्लोचनं नीरदाभं ।

नानालङ्‌कारदीप्तं दधतमुरुजटामण्डनं रामचंद्रम्‌ ॥

ध्यात्वा नीलोत्पलश्यामं रामं राजीवलोचनम्‌ ।

जानकीलक्ष्मणॊपेतं जटामुकुटमण्डितम्‌ ॥२॥

सासितूणधनुर्बाणपाणिं नक्तं चरान्तकम्‌ ।

स्वलीलया जगत्त्रातुमाविर्भूतमजं विभुम्‌ ॥३॥

रामरक्षां पठॆत्प्राज्ञ: पापघ्नीं सर्वकामदाम्‌ ।

शिरो मे राघव: पातु भालं दशरथात्मज: ॥४॥

कौसल्येयो दृशौ पातु विश्वामित्रप्रिय: श्रुती ।

घ्राणं पातु मखत्राता मुखं सौमित्रिवत्सल: ॥५॥

जिव्हां विद्दानिधि: पातु कण्ठं भरतवंदित: ।

स्कन्धौ दिव्यायुध: पातु भुजौ भग्नेशकार्मुक: ॥६॥

करौ सीतपति: पातु हृदयं जामदग्न्यजित्‌ ।

मध्यं पातु खरध्वंसी नाभिं जाम्बवदाश्रय: ॥७॥

सुग्रीवेश: कटी पातु सक्थिनी हनुमत्प्रभु: ।

ऊरू रघुत्तम: पातु रक्ष:कुलविनाशकृत्‌ ॥८॥

जानुनी सेतुकृत्पातु जङ्‌घे दशमुखान्तक: ।

पादौ बिभीषणश्रीद: पातु रामोSखिलं वपु: ॥९॥

एतां रामबलोपेतां रक्षां य: सुकृती पठॆत्‌ ।

स चिरायु: सुखी पुत्री विजयी विनयी भवेत्‌ ॥१०॥

पातालभूतलव्योम चारिणश्छद्‌मचारिण: ।

न द्र्ष्टुमपि शक्तास्ते रक्षितं रामनामभि: ॥११॥

रामेति रामभद्रेति रामचंद्रेति वा स्मरन्‌ ।

नरो न लिप्यते पापै भुक्तिं मुक्तिं च विन्दति ॥१२॥

जगज्जेत्रैकमन्त्रेण रामनाम्नाभिरक्षितम्‌ ।

य: कण्ठे धारयेत्तस्य करस्था: सर्वसिद्द्दय: ॥१३॥

आदिष्टवान्‌ यथा स्वप्ने रामरक्षामिमां हर: ।

तथा लिखितवान्‌ प्रात: प्रबुद्धो बुधकौशिक: ॥१५॥

आराम: कल्पवृक्षाणां विराम: सकलापदाम्‌ ।

अभिरामस्त्रिलोकानां राम: श्रीमान्‌ स न: प्रभु: ॥१६॥

शरण्यौ सर्वसत्वानां श्रेष्ठौ सर्वधनुष्मताम्‌ ।

रक्ष:कुलनिहन्तारौ त्रायेतां नो रघुत्तमौ ॥१९॥

आत्तसज्जधनुषा विषुस्पृशा वक्षया शुगनिषङ्‌ग सङि‌गनौ ।

रक्षणाय मम रामलक्ष्मणा वग्रत: पथि सदैव गच्छताम्‌ ॥२०॥

संनद्ध: कवची खड्‌गी चापबाणधरो युवा ।

गच्छन्‌मनोरथोSस्माकं राम: पातु सलक्ष्मण: ॥२१॥

रामो दाशरथि: शूरो लक्ष्मणानुचरो बली ।

काकुत्स्थ: पुरुष: पूर्ण: कौसल्येयो रघुत्तम: ॥२२॥

इत्येतानि जपेन्नित्यं मद्‌भक्त: श्रद्धयान्वित: ।

अश्वमेधायुतं पुण्यं संप्राप्नोति न संशय: ॥२४॥

रामं दूर्वादलश्यामं पद्‌माक्षं पीतवाससम्‌ ।

स्तुवन्ति नामभिर्दिव्यैर्न ते संसारिणो नर: ॥२५॥

रामं लक्शमण पूर्वजं रघुवरं सीतापतिं सुंदरम्‌ ।

काकुत्स्थं करुणार्णवं गुणनिधिं विप्रप्रियं धार्मिकम्‌

राजेन्द्रं सत्यसंधं दशरथनयं श्यामलं शान्तमूर्तिम्‌ ।

