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Navagraha Stotram (नवग्रह स्तोत्रम्)

नवग्रह स्तोत्र (Navagraha Stotram) – अर्थ और लाभ

नवग्रह स्तोत्र (Navagraha Stotram) – अर्थ, महत्त्व और संपूर्ण पाठ

नवग्रह स्तोत्र (Navagraha Stotram) हिंदू धर्म का एक अत्यंत प्रभावशाली और पवित्र स्तोत्र है। इसकी रचना महर्षि वेदव्यास ने नौ ग्रहों (नवग्रहों) को शांत करने और उनकी कृपा प्राप्त करने के लिए की थी। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, मनुष्य के जीवन में सुख-दुःख ग्रहों की चाल पर निर्भर करते हैं। इस स्तोत्र का नियमित पाठ करने से कुंडली के ग्रह दोष दूर होते हैं।

नवग्रह स्तोत्र के बारे में (About)

नवग्रह स्तोत्र संस्कृत भाषा में रचित है और इसमें नौ श्लोक हैं, जो क्रमशः सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु और केतु को समर्पित हैं। इसे ‘ग्रह शांति’ का एक अचूक उपाय माना जाता है। चाहे शनि की साढ़ेसाती हो या राहु-केतु का दोष, श्रद्धालु सदियों से इस स्तोत्र का पाठ करके राहत और मानसिक शांति प्राप्त करते आ रहे हैं।

इतिहास (History)

इस दिव्य स्तोत्र की रचना महर्षि वेदव्यास (Maharishi Veda Vyasa) ने की थी। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, व्यास जी ने मानव कल्याण के लिए वेदों और पुराणों के साथ-साथ ऐसे स्तोत्रों की रचना भी की जो आम जनमानस को दैवीय प्रकोपों से बचा सकें। ‘नवग्रह स्तोत्र’ में ऋषि व्यास ने यह आश्वासन दिया है कि इसका पाठ करने से न केवल ग्रहों की पीड़ा शांत होती है, बल्कि चोर, अग्नि और बुरे सपनों का भय भी मिट जाता है।


नवग्रह स्तोत्र (मूल संस्कृत और हिंदी अर्थ)

१. सूर्य (Sun)

मूल श्लोक:
जपाकुसुम संकाशं काश्यपेयं महद्युतिम् ।
तमोऽरिं सर्वपापघ्नं प्रणतोऽस्मि दिवाकरम् ॥ १ ॥

हिंदी अर्थ:
जिनकी कांति गुडहल (जपा) के फूल के समान लाल है, जो कश्यप ऋषि के पुत्र हैं, जो महातेजस्वी हैं, अंधकार के शत्रु हैं और सब पापों का नाश करने वाले हैं, उन सूर्य देव (दिवाकर) को मैं प्रणाम करता हूँ।

२. चन्द्र (Moon)

मूल श्लोक:
दधिशंखतुषाराभं क्षीरोदार्णव सम्भवम् ।
नमामि शशिनं सोमं शम्भोर्मुकुट भूषणम् ॥ २ ॥

हिंदी अर्थ:
जिनका रंग दही, शंख और बर्फ (तुषार) के समान श्वेत है, जो क्षीरसागर से उत्पन्न हुए हैं और भगवान शिव के मुकुट की शोभा हैं, उन चन्द्र देव (सोम) को मैं नमस्कार करता हूँ।

३. मंगल (Mars)

मूल श्लोक:
धरणीगर्भ संभूतं विद्युत्कान्ति समप्रभम् ।
कुमारं शक्तिहस्तं तं मंगलं प्रणमाम्यहम् ॥ ३ ॥

हिंदी अर्थ:
जो पृथ्वी देवी के गर्भ से उत्पन्न हुए हैं, जिनकी चमक बिजली की कौंध के समान है, जो कुमार स्वरूप हैं और हाथों में शक्ति (आयुध) धारण करते हैं, उन मंगल देव को मैं प्रणाम करता हूँ।

४. बुध (Mercury)

