Category: Stotram (Page 2 of 2)

Stotram

या देवी सर्वभूतेषु | Ya Devi Sarvabhuteshu Lyrics

या देवी सर्वभूतेषु

सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके।
शरण्ये त्र्यंबके गौरी नारायणि नमोस्तुते॥

या देवी सर्वभूतेषु विष्णुमायेति शब्दिता |
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

या देवी सर्वभूतेषु चेतनेत्य भिधीयते।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

या देवी सर्वभूतेषु बुद्धि-रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

या देवी सर्वभूतेषु निद्रा-रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

या देवी सर्वभूतेषु क्षुधा-रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

या देवी सर्वभूतेषु छाया-रुपेण संस्थिता |
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

या देवी सर्वभूतेषु शक्ति-रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

या देवी सर्वभूतेषु तृष्णा-रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

या देवी सर्वभूतेषू क्षान्ति रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

या देवी सर्वभूतेषू जाति रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

या देवी सर्वभूतेषू लज्जा-रुपेण संस्थिता |
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

या देवी सर्वभूतेषु शांति-रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

या देवी सर्वभूतेषु श्रद्धा-रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

या देवी सर्वभूतेषू कान्ति रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

या देवी सर्वभूतेषु लक्ष्मी-रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

या देवी सर्वभूतेषु व्रती-रुपेणना संस्थिता |
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

या देवी सर्वभूतेषु स्मृती-रुपेण संस्थिता |
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

या देवी सर्वभूतेषु दया-रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

या देवी सर्वभूतेषु तुष्टि-रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

या देवी सर्वभूतेषु मातृ-रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

या देवी सर्वभूतेषु भ्राँति-रूपेण संस्थिता |
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

इन्द्रियाणा मधिष्ठात्री भूतानां चाखिलेषु या |
भूतेषु सततं तस्यै व्याप्तिदेव्यै नमो नमः ||

चितिरुपेण या कृत्स्नम एतत व्याप्य स्थितः जगत
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

तंत्रोक्त देवी सूक्तम् : Tantroktam Devi Suktam Lyrics : Ya Devi Sarvbhuteshu

तंत्रोक्त देवी सूक्तम् अर्थ सहित 

सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके।

शरण्ये त्र्यंबके गौरी नारायणि नमोस्तुते॥

भावार्थ : हे नारायणी! तुम सब प्रकार का मंगल प्रदान करने वाली मंगल मयी हो। कल्याण दायिनी शिवा हो। सब पुरुषार्थो को (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष को) सिद्ध करने वाली हो। शरणागत वत्सला, तीन नेत्रों वाली एवं गौरी हो। हे नारायणी, तुम्हें नमस्कार है।

या देवी सर्वभूतेषु शक्ति-रूपेण संस्थिता।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

भावार्थ : जो देवी सब प्राणियों में शक्ति रूप में स्थित हैं, उनको नमस्कार, नमस्कार, बारंबार नमस्कार है।

या देवी सर्वभूतेषु विद्या-रूपेण संस्थिता।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

भावार्थ : जो देवी सब प्राणियों में विद्या के रूप में विराजमान हैं, उनको नमस्कार, नमस्कार, बारंबार नमस्कार है। मैं आपको बारंबार प्रणाम करता हूँ।

या देवी सर्वभूतेषु मातृ-रूपेण संस्थिता।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

भावार्थ : जो देवी सभी प्राणियों में माता के रूप में स्थित हैं, उनको नमस्कार, नमस्कार, बारंबार नमस्कार है।

या देवी सर्वभूतेषु चेतनेत्यभि-धीयते।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

भावार्थ : जो देवी सब प्राणियों में चेतना कहलाती हैं, उनको नमस्कार, नमस्कार, बारंबार नमस्कार है। (चेतना – स्वयं के और अपने आसपास के वातावरण के तत्वों का बोध होने, उन्हें समझने तथा उनकी बातों का मूल्यांकन करने की शक्ति)