वन्दे लोकभिरामं रघुकुलतिलकं राघवं रावणारिम्‌ ॥२६॥

श्रीराम राम रघुनन्दन राम राम ।

श्रीराम राम भरताग्रज राम राम ।

श्रीराम राम रणकर्कश राम राम ।

श्रीराम राम शरणं भव राम राम ॥२८॥

श्रीरामचन्द्रचरणौ मनसा स्मरामि ।

श्रीरामचन्द्रचरणौ वचसा गृणामि ।

श्रीरामचन्द्रचरणौ शिरसा नमामि ।

श्रीरामचन्द्रचरणौ शरणं प्रपद्ये ॥२९॥

माता रामो मत्पिता रामचंन्द्र: ।

स्वामी रामो मत्सखा रामचंद्र: ।

सर्वस्वं मे रामचन्द्रो दयालु ।

नान्यं जाने नैव जाने न जाने ॥३०॥

दक्षिणे लक्ष्मणो यस्य वामे तु जनकात्मजा ।

पुरतो मारुतिर्यस्य तं वन्दे रघुनंदनम्‌ ॥३१॥

लोकाभिरामं रनरङ्‌गधीरं राजीवनेत्रं रघुवंशनाथम्‌ ।

कारुण्यरूपं करुणाकरंतं श्रीरामचंद्रं शरणं प्रपद्ये ॥३२॥

मनोजवं मारुततुल्यवेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम्‌ ।

वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये ॥३३॥

कूजन्तं रामरामेति मधुरं मधुराक्षरम्‌ ।

आरुह्य कविताशाखां वन्दे वाल्मीकिकोकिलम्‌ ॥३४॥

रामो राजमणि: सदा विजयते रामं रमेशं भजे ।

रामेणाभिहता निशाचरचमू रामाय तस्मै नम: ।

रामान्नास्ति परायणं परतरं रामस्य दासोSस्म्यहम्‌ ।

रामे चित्तलय: सदा भवतु मे भो राम मामुद्धर ॥३७॥

राम रक्षा स्तोत्र हिंदी अर्थ सहित

॥ श्रीरामरक्षास्तोत्रम्‌ ॥

विनियोग:

श्रीगणेशायनम: ।

 अस्य श्रीरामरक्षास्तोत्रमन्त्रस्य ।

बुधकौशिक ऋषि: ।

श्रीसीतारामचंद्रोदेवता ।

अनुष्टुप्‌ छन्द: । सीता शक्ति: ।

 श्रीमद्‌हनुमान्‌ कीलकम्‌ ।

श्रीसीतारामचंद्रप्रीत्यर्थे जपे विनियोग: ॥

राम रक्षा स्तोत्र अर्थ: इस राम रक्षा स्तोत्र मंत्र के रचयिता ऋषि बुध कौशिक हैं, माता सीता और श्री रामचंद्र देवता हैं, अनुष्टुप छंद हैं, माता सीता शक्ति रूप हैं, हनुमान जी कीलक है तथा प्रभु रामचंद्र जी की प्रसन्नता के लिए राम रक्षा स्तोत्र ( Ram Raksha Stotra)के जप में विनियोग किया जाता हैं |

॥ अथ ध्यानम्‌ ॥

ध्यायेदाजानुबाहुं धृतशरधनुषं बद्दद्पद्‌मासनस्थं ।

पीतं वासोवसानं नवकमलदलस्पर्धिनेत्रं प्रसन्नम्‌ ॥

वामाङ्‌कारूढसीता मुखकमलमिलल्लोचनं नीरदाभं ।

नानालङ्‌कारदीप्तं दधतमुरुजटामण्डनं रामचंद्रम्‌ ॥

ध्यान कीजिये  :- प्रभु राम जो धनुष-बाण धारण किए हुए हैं,पद्मासन की मुद्रा में विराजमान हैं और पीतांबर बस्त्र पहने हुए हैं, जिनके आलोकित नेत्र नए कमल दल के समान स्पर्धा करते हैं, जो बाएँ ओर स्थित सीताजी के मुख कमल से मिले हुए हैं ।

