नवग्रह स्तोत्र (Navagraha Stotram) – अर्थ, महत्त्व और संपूर्ण पाठ
नवग्रह स्तोत्र (Navagraha Stotram) हिंदू धर्म का एक अत्यंत प्रभावशाली और पवित्र स्तोत्र है। इसकी रचना महर्षि वेदव्यास ने नौ ग्रहों (नवग्रहों) को शांत करने और उनकी कृपा प्राप्त करने के लिए की थी। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, मनुष्य के जीवन में सुख-दुःख ग्रहों की चाल पर निर्भर करते हैं। इस स्तोत्र का नियमित पाठ करने से कुंडली के ग्रह दोष दूर होते हैं।
नवग्रह स्तोत्र के बारे में (About)
नवग्रह स्तोत्र संस्कृत भाषा में रचित है और इसमें नौ श्लोक हैं, जो क्रमशः सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु और केतु को समर्पित हैं। इसे ‘ग्रह शांति’ का एक अचूक उपाय माना जाता है। चाहे शनि की साढ़ेसाती हो या राहु-केतु का दोष, श्रद्धालु सदियों से इस स्तोत्र का पाठ करके राहत और मानसिक शांति प्राप्त करते आ रहे हैं।
इतिहास (History)
इस दिव्य स्तोत्र की रचना महर्षि वेदव्यास (Maharishi Veda Vyasa) ने की थी। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, व्यास जी ने मानव कल्याण के लिए वेदों और पुराणों के साथ-साथ ऐसे स्तोत्रों की रचना भी की जो आम जनमानस को दैवीय प्रकोपों से बचा सकें। ‘नवग्रह स्तोत्र’ में ऋषि व्यास ने यह आश्वासन दिया है कि इसका पाठ करने से न केवल ग्रहों की पीड़ा शांत होती है, बल्कि चोर, अग्नि और बुरे सपनों का भय भी मिट जाता है।
नवग्रह स्तोत्र (मूल संस्कृत और हिंदी अर्थ)
१. सूर्य (Sun)
मूल श्लोक: जपाकुसुम संकाशं काश्यपेयं महद्युतिम् ।
तमोऽरिं सर्वपापघ्नं प्रणतोऽस्मि दिवाकरम् ॥ १ ॥
हिंदी अर्थ:
जिनकी कांति गुडहल (जपा) के फूल के समान लाल है, जो कश्यप ऋषि के पुत्र हैं, जो महातेजस्वी हैं, अंधकार के शत्रु हैं और सब पापों का नाश करने वाले हैं, उन सूर्य देव (दिवाकर) को मैं प्रणाम करता हूँ।
२. चन्द्र (Moon)
मूल श्लोक: दधिशंखतुषाराभं क्षीरोदार्णव सम्भवम् ।
नमामि शशिनं सोमं शम्भोर्मुकुट भूषणम् ॥ २ ॥
हिंदी अर्थ:
जिनका रंग दही, शंख और बर्फ (तुषार) के समान श्वेत है, जो क्षीरसागर से उत्पन्न हुए हैं और भगवान शिव के मुकुट की शोभा हैं, उन चन्द्र देव (सोम) को मैं नमस्कार करता हूँ।
३. मंगल (Mars)
मूल श्लोक: धरणीगर्भ संभूतं विद्युत्कान्ति समप्रभम् ।
कुमारं शक्तिहस्तं तं मंगलं प्रणमाम्यहम् ॥ ३ ॥
हिंदी अर्थ:
जो पृथ्वी देवी के गर्भ से उत्पन्न हुए हैं, जिनकी चमक बिजली की कौंध के समान है, जो कुमार स्वरूप हैं और हाथों में शक्ति (आयुध) धारण करते हैं, उन मंगल देव को मैं प्रणाम करता हूँ।
४. बुध (Mercury)
मूल श्लोक: प्रियंगुकलिकाश्यामं रूपेणाप्रतिमं बुधम् ।
सौम्यं सौम्यगुणोपेतं तं बुधं प्रणमाम्यहम् ॥ ४ ॥
हिंदी अर्थ:
जिनका वर्ण ‘प्रियंगु’ की कली के समान गहरा साँवला है, जिनका रूप अनुपम है, जो सौम्य हैं और सौम्य गुणों से संपन्न हैं, उन बुध देव को मैं प्रणाम करता हूँ।
५. गुरु (Jupiter)
मूल श्लोक: देवानांच ऋषीणांच गुरुं कांचनसन्निभम् ।
बुद्धिभूतं त्रिलोकेशं तं नमामि बृहस्पतिम् ॥ ५ ॥
हिंदी अर्थ:
जो देवताओं और ऋषियों के गुरु हैं, जिनकी आभा सोने (कांचन) के समान है, जो साक्षात बुद्धि के स्वरूप हैं और तीनों लोकों के स्वामी हैं, उन बृहस्पति देव को मैं नमन करता हूँ।
६. शुक्र (Venus)
मूल श्लोक: हिमकुन्दमृणालाभं दैत्यानां परमं गुरुम् ।
सर्वशास्त्रप्रवक्तारं भार्गवं प्रणमाम्यहम् ॥ ६ ॥
हिंदी अर्थ:
जिनकी कांति बर्फ, कुंद के फूल और कमलनाल (मृणाल) के समान श्वेत है, जो दैत्यों के परम गुरु हैं और सभी शास्त्रों के ज्ञाता/वक्ता हैं, उन भार्गव (शुक्र) को मैं प्रणाम करता हूँ।
७. शनि (Saturn)
मूल श्लोक: नीलांजनसमाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम् ।
छायामार्तण्ड संभूतं तं नमामि शनैश्चरम् ॥ ७ ॥
हिंदी अर्थ:
जिनकी आभा नीले अंजन (काजल) के समान है, जो सूर्यपुत्र हैं और यमराज के बड़े भाई हैं, जो छाया और सूर्य (मार्तण्ड) से उत्पन्न हुए हैं, उन शनि देव को मैं नमन करता हूँ।
८. राहु (Rahu)
मूल श्लोक: अर्धकायं महावीर्यं चन्द्रादित्य विमर्दनम् ।
सिंहिकागर्भसंभूतं तं राहुं प्रणमाम्यहम् ॥ ८ ॥
हिंदी अर्थ:
जिनका शरीर आधा है, जो महापराक्रमी हैं, जो सूर्य और चन्द्रमा को भी पीड़ित (ग्रहण) करते हैं और सिंहिका के गर्भ से उत्पन्न हुए हैं, उन राहु को मैं प्रणाम करता हूँ।
९. केतु (Ketu)
मूल श्लोक: पलाशपुष्पसंकाशं तारकाग्रहमस्तकम् ।
रौद्रं रौद्रात्मकं घोरं तं केतुं प्रणमाम्यहम् ॥ ९ ॥
हिंदी अर्थ:
जिनकी चमक पलाश के फूल के समान (धूम्र/लाल) है, जो तारों और ग्रहों में प्रधान हैं, जो रौद्र रूप वाले और भयानक हैं, उन केतु को मैं प्रणाम करता हूँ।
फलश्रुति (Benefits)
इति व्यासमुखोद्गीतं यः पठेत् सुसमाहितः ।
दिवा वा यदि वा रात्रौ विघ्नशान्तिर्भविष्यति ॥
नरनारीनृपाणांच भवेत् दुःस्वप्ननाशनम् ।
ऐश्वर्यमतुलं तेषां आरोग्यं पुष्टिवर्धनम् ॥
अर्थ:
व्यास जी के मुख से निकले इस स्तोत्र का जो भी व्यक्ति एकाग्रचित्त होकर (दिन या रात में) पाठ करता है, उसकी सभी बाधाएं शांत हो जाती हैं। स्त्री, पुरुष या राजा—सभी के बुरे सपने नष्ट हो जाते हैं और उन्हें अतुलनीय ऐश्वर्य, आरोग्य और पुष्टि (बल) की प्राप्ति होती है। व्यास जी कहते हैं कि इसमें कोई संदेह नहीं है।
रोचक तथ्य (Trivia)
रचयिता: इस स्तोत्र के रचयिता महर्षि वेदव्यास हैं, जिन्होंने महाभारत की रचना भी की थी।
पुष्प उपमा: सूर्य देव के लिए ‘जपाकुसुम’ (गुडहल) और केतु के लिए ‘पलाश पुष्प’ की उपमा का प्रयोग उनके रंग और तीव्रता को दर्शाने के लिए किया गया है।
शनि-यम संबंध: इस स्तोत्र में शनि देव को ‘यमाग्रज’ (यमराज का बड़ा भाई) कहकर संबोधित किया गया है, जो सूर्य की संतानों के रूप में उनके संबंध को दर्शाता है।
सुरक्षा कवच: फलश्रुति में विशेष रूप से उल्लेख है कि यह ‘दुःस्वप्न नाशनम्’ है, यानी यह बुरे सपनों और अज्ञात भय को दूर करता है।
शिव पंचाक्षर स्तोत्र – अर्थ और बोल | Shiv Panchakshar Stotra Lyrics & Meaning in Hindi
शिव पंचाक्षर स्तोत्र (Shiv Panchakshar Stotra)
रचयिता: आदि शंकराचार्य (Adi Shankaracharya)
परिचय (About)
शिव पंचाक्षर स्तोत्र भगवान शिव की उपासना में रचित सबसे लोकप्रिय और प्रभावशाली स्तोत्रों में से एक है। इसकी रचना आदि शंकराचार्य ने की थी। यह स्तोत्र भगवान शिव के पंचाक्षर मंत्र ‘नमः शिवाय’ पर आधारित है। इसमें कुल 5 मुख्य श्लोक हैं, और प्रत्येक श्लोक मंत्र के एक अक्षर (न, म, शि, वा, य) को समर्पित है। यह न केवल भक्ति का प्रतीक है, बल्कि यह पंचतत्वों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) के साथ शिव के संबंध को भी दर्शाता है।
Panchaksharamidam punyam yah pathechchiva sannidhau,
Shivalokamavapnoti shivena saha modate.