मूल श्लोक:
प्रियंगुकलिकाश्यामं रूपेणाप्रतिमं बुधम् ।
सौम्यं सौम्यगुणोपेतं तं बुधं प्रणमाम्यहम् ॥ ४ ॥

हिंदी अर्थ:
जिनका वर्ण ‘प्रियंगु’ की कली के समान गहरा साँवला है, जिनका रूप अनुपम है, जो सौम्य हैं और सौम्य गुणों से संपन्न हैं, उन बुध देव को मैं प्रणाम करता हूँ।

५. गुरु (Jupiter)

मूल श्लोक:
देवानांच ऋषीणांच गुरुं कांचनसन्निभम् ।
बुद्धिभूतं त्रिलोकेशं तं नमामि बृहस्पतिम् ॥ ५ ॥

हिंदी अर्थ:
जो देवताओं और ऋषियों के गुरु हैं, जिनकी आभा सोने (कांचन) के समान है, जो साक्षात बुद्धि के स्वरूप हैं और तीनों लोकों के स्वामी हैं, उन बृहस्पति देव को मैं नमन करता हूँ।

६. शुक्र (Venus)

मूल श्लोक:
हिमकुन्दमृणालाभं दैत्यानां परमं गुरुम् ।
सर्वशास्त्रप्रवक्तारं भार्गवं प्रणमाम्यहम् ॥ ६ ॥

हिंदी अर्थ:
जिनकी कांति बर्फ, कुंद के फूल और कमलनाल (मृणाल) के समान श्वेत है, जो दैत्यों के परम गुरु हैं और सभी शास्त्रों के ज्ञाता/वक्ता हैं, उन भार्गव (शुक्र) को मैं प्रणाम करता हूँ।

७. शनि (Saturn)

मूल श्लोक:
नीलांजनसमाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम् ।
छायामार्तण्ड संभूतं तं नमामि शनैश्चरम् ॥ ७ ॥

हिंदी अर्थ:
जिनकी आभा नीले अंजन (काजल) के समान है, जो सूर्यपुत्र हैं और यमराज के बड़े भाई हैं, जो छाया और सूर्य (मार्तण्ड) से उत्पन्न हुए हैं, उन शनि देव को मैं नमन करता हूँ।

८. राहु (Rahu)

मूल श्लोक:
अर्धकायं महावीर्यं चन्द्रादित्य विमर्दनम् ।
सिंहिकागर्भसंभूतं तं राहुं प्रणमाम्यहम् ॥ ८ ॥

हिंदी अर्थ:
जिनका शरीर आधा है, जो महापराक्रमी हैं, जो सूर्य और चन्द्रमा को भी पीड़ित (ग्रहण) करते हैं और सिंहिका के गर्भ से उत्पन्न हुए हैं, उन राहु को मैं प्रणाम करता हूँ।

९. केतु (Ketu)

मूल श्लोक:
पलाशपुष्पसंकाशं तारकाग्रहमस्तकम् ।
रौद्रं रौद्रात्मकं घोरं तं केतुं प्रणमाम्यहम् ॥ ९ ॥

हिंदी अर्थ:
जिनकी चमक पलाश के फूल के समान (धूम्र/लाल) है, जो तारों और ग्रहों में प्रधान हैं, जो रौद्र रूप वाले और भयानक हैं, उन केतु को मैं प्रणाम करता हूँ।


फलश्रुति (Benefits)

इति व्यासमुखोद्गीतं यः पठेत् सुसमाहितः ।
दिवा वा यदि वा रात्रौ विघ्नशान्तिर्भविष्यति ॥
नरनारीनृपाणांच भवेत् दुःस्वप्ननाशनम् ।
ऐश्वर्यमतुलं तेषां आरोग्यं पुष्टिवर्धनम् ॥