उन आजानु बाहु, मेघश्याम,विभिन्न अलंकारों से विभूषित तथा जटाधारी श्रीराम का ध्यान करें |

॥ इति ध्यानम्‌ ॥

चरितं रघुनाथस्य शतकोटिप्रविस्तरम्‌ ।

एकैकमक्षरं पुंसां महापातकनाशनम्‌ ॥१॥

राम रक्षा स्तोत्र अर्थ: श्री रघुनाथजी का चरित्र सौ करोड़ विस्तार वाला हैं | उसका एक-एक अक्षर महापातकों को नष्ट करने वाला है |

ध्यात्वा नीलोत्पलश्यामं रामं राजीवलोचनम्‌ ।

जानकीलक्ष्मणॊपेतं जटामुकुटमण्डितम्‌ ॥२॥

राम रक्षा स्तोत्र अर्थ: नीले कमल के श्याम वर्ण वाले, कमलनेत्र वाले , जटाओं के मुकुट से सुशोभित, जानकी तथा लक्ष्मण सहित ऐसे भगवान् श्री राम का स्मरण करके,

सासितूणधनुर्बाणपाणिं नक्तं चरान्तकम्‌ ।

स्वलीलया जगत्त्रातुमाविर्भूतमजं विभुम्‌ ॥३॥

राम रक्षा स्तोत्र अर्थ: जो अजन्मा एवं सर्वव्यापक, हाथों में खड्ग, तुणीर, धनुष-बाण धारण किए राक्षसों के संहार तथा अपनी लीलाओं से जगत रक्षा हेतु अवतीर्ण श्रीराम का स्मरण करके,

रामरक्षां पठॆत्प्राज्ञ: पापघ्नीं सर्वकामदाम्‌ ।

शिरो मे राघव: पातु भालं दशरथात्मज: ॥४॥

 राम रक्षा स्तोत्र अर्थ: मैं सर्वकामप्रद और पापों को नष्ट करने वाले राम रक्षा स्तोत्र का पाठ करता हूँ | राघव मेरे सिर की और दशरथ के पुत्र मेरे ललाट की रक्षा करें |

कौसल्येयो दृशौ पातु विश्वामित्रप्रिय: श्रुती ।

घ्राणं पातु मखत्राता मुखं सौमित्रिवत्सल: ॥५॥

राम रक्षा स्तोत्र अर्थ: कौशल्या नंदन मेरे नेत्रों की, विश्वामित्र के प्रिय मेरे कानों की, यज्ञरक्षक मेरे घ्राण की और सुमित्रा के वत्सल मेरे मुख की रक्षा करें |

जिव्हां विद्दानिधि: पातु कण्ठं भरतवंदित: ।

स्कन्धौ दिव्यायुध: पातु भुजौ भग्नेशकार्मुक: ॥६॥

राम रक्षा स्तोत्र अर्थ: मेरी जिह्वा की विधानिधि रक्षा करें, कंठ की भरत-वंदित, कंधों की दिव्यायुध और भुजाओं की महादेवजी का धनुष तोड़ने वाले भगवान् श्रीराम रक्षा करें |

करौ सीतपति: पातु हृदयं जामदग्न्यजित्‌ ।

मध्यं पातु खरध्वंसी नाभिं जाम्बवदाश्रय: ॥७॥

राम रक्षा स्तोत्र अर्थ: मेरे हाथों की सीता पति श्रीराम रक्षा करें, हृदय की जमदग्नि ऋषि के पुत्र (परशुराम) को जीतने वाले, मध्य भाग की खर (नाम के राक्षस) के वधकर्ता और नाभि की जांबवान के आश्रयदाता रक्षा करें |