इतिहास (History)
शिव पंचाक्षर स्तोत्र की रचना 8वीं शताब्दी के महान दार्शनिक आदि शंकराचार्य द्वारा की गई थी। उस समय भारत में कई मत-मतांतर प्रचलित थे, और शंकराचार्य ने अद्वैत वेदांत और पंचायतन पूजा को पुनः स्थापित किया। उन्होंने वेदों के सार को आम जनमानस तक पहुँचाने के लिए सरल संस्कृत में कई स्तोत्र रचे। यह स्तोत्र यजुर्वेद में वर्णित ‘नमः शिवाय’ मंत्र की व्याख्या करता है।
अर्थ विश्लेषण (Meaning Analysis)
‘न’ कार (पृथ्वी तत्व): जो नागराज को हार के रूप में धारण करते हैं, जिनके तीन नेत्र हैं, और जो भस्म लगाए हुए हैं। ऐसे ‘न’ अक्षर स्वरूप भगवान शिव को नमस्कार है।
‘म’ कार (जल तत्व): जो गंगाजल और चंदन से सुशोभित हैं, जो नंदी और गणों के स्वामी हैं, और मंदार पुष्पों से पूजे जाते हैं। ऐसे ‘म’ अक्षर स्वरूप शिव को नमस्कार है।
‘शि’ कार (अग्नि तत्व): जो माता पार्वती (गौरी) के मुख कमल को खिलाने के लिए सूर्य समान हैं, जिन्होंने दक्ष के यज्ञ का नाश किया, और जिनका कंठ नीला है। ऐसे ‘शि’ अक्षर स्वरूप शिव को नमस्कार है।
‘व’ कार (वायु तत्व): जिनकी पूजा वसिष्ठ, अगस्त्य और गौतम जैसे महान ऋषि करते हैं, और जिनके नेत्र सूर्य, चंद्रमा और अग्नि हैं। ऐसे ‘व’ अक्षर स्वरूप शिव को नमस्कार है।
‘य’ कार (आकाश तत्व): जो यक्ष का रूप धारण करने वाले (या यक्षों द्वारा पूजित), जटाधारी, हाथ में पिनाक धनुष लिए हुए सनातन देव हैं। ऐसे ‘य’ अक्षर स्वरूप शिव को नमस्कार है।
रोचक तथ्य (Trivia)
यह स्तोत्र ‘नमः शिवाय’ मंत्र के प्रत्येक अक्षर (न, म, शि, वा, य) पर आधारित है।
माना जाता है कि इन 5 श्लोकों का संबंध पंचमहाभूतों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) से है।
आदि शंकराचार्य ने 8वीं शताब्दी में अद्वैत वेदांत के प्रचार के दौरान इसकी रचना की थी।
इस स्तोत्र को शिव मानस पूजा और शिव तांडव स्तोत्र के साथ भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए सबसे प्रभावी माना जाता है।
सिद्ध कुंजिका स्तोत्रम् (Siddha Kunjika Stotram) – अर्थ और महत्व
सिद्ध कुंजिका स्तोत्रम्: दुर्गा सप्तशती की गुप्त कुंजी
कलाकार/स्रोत: परंपरागत (रुद्रयामल तन्त्र)
परिचय (About)
सिद्ध कुंजिका स्तोत्र (Siddha Kunjika Stotram) हिंदू धर्म में शाक्त परंपरा का एक अत्यंत प्रभावशाली और पवित्र स्तोत्र है। रुद्रयामल तंत्र के अंतर्गत गौरी तंत्र में वर्णित यह स्तोत्र भगवान शिव द्वारा माता पार्वती को प्रदान किया गया था। ‘कुंजिका’ का अर्थ है चाबी। शास्त्रों के अनुसार, दुर्गा सप्तशती के मंत्र कीलित (locked) हैं। सिद्ध कुंजिका स्तोत्र का पाठ उन मंत्रों के कीलन को हटाकर उनकी सुप्त शक्ति को जगाता है।
इतिहास (History)
इस स्तोत्र का उद्गम रुद्रयामल तन्त्र से है। यह भगवान शिव और पार्वती के संवाद के रूप में है। शिव जी, देवी पार्वती को बताते हैं कि यह स्तोत्र देवताओं के लिए भी दुर्लभ है और इसे अत्यंत गुप्त रखा जाना चाहिए। यह दुर्गा सप्तशती पाठ का सार तत्व है।
सिद्ध कुंजिका स्तोत्रम् (मूल पाठ)
शिव उवाच
शृणु देवि प्रवक्ष्यामि, कुंजिकास्तोत्रमुत्तमम्।
येन मन्त्रप्रभावेण चण्डीजापः शुभो भवेत्॥१॥
न कवचं नार्गलास्तोत्रं कीलकं न रहस्यकम्।
न सूक्तं नापि ध्यानं च न न्यासो न च वार्चनम्॥२॥
कुंजिकापाठमात्रेण दुर्गापाठफलं लभेत्।
अति गुह्यतरं देवि देवानामपि दुर्लभम्॥३॥
गोपनीयं प्रयत्नेन स्वयोनिरिव पार्वति।
मारणं मोहनं वश्यं स्तम्भनोच्चाटनादिकम्।
पाठमात्रेण संसिद्ध्येत् कुंजिकास्तोत्रमुत्तमम्॥४॥
अथ मन्त्रः
सिद्ध कुंजिका स्तोत्र केवल शब्दों का संग्रह नहीं, बल्कि बीजाक्षरों का एक विद्युत-पुंज है।
सर्वोपरि महत्व: भगवान शिव कहते हैं कि इस स्तोत्र के पाठ से कवच, अर्गला, कीलक, ध्यान, और न्यास की आवश्यकता गौण हो जाती है, क्योंकि यह ‘कुंजी’ सीधे शक्ति को खोल देती है।
बीजाक्षर रहस्य:
ऐं (Aim): यह वाग्बीज है, जो ज्ञान और सृष्टि का प्रतीक है।
ह्रीं (Hreem): यह मायाबीज है, जो भुवनेश्वरश्वरी और पालन शक्ति का प्रतीक है।
क्लीं (Kleem): यह कामबीज है, जो आकर्षण और इच्छा पूर्ति का प्रतीक है।
चेतावनी: अंतिम श्लोक चेतावनी देता है कि कुंजिका के बिना सप्तशती का पाठ ‘अरण्य रोदन’ (जंगल में रोने) के समान व्यर्थ हो सकता है।
रोचक तथ्य (Trivia)
📚 समय की बचत: नवरात्रि में समयाभाव होने पर, भक्त अक्सर पूर्ण चंडी पाठ के विकल्प के रूप में केवल ‘सिद्ध कुंजिका स्तोत्र’ का पाठ करते हैं।
🔐 गुप्त साधना: इसे ‘स्वयोनिरिव’ गुप्त रखने को कहा गया है, जिसका अर्थ है कि यह अत्यंत व्यक्तिगत साधना है।
🔥 अग्नि तत्व: इसमें ‘ज्वालय ज्वालय’ जैसे शब्दों का प्रयोग अग्नि तत्व को प्रज्वलित करने और नकारात्मकता को भस्म करने के लिए किया गया है।
श्रीरामरक्षास्तोत्रम् (Ram Raksha Stotra) – अर्थ और महात्म्य
श्रीरामरक्षास्तोत्रम् (Ram Raksha Stotra): सुरक्षा और भक्ति का दिव्य कवच
रचियता: बुधकौशिक ऋषि (Budha Kaushika Rishi)
श्रीरामरक्षास्तोत्रम्, जिसे भगवान राम का ‘रक्षा कवच’ भी कहा जाता है, वैदिक परंपरा के सबसे शक्तिशाली और लोकप्रिय स्तोत्रों में से एक है। यह स्तोत्र न केवल मन को शांति देता है, बल्कि भक्त को हर प्रकार की विपत्तियों से सुरक्षित भी रखता है।
श्रीरामरक्षास्तोत्रम् की रचना बुधकौशिक ऋषि द्वारा वैदिक काल में की गई थी। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान शिव (शंकर) ने स्वयं बुधकौशिक ऋषि के स्वप्न में आकर उन्हें यह शक्तिशाली स्तोत्र सुनाया था। ऋषि ने सुबह जागने पर तुरंत उस दिव्य स्तोत्र को भोजपत्र पर लिख लिया। यह घटना इस स्तोत्र की दिव्यता और प्रमाणिकता को सिद्ध करती है।
ℹ️ परिचय (About)
यह भगवान श्री राम को समर्पित एक अत्यंत शक्तिशाली स्तोत्र है। ‘रक्षा’ का अर्थ है सुरक्षा, और इस स्तोत्र का पाठ करने से भक्त को श्री राम का दिव्य संरक्षण प्राप्त होता है। इसमें भगवान राम के विभिन्न नामों और उनके गुणों का वर्णन किया गया है।
🧐 अर्थ और विश्लेषण (Meaning Analysis)
श्रीरामरक्षास्तोत्रम् का अर्थ अत्यंत गहरा है। इसे मुख्य रूप से एक ‘वज्र-पंजर’ (अभेद्य कवच) के रूप में देखा जाता है।
कवच भाग: श्लोक 4 से 9 तक भक्त भगवान के विभिन्न नामों का स्मरण करते हुए शरीर के अंगों की सुरक्षा मांगता है। जैसे, “मेरे कंठ की रक्षा भरत-वंदित (राम) करें”।
राम नाम का महत्व: यह स्तोत्र सिखाता है कि राम का नाम ही कलयुग में सबसे बड़ा सहारा है। अंतिम श्लोक में बताया गया है कि “राम” नाम का तीन बार जाप करना विष्णु सहस्त्रनाम के 1000 नामों के बराबर फल देता है।
💡 रोचक तथ्य (Trivia)
यह उन दुर्लभ स्तोत्रों में से है जिसकी रचना जाग्रत अवस्था में नहीं, बल्कि स्वप्न में प्राप्त ज्ञान के आधार पर हुई।
इसका अंतिम श्लोक (“राम रामेति…”) भगवान शिव द्वारा माता पार्वती को बताया गया था।
इसे ‘वज्रपंजर’ भी कहा जाता है, जिसका अर्थ है ‘हीरे का पिंजरा’, जिसे कोई अस्त्र-शस्त्र नहीं भेद सकता।
इस स्तोत्र के पाठ में हनुमान जी को ‘कीलक’ (स्तंभ) माना गया है।
जय अम्बे गौरी आरती – अनुराधा पौडवाल | Jai Ambe Gauri Lyrics & Meaning
जय अम्बे गौरी आरती: लिरिक्स और अर्थ
कलाकार: अनुराधा पौडवाल (Anuradha Paudwal) | शैली: भक्ति संगीत
यह पृष्ठ प्रसिद्ध दुर्गा आरती ‘जय अम्बे गौरी’ को समर्पित है। यहाँ आप इसके हिंदी लिरिक्स, रोमन लिप्यंतरण, और इसके गहरे अर्थ को पढ़ सकते हैं।
🎵 जय अम्बे गौरी लिरिक्स (Hindi Lyrics)
जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी।
तुमको निशिदिन ध्यावत, हरि ब्रह्मा शिवरी॥
मांग सिन्दूर विराजत, टीको मृगमद को।
उज्ज्वल से दो नैना, चन्द्रवदन नीको॥
कनक समान कलेवर, रक्ताम्बर राजै।
रक्तपुष्प गल माला, कण्ठन पर साजै॥
केहरि वाहन राजत, खड्ग खप्पर धारी।
सुर-नर-मुनिजन सेवत, तिनके दुखहारी॥
कानन कुण्डल शोभित, नासाग्रे मोती।
कोटिक चन्द्र दिवाकर, राजत सम ज्योति॥
शुम्भ-निशुम्भ विदारे, महिषासुर घाती।
धूम्रविलोचन नैना, निशदिन मदमाती॥
चण्ड-मुण्ड संहारे, शोणित बीज हरे।
मधु-कैटभ दोउ मारे, सुर भयहीन करे॥
ब्रह्माणी, रुद्राणी, तुम कमला रानी।
आगम निगम बखानी, तुम शिव पटरानी॥
चौंसठ योगिनी मंगल गावत, नृत्य करत भैरों।
बाजत ताल मृदंगा, अरु बाजत डमरू॥
तुम ही जग की माता, तुम ही हो भरता।
भक्तन की दुख हरता, सुख सम्पत्ति करता॥
भुजा चार अति शोभित, वरमुद्रा धारी।
मनवांछित फल पावत, सेवत नर नारी॥
कंचन थाल विराजत, अगर कपूर बाती।
श्रीमालकेतु में राजत, कोटि रतन ज्योति॥
श्री अम्बेजी की आरती, जो कोई नर गावे।
कहत शिवानन्द स्वामी, सुख-सम्पत्ति पावे॥
📖 Romanized Lyrics
Jai Ambe Gauri, Maiya Jai Shyama Gauri.
Tumko Nishidin Dhyavat, Hari Brahma Shivri.
Mang Sindoor Virajat, Tiko Mrigmad Ko.
Ujjwal Se Do Naina, Chandravadan Neeko.
Kanak Saman Kalevar, Raktambar Raje.
Raktapushp Gal Mala, Kanthan Par Saje.
Kehari Vahan Rajat, Khadg Khappar Dhari.
Sur-Nar-Munijan Sevat, Tinke Dukhhari.
Kanan Kundal Shobhit, Nasagre Moti.
Kotik Chandra Divaker, Rajat Sam Jyoti.
Shumbh-Nishumbh Vidare, Mahishasur Ghati.
Dhumravilochan Naina, Nishadin Madmati.
Chand-Mund Sanhare, Shonit Beej Hare.
Madhu-Kaitabh Dou Mare, Sur Bhayheen Kare.
Brahmani, Rudrani, Tum Kamala Rani.
Agam Nigam Bakhani, Tum Shiv Patrani.
Chausath Yogini Mangal Gavat, Nritya Karat Bhairon.
Bajat Tal Mridanga, Aru Bajat Damru.
Tum Hi Jag Ki Mata, Tum Hi Ho Bharta.
Bhaktan Ki Dukh Harta, Sukh Sampatti Karta.
Bhuja Char Ati Shobhit, Varamudra Dhari.
Manvanchhit Phal Pavat, Sevat Nar Nari.
Kanchan Thal Virajat, Agar Kapoor Bati.
Shrimalketu Mein Rajat, Koti Ratan Jyoti.
Shri Ambeji Ki Aarti, Jo Koi Nar Gave.
Kahat Shivanand Swami, Sukh-Sampatti Pave.