या देवी सर्वभूतेषु दया-रूपेण संस्थिता।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

भावार्थ : जो देवी सब प्राणियों में दया के रूप में विद्यमान हैं, उनको नमस्कार, नमस्कार, बारंबार नमस्कार है।

या देवी सर्वभूतेषु क्षुधा-रूपेण संस्थिता।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

भावार्थ : जो देवी समस्त प्राणियों में भूख के रूप में विराजमान हैं, उनको नमस्कार, नमस्कार, बारंबार नमस्कार है।

Read More Article : माँ नवदुर्गा के 9 रूप

या देवी सर्वभूतेषु तृष्णा-रूपेण संस्थिता।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

भावार्थ : जो देवी सभी प्राणियों में चाहत के रूप में स्थित हैं, उनको नमस्कार, नमस्कार, बारंबार नमस्कार है।

या देवी सर्वभूतेषु शांति-रूपेण संस्थिता।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

भावार्थ : जो देवी समस्त प्राणियों में शान्ति के रूप में स्थित हैं, उनको नमस्कार, नमस्कार, बारंबार नमस्कार है।

या देवी सर्वभूतेषू क्षान्ति रूपेण संस्थिता।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

भावार्थ : जो देवी सब प्राणियों में सहनशीलता, क्षमा के रूप में स्थित हैं, उनको नमस्कार, नमस्कार, बारंबार नमस्कार है।

या देवी सर्वभूतेषु बुद्धि-रूपेण संस्थिता।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

भावार्थ : जो देवी सभी प्राणियों में बुद्धि के रूप में स्थित हैं, उनको नमस्कार, नमस्कार, बारंबार नमस्कार है

या देवी सर्वभूतेषु श्रद्धा-रूपेण संस्थिता।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

भावार्थ : जो देवी समस्त प्राणियों में श्रद्धा, आदर, सम्मान के रूप में स्थित हैं, उनको नमस्कार, नमस्कार, बारंबार नमस्कार है।

या देवी सर्वभूतेषु भक्ति-रूपेण संस्थिता।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

भावार्थ : जो देवी सब प्राणियों में भक्ति, निष्ठा, अनुराग के रूप में स्थित हैं, उनको नमस्कार, नमस्कार, बारंबार नमस्कार है

या देवी सर्वभूतेषु लक्ष्मी-रूपेण संस्थिता।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

भावार्थ : जो देवी सब प्राणियों में लक्ष्मी, वैभव के रूप में स्थित हैं, उनको नमस्कार, नमस्कार, बारंबार नमस्कार है।

या देवी सर्वभूतेषु स्मृती-रुपेण संस्थिता |

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

भावार्थ : उस देवी को, जो सभी जीवों में स्मृति के रूप में निवास कर रही है,उनको नमस्कार, नमस्कार, बारंबार नमस्कार है।

या देवी सर्वभूतेषु तुष्टि-रूपेण संस्थिता।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

भावार्थ : जो देवी सब प्राणियों में सन्तुष्टि के रूप में विराजमान हैं, उनको नमस्कार, नमस्कार, बारंबार नमस्कार है।

देवी माँ दुर्गा की महिमा

देवी दुर्गा संपूर्ण सृष्टि की जननी हैं। तीन नेत्रों से संपन्न, इस ब्रह्मांड में विभिन्न कार्यों को पूरा करने के लिए देवी माँ ने हजारों रूपों में अवतार लिया है देवी भूत, वर्तमान और भविष्य तीनों काल का प्रतिनिधित्व करती हैं।

माता के कुछ सबसे महत्वपूर्ण कार्य राक्षसों का नाश करना और पवित्र लोगों की रक्षा करना है। वह उन जगहों पर रहती है जहां उनके नाम का जाप भक्ति और विश्वास के साथ किया जाता है।