सुग्रीवेश: कटी पातु सक्थिनी हनुमत्प्रभु: ।

ऊरू रघुत्तम: पातु रक्ष:कुलविनाशकृत्‌ ॥८॥

 राम रक्षा स्तोत्र अर्थ: मेरे कमर की सुग्रीव के स्वामी, हडियों की हनुमान के प्रभु और रानों की राक्षस कुल का विनाश करने वाले रघुश्रेष्ठ रक्षा करें |

जानुनी सेतुकृत्पातु जङ्‌घे दशमुखान्तक: ।

पादौ बिभीषणश्रीद: पातु रामोSखिलं वपु: ॥९॥

राम रक्षा स्तोत्र अर्थ: मेरे जानुओं की सेतुकृत, जंघाओं की दशानन वधकर्ता, चरणों की विभीषण को ऐश्वर्य प्रदान करने वाले और सम्पूर्ण शरीर की श्रीराम रक्षा करें |

एतां रामबलोपेतां रक्षां य: सुकृती पठॆत्‌ ।

स चिरायु: सुखी पुत्री विजयी विनयी भवेत्‌ ॥१०॥

राम रक्षा स्तोत्र अर्थ: शुभ कार्य करने वाला जो भक्त भक्ति एवं श्रद्धा के साथ रामबल से संयुक्त होकर इस स्तोत्र का पाठ करता हैं, वह दीर्घायु, सुखी, पुत्रवान, विजयी और विनयशील हो जाता हैं |

पातालभूतलव्योम चारिणश्छद्‌मचारिण: ।

न द्र्ष्टुमपि शक्तास्ते रक्षितं रामनामभि: ॥११॥

राम रक्षा स्तोत्र अर्थ: जो जीव पाताल, पृथ्वी और आकाश में विचरते रहते हैं अथवा छद्दम वेश में घूमते रहते हैं , वे राम नामों से सुरक्षित मनुष्य को देख भी नहीं पाते |

रामेति रामभद्रेति रामचंद्रेति वा स्मरन्‌ ।

नरो न लिप्यते पापै भुक्तिं मुक्तिं च विन्दति ॥१२॥

राम रक्षा स्तोत्र अर्थ: राम, रामभद्र तथा रामचंद्र आदि नामों का स्मरण करने वाला रामभक्त पापों से लिप्त नहीं होता. इतना ही नहीं, वह अवश्य ही भोग और मोक्ष दोनों को प्राप्त करता है |

जगज्जेत्रैकमन्त्रेण रामनाम्नाभिरक्षितम्‌ ।

य: कण्ठे धारयेत्तस्य करस्था: सर्वसिद्द्दय: ॥१३॥

 राम रक्षा स्तोत्र अर्थ: जो संसार पर विजय करने वाले मंत्र राम-नाम से सुरक्षित इस स्तोत्र को कंठस्थ कर लेता हैं, उसे सम्पूर्ण सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती हैं |

वज्रपंजरनामेदं यो रामकवचं स्मरेत्‌ ।

अव्याहताज्ञ: सर्वत्र लभते जयमंगलम्‌ ॥१४॥

राम रक्षा स्तोत्र अर्थ: जो मनुष्य वज्रपंजर नामक इस राम कवच का स्मरण करता हैं, उसकी आज्ञा का कहीं भी उल्लंघन नहीं होता तथा उसे सदैव विजय और मंगल की ही प्राप्ति होती हैं |

आदिष्टवान्यथा स्वप्ने रामरक्षामिमां हर: ।

तथा लिखितवान्‌ प्रात: प्रबुद्धो बुधकौशिक: ॥१५॥

राम रक्षा स्तोत्र अर्थ: भगवान् शंकर ने स्वप्न में इस रामरक्षा स्तोत्र का आदेश बुध कौशिक ऋषि को दिया था, उन्होंने प्रातः काल जागने पर उसे वैसा ही लिख दिया |