🕉️ आरती का इतिहास (History)
यह आरती ‘जय अम्बे गौरी’ हिंदू धर्म में देवी दुर्गा की उपासना का एक प्रधान अंग है। सदियों से मंदिरों और घरों में, विशेषकर नवरात्रि के पावन पर्व पर इसे गाया जाता है। आरती के रचयिता के रूप में ‘शिवानन्द स्वामी’ का नाम आता है, जैसा कि अंतिम छंद में उल्लेखित है। अनुराधा पौडवाल, जिन्हें भक्ति संगीत की सम्राज्ञी माना जाता है, ने इसे अपनी सुरीली आवाज देकर अमर कर दिया है। 90 के दशक में टी-सीरीज (T-Series) द्वारा जारी किए गए भक्ति एल्बमों के माध्यम से यह संस्करण अत्यंत लोकप्रिय हुआ।
ℹ️ गीत के बारे में (About)
यह आरती माँ दुर्गा की महिमा, उनके रूप और उनकी शक्तियों का वर्णन करती है। अनुराधा पौडवाल का गायन अत्यंत भावपूर्ण और स्पष्ट है, जो श्रोता को भक्ति रस में सराबोर कर देता है। इसमें देवी के सौम्य रूप (गौरी) और संहारक रूप (महिषासुर मर्दिनी) दोनों का संतुलन है। वाद्य यंत्रों में पारंपरिक घंटियों, मृदंग और शंख का उपयोग इसे एक पूर्ण धार्मिक अनुभव बनाता है।
🧐 भावार्थ (Meaning Analysis)
दिव्य स्वरूप: आरती की शुरुआत में माता के सुंदर रूप का वर्णन है—स्वर्ण समान शरीर (कनक समान कलेवर), लाल वस्त्र (रक्ताम्बर), और गले में लाल फूलों की माला।
असुर संहारक: मध्य भाग में माता की वीरता का गान है। उन्होंने शुम्भ-निशुम्भ, महिषासुर, चण्ड-मुण्ड, और मधु-कैटभ जैसे भयानक राक्षसों का वध करके देवताओं को भयमुक्त किया।
त्रिशक्ति: माता को ब्रह्माणी (सरस्वती), रुद्राणी (पार्वती) और कमला रानी (लक्ष्मी) के रूप में संबोधित किया गया है, जो दर्शाता है कि वे ही सर्वोच्च शक्ति हैं।
फलश्रुति: अंत में, आरती करने का फल बताया गया है—सुख और संपत्ति की प्राप्ति। यह केवल एक गीत नहीं, बल्कि मनवांछित फल पाने की प्रार्थना है।
💡 रोचक तथ्य (Trivia)
रचनाकार: आरती की अंतिम पंक्ति “कहत शिवानन्द स्वामी” से पता चलता है कि इसके मूल रचयिता स्वामी शिवानन्द थे।
लोकप्रियता: उत्तर भारत में शायद ही कोई ऐसा दुर्गा मंदिर हो जहाँ सुबह-शाम यह आरती न गाई जाती हो।
धुन: इस आरती की गायन शैली और मीटर (meter) प्रसिद्ध आरती “ओम जय जगदीश हरे” के समान है।
योगिनी: “चौंसठ योगिनी” का संदर्भ तांत्रिक परंपराओं से जुड़ा है, जो देवी की 64 सहचरियों को दर्शाता है।
तू पास है, मेरे पास है ऐसे
मेरा कोई एहसास है जैसे
तू पास है, मेरे पास है ऐसे
मेरा कोई एहसास है जैसे
हाय मैं मर ही जाऊं
जो तुझको न पाऊं
बातों में तेरी मैं रातें बिताऊं
होंठों पे लम्हा-लम्हा
है नाम तेरा हाय
तुझको ही गाऊं मैं, तुझको पुकारूं
कोरस:
सैयारा तू तो बदला नहीं है
मौसम ज़रा सा रूठा हुआ है
सैयारा तू तो बदला नहीं है
मौसम ज़रा सा रूठा हुआ है
बीते लम्हों से दुनिया बसा लूं
मैं तो तेरे आंसुओं का बना हूं
मेरी हंसी में तेरी सदाएं
तेरी कहानी खुद को सुनाऊं
यादों के तारे, यादों के तारे टूटेंगे कैसे
मेरे हैं जो वो रूठेंगे कैसे
बीते दिनों की खोली किताबें
गुज़रे पलों को कैसे भुला दें
हाय मैं मर ही जाऊं
जो तुझको न पाऊं
बातों में तेरी मैं रातें बिताऊं
होंठों पे लम्हा-लम्हा
है नाम तेरा हाय
तुझको ही गाऊं मैं, तुझको पुकारूं
सैयारा तू तो बदला नहीं है
मौसम ज़रा सा रूठा हुआ है
सैयारा तू तो बदला नहीं है
मौसम ज़रा सा रूठा हुआ है
Romanized Lyrics
Tu paas hai, mere paas hai aise
Mera koi ehsaas hai jaise
Tu paas hai, mere paas hai aise
Mera koi ehsaas hai jaise
Haaye main mar hi jaaun
Jo tujhko na paaun
Baaton mein teri main raatein bitaaun
Honthon pe lamha-lamha
Hai naam tera haaye
Tujhko hi gaaun main, tujhko pukaarun
Chorus:
Saiyaara tu toh badla nahi hai
Mausam zara sa rootha hua hai
Saiyaara tu toh badla nahi hai
Mausam zara sa rootha hua hai
Beete lamhon se duniya basa loon
Main toh tere aansuon ka bana hoon
Meri hansi mein teri sadaayein
Teri kahaani khud ko sunaaun
Yaadon ke taare, yaadon ke taare tootenge kaise
Mere hain jo woh roothenge kaise
Beete dinon ki kholi kitaabein
Guzre palon ko kaise bhula dein
Haaye main mar hi jaaun
Jo tujhko na paaun
Baaton mein teri main raatein bitaaun
Honthon pe lamha-lamha
Hai naam tera haaye
Tujhko hi gaaun main, tujhko pukaarun
Saiyaara tu toh badla nahi hai
Mausam zara sa rootha hua hai
Saiyaara tu toh badla nahi hai
Mausam zara sa rootha hua hai
इतिहास (History)
यह गीत 2025 की आगामी बॉलीवुड फिल्म ‘सैयारा’ (Saiyaara) का शीर्षक गीत (Title Track) है। यह फिल्म यश राज फिल्म्स (YRF) के बैनर तले बनी है और मोहित सूरी द्वारा निर्देशित है। इस गाने को फहीम अब्दुल्ला ने अपनी आवाज़ दी है, जो इससे पहले अपने वायरल हिट गाने ‘इश्क़’ के लिए चर्चा में रहे थे। संगीत तनिष्क बागची, फहीम अब्दुल्ला और अर्सलान निज़ामी ने मिलकर तैयार किया है, और इसके बोल इरशाद कामिल ने लिखे हैं।
गाने के बारे में (About)
‘सैयारा’ एक बेहद भावुक और रोमांटिक गीत है जो दो प्रेमियों के बीच के अटूट बंधन और जुदाई के दर्द को बयां करता है। गाने का संगीत धीमा और दिल को छू लेने वाला है, जो श्रोता को एक पुरानी यादों (nostalgia) की दुनिया में ले जाता है। इसमें गायक अपनी प्रेमिका को अपनी पूरी दुनिया मानता है और उसे खोने के डर को व्यक्त करता है।
अर्थ विश्लेषण (Meaning Analysis)
इस गीत में ‘सैयारा’ शब्द का प्रयोग प्रेमी ने अपनी प्रेमिका के लिए एक रूपक (metaphor) के तौर पर किया है। ‘सैयारा’ का अर्थ होता है ‘ग्रह’ (Planet) या ‘सैर करने वाला’ (Wanderer), यानी प्रेमी के लिए उसकी प्रेमिका ही उसकी पूरी दुनिया है। पंक्ति ‘सैयारा तू तो बदला नहीं है, मौसम ज़रा सा रूठा हुआ है’ का अर्थ है कि उनका प्यार और वो व्यक्ति आज भी वही है, बस हालात (मौसम) थोड़े विपरीत हो गए हैं। ‘मैं तो तेरे आंसुओं का बना हूं’ जैसी पंक्तियाँ यह दर्शाती हैं कि प्रेमी का अस्तित्व उसकी प्रेमिका के सुख-दुख से पूरी तरह जुड़ा हुआ है।
रोचक तथ्य (Trivia)
यह फिल्म अहान पांडेय (Ahaan Panday) की बॉलीवुड में डेब्यू फिल्म है।
फहीम अब्दुल्ला और अर्सलान निज़ामी कश्मीरी कलाकार हैं, जिन्होंने इस बड़े बॉलीवुड प्रोजेक्ट में अपनी छाप छोड़ी है।
गाने के संगीत में आधुनिक वाद्ययंत्रों के साथ-साथ पारंपरिक कश्मीरी संगीत की हल्की झलक भी महसूस की जा सकती है।
2012 की फिल्म ‘एक था टाइगर’ में भी ‘सैयारा’ नाम का एक सुपरहिट गाना था, लेकिन यह गाना उससे बिल्कुल अलग है।
Ishq woh balaa hai Ishq woh balaa hai Jisko chhua jisne woh jalaa hai
Dil se hota hai shuru Dil se hota hai shuru Par kambakht sar pe chadha hai
Kabhi khud se, kabhi khuda se Kabhi zamaane se ladaa hai Itna hua badnaam phir bhi Har zubaan pe adaa hai
Ishq ki saazishein Ishq ki baaziyaan Haara main khel ke Do dilon ka juaa
Kyun tune meri fursat ki Kyun dil mein itni harkat ki Ishaq mein itni barqat ki Ye tune kya kiya
Phiroon ab maara maara main Chaand se bichhda taara main Dil se itna kyun haara main Yeh tune kya kiya
Saari duniya se jeet ke main aaya hoon idhar Tere aage hi main haara kiya tune kya asar
Main dil ka raaz kehta hoon Ke jab jab saansein leta hoon Tera hi naam leta hoon Yeh tune kya kiya
Meri baahon ko teri saanson ki jo Aadatein lagi hain waisi Jee leta hoon ab main thoda aur Mere dil ki rait pe aankhon ki jo Pade parchhai teri Pee leta hoon tab main thoda aur
Jaane kaun hai tu meri Main na jaanu yeh magar Jahaan jaaoon main karoon main wahaan Tera hi zikar
Mujhe tu raazi lagti hai Jeeti hui baazi lagti hai Tabeeyat taazi lagti hai Ye tune kya kiya
Main dil ka raaz kehta hoon Ke jab jab saansein leta hoon Tera hi naam leta hoon Yeh tune kya kiya
Dil karta hai teri baatein sunu Saude main adhoore chunu Muft ka hua yeh faayda Kyun khud ko main barbaad karoon Fanaa hoke tunhse miloon Ishq ka ajab hai kaayda
Teri raahon se jo guzri hain meri dagar Main aage badh gaya hoon hoke thoda befikar
Kaho to kis se marzi loon Kaho to kis ko arzi doon Hansta ab thoda farzi hoon Yeh tune kya kiya
Main dil ka raaz kehta hoon Ke jab jab saansein leta hoon
Ishq ki saazishein Ishq ki baaziyaan Haara main khel ke Do dilon ka juaa
14 सितंबर को ‘हिन्दी दिवस’ मनाया जाता है। संवैधानिक रूप से हिंदी को राजभाषा का दर्जा प्राप्त है किंतु सरकारों ने उसे उसका प्रथम स्थान न देकर अन्यत्र धकेल दिया यह दुखदाई है। हिंदी को राजभाषा के रूप में देखना और हिंदी दिवस के रूप में उसका सम्मान करना भारत की सभी भाषाओं का सम्मान है जो हिंदी की सगी बहनों के समान है। क्योंकि भारत की सभी भाषाएं संस्कृत से उत्पन्न हुई हैं। और उन सब में संस्कृत की घनीभूत शब्दावली विद्यमान है। जो यह प्रमाणित करती है कि ये सभी भाषाएं संस्कृत से मौलिक रुप से संबंधित हैं। इन सभी भाषाओं में मूलभूत वर्ण संस्कृत से ही आए हैं। एक दो वर्ण जो जबरन इनमें डाले गए हैं वे ही अन्य भाषाओं से लिए गए हैं और वे भी हमारी पराधीनता की स्वीकार्यता के प्रभाव से। अन्यथा तो संस्कृत में न केवल वर्ण अक्षर बल्कि उसका व्याकरण आज भी इतना समृद्ध है कि संसार की कोई भी भाषा उसके बराबरी नहीं कर सकती। उसमें जो लकार(काल), उसमें जो धातुएं दी गई हैं, जिसके आधार पर यह एकमात्र भाषा है जो अपने उत्पन्न शब्दों को अर्थ प्रदान करती है और हजारों वर्षों तक उसे आप अपरिवर्तित रखने में दक्ष हैं ।धन्य है संस्कृत और उनकी पुत्रियांँ भारत की सभी भाषाएंँ।
यदि हिंदी का सम्मान होता है तो हिंदी भारत की सभी भाषाओं के साथ मिलजुल कर रहने के लिए स्वाभाविक और प्राकृतिक रूप से स्वीकार्य है। आप देखेंगे कि हिंदी की फिल्में पूरे भारत में उतने ही प्रेम से देखी जाती हैं। कविताएं और गीत उतने ही आनंद से गाए जाते हैं जितने दक्षिण के गीत और फिल्में भारत के अन्यत्र भागों में गाये, देखे और सुने जाते हैं।
हम इस दिन से संबंधित कुछ कविताओं का यहां पठन करते हैं –
01
निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल
निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल।
अंग्रेजी पढ़ि के जदपि, सब गुन होत प्रवीन पै निज भाषा-ज्ञान बिन, रहत हीन के हीन।
उन्नति पूरी है तबहिं जब घर उन्नति होय निज शरीर उन्नति किये, रहत मूढ़ सब कोय।
निज भाषा उन्नति बिना, कबहुं न ह्यैहैं सोय लाख उपाय अनेक यों भले करे किन कोय।
इक भाषा इक जीव इक मति सब घर के लोग तबै बनत है सबन सों, मिटत मूढ़ता सोग।
और एक अति लाभ यह, या में प्रगट लखात निज भाषा में कीजिए, जो विद्या की बात।
तेहि सुनि पावै लाभ सब, बात सुनै जो कोय यह गुन भाषा और महं, कबहूं नाहीं होय।
विविध कला शिक्षा अमित, ज्ञान अनेक प्रकार सब देसन से लै करहू, भाषा माहि प्रचार।
भारत में सब भिन्न अति, ताहीं सों उत्पात विविध देस मतहू विविध, भाषा विविध लखात।
सब मिल तासों छांड़ि कै, दूजे और उपाय उन्नति भाषा की करहु, अहो भ्रातगन आय।
(रचनाकार- -भारतेंदु हरिश्चंद्र)
निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल
बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल।
अंग्रेजी पढ़ि के जदपि, सब गुन होत प्रवीन
पै निज भाषा-ज्ञान बिन, रहत हीन के हीन।
उन्नति पूरी है तबहिं जब घर उन्नति होय
निज शरीर उन्नति किये, रहत मूढ़ सब कोय।
निज भाषा उन्नति बिना, कबहुं न ह्यैहैं सोय
लाख उपाय अनेक यों भले करे किन कोय।
इक भाषा इक जीव इक मति सब घर के लोग
तबै बनत है सबन सों, मिटत मूढ़ता सोग।
और एक अति लाभ यह, या में प्रगट लखात
निज भाषा में कीजिए, जो विद्या की बात।
तेहि सुनि पावै लाभ सब, बात सुनै जो कोय
यह गुन भाषा और महं, कबहूं नाहीं होय।
विविध कला शिक्षा अमित, ज्ञान अनेक प्रकार
सब देसन से लै करहू, भाषा माहि प्रचार।
भारत में सब भिन्न अति, ताहीं सों उत्पात
विविध देस मतहू विविध, भाषा विविध लखात।
सब मिल तासों छांड़ि कै, दूजे और उपाय
उन्नति भाषा की करहु, अहो भ्रातगन आय।
(रचनाकार- -भारतेंदु हरिश्चंद्र)
02
अभिनंदन अपनी भाषा का
करते हैं तन-मन से वंदन, जन-गण-मन की अभिलाषा का अभिनंदन अपनी संस्कृति का, आराधन अपनी भाषा का। यह अपनी शक्ति सर्जना के माथे की है चंदन रोली माँ के आँचल की छाया में हमने जो सीखी है बोली यह अपनी बँधी हुई अंजुरी ये अपने गंधित शब्द सुमन यह पूजन अपनी संस्कृति का यह अर्चन अपनी भाषा का। अपने रत्नाकर के रहते किसकी धारा के बीच बहें हम इतने निर्धन नहीं कि वाणी से औरों के ऋणी रहें इसमें प्रतिबिंबित है अतीत आकार ले रहा वर्तमान यह दर्शन अपनी संस्कृति का यह दर्पण अपनी भाषा का। यह ऊँचाई है तुलसी की यह सूर-सिंधु की गहराई टंकार चंद वरदाई की यह विद्यापति की पुरवाई जयशंकर की जयकार निराला का यह अपराजेय ओज यह गर्जन अपनी संस्कृति का यह गुंजन अपनी भाषा का। (रचनाकार- सोम ठाकुर)
करते हैं तन-मन से वंदन, जन-गण-मन की अभिलाषा का
अभिनंदन अपनी संस्कृति का, आराधन अपनी भाषा का।
यह अपनी शक्ति सर्जना के माथे की है चंदन रोली
माँ के आँचल की छाया में हमने जो सीखी है बोली
यह अपनी बँधी हुई अंजुरी ये अपने गंधित शब्द सुमन
यह पूजन अपनी संस्कृति का यह अर्चन अपनी भाषा का।
अपने रत्नाकर के रहते किसकी धारा के बीच बहें
हम इतने निर्धन नहीं कि वाणी से औरों के ऋणी रहें
इसमें प्रतिबिंबित है अतीत आकार ले रहा वर्तमान
यह दर्शन अपनी संस्कृति का यह दर्पण अपनी भाषा का।
यह ऊँचाई है तुलसी की यह सूर-सिंधु की गहराई
टंकार चंद वरदाई की यह विद्यापति की पुरवाई
जयशंकर की जयकार निराला का यह अपराजेय ओज
यह गर्जन अपनी संस्कृति का यह गुंजन अपनी भाषा का।
(रचनाकार- सोम ठाकुर)
03
हिंदी हमारी आन बान शान
हिंदी हमारी आन है, हिंदी हमारी शान है, हिंदी हमारी चेतना वाणी का शुभ वरदान है, हिंदी हमारी वर्तनी, हिंदी हमारा व्याकरण, हिंदी हमारी संस्कृति, हिंदी हमारा आचरण, हिंदी हमारी वेदना, हिंदी हमारा गान है, हिंदी हमारी आत्मा है, भावना का साज़ है, हिंदी हमारे देश की हर तोतली आवाज़ है, हिंदी हमारी अस्मिता, हिंदी हमारा मान है, हिंदी निराला, प्रेमचंद की लेखनी का गान है, हिंदी में बच्चन, पंत, दिनकर का मधुर संगीत है, हिंदी में तुलसी, सूर, मीरा जायसी की तान है, जब तक गगन में चांद, सूरज की लगी बिंदी रहे, तब तक वतन की राष्ट्र भाषा ये अमर हिंदी रहे, हिंदी हमारा शब्द, स्वर व्यंजन अमिट पहचान है, हिंदी हमारी चेतना वाणी का शुभ वरदान है।
(रचनाकार- अंकित शुक्ला)
हिंदी हमारी आन है, हिंदी हमारी शान है,
हिंदी हमारी चेतना वाणी का शुभ वरदान है,
हिंदी हमारी वर्तनी, हिंदी हमारा व्याकरण,
हिंदी हमारी संस्कृति, हिंदी हमारा आचरण,
हिंदी हमारी वेदना, हिंदी हमारा गान है,
हिंदी हमारी आत्मा है, भावना का साज़ है,
हिंदी हमारे देश की हर तोतली आवाज़ है,
हिंदी हमारी अस्मिता, हिंदी हमारा मान है,
हिंदी निराला, प्रेमचंद की लेखनी का गान है,
हिंदी में बच्चन, पंत, दिनकर का मधुर संगीत है,
हिंदी में तुलसी, सूर, मीरा जायसी की तान है,
जब तक गगन में चांद, सूरज की लगी बिंदी रहे,
तब तक वतन की राष्ट्र भाषा ये अमर हिंदी रहे,
हिंदी हमारा शब्द, स्वर व्यंजन अमिट पहचान है,
हिंदी हमारी चेतना वाणी का शुभ वरदान है।
(रचनाकार- अंकित शुक्ला)
04
नूतन वर्षाभिनंदन
नूतन का अभिनंदन हो
प्रेम-पुलकमय जन-जन हो!