देवी मंत्र हमारे जीवन के अंत को सुरक्षित करने के लिए मां दुर्गा का आशीर्वाद जीतने के लिए शक्तिशाली जप हैं। सफलता और समृद्धि के लिए देवी मंत्रों का जाप अति आवश्यक है।।

माँ दुर्गा सबसे शुभ हैं और सभी दुनिया को समृद्धि और शुभ का आशीर्वाद देती हैं।

पवित्र और पवित्र माँ उन लोगों की रक्षा करती है जो उसके सामने आत्मसमर्पण करते हैं और वह गौरी के रूप में अवतार लेने पर पर्वत राजा की बेटी हैं। हम दिव्य माता को नमन करते हैं और उनकी पूजा करते हैं।

देवी दुर्गा सर्वव्यापी हैं। वह सार्वभौमिक मां की पहचान है। वह सभी प्राणियों में शक्ति, शांति और बुद्धि का अवतार है।

माना जाता है कि हजारों साल पहले, एक युवा महिला ने एक ही अहसास के बाद परमानंद में नृत्य करना शुरू कर दिया था जिसने उसके जीवन को हमेशा के लिए बदल दिया: उसका जीवन अनंत चेतना से उत्पन्न हुआ जो निराकार और हर रूप में मौजूद है।

जो उभर कर आया वह उस चेतना की प्रशंसा में इस परमानंद की एक सहज अभिव्यक्ति थी जिसे आज हम ‘या देवी सर्व भुतेसु’ के नाम से जानते हैं।

संगीतकार ऋषि वाक ने मानव अस्तित्व के हर हिस्से पर कब्जा कर लिया है और इसका श्रेय देवी माँ को दिया है। ऋग्वेद में उत्पन्न होने वाला यह मंत्र दैनिक नवरात्रि की प्रार्थना और साधना का अंग बन गया है। सरल और गहरा।

प्राणियों में ऊर्जा स्फूर्ति, उल्लास व क्रियाशीलता बनकर परिलक्षित होता है दुर्गा मंत्र

अर्थात: यह अपने भीतर शक्ति के रूप में स्थित देवी की आराधना है। हमें अपने भीतर की शक्ति को पहचानना होगा और उसका सदुपयोग करना होगा।

शक्ति अथवा ऊर्जा प्रकृति के रूप में (बाहरी और हमारे भीतर की प्रकृति), उल्लास के रूप में, क्रियाशीलता के रूप में, प्रसन्नता आदि के रूप में अभिव्यक्त होती है। वासंतिक नवरात्रि का पदार्पण भी ऐसे समय में होता है, जब प्रकृति नई ऊर्जा से भरी होती है।

प्राणियों में भी यह ऊर्जा स्फूर्ति, उल्लास और क्रियाशीलता बनकर परिलक्षित होती है। लेकिन यदि हम उसे सकारात्मक रूप में क्रियान्वित नहीं कर पाते, तो शक्ति होने के बावजूद हाथियों की तरह निष्क्रिय होकर खूंटे से बंधे रहते हैं या फिर उस ऊर्जा को नकारात्मकता की ओर मोड़ देते हैं।

जिस शक्ति का उपयोग हम मदद में या सृजनात्मक कामों में कर सकते हैं, उसका उपयोग विध्वंसक कार्यों में करने लगते हैं। शक्ति के प्रवाह को सकारात्मकता की ओर लाने के लिए नौ दिन शक्ति की आराधना का प्रावधान किया गया होगा।

दुर्गा सप्तशती के अनुसार, मां दुर्गा समस्त प्राणियों में चेतना, बुद्धि, स्मृति, धृति, शक्ति, शांति श्रद्धा, कांति, तुष्टि, दया आदि अनेक रूपों में स्थित हैं। अपने भीतर स्थित इन देवियों को जगाना हमें सकारात्मकता की ओर ले जाता है।