आराम: कल्पवृक्षाणां विराम: सकलापदाम्‌ ।

अभिरामस्त्रिलोकानां राम: श्रीमान्‌ स न: प्रभु: ॥१६॥

राम रक्षा स्तोत्र अर्थ: जो कल्प वृक्षों के बगीचे के समान विश्राम देने वाले हैं, जो समस्त विपत्तियों को दूर करने वाले हैं (विराम माने थमा देना, किसको थमा देना/दूर कर देना ? सकलापदाम = सकल आपदा = सारी विपत्तियों को)  और जो तीनो लोकों में सुंदर (अभिराम + स्+ त्रिलोकानाम) हैं, वही श्रीमान राम हमारे प्रभु हैं |

तरुणौ रूपसंपन्नौ सुकुमारौ महाबलौ ।

पुण्डरीकविशालाक्षौ चीरकृष्णाजिनाम्बरौ ॥१७॥

 राम रक्षा स्तोत्र अर्थ: जो युवा,सुन्दर, सुकुमार,महाबली और कमल (पुण्डरीक) के समान विशाल नेत्रों वाले हैं, मुनियों की तरह वस्त्र एवं काले मृग का चर्म धारण करते हैं |

फलमूलशिनौ दान्तौ तापसौ ब्रह्मचारिणौ ।

पुत्रौ दशरथस्यैतौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ ॥१८॥

राम रक्षा स्तोत्र अर्थ: जो फल और कंद का आहार ग्रहण करते हैं, जो संयमी , तपस्वी एवं ब्रह्रमचारी हैं , वे दशरथ के पुत्र राम और लक्ष्मण दोनों भाई हमारी रक्षा करें |

शरण्यौ सर्वसत्वानां श्रेष्ठौ सर्वधनुष्मताम्‌ ।

रक्ष:कुलनिहन्तारौ त्रायेतां नो रघुत्तमौ ॥१९॥

राम रक्षा स्तोत्र अर्थ: ऐसे महाबली – रघुश्रेष्ठ मर्यादा पुरूषोतम समस्त प्राणियों के शरणदाता, सभी धनुर्धारियों में श्रेष्ठ और राक्षसों के कुलों का समूल नाश करने में समर्थ हमारा त्राण करें |

आत्तसज्जधनुषा विषुस्पृशा वक्षया शुगनिषङ्‌ग सङि‌गनौ ।

रक्षणाय मम रामलक्ष्मणा वग्रत: पथि सदैव गच्छताम्‌ ॥२०॥

राम रक्षा स्तोत्र अर्थ: संघान किए धनुष धारण किए, बाण का स्पर्श कर रहे, अक्षय बाणों से युक्त तुणीर लिए हुए राम और लक्ष्मण मेरी रक्षा करने के लिए मेरे आगे चलें |

संनद्ध: कवची खड्‌गी चापबाणधरो युवा ।

गच्छन्‌मनोरथोSस्माकं राम: पातु सलक्ष्मण: ॥२१॥

राम रक्षा स्तोत्र अर्थ: हमेशा तत्पर, कवचधारी, हाथ में खडग, धनुष-बाण तथा युवावस्था वाले भगवान् राम लक्ष्मण सहित आगे-आगे चलकर हमारी रक्षा करें |

रामो दाशरथि: शूरो लक्ष्मणानुचरो बली ।

काकुत्स्थ: पुरुष: पूर्ण: कौसल्येयो रघुत्तम: ॥२२॥

राम रक्षा स्तोत्र अर्थ: भगवान् का कथन है की श्रीराम, दाशरथी, शूर, लक्ष्मनाचुर, बली, काकुत्स्थ , पुरुष, पूर्ण, कौसल्येय, रघुतम,

वेदान्तवेद्यो यज्ञेश: पुराणपुरुषोत्तम: ।

जानकीवल्लभ: श्रीमानप्रमेय पराक्रम: ॥२३॥

राम रक्षा स्तोत्र अर्थ: वेदान्त्वेघ, यज्ञेश,पुराण पुरूषोतम , जानकी वल्लभ, श्रीमान और अप्रमेय पराक्रम आदि नामों का

इत्येतानि जपेन्नित्यं मद्‌भक्त: श्रद्धयान्वित: ।

अश्वमेधाधिकं पुण्यं संप्राप्नोति न संशय: ॥२४॥

राम रक्षा स्तोत्र अर्थ: नित्यप्रति श्रद्धापूर्वक जप करने वाले को निश्चित रूप से अश्वमेध यज्ञ से भी अधिक फल प्राप्त होता हैं |