नव-स्फूर्ति भर दे नव-चेतन
टूट पड़ें जड़ता के बंधन;
शुद्ध, स्वतंत्र वायुमंडल में
निर्मल तन, निर्भय मन हो!
प्रेम-पुलकमय जन-जन हो,
नूतन का अभिनंदन हो!
प्रति अंतर हो पुलकित-हुलसित
प्रेम-दिए जल उठें सुवासित
जीवन का क्षण-क्षण हो ज्योतित,
शिवता का आराधन हो!
प्रेम-पुलकमय प्रति जन हो,
नूतन का अभिनंदन हो!
(रचनाकार- -फणीश्वरनाथ रेणु)
05
कलम, आज उनकी जय बोल
जला अस्थियां बारी-बारी
चिटकाई जिनमें चिंगारी,
जो चढ़ गये पुण्यवेदी पर
लिए बिना गर्दन का मोल
कलम, आज उनकी जय बोल।
जो अगणित लघु दीप हमारे
तूफानों में एक किनारे,
जल-जलाकर बुझ गए किसी दिन
मांगा नहीं स्नेह मुंह खोल
कलम, आज उनकी जय बोल।
पीकर जिनकी लाल शिखाएं
उगल रही सौ लपट दिशाएं,
जिनके सिंहनाद से सहमी
धरती रही अभी तक डोल
कलम, आज उनकी जय बोल।
अंधा चकाचौंध का मारा
क्या जाने इतिहास बेचारा,
साखी हैं उनकी महिमा के
सूर्य चन्द्र भूगोल खगोल
कलम, आज उनकी जय बोल।
(रचनाकार- -रामधारी सिंह ‘दिनकर’)
06
हिन्दी दिवस पर अटल बिहारी वाजपेयी की कविता
बनने चली विश्व भाषा जो
बनने चली विश्व भाषा जो, अपने घर में दासी, सिंहासन पर अंग्रेजी है, लखकर दुनिया हांसी, लखकर दुनिया हांसी, हिन्दी दां बनते चपरासी, अफसर सारे अंग्रेजी मय, अवधी या मद्रासी, गूंजी हिन्दी विश्व में गूंजी हिन्दी विश्व में, स्वप्न हुआ साकार; राष्ट्र संघ के मंच से, हिन्दी का जयकार; हिन्दी का जयकार, हिन्दी हिन्दी में बोला; देख स्वभाषा-प्रेम, विश्व अचरज से डोला; कह कैदी कविराय, मेम की माया टूटी; भारत माता धन्य, स्नेह की सरिता फूटी! (रचनाकार- अटल बिहारी वाजपेयी)
बनने चली विश्व भाषा जो,
अपने घर में दासी,
सिंहासन पर अंग्रेजी है,
लखकर दुनिया हांसी,
लखकर दुनिया हांसी,
हिन्दी दां बनते चपरासी,
अफसर सारे अंग्रेजी मय,
अवधी या मद्रासी,
गूंजी हिन्दी विश्व में
गूंजी हिन्दी विश्व में,
स्वप्न हुआ साकार;
राष्ट्र संघ के मंच से,
हिन्दी का जयकार;
हिन्दी का जयकार,
हिन्दी हिन्दी में बोला;
देख स्वभाषा-प्रेम,
विश्व अचरज से डोला;
कह कैदी कविराय,
मेम की माया टूटी;
भारत माता धन्य,
स्नेह की सरिता फूटी!
(रचनाकार- अटल बिहारी वाजपेयी)
07
हिन्दी दिवस पर गिरिजा कुमार माथुर की कविता
वह हिंदी है
एक डोर में सबको जो है बाँधती
वह हिंदी है,
हर भाषा को सगी बहन जो मानती
वह हिंदी है।
भरी-पूरी हों सभी बोलियां
यही कामना हिंदी है,
गहरी हो पहचान आपसी
यही साधना हिंदी है,
सौत विदेशी रहे न रानी
यही भावना हिंदी है।
तत्सम, तद्भव, देश विदेशी
सब रंगों को अपनाती,
जैसे आप बोलना चाहें
वही मधुर, वह मन भाती,
नए अर्थ के रूप धारती
हर प्रदेश की माटी पर,
‘खाली-पीली-बोम-मारती’
बंबई की चौपाटी पर,
चौरंगी से चली नवेली
प्रीति-पियासी हिंदी है,
बहुत-बहुत तुम हमको लगती
‘भालो-बाशी’, हिंदी है।
उच्च वर्ग की प्रिय अंग्रेज़ी
हिंदी जन की बोली है,
वर्ग-भेद को ख़त्म करेगी
हिंदी वह हमजोली है,
सागर में मिलती धाराएँ
हिंदी सबकी संगम है,
शब्द, नाद, लिपि से भी आगे
एक भरोसा अनुपम है,
गंगा कावेरी की धारा
साथ मिलाती हिंदी है,
पूरब-पश्चिम/ कमल-पंखुरी
सेतु बनाती हिंदी है।
– गिरिजा कुमार माथुर
एक डोर में सबको जो है बाँधती
वह हिंदी है,
हर भाषा को सगी बहन जो मानती
वह हिंदी है।
भरी-पूरी हों सभी बोलियां
यही कामना हिंदी है,
गहरी हो पहचान आपसी
यही साधना हिंदी है,
सौत विदेशी रहे न रानी
यही भावना हिंदी है।
तत्सम, तद्भव, देश विदेशी
सब रंगों को अपनाती,
जैसे आप बोलना चाहें
वही मधुर, वह मन भाती,
नए अर्थ के रूप धारती
हर प्रदेश की माटी पर,
‘खाली-पीली-बोम-मारती’
बंबई की चौपाटी पर,
चौरंगी से चली नवेली
प्रीति-पियासी हिंदी है,
बहुत-बहुत तुम हमको लगती
‘भालो-बाशी’, हिंदी है।
उच्च वर्ग की प्रिय अंग्रेज़ी
हिंदी जन की बोली है,
वर्ग-भेद को ख़त्म करेगी
हिंदी वह हमजोली है,
सागर में मिलती धाराएँ
हिंदी सबकी संगम है,
शब्द, नाद, लिपि से भी आगे
एक भरोसा अनुपम है,
गंगा कावेरी की धारा
साथ मिलाती हिंदी है,
पूरब-पश्चिम/ कमल-पंखुरी
सेतु बनाती हिंदी है।
– गिरिजा कुमार माथुर
08
हिन्दी दिवस पर मैथिली शरण गुप्त की कविता है;
करो अपनी भाषा पर प्यार
करो अपनी भाषा पर प्यार ।
जिसके बिना मूक रहते तुम, रुकते सब व्यवहार ।।
जिसमें पुत्र पिता कहता है, पतनी प्राणाधार,
और प्रकट करते हो जिसमें तुम निज निखिल विचार ।
बढ़ायो बस उसका विस्तार ।
करो अपनी भाषा पर प्यार ।।
भाषा विना व्यर्थ ही जाता ईश्वरीय भी ज्ञान,
सब दानों से बहुत बड़ा है ईश्वर का यह दान ।
असंख्यक हैं इसके उपकार ।
करो अपनी भाषा पर प्यार ।।
यही पूर्वजों का देती है तुमको ज्ञान-प्रसाद,
और तुमहारा भी भविष्य को देगी शुभ संवाद ।
बनाओ इसे गले का हार ।
करो अपनी भाषा पर प्यार ।।
(रचनाकार- -मैथिली शरण गुप्त)
09
हिन्दी दिवस पर देवमणि पांडेय की कविता-
हिंदी इस देश का गौरव है।
हिंदी इस देश का गौरव है,
हिंदी भविष्य की आशा है।
हिंदी हर दिल की धड़कन है, हिंदी जनता की भाषा है।
इसको कबीर ने अपनाया
मीराबाई ने मान दिया।
आज़ादी के दीवानों ने
इस हिंदी को सम्मान दिया।
जन जन ने अपनी वाणी से हिंदी का रूप तराशा है।
हिंदी हर क्षेत्र में आगे है
इसको अपनाकर नाम करें।
हम देशभक्त कहलाएंगे
जब हिंदी में सब काम करें।
हिंदी चरित्र है भारत का, नैतिकता की परिभाषा है।
हिंदी हम सब की ख़ुशहाली
हिंदी विकास की रेखा है।
हिंदी में ही इस धरती ने
हर ख़्वाब सुनहरा देखा है।
हिंदी हम सबका स्वाभिमान, यह जनता की अभिलाषा है।
(रचनाकार- -देवमणि पांडेय)
10
विश्व हिंदी दिवस पर कविता
“जय हिंदी”
“जय हिंदी” संस्कृत से जन्मी है हिन्दी, शुद्धता का प्रतीक है हिन्दी । लेखन और वाणी दोनो को, गौरान्वित करवाती हिन्दी । उच्च संस्कार, वियिता है हिन्दी, सतमार्ग पर ले जाती हिन्दी । ज्ञान और व्याकरण की नदियाँ, मिलकर सागर सोत्र बनाती हिन्दी । हमारी संस्कृति की पहचान है हिन्दी, आदर और मान है हिन्दी । हमारे देश की गौरव भाषा, एक उत्कृष्ट अहसास है हिन्दी ।। रचनाकार--प्रतिभा गर्ग
संस्कृत से जन्मी है हिन्दी,
शुद्धता का प्रतीक है हिन्दी ।
लेखन और वाणी दोनो को,
गौरान्वित करवाती हिन्दी ।
उच्च संस्कार, वियिता है हिन्दी,
सतमार्ग पर ले जाती हिन्दी ।
ज्ञान और व्याकरण की नदियाँ,
मिलकर सागर सोत्र बनाती हिन्दी ।
हमारी संस्कृति की पहचान है हिन्दी,
आदर और मान है हिन्दी ।
हमारे देश की गौरव भाषा,
एक उत्कृष्ट अहसास है हिन्दी ।।
रचनाकार–प्रतिभा गर्ग
11
कविता का उद्देश्य विश्व के समक्ष हिंदी भाषा का मजबूत पक्ष रखना है।
भाल का शृंगार
माँ भारती के भाल का शृंगार है हिंदी
हिंदोस्ताँ के बाग़ की बहार है हिंदी
घुट्टी के साथ घोल के माँ ने पिलाई थी
स्वर फूट पड़ रहा, वही मल्हार है हिंदी
तुलसी, कबीर, सूर औ’ रसखान के लिए
ब्रह्मा के कमंडल से बही धार है हिंदी
सिद्धांतों की बात से न होयगा भला
अपनाएँगे न रोज़ के व्यवहार में हिंदी
कश्ती फँसेगी जब कभी तूफ़ानी भँवर में
उस दिन करेगी पार, वो पतवार है हिंदी
माना कि रख दिया है संविधान में मगर
पन्नों के बीच आज तार-तार है हिंदी
सुन कर के तेरी आह ‘व्योम’ थरथरा रहा
वक्त आने पर बन जाएगी तलवार ये हिंदी
-डॉ जगदीश व्योम
12
“पुष्प की अभिलाषा”
चाह नहीं, मैं सुरबाला के
गहनों में गूंथा जाऊं,
चाह नहीं प्रेमी-माला में बिंध
प्यारी को ललचाऊं,
चाह नहीं सम्राटों के शव पर
हे हरि डाला जाऊं,
चाह नहीं देवों के सिर पर
चढूं भाग्य पर इठलाऊं,
मुझे तोड़ लेना बनमाली,
उस पथ पर देना तुम फेंक
मातृ-भूमि पर शीश- चढ़ाने,
जिस पथ पर जावें वीर अनेक
-माखनलाल चतुर्वेदी
हिन्दी: भारतीय संविधान और राजभाषा की यात्रा”
राज-काज चलाने के लिए किसी-न-किसी भाषा की आवश्यकता पड़न है। वह भाषा राजभाषा कहलाती है। अपने समय में संस्कृत, पाली, महाराष्ट्रा, प्राकृ अथवा अपभ्रंश राजभाषा रही हैं। प्रमाणों से विदित होता है कि 11वीं से 15 शताब्दी ईसवी के दौरान राजस्थान में हिन्दी मिश्रित संस्कृत का प्रयोग होता था मुसलमान बादशाहों के शासन काल में मुहम्मद गौरी से लेकर अकबर के सम तक हिन्दी शासन-कार्य का माध्यम थी। अकबर के गृहमंत्री राजा टोडरमल से सरकारी कागजात फ़ारसी में लिखे जाने लगे। एक फारसीदान मुंशी क ने तीन सौ वर्ष तक फ़ारसी को शासन-कार्य का माध्यम बनाये रखा। मॅकाल आकर अंग्रेजी को प्रतिष्ठित किया। तब से उच्च स्तर पर अंग्रेजी और निम पर देशी भाषाएँ प्रयुक्त होती रहीं । हिन्दी प्रदेश में उर्दू प्रतिष्ठित रही, यद्यपि राजस्थान और मध्यप्रदेश के देशी राज्यों में हिन्दी माध्यम से सारा कामकाज होता रहा। राष्ट्र चेतना के विकास के साथ राजभाषा को राजपद दिलाने की माँग उठी । भारतेंदु हरिशचन्द्र,महर्षि दयानन्द सरस्वती, केशवचन्द्र सेन, लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक महामना मदन मोहन मालवीय, महात्मा गांधी, राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन और से अन्य नेताओं और जनसाधारण ने अनुभव किया कि हमारे देश का राज-का हमारी ही भाषा में होना चाहिए और वह भाषा हिन्दी ही हो सकती है। हिन्दू सभी की सहोदरी है, यह सबसे बड़े क्षेत्र के लोगों की (42 प्रतिश से ऊपर जनता की) मातृभाषा है, हिन्दी प्रदेश के बाहर भी यह अधिकतर लोग की दूसरी या तीसरी भाषा है, हिन्दी संस्कृत की उत्तराधिकारी है और सभी भारती भाषाओं की अपेक्षा सरल है। इन विशेषताओं के कारण स्वतंत्रता प्राप्ति से पह ही हिन्दी को भारत की संपर्क भाषा के रूप में स्वीकार किया गया।