अर्थ:
व्यास जी के मुख से निकले इस स्तोत्र का जो भी व्यक्ति एकाग्रचित्त होकर (दिन या रात में) पाठ करता है, उसकी सभी बाधाएं शांत हो जाती हैं। स्त्री, पुरुष या राजा—सभी के बुरे सपने नष्ट हो जाते हैं और उन्हें अतुलनीय ऐश्वर्य, आरोग्य और पुष्टि (बल) की प्राप्ति होती है। व्यास जी कहते हैं कि इसमें कोई संदेह नहीं है।

रोचक तथ्य (Trivia)

  • रचयिता: इस स्तोत्र के रचयिता महर्षि वेदव्यास हैं, जिन्होंने महाभारत की रचना भी की थी।
  • पुष्प उपमा: सूर्य देव के लिए ‘जपाकुसुम’ (गुडहल) और केतु के लिए ‘पलाश पुष्प’ की उपमा का प्रयोग उनके रंग और तीव्रता को दर्शाने के लिए किया गया है।
  • शनि-यम संबंध: इस स्तोत्र में शनि देव को ‘यमाग्रज’ (यमराज का बड़ा भाई) कहकर संबोधित किया गया है, जो सूर्य की संतानों के रूप में उनके संबंध को दर्शाता है।
  • सुरक्षा कवच: फलश्रुति में विशेष रूप से उल्लेख है कि यह ‘दुःस्वप्न नाशनम्’ है, यानी यह बुरे सपनों और अज्ञात भय को दूर करता है।

शिव पंचाक्षर स्तोत्र (Shiv Panchakshar Stotra)

शिव पंचाक्षर स्तोत्र – अर्थ और बोल | Shiv Panchakshar Stotra Lyrics & Meaning in Hindi

शिव पंचाक्षर स्तोत्र (Shiv Panchakshar Stotra)

रचयिता: आदि शंकराचार्य (Adi Shankaracharya)

परिचय (About)

शिव पंचाक्षर स्तोत्र भगवान शिव की उपासना में रचित सबसे लोकप्रिय और प्रभावशाली स्तोत्रों में से एक है। इसकी रचना आदि शंकराचार्य ने की थी। यह स्तोत्र भगवान शिव के पंचाक्षर मंत्र ‘नमः शिवाय’ पर आधारित है। इसमें कुल 5 मुख्य श्लोक हैं, और प्रत्येक श्लोक मंत्र के एक अक्षर (न, म, शि, वा, य) को समर्पित है। यह न केवल भक्ति का प्रतीक है, बल्कि यह पंचतत्वों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) के साथ शिव के संबंध को भी दर्शाता है।

गीत के बोल (Lyrics)

श्लोक १

नागेन्द्रहाराय त्रिलोचनाय, भस्माङ्गरागाय महेश्वराय। नित्याय शुद्धाय दिगम्बराय, तस्मै ‘न’ काराय नमः शिवाय॥१॥

Nagendraharaya Trilochanaya, Bhasmangaragaya Maheshvaraya. Nityaya Shuddhaya Digambaraya, Tasmai ‘Na’ karaya Namah Shivaya. ||1||

श्लोक २

मन्दाकिनीसलिलचन्दनचर्चिताय, नन्दीश्वरप्रमथनाथमहेश्वराय। मन्दारपुष्पबहुपुष्पसुपूजिताय, तस्मै ‘म’ काराय नमः शिवाय॥२॥

Mandakini salila chandana charchitaya, Nandishvara pramathanatha maheshvaraya. Mandara pushpa bahupushpa supoojitaya, Tasmai ‘Ma’ karaya Namah Shivaya. ||2||

श्लोक ३

शिवाय गौरीवदनाब्जवृन्द-, सूर्याय दक्षाध्वरनाशकाय। श्रीनीलकण्ठाय वृषध्वजाय, तस्मै ‘शि’ काराय नमः शिवाय॥३॥

Shivaya Gauri vadanabja vrinda-, Suryaya dakshadhvara nashakaya. Shri Nilakanthaya Vrishadhvajaya, Tasmai ‘Shi’ karaya Namah Shivaya. ||3||