भगवान श्रीराम ने शक्ति की उपासना कर बलशाली रावण पर विजय पाई थी। जबकि ‘देवी पुराण’ में उल्लेख है कि रावण शिव के साथ-साथ शक्ति का भी आराधक था। उसने मां दुर्गा से बलशाली होने का वरदान पा रखा था।

लेकिन शक्ति ने राम का साथ दिया, क्योंकि रावण अपने भीतर सद्गुण रूपी देवियों को जगा नहीं पाया। तुष्टि, दया, शांति आदि के अभाव में उसका अहंकार प्रबल हो गया।

इसलिए देवी की आराधना का एक अर्थ यह भी है कि आप एक ऐसे इंसान बनें, जिसमें शक्ति के साथ- साथ करुणा, दया, चेतना, बुद्धि, तुष्टि आदि गुण भी हों। देवी के रूपों में मां दुर्गा को राक्षसों से संघर्ष करते हुए दिखाया

या  देवी सर्वभूतेषु देवी मंत्र, माँ दुर्गा का प्रमुख मंत्र है, देवी लक्ष्मी, सरस्वती, काली और नौदेवी सभी माता दुर्गा का ही रूप है। इस मंत्र के द्वारा माता के सभी रूपों की पूजा व स्तुति की जाती है।

माँ दुर्गा ही जीवन, बुद्धि, शक्ति, धन, शांति इत्यादि सभी प्रदान करने वाली देवी है| इस मंत्र के द्वारा माता की स्तुति कर उनको प्रसन्न कर उनका आशीर्वाद प्राप्त कर व्यक्ति एक सफल और समृद्ध जीवन जी सकता है|

इस मंत्र के नियमित पाठ से व्यक्ति अपनी सभी इच्छाओं को पूरा कर सकता है।

या देवी सर्वभूतु मंत्र देवी स्तुति का हिस्सा है, या देवी दुर्गा को नमस्कार है। मां दुर्गा की स्तुति करने वाला मंत्र मुक्तिदायक रचना है।

मंत्र जीवन के अस्तित्व के लिए सर्वव्यापी चेतना को धन्यवाद देता है।

यह दुर्गा मां का आह्वान करता है और बिना किसी बाधा के सकारात्मक जीवन जीने के लिए उनसे आशीर्वाद मांगता है।

मंत्र देवी के गहरे पहलुओं को दर्शाता है जो अक्सर छूट जाते हैं।

मंत्र के द्वारा हमें पता लगता है कि मां देवी सभी जगह विद्यमान है

सर्वव्यापी: देवी सभी में चेतना के रूप में मौजूद हैं। ऐसा कोई स्थान नहीं है जहां देवी न हों।

सभी रूपों में: प्रकृति और उसकी विकृतियां सभी देवी के रूप हैं। सुंदरता, शांति सभी देवी के रूप हैं। क्रोध आए तो भी देवी हैं। तुम लड़ते हो तो वह भी देवी है।

प्राचीन और नवीन : हर क्षण चेतना के साथ जीवंत है। हमारी चेतना ‘निथ नूतन’ एक ही समय में प्राचीन और नई है। वस्तुएं या तो पुरानी हैं या नई, लेकिन प्रकृति में आप पुराने और नए को एक साथ विद्यमान पाएंगे।

सूरज पुराना भी है और नया भी। एक नदी में हर पल ताजा पानी बहता है, लेकिन फिर भी बहुत पुराना है। इसी तरह मानव जीवन बहुत प्राचीन है लेकिन साथ ही नया भी है। तुम्हारा मन वही है।

निम्न मंत्र से देवी दुर्गा का स्मरणकर प्रार्थना करने मात्र से देवी प्रसन्न होकर अपने भक्तों की इच्छापूर्ण करती हैं।

समस्त देव गण जिनकी स्तुति प्राथना करते हैं। माँ दुर्गा अपने भक्तो की रक्षा कर उन पर कृपा दृष्टी की वर्षा करती है और उसको उन्नती के शिखर पर जाने का मार्ग प्रसस्त करती हैं।