रामं दूर्वादलश्यामं पद्‌माक्षं पीतवाससम्‌ ।

स्तुवन्ति नामभिर्दिव्यैर्न ते संसारिणो नर: ॥२५॥

राम रक्षा स्तोत्र अर्थ: दूर्वादल के समान श्याम वर्ण, कमल-नयन एवं पीतांबरधारी श्रीराम की उपरोक्त दिव्य नामों से स्तुति करने वाला संसारचक्र में नहीं पड़ता |

रामं लक्शमण पूर्वजं रघुवरं सीतापतिं सुंदरम्‌ ।

काकुत्स्थं करुणार्णवं गुणनिधिं विप्रप्रियं धार्मिकम्‌

राजेन्द्रं सत्यसंधं दशरथनयं श्यामलं शान्तमूर्तिम्‌ ।

वन्दे लोकभिरामं रघुकुलतिलकं राघवं रावणारिम्‌ ॥२६॥

राम रक्षा स्तोत्र अर्थ: लक्ष्मण जी के पूर्वज , सीताजी के पति, काकुत्स्थ, कुल-नंदन, करुणा के सागर , गुण-निधान , विप्र भक्त, परम धार्मिक , राजराजेश्वर, सत्यनिष्ठ, दशरथ के पुत्र, श्याम और शांत मूर्ति, सम्पूर्ण लोकों में सुन्दर, रघुकुल तिलक , राघव एवं रावण के शत्रु भगवान् राम की मैं वंदना करता हूँ |

रामाय रामभद्राय रामचंद्राय वेधसे ।

रघुनाथाय नाथाय सीताया: पतये नम: ॥२७॥

राम रक्षा स्तोत्र अर्थ: राम, रामभद्र, रामचंद्र, विधात स्वरूप , रघुनाथ, प्रभु एवं सीताजी के स्वामी की मैं वंदना करता हूँ |

श्रीराम राम रघुनन्दन राम राम ।

श्रीराम राम भरताग्रज राम राम ।

श्रीराम राम रणकर्कश राम राम ।

श्रीराम राम शरणं भव राम राम ॥२८॥

राम रक्षा स्तोत्र अर्थ: हे रघुनन्दन श्रीराम ! हे भरत के अग्रज भगवान् राम! हे रणधीर, मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ! आप मुझे शरण दीजिए |

श्रीरामचन्द्रचरणौ मनसा स्मरामि ।

श्रीरामचन्द्रचरणौ वचसा गृणामि ।

श्रीरामचन्द्रचरणौ शिरसा नमामि ।

श्रीरामचन्द्रचरणौ शरणं प्रपद्ये ॥२९॥

राम रक्षा स्तोत्र अर्थ: मैं एकाग्र मन से श्रीरामचंद्रजी के चरणों का स्मरण और वाणी से गुणगान करता हूँ, वाणी द्धारा और पूरी श्रद्धा के साथ भगवान् रामचन्द्र के चरणों को प्रणाम करता हुआ मैं उनके चरणों की शरण लेता हूँ |

माता रामो मत्पिता रामचंन्द्र: ।

स्वामी रामो मत्सखा रामचंद्र: ।

सर्वस्वं मे रामचन्द्रो दयालु ।

नान्यं जाने नैव जाने न जाने ॥३०॥

राम रक्षा स्तोत्र अर्थ: श्रीराम मेरे माता, मेरे पिता , मेरे स्वामी और मेरे सखा हैं | इस प्रकार दयालु श्रीराम मेरे सर्वस्व हैं. उनके सिवा में किसी दुसरे को नहीं जानता |

दक्षिणे लक्ष्मणो यस्य वामे तु जनकात्मजा ।

पुरतो मारुतिर्यस्य तं वन्दे रघुनंदनम्‌ ॥३१॥

राम रक्षा स्तोत्र अर्थ: जिनके दाईं और लक्ष्मण जी, बाईं और जानकी जी और सामने हनुमान ही विराजमान हैं, मैं उन्ही रघुनाथ जी की वंदना करता हूँ |