श्लोक ४

वसिष्ठकुम्भोद्भवगौतमार्य-, मुनीन्द्रदेवार्चितशेखराय। चन्द्रार्कवैश्वानरलोचनाय, तस्मै ‘व’ काराय नमः शिवाय॥४॥

Vasistha kumbhodbhava gautamarya-, Munindra devarchita shekharaya. Chandrarka vaishvanara lochanaya, Tasmai ‘Va’ karaya Namah Shivaya. ||4||

श्लोक ५

यक्षस्वरूपाय जटाधराय, पिनाकहस्ताय सनातनाय। दिव्याय देवाय दिगम्बराय, तस्मै ‘य’ काराय नमः शिवाय॥५॥

Yaksha svaroopaya jatadharaya, Pinakahastaya sanatanaya. Divyaya devaya digambaraya, Tasmai ‘Ya’ karaya Namah Shivaya. ||5||

फलश्रुति

पञ्चाक्षरमिदं पुण्यं यः पठेच्छिवसंनिधौ। शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते॥

Panchaksharamidam punyam yah pathechchiva sannidhau, Shivalokamavapnoti shivena saha modate.

इतिहास (History)

शिव पंचाक्षर स्तोत्र की रचना 8वीं शताब्दी के महान दार्शनिक आदि शंकराचार्य द्वारा की गई थी। उस समय भारत में कई मत-मतांतर प्रचलित थे, और शंकराचार्य ने अद्वैत वेदांत और पंचायतन पूजा को पुनः स्थापित किया। उन्होंने वेदों के सार को आम जनमानस तक पहुँचाने के लिए सरल संस्कृत में कई स्तोत्र रचे। यह स्तोत्र यजुर्वेद में वर्णित ‘नमः शिवाय’ मंत्र की व्याख्या करता है।

अर्थ विश्लेषण (Meaning Analysis)

  • ‘न’ कार (पृथ्वी तत्व): जो नागराज को हार के रूप में धारण करते हैं, जिनके तीन नेत्र हैं, और जो भस्म लगाए हुए हैं। ऐसे ‘न’ अक्षर स्वरूप भगवान शिव को नमस्कार है।
  • ‘म’ कार (जल तत्व): जो गंगाजल और चंदन से सुशोभित हैं, जो नंदी और गणों के स्वामी हैं, और मंदार पुष्पों से पूजे जाते हैं। ऐसे ‘म’ अक्षर स्वरूप शिव को नमस्कार है।
  • ‘शि’ कार (अग्नि तत्व): जो माता पार्वती (गौरी) के मुख कमल को खिलाने के लिए सूर्य समान हैं, जिन्होंने दक्ष के यज्ञ का नाश किया, और जिनका कंठ नीला है। ऐसे ‘शि’ अक्षर स्वरूप शिव को नमस्कार है।
  • ‘व’ कार (वायु तत्व): जिनकी पूजा वसिष्ठ, अगस्त्य और गौतम जैसे महान ऋषि करते हैं, और जिनके नेत्र सूर्य, चंद्रमा और अग्नि हैं। ऐसे ‘व’ अक्षर स्वरूप शिव को नमस्कार है।
  • ‘य’ कार (आकाश तत्व): जो यक्ष का रूप धारण करने वाले (या यक्षों द्वारा पूजित), जटाधारी, हाथ में पिनाक धनुष लिए हुए सनातन देव हैं। ऐसे ‘य’ अक्षर स्वरूप शिव को नमस्कार है।

रोचक तथ्य (Trivia)

  • यह स्तोत्र ‘नमः शिवाय’ मंत्र के प्रत्येक अक्षर (न, म, शि, वा, य) पर आधारित है।
  • माना जाता है कि इन 5 श्लोकों का संबंध पंचमहाभूतों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) से है।
  • आदि शंकराचार्य ने 8वीं शताब्दी में अद्वैत वेदांत के प्रचार के दौरान इसकी रचना की थी।
  • इस स्तोत्र को शिव मानस पूजा और शिव तांडव स्तोत्र के साथ भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए सबसे प्रभावी माना जाता है।

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