स्वतंत्रता के बाद राज्यसत्ता जनता के हाथ में आई । लोकतांत्रिक व्यवस्था में यह आवश्यक हो गया कि देश का राज-काज, लोक की भाषा में हो, अतः राजभाषा के रूप में हिन्दी को एकमत से स्वीकार किया गया। 14 सितम्बर, 1949 ई. को भारत के संविधान में हिन्दी को मान्यता प्रदान की गई। तब से राजकार्यों में इसके प्रयोग का विकासक्रम आरंभ होता है। संविधान के अनुच्छेद 343 के अनुसार संघ की राजभाषा हिन्दी और लिपि देवनागरी है। राजभाषा
‘राजभाषा’ से तात्पर्य है ‘सरकारी कामकाज के लिये प्रयुक्त भाषा’ राजभाषा शब्द अंग्रेजी के ऑफिशियल लैंग्वेज का पर्याय है। विधिक रूप में इस शब्द का प्रयोग स्वतंत्र भारत के संविधान में सर्वप्रथम किया गया। ‘राजभाषा’ की शब्दावली पारिभाषिक होने के साथ-साथ शासन से जुड़ी होती है। इसकी शब्दावली एकार्थक, निश्चित अर्थ में प्रयुक्त होने वाली और औपचारित होती है। यह आवश्यक नहीं है कि राजभाषा संबंधित राज्य की राष्ट्रभाषा भी हो। भारत के संविधान के अध्याय 17. अनुच्छेद 343 के द्वारा हिन्दी को ‘राजभाषा’ के रूप में स्वीकृत किया गया और इसी के साथ उसके विकास के लिए भी संविधान के अनुच्छेद 351 के अनुसार निर्देश दिये गए।
14 सितम्बर, 1949 को भारतीय संघ की राजभाषा के रूप में हिन्दी को स्वीकृत किये जाने का निर्णय संविधान सभा द्वारा लिया गया। संविधान सभा ने राजभाषा के संबंध में तीन मुख्य व्यवस्थायें की-
1. संघ की राजभाषा हिन्दी और लिपि देवनागरी होगी।
2. संविधान के प्रारंभ से पन्द्रह वर्षों की अवधि के लिए अंग्रेजी राजभाषा के रूप में चलती रहेगी।
3. हिन्दी के विकास के कारण अन्य भारतीय भाषाओं की उपेक्षा न हो।
संवैधानिक प्रावधान | राजभाषा विभाग | गृह मंत्रालय | भारत सरकार
राजभाषा की संवैधानिक स्थिति
i.अनुच्छेद 343 में ‘संघ की राजभाषा’ का उल्लेख है।
ii.अनुच्छेद 344 में ‘राजभाषा के लिए आयोग और संसद की समिति’ का उल्लेख है।
iii. अनुच्छेद 345, 346, 347 में ‘प्रादेशिक भाषाएँ अर्थात् राज्य की राजभाषाएँ’ का उल्लेख है।
iv. अनुच्छेद 348 में ‘उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों में तथा विधायकों आदि की भाषा’ का उल्लेख है।
(HC+SC+LEGISLATURE=148)
v. अनुच्छेद 349 में ‘भाषा संबंधी कुछ विधियों को अधिनियमित करने के लिए। विशेष प्रक्रिया का उल्लेख है।
vi.अनुच्छेद 350 में ‘व्यथा के निवारण के लिए प्रयुक्त भाषा प्राथमिकता पर मातृभाषा में शिक्षा की सुविधाएँ तथा भाषाई अल्पसंख्यक के लिए विशेष अधिकार।
vii. अनुच्छेद 351 में ‘हिन्दी के विकास के लिये निदेश’ आदि का उल्लेख है।
संविधान में राजभाषा के प्रावधान
1. संविधान के अनुच्छेद 120- इसके अनुसार संसद में हिन्दी अथवा अंग्रेजी भाषा में कार्य किया जा सकेगा। यदि कोई संसद सदस्य हिन्दी अथवा अंग्रेजी में अपने विचार व्यक्त नहीं कर सकता तो लोकसभा अध्यक्ष या राज्यसभा के सभापति की अनुमति से अपनी मातृभाषा में अपने विचार व्यक्त कर सकता है।
2. अनुच्छेद 210 – विभिन्न राज्यों के विधानमंडल हिन्दी अथवा अंग्रेजी में कार्य करेंगे। यथास्थिति लोकसभा अध्यक्ष या राज्यसभा के सभापति सदस्य को उसकी मातृभाषा में विचार व्यक्त करने की अनुमति दे सकता है।
3. अनुच्छेद 343- संघ की राजभाषा हिन्दी, लिपि देवनागरी तथा अंक भारतीय अंकों के अंतर्राष्ट्रीय रूप वाले होंगे। सरकारी कामकाज में अंग्रेजी का प्रयोग 15 वर्षों की अवधि तक किया जाता रहेगा, परंतु राष्ट्रपति इस अवधि के दौरान शासकीय प्रयोजनों में अंग्रेजो के साथ हिन्दी भाषा का प्रयोग अधिकृत कर सकेगा। 15 वर्षों की अवधि के पश्चात् विधि द्वारा अंग्रेजी भाषा अंकों के देवनागरी रूप में प्रयोग को उपबंधित कर सकती है।
4. अनुच्छेद 344- इसके अनुसार संविधान लागू होने के पाँच एवं दस वर्ष की समाप्ति पर राष्ट्रपति आदेश द्वारा राजभाषा आयोग का गठन करेंगे। यह आयोग हिन्दी के उत्तरोत्तर प्रयोग आदि की सिफारिश करेगा। संसदीय राजभाषा समिति का गठन किया जायेगा। इस समिति में लोकसभा बीस सदस्य और राज्यसभा के दस सदस्य होंगे। यह समिति राजभाषा आयोग की सिफारिशों के बारे में राष्ट्रपति को अपनी रिपोर्ट देगी।
5. अनुच्छेद 345- किसी राज्य का विधान मंडल विधि द्वारा उस राज्य की किसी एक अथवा अन्य भाषाओं को अपनी राजभाषा के रूप में स्वीकार कर सकता है।
6. अनुच्छेद 346- किसी एक या दूसरे राज्य और संघ के बीच में संचार की भाषा राजभाषा होगी।
7. अनुच्छेद 347- किसी राज्य की जनसंख्या का पर्याप्त भाग यह चाहता है कि उनके द्वारा बोली जाने को शासकीय मान्यता दी जाये तो राष्ट्रपति वैसा करने के लिए संबंधित राज्य को आदेश दे सकते हैं।
8. अनुच्छेद 348- जब तक संसद विधि द्वारा उपबंध न करे तब तक उच्चतम न्यायालय तथा उच्च न्यायालय की सभी कार्यवाहियाँ अंग्रेजी भाषा में होंगी। संसद एवं राज्यों के विधान-मंडलों में पारित विधेयक राष्ट्रपति एवं राज्यपालों द्वारा जारी सभी अध्यादेश, आदेश विनिमय, नियम आदि सबके प्राधिकृत पाठ भी अंग्रेजी भाषा में ही माना जायेगा।
9. अनुच्छेद 349- संविधान लागू होने के 15 वर्षों की अवधि तक अंग्रेजी के अलावा किसी भी दूसरी भाषा का प्राधिकृत पाठ नहीं माना जायेगा। किसी अन्य भाषा के प्राधिकृत पाठ हेतु भाषा आयोग तथा सिफारिशों की गठित रिपोर्ट पर विचार करने के पश्चात् राष्ट्रपति अपनी स्वीकृति प्रदान कर सकता है।
10. अनुच्छेद 350- शिकायत निवारण के लिये कोई भी व्यक्ति किसी भी अधिकारी या प्राधिकारी को संघ अथवा राज्य में प्रयुक्त किसी भी भाषा में अपना अभिवेदन दे सकता 1
11. अनुच्छेद 351- इसके अंतर्गत हिन्दी भाषा की प्रसार वृद्धि तथा विकास करना भारत की सामासिक संस्कृति को विकसित करना, हिन्दी को भारतीय तथा अन्य से जोड़कर उसका दायरा विस्तृत करना संघ का उद्देश्य होगा ।
राजभाषा नियम 1976 की विशिष्टताएँ
1. राजभाषा नियम 1976 के अंतर्गत कुल बारह नियम बनाये गये। तमिलनाडु राज्य को छोड़कर देश के अन्य सभी राज्यों पर समान रूप से ये नियम लागू होते हैं।
2. हिन्दी के प्रगामी प्रयोग को प्रभावी ढंग से लागू करने के उद्देश्य से पूरे भारत को तीन क्षेत्रों में बाँटा गया है-
क्षेत्र क-
समस्त हिन्दी भाषी राज्य एवं संघ राज्यक्षेत्र (बिहार, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, मध्यप्रदेश, राजस्थान, उत्तरप्रदेश, दिल्ली अंडमान निकोबार द्वीप समूह ) एव
क्षेत्र ख-
गुजरात, महाराष्ट्र तथा पंजाब, चंडीगढ़ इसके अंतर्गत वे राज्य तथा संघ राज्यक्षेत्र आते हैं जो से ‘क’ और ‘ख’ के अंतर्गत नहीं आते।
क्षेत्र ग-
3. राजभाषा नियम 1976 में हिन्दी पत्राचार के संबंध में स्पष्ट दिशा-निर्देश दिये गये हैं ।
4. राजभाषा नियम 1976 के नियम 5 के अंतर्गत प्रावधान है कि व्यक्तिगत अथवा राज्य द्वारा हिन्दी में भेजे गये पत्रों का जवाब हिन्दी में ही अनिवार्य रूप से देना होगा।
5. कोई भी कर्मचारी हिन्दी या अंग्रेजी में अभ्यावेदन कर सकता है।
6. नियम 5 के अंतर्गत यह प्रावधान किया गया है कि सरकारी कार्यालय में जारी होने वाले परिपत्र, प्रशासनिक रिपोर्ट, कार्यालय आदेश, अधिसूचना, करार, संधियों, विज्ञापन तथा निविदा सूचना आदि अनिवार्य रूप से हिन्दी- अंग्रेजी द्विभाषी रूप से जारी किये जायेंगे ।
7. केन्द्रीय सरकार के अधिकारी या कर्मचारी फाइलों में टिप्पणी केवल हिन्दी या अंग्रेजी में लिख सकते हैं। किसी अन्य भाषा में वे उसका अनुवाद प्रस्तुत नहीं कर सकते।
8. राजभाषा नियम 1976 के नियम 12 के अनुसार केन्द्रीय सरकार के कार्यालय के प्रशासनिक प्रधान का यह उत्तरदायित्व होगा कि वह सुनिश्चित करें दि राजभाषा अधिनियम एवं राजभाषा नियमों के उपबंधों का समुचित पालन किया जा रहा है और इसके सुनिश्चित पालन के लिए प्रभावकारी जाँच बिर निर्धारित करे ।
9. संक्षेप में कहा जा सकता है कि राजभाषा नियम 1976 से राजभाषा हिन्दी प्रगामी प्रयोग में काफी मात्रा में गति आई तथा केन्द्रीय सरकार के कर्मचारिय को भी हिन्दी में कामकाज करने में निश्चित रूप से प्रोत्साहन मिला।
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प्रश्न -हिंदी दिवस कब मनाया जाता है ?