इस लिये ईश्वर में श्रद्धा विश्वास रखने वाले सभी मनुष्य को देवी की शरण में जाकर देवी से निर्मल हृदय से प्रार्थना करनी चाहिये।

या देवी सर्वभूतु मंत्र दुर्गा मां का आह्वान करता है जो बुराई का नाश करने वाली हैं और अपने भक्तों के दुखों को दूर करती हैं।

सभी प्रकार के भय और मानसिक कष्टों को दूर करता है और व्यक्ति को जीवन में सही निर्णय लेने में सक्षम बनाता है।

दुश्मनों और बुरी आत्माओं के डर को दूर करता है और घरों और व्यक्तियों के जीवन में समग्र शांति और समृद्धि को बढ़ावा देता है।

घर में सकारात्मक स्पंदन को बढ़ाता है और घर के सभी लोगों के जीवन में खुशी और सफलता को बढ़ावा देता है।घर में व्याप्त बुरी ऊर्जाओं को दूर करता है और घर के समग्र विकास के लिए सभी रूपों में शुभता को बढ़ावा देता है। किसी के मार्ग

में आने वाली बाधाओं को दूर करता है और सफलता लाता है।

मां दुर्गा के इन मंत्रों का जाप करने के लिए प्रातःकाल स्नान करने के बाद घर में बने पूजा स्थान पर बैठे. दीपक जलाएं और मां दुर्गा को नमन करते हुए किसी भी एक मंत्र का जाप 108 बार करें|

मान्यता है कि इन मंत्रों का जाप करने से मन को शांति मिलती है और दिमाग में कई ऊर्जा का संचार होता है. ऐसा कहा जाता है कि मां दुर्गा के इन मंत्रों का जाप नवरात्रि के अलावा बाकि दिनों में किया जाए तो मनुष्य के जीवन से सभी कष्ट मिट जाते हैं|

ya devi sarva bhuteshu	,
ya devi sarva bhuteshu lyrics	,
ya devi sarva bhuteshu in hindi	,
ya devi sarva bhuteshu lyrics in hindi	,

Ya Devi Sarva Bhutessu ENGLISH

Lyrics and Meaning of the chant

Yaa Devi Sarva-Bhutessu Vishnumaayeti Shabditaa |
Namas-Tasyai Namas-Tasyai Namas-Tasyai Namo Namah ||

To that Devi Who in All Beings is Called Vishnumaya,
Salutations to Her, Salutations to Her, Salutations to Her, Salutations again and again.

Yaa Devi Sarva-Bhutessu Chetanety-Abhidhiiyate |
Namas-Tasyai Namas-Tasyai Namas-Tasyai Namo Namah ||

To that Devi Who in All Beings is Reflected as Consciousness,
Salutations to Her, Salutations to Her, Salutations to Her, Salutations again and again.

Yaa Devi Sarva-Bhutessu Buddhi-Ruupenna Samsthitaa |
Namas-Tasyai Namas-Tasyai Namas-Tasyai Namo Namah ||

To that Devi Who in All Beings is Abiding in the Form of Intelligence,
Salutations to Her, Salutations to Her, Salutations to Her, Salutations again and again.

Yaa Devi Sarva-Bhutessu Nidra-Ruupenna Samsthitaa |
Namas-Tasyai Namas-Tasyai Namas-Tasyai Namo Namah ||

To that Devi Who in All Beings is Abiding in the Form of Sleep,
Salutations to Her, Salutations to Her, Salutations to Her, Salutations again and again.

Yaa Devi Sarva-Bhutessu Kssudhaa-Ruupenna Samsthitaa |
Namas-Tasyai Namas-Tasyai Namas-Tasyai Namo Namah ||

To that Devi Who in All Beings is Abiding in the Form of Hunger,
Salutations to Her, Salutations to Her, Salutations to Her, Salutations again and again.