लोकाभिरामं रनरङ्‌गधीरं राजीवनेत्रं रघुवंशनाथम्‌ ।

कारुण्यरूपं करुणाकरंतं श्रीरामचंद्रं शरणं प्रपद्ये ॥३२॥

राम रक्षा स्तोत्र अर्थ: मैं सम्पूर्ण लोकों में सुन्दर तथा रणक्रीड़ा में धीर, कमलनेत्र, रघुवंश नायक, करुणा की मूर्ति और करुणा के भण्डार की श्रीराम की शरण में हूँ |

मनोजवं मारुततुल्यवेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम्‌ ।

वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये ॥३३॥

राम रक्षा स्तोत्र अर्थ: जिनकी गति मन के समान और वेग वायु के समान (अत्यंत तेज) है, जो परम जितेन्द्रिय एवं बुद्धिमानों में श्रेष्ठ हैं, मैं उन पवन-नंदन वानारग्रगण्य श्रीराम दूत की शरण लेता हूँ |

कूजन्तं रामरामेति मधुरं मधुराक्षरम्‌ ।

आरुह्य कविताशाखां वन्दे वाल्मीकिकोकिलम्‌ ॥३४॥

राम रक्षा स्तोत्र अर्थ: मैं कवितामयी डाली पर बैठकर, मधुर अक्षरों वाले ‘राम-राम’ के मधुर नाम को कूजते हुए वाल्मीकि रुपी कोयल की वंदना करता हूँ |

आपदामपहर्तारं दातारं सर्वसंपदाम्‌ ।

लोकाभिरामं श्रीरामं भूयो भूयो नमाम्यहम्‌ ॥३५॥

राम रक्षा स्तोत्र अर्थ: मैं इस संसार के प्रिय एवं सुन्दर उन भगवान् राम को बार-बार नमन करता हूँ, जो सभी आपदाओं को दूर करने वाले तथा सुख-सम्पति प्रदान करने वाले हैं |

भर्जनं भवबीजानामर्जनं सुखसंपदाम्‌ ।

तर्जनं यमदूतानां रामरामेति गर्जनम्‌ ॥३६॥

राम रक्षा स्तोत्र अर्थ: ‘राम-राम’ का जप करने से मनुष्य के सभी कष्ट समाप्त हो जाते हैं | वह समस्त सुख-सम्पति तथा ऐश्वर्य प्राप्त कर लेता हैं | राम-राम की गर्जना से यमदूत सदा भयभीत रहते हैं |

रामो राजमणि: सदा विजयते रामं रमेशं भजे ।

रामेणाभिहता निशाचरचमू रामाय तस्मै नम: ।

रामान्नास्ति परायणं परतरं रामस्य दासोSस्म्यहम्‌ ।

रामे चित्तलय: सदा भवतु मे भो राम मामुद्धर ॥३७॥

राम रक्षा स्तोत्र अर्थ: राजाओं में श्रेष्ठ श्रीराम सदा विजय को प्राप्त करते हैं | मैं लक्ष्मीपति भगवान् श्रीराम का भजन करता हूँ | सम्पूर्ण राक्षस सेना का नाश करने वाले श्रीराम को मैं नमस्कार करता हूँ |

श्रीराम के समान अन्य कोई आश्रयदाता नहीं | मैं उन शरणागत वत्सल का दास हूँ | मैं हमेशा श्रीराम मैं ही लीन रहूँ | हे श्रीराम! आप मेरा (इस संसार सागर से) उद्धार करें |

राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे ।

सहस्रनाम तत्तुल्यं रामनाम वरानने ॥३८॥

राम रक्षा स्तोत्र अर्थ: शिव पार्वती से बोले – हे सुमुखी ! राम- नाम ‘विष्णु सहस्त्रनाम’ के समान है | मैं सदा राम का स्तवन करता हूँ और राम-नाम में ही रमण करता हूँ |

इति श्रीबुधकौशिकविरचितं श्रीराम रक्षा स्तोत्र संपूर्णम्‌ ॥

॥ श्री सीतारामचंद्रार्पणमस्तु ॥

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