उत्तर -हिंदी दिवस 14 सितंबर को मनाया जाता है।
प्रश्न -हिंदी दिवस पर 10 लाइन ,
उत्तर – हमें अपनी भाषा से प्रेम करना चाहिए क्योंकि हम जब अपनी भाषा बोलते हैं तो हम बहुत सहज रहकर सरलता से अपनी बात दूसरों तक पहुंचा सकते हैं। उसके बिना हम किसी मूक प्राणी की तरह हो जाते हैं और हमारे सारे व्यवहार रुक जाते हैं। हम अपनी मातृभाषा में ही अपने मूलभूत विचारों को अच्छी तरह से प्रकट कर सकते हैं। हम अपनी कोई भी बात अपनी मातृभाषा में ही ठीक तरह से बोल सकते हैं। हमारी मातृभाषा में हमारी संस्कृति और सभ्यता समाहित होती है अतः हम हमारी संस्कृति की भी उसे रक्षा कर लेते हैं। हम अपनी भाषा के द्वारा हमारी नई पीढ़ी को भी हमारी सांस्कृतिक विरासत पहुंचा देते हैं।
प्रश्न -हिंदी दिवस पर कविता 10 लाइन ,
उत्तर – हिन्दी दिवस पर मैथिली शरण गुप्त की कविता है;
करो अपनी भाषा पर प्यार ।
करो अपनी भाषा पर प्यार ।
जिसके बिना मूक रहते तुम, रुकते सब व्यवहार ।।
जिसमें पुत्र पिता कहता है, पतनी प्राणाधार,
और प्रकट करते हो जिसमें तुम निज निखिल विचार ।
बढ़ायो बस उसका विस्तार ।
करो अपनी भाषा पर प्यार ।।
भाषा विना व्यर्थ ही जाता ईश्वरीय भी ज्ञान,
सब दानों से बहुत बड़ा है ईश्वर का यह दान ।
असंख्यक हैं इसके उपकार ।
करो अपनी भाषा पर प्यार ।।
प्रश्न -हिंदी दिवस क्यों मनाया जाता है ,
उत्तर – हिंदी हमारी राजभाषा, राष्ट्रभाषा, संपर्क भाषा और आपसी व्यवहार की भी भाषा है। वह हमारी साहित्यिक और सांस्कृतिक के साथ-साथ तकनीकी भाषा भी बन रही है। अतः उसके सम्मान में हिंदी दिवस 14 सितंबर को मनाया जाता है। क्योंकि भाषा के बिना हम कोई भी व्यवहार नहीं कर सकते। 14 सितंबर 1949 को भारतीय संविधान सभा ने हिंदी को देवनागरी लिपि में भारत की राजभाषा के रूप में स्वीकार किया। अतः 1953 से हर वर्ष 14 सितंबर को हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाता है।
प्रश्न -विश्व हिंदी दिवस कब मनाया जाता है ,
उत्तर – विश्व हिंदी दिवस 10 जनवरी को मनाया जाता है। प्रथम विश्व हिंदी दिवस का आयोजन 10 जनवरी 1974 को नागपुर, महाराष्ट्र में किया गया था। इसके मनाने का मुख्य उद्देश्य हिंदी के प्रति सम्मान व्यक्त करते हुए इसे विश्व प्रसिद्ध एक सम्मानित भाषा के रूप में दर्जा दिलाने के लिए इसे मनाया जाता है । संकल्प लिया जाता है। भारत के दूतावास जो दुनिया भर में फैले हुए हैं सभी देशों में उनमें विभिन्न प्रकार के कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं और वहां पर हिंदी का प्रचार प्रसार किया जाता है।
हिंदी दिवस कोट्स : Hindi Diwas Quotes
क्वोट (Hindi Diwas Quote) -01
हिंदी है भारत की आशा
हिंदी है भारत की भाषा
हिंदी दिवस पर आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं।
क्वोट (Hindi Diwas Quote) – 02
भारत मां के भाल पर सजी स्वर्णिम बिंदी हूं,
मैं भारत की बेटी आपकी अपनी हिंदी हूं।
क्वोट (Hindi Diwas Quote) – 03
अपने वतन की सबसे प्यारी भाषा
हिंदी जगत की सबसे न्यारी भाषा
क्वोट (Hindi Diwas Quote) – 04
भारत देश की आशा है, हिंदी अपनी भाषा है,
जात-पात के बंधन को तोड़े, हिंदी सारे देश को जोड़े।
क्वोट (Hindi Diwas Quote) – 05
अभिव्यक्ति की खान है, भारत का अभिमान है,
हिंदी दिवस हिंदी भाषा के लिए एक अभियान है!
क्वोट (Hindi Diwas Quote) – 06
विविधताओं से भरे इस देश में लगी भाषाओं की फुलवारी है,
इनमें हमको सबसे प्यारी हिंदी मातृभाषा हमारी है।
क्वोट (Hindi Diwas Quote) – 07
हिंदी दिवस पर हमने ठाना है
लोगों में हिंदी का स्वाभिमान जगाना है,
हम सब का अभिमान है हिंदी
भारत देश की शान है हिंदी।
क्वोट (Hindi Diwas Quote) – 08
हिंदी को आगे बढ़ाना है,
उन्नति की राह पर ले जाना है,
केवल एक दिन ही नहीं,
हमें नित हिंदी दिवस मनाना है,
हिंदी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं!
क्वोट (Hindi Diwas Quote) – 09
ज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल: भारतेंदु हरिश्चंद्र
क्वोट (Hindi Diwas Quote) – 10
हिंदी हमारे देश और भाषा की प्रभावशाली विरासत है: माखनलाल चतुर्वेदी
क्वोट (Hindi Diwas Quote) – 11
हिंदी पढ़ना और पढ़ाना हमारा कर्तव्य है। उसे हम सबको अपनाना है: लाल बहादुर शास्त्री
क्वोट (Hindi Diwas Quote) – 12
हिंदी भाषा वह नदी है जो साहित्य, संस्कृति और समाज को एक साथ बहा ले जाती है: रामधारी सिंह दिनकर
क्वोट (Hindi Diwas Quote) – 13
जिस देश को अपनी भाषा और साहित्य के गर्व का अनुभव नहीं है, वह उन्नत नहीं हो सकता: डॉ राजेंद्र प्रसाद
क्वोट (Hindi Diwas Quote) – 14
हम सब का अभिमान हैं हिन्दी
भारत देश की शान हैं हिन्दी
क्वोट (Hindi Diwas Quote) – 15
हिंदी को जीवन की भाषा बनाओ। यह केवल बोलचाल की भाषा नहीं, बल्कि विचारों की अभिव्यक्ति की भाषा है: मुंशी प्रेमचंद
क्वोट (Hindi Diwas Quote) – 16
मैं दुनिया की सभी भाषाओं की इज्जत करता हूं, पर मेरे देश में हिंदी की इज्जत न हो, ये मैं सह नहीं सकता: आचार्य विनोबा भावे
क्वोट (Hindi Diwas Quote) – 17
राष्ट्रभाषा के बिना राष्ट्र गूंगा हो जाता है। हिंदी ही एक ऐसी भाषा है जो पूरे देश को एक सूत्र में बांधने की क्षमता रखती है: महात्मा गांधी
क्वोट (Hindi Diwas Quote) – 18
हिंदी उन सभी गुणों से अलंकृत है, जिनके बल पर वह विश्व की साहित्यिक भाषा की अगली श्रेणी में समासीन हो सकती है: मैथिलीशरण गुप्त
क्वोट (Hindi Diwas Quote) – 19
हिंदी केवल एक भाषा नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति और संस्कारों की पहचान है। यह भारत की आत्मा को प्रतिबिम्बित करती है और हैं एक सूत्र में पिरोती है: पीएम नरेंद्र मोदी
क्या? घुस जायेगा रुदन तुम्हारा निःश्वासों के द्वारा, कोकिल बोलो तो ! और सवेरे हो जायेगा उलट-पुलट जग सारा, कोकिल बोलो तो !
प्रसंग और संदर्भ-
प्रस्तुत कविता ‘कैदी और कोकिला’ प्रसिद्ध राष्ट्रवादी कवि माखन लाल चतुर्वेदी के कविता-संग्रह ‘हिमकिरीटिनी’ से ली गयी है। कवि ने इस कविता की रचना उस समय की थी जब देश पराधीनता की बेड़ियों में जकड़ा हुआ था। कवि को स्वयं भी आजादी के आंदोलनों में जेल जाना पड़ा था। इसलिए कहा जा सकता है कि यह कविता कवि ने स्वयं के जेल अनुभव से प्रेरित होकर लिखी है। जेल में प्रताड़ना और दुर्व्यवहार का चित्रण करके जनता के सामने प्रस्तुत करना और कोयल के माध्यम से लोगों में आजादी की चेतना पैदा करना इस कविता का उद्देश्य प्रतीत होता है।
कविता का वाचक स्वतंत्रता सेनानी है। गोरी हुकूमत ने उसे कैद कर दिया है। रात का समय है, चारों तरफ अंधेरा है और खामोशी छायी हुई है। ऐसे में कोयल का बोलना सुन कर कैदी अर्थात स्वतंत्रता सेनानी के मन में प्रश्न उठता है कि आखिर इतनी रात में कोयल के बोलने का क्या कारण हो सकता है? क्या वह कोई शुभ या अशुभ सूचना लाई है? इस प्रश्न का उत्तर पाने के लिए वह कोयल से इतनी रात में गाने का कारण पूछने लगता है। कविता अपने आप में, कोयल से पूछी गयी, एक प्रश्न माला है। वास्तव में कोयल काव्य-प्रतीक है, जिसे माध्यम बनाकर कवि नें देशवासियों के मन में राष्ट्रीयता की भावना को जगाने का सार्थक प्रयास किया है।
विशेष-
यह कविता राष्ट्रप्रेम की भावना से प्रेरित हो कर लिखी गयी है। कोयल का इस कविता में बड़े ही सुंदर ढंग से मानवीकरण हुआ है। रूपक और उपमा अलंकार के प्रयोग से काव्य सौंदर्य बहुत आकर्षक बन गया है। इस कविता से हमें आजादी के आंदोलन के समय देश के युवाओं में प्रवाहित देश प्रेम और त्याग बलिदान की भावना का अनुमान होता है।
कठिन शब्द
कोकिल-कोयल, रह-रह जाना-कुछ कहने की इच्छा के साथ रूक जाना, बटमार-लुटेरे, प्रभाव असर, तम-अंधेरा, हिमकर-चंद्रमा, कालिमा मई-काली अंधेरी, आली-सखी, वेदना कष्ट, दर्द, हूक-दर्द भरी टीस, मृदुल कोमल, मीठा, वैभव-समृद्धि, ऐश्वर्य, बावली-पगली, दावानल जंगल की आग, ज्वालायें-लपटें, दीखीं-दिखाई दीं, चर्रक चर्रक चर्र चर्र की आवाज, तान-मधुर आवाज, गान-गीत, अकड़ ऐंठ, सख्ती, मोट-कुएं से पानी खींचने का चरसा, गजबढ़ाना-उपद्रव या आतंक, करूणा-दया, बेधना-काटना, छेद करना, विद्रोह-बीज-विरोध की शुरूआत, रजनी-रात, करनी-क्रिया कलाप, व्यवहार, कल्पना-विचार, शैली, भावना, सोच, कालकोठरी-जेल की कोठरी जिसमें गम्भीर अपराधी बंदी बनाये जाते हैं, कमली कम्बल, लौह श्रृंखला-लोहे की जंजीर, हुंकृति हुंकार, व्याली-सांपिन, संकट-सागर-संकटों या दुखों का समुद्र, कभी न खत्म होने वाला दुख, मदमाती- मस्ती से भरी हुई, नशे में चूर, तैराती यादों में लाती, नसीब-भाग्य, तकदीर, गुनाह-पाप, विषमता – अंतर, भेद, रणभेरी-युद्ध के समय बजाया जानेवाला नगाड़ा, कृति-रचना, व्रत-संकल्प, आसव-मदिरा, नभ-भर-पूरा आकाश, वाह कहावें-प्रशंसा पावें
व्याख्या-
1. कविता के पहले बंद में कैदी के माध्यम से कवि कोयल से पूछता है-हे कोयल ! तुम क्या गा रही हो? गाते-गाते कभी चुप हो जाती हो! आखिर बात क्या है? क्या कोई संदेश लेकर आई हो? कुछ बोलती क्यों नहीं! अगर कोई संदेश लेकर आई हो तो बताओ ! बोलते-बोलते चुप क्यों हो जाती हो? और यह भी तो बताओ कि यह संदेश तुम्हें कहां से मिला है? कुछ तो बोलो!