Yaa Devi Sarva-Bhutessu Chaayaa-Ruupenna Samsthitaa |
Namas-Tasyai Namas-Tasyai Namas-Tasyai Namo Namah ||

To that Devi Who in All Beings is Abiding in the Form of Shadow (of Higher Self),
Salutations to Her, Salutations to Her, Salutations to Her, Salutations again and again.

Yaa Devi Sarva-Bhutessu Shakti-Ruupenna Samsthitaa |
Namas-Tasyai Namas-Tasyai Namas-Tasyai Namo Namah ||

To that Devi Who in All Beings is Abiding in the Form of Power,
Salutations to Her, Salutations to Her, Salutations to Her, Salutations again and again.

Yaa Devi Sarva-Bhutessu Trshnnaa-Ruupenna Samsthitaa |
Namas-Tasyai Namas-Tasyai Namas-Tasyai Namo Namah ||

To that Devi Who in All Beings is Abiding in the Form of Thirst,
Salutations to Her, Salutations to Her, Salutations to Her, Salutations again and again.

Yaa Devi Sarva-Bhutessu Kshaanti-Ruupenna Samsthitaa |
Namas-Tasyai Namas-Tasyai Namas-Tasyai Namo Namah ||

To that Devi Who in All Beings is Abiding in the Form of Forbearance,
Salutations to Her, Salutations to Her, Salutations to Her, Salutations again and again.

Yaa Devi Sarva-Bhutessu Jaati-Ruupenna Samsthitaa |
Namas-Tasyai Namas-Tasyai Namas-Tasyai Namo Namah ||

To that Devi Who in All Beings is Abiding in the Form of Genus (Original Cause of Everything),
Salutations to Her, Salutations to Her, Salutations to Her, Salutations again and again.

Yaa Devi Sarva-Bhutessu Lajjaa-Ruupenna Samsthitaa |
Namas-Tasyai Namas-Tasyai Namas-Tasyai Namo Namah ||

To that Devi Who in All Beings is Abiding in the Form of Modesty,
Salutations to Her, Salutations to Her, Salutations to Her, Salutations again and again.

Yaa Devi Sarva-Bhutessu Shaanti-Ruupenna Samsthitaa |
Namas-Tasyai Namas-Tasyai Namas-Tasyai Namo Namah ||

To that Devi Who in All Beings is Abiding in the Form of Peace,
Salutations to Her, Salutations to Her, Salutations to Her, Salutations again and again.

Yaa Devi Sarva-Bhutessu Shraddhaa-Ruupenna Samsthitaa |
Namas-Tasyai Namas-Tasyai Namas-Tasyai Namo Namah ||

To that Devi Who in All Beings is Abiding in the Form of Faith,
Salutations to Her, Salutations to Her, Salutations to Her, Salutations again and again.

Yaa Devii Sarva-Bhutessu Kaanti-Ruupenna Samsthitaa |
Namas-Tasyai Namas-Tasyai Namas-Tasyai Namo Namah ||

To that Devi Who in All Beings is Abiding in the Form of Loveliness and Beauty,
Salutations to Her, Salutations to Her, Salutations to Her, Salutations again and again.

Yaa Devi Sarva-Bhutessu Lakshmii-Ruupenna Samsthitaa |
Namas-Tasyai Namas-Tasyai Namas-Tasyai Namo Namah ||

To that Devi Who in All Beings is Abiding in the Form of Good Fortune,
Salutations to Her, Salutations to Her, Salutations to Her, Salutations again and again.

Yaa Devi Sarva-Bhutessu Vrtti-Ruupenna Samsthitaa |
Namas-Tasyai Namas-Tasyai Namas-Tasyai Namo Namah ||

To that Devi Who in All Beings is Abiding in the Form of Activity,
Salutations to Her, Salutations to Her, Salutations to Her, Salutations again and again.