2. दूसरे बंद में कवि जेल की यातनाओं के वर्णन के बहाने अंग्रेजों के अत्याचार को सबके सामने प्रस्तुत किया गया है। कवि अर्थात बंदी कहता है कि जेल की दीवारें काली और ऊंची हैं। इसके घेरे में तरह तरह के चोर बटमार, लुटेरे, डाकू रहते हैं। यहां पेट भर भोजन के लिए तरस जाना पडता है। हालत यह है कि न जीने दिया जाता है न मरने। तड़प कर रह जाना पडता है। यहाँ आजादी नाम की चीज ही नहीं है। हर समय कड़े पहरे में जीवन बिताना पडता है। पता नहीं यह कैसा शासन है कि सब तरफ उत्पीड़न का अंधकार ही अंधकार है। चंद्रमा भी कहीं चला गया है। धरती से आसमान तक सब जगह निराशा का अंधकार छाया हुआ है। उम्मीद की कहीं कोई रोशनी नहीं है और रात भी भयानक रूप से काली है। कैदी के माध्यम से कवि पूछता है कि हे कोयल ! इस कालिमाम रात में तू क्यों जाग रही हो? तुम्हारे जागने का प्रयोजन क्या है?
3. कविता के तीसरे बंद में कोयल के स्वर में बहुत गहरी वेदना है। इस वेदना में पराधीन भारत की वेदना की तरफ संकेत किया गया है। जेल में बंद स्वतंत्रता सेनानी को लगता है कि कोयल ने अंग्रेज सरकार द्वारा किये जाने वाले अत्याचार को देख लिया है। इसीलिए उसके कंठ से वेदना का स्वर सुनाई पड़ रहा है। कोयल की कुहुक दर्दीली हूक में बदल गयी है। कैदी को लगता है कि कोयल अपनी वेदना सुनाना चाहती है। इसलिए पूछता है, तुम्हें किस बात की चिंता है? किस वेदना के बोझ से कराह रही हो? कुछ बोल क्यों नहीं रही हो? कैदी सोचता है कि कोयल शायद उसके दर्द को समझ रही है, इसलिए उसके मुख से वेदना का स्वर फूट रहा है। वह कोयल से पूछना चाहता है कि मेरी आजादी की तरह क्या तुम्हारा भी कुछ लुट गया है? तुम्हारी मीठी आवाज, जिसके वैभव की तुम स्वामिनी हो, लगता है किसी दुख के कारण कहीं गुम हो गयी है। तुम्हारी बोली में मिठास नहीं है। ऐसा कौन सा दुःख का पहाड़ तुम पर टूट पड़ा है? मुझे भी तो बताओ !
4. इस बंद में जेल के भीतर रात के वातावरण का वर्णन किया गया है। बंदी कोयल से कहता है, इस रात में यहां तुम क्या सुनने आई हो? ये जो तुम्हें घर्र-धर्र की आवाजें सुनाई दे रही हैं, सो रहे बंदियों की स्वांसो की आवाजें हैं। रात में यहां तुम्हें तरह-तरह की आवाजें सुनाई देंगी यातनाओं के दर्द से रो रहे कैदियों की सिसकियों की आवाजें, जेल के भारी भरकम लोहे के फाटक के खुलने बंद होने की आवाजें, सिपाहियों के बूटों की आवाजें, संत्रियों की आवाजें, कैदियों की गिनती के समय एक दो तीन चार की आवाजें। हे कोयल ! जेल की भयावनी रात में, जब हमारे दोनों नेत्रों की प्याली आंसुओं से भरी हुई है, तुम असमय अपना मधुर गाना सुनाने क्यों चली आई हो। दुख की इस मानसिकता में तुम्हारा यह मधुर गान बिल्कुल बेसुरा लग रहा है।
5. पांचवे बंद में सेनानी कैदी को इतनी रात में कोयल का चीखना बड़ा अजीब लग रहा है, इसलिए वह कोयल से पूछता है कि क्या तुम बावली हो गयी हो जो आधी रात को इस तरह चीख रही हो? आखिर तुम्हें हुआ क्या है? आधी रात के सन्नाटे में क्यों चीख रही हो? तुम्हारा इस तरह आधी रात में चीखना मुझे आशंकित कर रहा है। कहीं तुमने जंगल में लगी आग तो नहीं देख लिया है? हे कोयल ! कुछ तो बोलो!! यहां कवि ने जंगल की आग के बहाने कहना चाहा है कि कोयल ने अंग्रेजी हुकूमत के अत्याचारों से जनता में मची चीख पुकार देख लिया है।
6. कैदी कोयल से पूछता है कि हे कोयल ! कहीं ऐसा तो नहीं कि कारागार की भयावहता से क्लांत सेनानी कैदियों के घायल हृदय की पीड़ा को अपने मधुर गीत के अमृत से शांत करने आई हो? या अपने गीत से पेड़ों और हवाओं और जेल की ऊंची दीवारों, की बाधाओं को चीर कर तुम अपनी ताकत आजमाना चाहती हो? यहां कवि संकेतों में कोयल के माध्यम से कहना चाहता है कि जेल की दीवारें भी साहसी सेनानियों के लिए अभेद्य नहीं हैं। गुलामी जितनी भी कड़ी हो, जैसे कोयल अपने हठ से जेल की अलंघ्य दीवारों और पेड़ों की बाधाओं को पार कर अपनी आवाज से जेल को गुंजायमान कर सकती है, वैसे ही गुलामी की कठोर बेड़ियां भी तोड़ी जा सकती हैं। आगे कैदी पूछता है कि कहीं ऐसा तो नहीं कि हमारी आंखों में भरे आंसू अर्थात हमारी पीड़ाओं का शमन करने के लिए, तुमने जेल के ऊंचे टावरों पर जलते हुए गुलामी के दीपों को बुझाने का प्रण कर लिया है? कोयल ! ये दीप तो अंधकार को नष्ट करने के लिए लगाये गये हैं ताकि जेल (अंग्रेज सरकार) की रखवाली किया जा सके ! तुम्हें क्या नभ के इन जलते हुए दीपों (अंग्रेजी सरकार के बने रहने) की शोभा अच्छी नहीं लगती है? अर्थात क्या तुम अंग्रेजो का राज मिटाना चाहती हो?
7. यहाँ कैदी कोयल से कहता है कि हे कोयल ! तुम्हें लोग इसलिए प्यार करते हैं कि तुम रोज प्रातःकाल सूरज की किरणों के साथ ही अपनी मीठी धुन से सारे संसार को जगाती हो। लेकिन आज इस काली अंधेरी रात में क्यों जगा रही हो? क्या तुम सचमुच ही मतवाली हो गयी हो? बोलो! बताओ !
8. इस बंद का काव्य सौंदर्य बड़ा ही मोहक है। इसमें छायावादी बिम्बों और उपमाओं का सघन प्रयोग दिखता है। कवि इस बंद में प्रकाश की किरणों पर कोयल के गीतों को चमकते हुए देखता है। कहता है-हे कोयल ! मैंने, पृथ्वी पर उगी हरी-हरी दूबों पर पड़ी ओस की बूंदों को सुखाती, विन्ध्या के झरनों पर मोती बिखेरती, गगन ऊँचे-ऊँचे पेड़ों वाले वनों और पूरे ब्रहमाण्ड को झकझोर देने वाली हवाओं पर अठखेलियां करती प्रातः कालीन किरणों पर तुम्हारे गीतों को थिरकते हुए देखा है।
9. कैदी के माध्यम से कवि कहता है कि हे कोयल ! मीठे गान सुना कर संसार का मन प्रसन्न करना तुम्हारा स्वभाव है। मुश्किल समयों में भी तुम अपना स्वभाव नहीं छोड़ती। फिर ऐसा क्यों है कि तुम इस काली रात में, जेल की दीवारों के भीतर जल रहे दीप को बुझाना चाहती हो? इसका सर्वनाश करना चाहती हो? अंधकार के पत्तों पर अपनी चमकीली तानें लिखने की तुम्हारी विवशता का क्या कारण है? अर्थात गुलामी के अंधकार को क्यों मिटाना चाहती हो?
10. कैदी कोयल से पूछता है- क्या हमें इन जंजीरों में जकड़े देखना तुम्हें सह नहीं लग रहा? फिर स्वयं ही कोयल को समझाते हुए कहता है कि अरे! ये हथकड़ियां नहीं हैं, ये तो हम सेनानियों को ब्रिटिश राज का दिया आभूषण है। हम सेनानियों को गुलाम देश में यही शोभा देता है। और कोल्हूं का यह चर्रक चूं? यह तो अब हमारे जीवन की लय बन चुका है-प्रेरणा का संगीत। यातनाओं के कोल्हूं में पिसते रहना ही हम सेनानियों के जीवन का यथार्थ है। पत्थर तोड़ते-तोड़ते हमारी उंगलियां उन्हीं पत्थरों पर भारत माता की आजादी का गाना लिखने लगती है। हम पेट पर ‘मोट’ का जुआं बांध कर ब्रिटिश राज की अकड़ के कुंए को खाली कर रहे हैं। अर्थात इतनी यातनायें सहकर हम ब्रिटिश राज की अकड़ ढीली कर रहे हैं। हमारे अंदर यातनाओं को सहने का गजब का धैर्य है। हम नहीं चाहते कि हमारी यातना देख लोगों के भीतर करूणा का संचार हो, लोगों की आंख में आंसू आये। परन्तु इतनी रात में तुम्हारी वेदना भरी चीख से मेरा मन विदीर्ण हो रहा है।
11. इन पंक्तियों में कवि कोयल को संबोधित करते हुए कहता है कि वातावरण में सन्नाटा पसरा है, चारों ओर अंधकार फैला हुआ है। तुम्हारी रूलाई इस अंधकार को बेध रही है। मगर यह तो बताओ कि तुम रो क्यों रही हो? ब्रिटिश शासन के विरुद्ध विद्रोह का मधुर-बीज क्यों बो रही हों? क्या तुम भी स्वतंत्रता सेनानियों की तरह देशभक्ति का व्रिदोह-बीज बोना चाहती हो?
12. इस बंद में जेल में सेनानियों के साथ हो रहे उत्पीड़न का वर्णन है। कवि कोयल से कह रहा है कि देखो! तू भी काली है और ये दुखों की रात भी काली है। हम जिस कोठरी में रहते हैं, वह भी काली है और आस-पास चलने वाली हवा के साथ-साथ यहाँ से मुक्ति पाने की हमारी कल्पना काली है। अंग्रेजी सरकार की करतूतें काली है। जेल की दीवारें काली हैं। इन दीवारों के भीतर की हवा काली है, मेरी ये टोपी काली है और जो कम्बल मैं ओढ़ता हूँ वह भी काला है। जिन जंजीरों में मुझे बांधा गया है, वह भी काली है। दिन-रात कठोर यातनायें सहने के अलावा पहरेदारों की गाली भी सुनना पड़ता है। यह डांट और गाली किसी काले सांप की तरह हमें डंसने को दौड़ती हैं।
13. यहां कवि कोयल को संबोधित करते हुए कहता हैं ऐसा क्यों है कि यहां अपार संकट सामने खड़ा है और तुम मरने को उद्यत दिखाई देती हो ! तुम तो स्वतंत्र हो, फिर आधी रात में जेल रूपी संकट के सागर पर आशा और उत्साह से भरपूर अपने चमकीले गीतों को क्यों तैरा रही हो? अर्थात जेल के इस उदास सन्नाटे में स्वतंत्रता की भावना जागृत करने वाले मदमस्त करने वाले गीत क्यूँ गाए जा रही हो? कारागार के समीप घूम-फिरकर ओज-तेज का संचार क्यों कर रही हो? हे कोयल ! कुछ तो बोलो।
14. कवि कहता है कि हे कोयल ! तू मैना जैसी बंदिनी नहीं है, तुम्हारा पालन किसी सोने के पिंजरे में नहीं हुआ है, कोई तुझे कुछ खिलाता भी नहीं है, तूम न तो तोता हो न तूती, तुम हर तरह से आजाद हो, एक सेनानी की तरह तुम्हारा जीवन भी युद्ध भूमि के समान है- सब तरफ संघर्षो से घिरा हुआ। तुम्हारी बोली किसी शंखनाद से कम नहीं है। कोकिला और सेनानी की तुलना करके कवि ने दोनों को समतुल्य बना दिया है।
15. इस बंद में कैदी कोयल से पूछता है कि तुम कहां से आवाज दे रही हो! जेल की दीवारों के उस पार से या भीतर से? अपना हृदय टटोल कर बताओं कि वास्तव में तुम हो कहां (अर्थात तुम किसे जाग्रत करना चाहती हो, सेनानियों को या अंग्रेजों को)। तुमकाली जरूर हो लेकिन तुम्हारा त्याग बहुत धवल है। काली होने के बावजूद आर्यों के इस देश में तुम पूजनीय हो। हे कोयल ! कुछ बोलती क्यों नहीं ?
16. इस पद में हर तरह से आजाद कोयल एवं बेड़ियों में जकड़े कैदी की मनःस्थिति की तुलना बड़े ही मार्मिक ढंग से की गयी है। कोयल को संबोधित करते हुए कवि कहता कि हे कोयल ! तुम पूरी तरह आजाद हो, तुम्हें हरी भरी डालियों पर बसेरा बनाने की छूट है, पूरा आसमान तुम्हारा है, जहां, जब चाहो जा सकती हो। तुम्हारे गीतों पर लोग खुश होकर तालियां बजाते हैं। वाह-वाह ! करते हैं। इधर हम कैदियों का रोना कराहना सुनने के लिए कोई तैयार ही नहीं है। तुम कहीं पर भी विचरण कर सकती हो और मनचाहे गीत गा सकती हो। लेकिन हमें, हमेशा अंधकार से भरी, 10 फुट की छोटी सी कोठरी में रहना पड़ता है। अपनी इच्छानुसार कुछ भी नहीं कर सकना यहां असंभव है। हमारे और तुम्हारे जीवन में जमीन आसमान का फर्क है, तुम्हें आजादी ही आजादी है, जब कि मेरे भाग्य में अंधकार से भरी रात है। समझ में नहीं आता कि युद्ध का यह राग क्यों गाये जा रही हो? इस रहस्यमय ढंग से तुम्हारे गाने का आशय क्या है? मुझे बताओ कोयल !
17. कवि कोयल की पुकार पर कुछ भी करने को तैयार है। कोयल से कहता है, हे कोयल ! बताओ अपनी कृति से और क्या कर दूं। मोहन यहां मोहनदास करमचंद गांधी के लिए प्रयोग किया गया है। मोहन के व्रत पर प्राणों का आसव से कवि का अभिप्राय यह है कि कोयल यदि कहे तो वह गांधी जी के संकल्पों को पूरा करने के लिए अपने प्राणों को न्यौछावर भी कर सकता हूं। देशवासियों के दिलों में गुलामी के खिलाफ लड़ने का मंत्र फूँक सकता हूं।
18. कोयल को लगातार गाते देख कैदी पूछता है, हे कोयल ! तुम्हारा यह गाना बंद भी होगा या हर समय गाती ही रहोगी? क्या तुमने अपनी आवाज की मधुरता को गुलामी के अंधकार में दफन कर देने की ठान ली है? अर्थात क्या तुम अंग्रेजों की गुलामी के सामने झुकने को तैयार नहीं हो? क्या तुम्हें पता नहीं कि यह अत्याचारी आकाश कमजोरों को निगल जाता है? आखिर क्यों अपने आप को उसका निवाला बनाने पर आमादा हो? अर्थात आजादी की लड़ाई का जोखिम क्यों उठाना चाहती हो? जेल के जिन बंदियों में तुम करूणा जगाना चाहती हो, वे अभी जेल की कठोर बंदिशों के बीच अपनी स्मृतियों के साथ सो रहे हैं। क्या तुम नींद में अचेत पड़े लोगों को आजादी का संदेश दे पाओगी?
19. अंतिम बंद में कैदी कोयल से पूछता है कि क्या तुम्हें यकीन है कि इन सोये हुए कैदियों की सांसों के रास्ते तुम्हारा रूदन इनकी आत्मा तक पहुंच जायेगा? बताओ कोयल ! और यह भी बताओ कि क्या सुबह जब कैदी नींद से जागेंगे तो सब कुछ उलट-पुलट हो जायेगा? क्या गुलामी का राज उखाड़ कर नष्ट हो जायेगा? बोलो कोयल !
काव्य सौष्ठव-
कविता की संबोधन वाचक और प्रश्न वाचक शैली आत्मीयता की भावना जगाती है।
कोयल को माध्यम बनाकर लिखी गई इस कविता में अन्योक्ति अलंकार का बड़ा सुंदर प्रयोग किया गया है। इससे कविता का सौंदर्य बहुत बढ़ गया है।
लय और छंद की झंकार अलग से अपना ध्यान आकर्षित करती है। संस्कृतनिष्ठ और तत्सम शब्दों का प्रयोग खूब हुआ है किन्तु भाषा में लालित्य का प्रवाह तनिक भी कम नहीं हुआ है।
काव्य-भाषा सांकेतिक है। कहीं-कहीं काव्यालंकारों का बड़ा मनोहारी प्रयोग हुआ है।
कवि ने भावानुकूल तत्सम शब्दों वाली खड़ी बोली का प्रयोग किया है।
पुष्प का मानवीकरण बहुत सुंदर ढंग से किया गया है।
विशेष-
देश प्रेम और स्वाधीनता की चेतना जगाना इस कविता का प्रमुख उद्देश्य है। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए कवि ने काव्य सौंदर्य को कहीं हल्का नहीं होने दिया है। यह कविता अपनी सघन प्रतीकात्मकता, सांकेतिकता, आलंकारिकता और शब्द योजना की दृष्टि से भी बहुत महत्वपूर्ण है। इसका उदात्त भाव इसे अलग से श्रेष्ठ बनाता है।
Kaisi aur kokila question answers
बोध प्रश्न-1
निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर संक्षेप में दें।
1. ‘पुष्प की अभिलाषा’ में कवि क्या संदेश देना चाहता है?
2. ‘पुष्प की अभिलाषा’ में पुष्प माली से क्या कहता है?
3. ‘कैदी और कोकिला’ का सारांश लिखिये।
4. ‘कैदी और कोकिला’ कविता के आधार पर पराधीन भारत की जेलों में स्वतंत्रता संग्राम के सेनानियों को दी जाने वाली यातनाओं का वर्णन कीजिए।
5. ‘कैदी और कोकिला’ में हथकड़ियों को गहना क्यों कहा गया है?
बोध प्रश्न-2
वस्तुनिष्ठ प्रश्न
i. ‘पुष्प की अभिलाषा’ शीर्षक कविता, किस पुस्तक से ली गयी है?
क) हिम किरीटिनी
ख) हिम तरंगिनी
ii. पुष्प किस पथ पर बिखेरा जाना चाहता है?
ग) समर्पण
घ) वेणु ले गूंजे धरा
क) राज पथ पर
ख) बाजार के पथ पर
ग) शहीद पथ पर
घ) जिस पथ से मातृभूमि पर शीश चढ़ाने के लिए वीर सैनिक जाते हैं।
iii. पुष्प अपनी अभिलाषा किसके सामने प्रकट कर रहा है?
क) कवि के सामने
ख) सुर बाला के सामने
ग) सैनिक के सामने
घ) माली के सामने
iv. ‘पुष्प की अभिलाषा’ कविता की मूल भावना क्या है?
क) भगवद् भक्ति की भावना
ग) अंग्रेजों पर शासन की भावना
ख) देश भक्ति की भावना
घ) युद्ध की भावना
v. पुष्प की अभिलाषा कविता के माध्यम से किसकी अभिलाषा व्यक्त हुई है?
क) कवि की अभिलाषा
घ) देश प्रेमी की अभिलाषा
ख) सम्राट की अभिलाषा
ग) सुंदरी की अभिलाषा
vi. ‘कैदी और कोकिला किस संग्रह में संकलित है?
क) ‘हिमकिरीटिनी’
घ) समय के पांव
ख) बिजुरी काजल आंज रही
vii. ‘कैदी और कोकिला’ में जंजीरों को क्या कहा गया है?
क) उत्पीड़न का औजार
ख) गहना
ग) गुलामी का प्रतीक
घ) कुछ नहीं
viii. कैदी और कोयल में क्या समानता है?
क) दोनों गायक हैं
ख) दोनों कैदी हैं
ग) दोनो स्वतंत्रता से प्रेरित हैं
घ) दोनों घायल हैं
ix. कवि ने किस शासन की तुलना तम के प्रभाव से की है?
क) मुगल शासन की
ख) रूसी शासन की
ग) भारतीय शासन की
घ) ब्रिटिश शासन की
पराधीन भारत में कैदियों के साथ कैसा व्यवहार किया जाता था? X
क) अमानवीय
ख) सामान्य
ग) राजसी
घ) सम्माननीय
xi. कैदी ने देश की आजादी के लिए किसके विरूद्ध संघर्ष किया?
क) अंग्रेजी शासन
ख) कांग्रेस शासन
ग) मुगल शासन
घ) स्थानीय शासन xii. हथकड़ियों को कविता में क्या कहा गया है?
क) गहना
ख) बेड़ी
ग) बंधन
घ) पराधीनता
xiii. कोयल किस समय चीख रही थी?
क) दोपहर में
ख) आधी रात में
ग) कभी नहीं
घ) सूरज निकलने पर
xiv. कैदी की कोठरी कितने फुट की थी?
क) 10 फुट
ख) 5 फुट
ग) 3 मीटर
घ) 10 गज
xv. ‘कैदी और कोयल’ में कवि ने अंग्रेजी शासन की तुलना किस रंग से की है?
क) काला
ख) नीला
ग) सफेद
घ) हरा
16.3 उपयोगी पुस्तकें
माखन लाल चतुर्वेदीः एक अध्ययन, लेखक श्री नर्मदा प्रसाद खरे।
16.4 बोध प्रश्नों के उत्तर
बोध प्रश्न – 1
1. ‘पुष्प की अभिलाषा’ कविता ब्रिटिश शासन की गुलामी से आजादी के लिए देश के नौजवानों में देश प्रेम की भावना जगाने के लिए लिखी गयी थी। इस कविता में कवि ने देश के प्रति समर्पित होने का संदेश दिया है। पुष्प के माध्यम से कवि ने प्रेरणा दी है कि हमें अपने देश के लिए त्याग बलिदान करने में पीछे नहीं रहना चाहिए।
2. भारत देश के स्वतंत्रता सेनानी अंग्रेजों से आजादी के लिए लड़ाई कर रहे थे। यह कविता जनता में देशप्रेम की भावना पैदा करने के लिए लिखी गयी थी। इस कविता में माली से फूल कहता है, हे माली! सुनो! मैं नहीं चाहता कि मुझे किसी सुंदर स्त्री के आभूषण में गूंथा जाय जिससे कि युवती का आकर्षण बढ़ जाय। मुझे किसी सुंदरी के गले का आभूषण बनने की इच्छा बिल्कुल ही नहीं है। मैं किसी युवती के श्रृंगार का उपकरण नहीं बनना चाहता। किसी प्रेमी की माला में गुंथ कर उसकी प्रेमिका को ललचाने की भी मुझे कोई इच्छा नहीं है। हे माली! तुम मुझे किसी सम्राट के शव पर डाले जाने से बचाना। हमें इस तरह का सम्मान पाने की भूख बिल्कुल नहीं है। किसी देवता के सिर पर चढ़ने का सौभाग्य प्राप्त करने की भी मुझे कोई चाह नहीं है। देशप्रेम के सामने ये सब बहुत तुच्छ इच्छायें हैं। हमारी अभिलाषा तो मातृभूमि को आजाद कराने के लिए शीश कटाने को तैयार वीरों के चरण चूमना चाहते हैं। अतः तुम हमें उस रास्ते पर बिखेर देना जिस रास्ते से देशप्रेमी सैनिक मातृभूमि की रक्षा के लिए शीश कटाने जा रहे होते हैं।
3. कैदी और कोकिला कविता में कवि ने अंग्रेजी शासन द्वारा किये गये अत्याचारों व जेल में कैदियों को दी जाने वाली यातनाओं तथा अपने दुख और असंतोष का वर्णन किया है। कविता का सारांश यह है कि कवि आजादी के आंदोलन में जेल चला गया है। जेल में उसपर बहुत अत्याचार किया जाता है। उसे उम्मीद नहीं है कि ब्रिटिश शासन कभी खत्म होगा। रात में नींद नहीं आ रही है। आधी रात किसी कोयल के कूकने की आवाज सुनकर वह चौंक जाता है। उसे कोयल का इतनी रात में कूकना बड़ा रहस्यमय लगता है। कविता में वह कोयल को संबोधित करके पूछता है, कि तू इतनी रात को क्या कहना चाह रही है? मैं जेल में हूं तू स्वतंत्र है, मुझे रोना भी गुनाह है, तू इस अंधेरी रात में चीख-चीख कर क्यों बावली हो रही है? ऐसा लगता है तू मेरे दुख से दुखी होकर इतनी रात में करूणा भरे स्वर में बोल रही हो और अंग्रेजों के अत्याचार का मुकाबला करने के लिए प्रेरित कना चाह रही हो। कवि ने स्वतंत्रता सेनानियों व भारतीय जनता के देश पर न्यौछावर हो जाने की प्रेरणा देने के लिए इस कविता की रचना की है।
4. पराधीन भारत में स्वतंत्रता सेनानियों को जेलों में तरह तरह से अमानवीय यातनायें दी जाती थीं। कविता में इस यातना का वर्णन करते हुए कवि ने कहा है कि ब्रिटिश राज में राजनैतिक कैदियों के साथ चोर डाकुओं जैसा व्यवहार किया जाता था। हथकड़ियों में जकड़ कर उन्हें चोरों डाकुओं के साथ अंधेरी काल कोठरी में रखा जाता था। पेट भर भोजन नहीं दिया जाता था। कोल्हू में उन्हें जोत कर पानी निकलवाया जाता था। जेलर सिपाहियों की निगरानी में रखा जाता था और तरह-तरह से अपमानित किया जाता था।
5. गहना आभूषण को कहते हैं। गहना का हमारे जीवन में महत्व इसलिए है क्योंकि वह धारण करने वाले व्यक्ति के सौंदर्य को बढ़ा देता है। अंग्रेजों से लोहा लेने वाले वीरों को जब जेल भेजा जाता था तो समाज में उनकी प्रतिष्ठा बढ जाती थी। बेडी और हथकड़ी में जकड़ा हुआ सेनानी गर्व का अनुभव करता था क्योंकि उसके अंदर मातृभूमि के लिए हर कष्ट सहन करने का जज्बा होता था। जेल क्रांतिकारियों का प्रिय आवास होता था तथा पावों में बेडियां और हथकडियां पहन कर गहना पहने होने जैसा संतोष होता था। इसलिए कैदी ने कोकिला से कहा कि बेड़ियां और हथकड़ियां तो क्रांतिकारियों का गहना है।