Yaa Devi Sarva-Bhutessu Smrti-Ruupenna Samsthitaa |
Namas-Tasyai Namas-Tasyai Namas-Tasyai Namo Namah ||

To that Devi Who in All Beings is Abiding in the Form of Memory,
Salutations to Her, Salutations to Her, Salutations to Her, Salutations again and again.

Yaa Devi Sarva-Bhutessu Dayaa-Ruupenna Samsthitaa |
Namas-Tasyai Namas-Tasyai Namas-Tasyai Namo Namah ||

To that Devi Who in All Beings is Abiding in the Form of Kindness,
Salutations to Her, Salutations to Her, Salutations to Her, Salutations again and again.

Yaa Devi Sarva-Bhutessu Tushtti-Ruupenna Samsthitaa |
Namas-Tasyai Namas-Tasyai Namas-Tasyai Namo Namah ||

To that Devi Who in All Beings is Abiding in the Form of Contentment,
Salutations to Her, Salutations to Her, Salutations to Her, Salutations again and again.

Yaa Devi Sarva-Bhutessu Maatr-Ruupenna Samsthitaa |
Namas-Tasyai Namas-Tasyai Namas-Tasyai Namo Namah ||

To that Devi Who in All Beings is Abiding in the Form of Mother,
Salutations to Her, Salutations to Her, Salutations to Her, Salutations again and again.

Yaa Devi Sarva-Bhutessu Bhraanti-Ruupenna Samsthitaa |
Namas-Tasyai Namas-Tasyai Namas-Tasyai Namo Namah ||

To that Devi Who in All Beings is Abiding in the Form of Delusion,
Salutations to Her, Salutations to Her, Salutations to Her, Salutations again and again.

Indriyaannaam-Adhisstthaatrii Bhutaanaam Ca-Akhilessu |
Yaa Bhuutessu Satatam Tasyai Vyaapti-Devyai Namo Namah ||

(Salutations) To that Devi Who Governs the Faculty of Senses of Beings in All the Worlds,
Salutations to Her Who is the Devi Who Always Pervades all Beings.

Citi-Ruupenna Yaa Krtsnam-Etad-Vyaapya Sthitaa Jagat |
Namas-Tasyai Namas-Tasyai Namas-Tasyai Namo Namah ||

(Salutations to Her) Who in the Form of Consciousness Pervades This Universe and Abides in It,
Salutations to Her, Salutations to Her, Salutations to Her, Salutations again and again.

You May also read above in this website.

बजरंग बाण (Bajrang Baan)

By हरिहरन (Hariharan)


बजरंग बाण – हरिहरन | Bajrang Baan Lyrics & Meaning in Hindi

बजरंग बाण (Bajrang Baan) – हरिहरन

गायक: हरिहरन

रचनाकार: गोस्वामी तुलसीदास

शैली: भक्ति संगीत / भजन

परिचय (About)

बजरंग बाण भगवान हनुमान की अमोघ शक्ति का प्रतीक है। हरिहरन की मखमली और गंभीर आवाज़ में गाया गया यह भजन न केवल कानों को प्रिय लगता है, बल्कि आत्मा को भी झकझोर देता है। यह पाठ विशेष रूप से तब किया जाता है जब कोई भक्त घोर संकट, भय या स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहा हो। ‘बाण’ का अर्थ है तीर, जो अपने लक्ष्य को भेद कर ही रहता है; इसी प्रकार यह पाठ हनुमान जी की कृपा सुनिश्चित करता है।

इतिहास (History)

इस स्तोत्र की रचना गोस्वामी तुलसीदास जी ने की थी। किंवदंतियों के अनुसार, एक बार तुलसीदास जी को काशी में बहुत ही पीड़ादायक फोड़े या वात रोग ने जकड़ लिया था। औषधियों के विफल होने पर, उन्होंने हनुमान जी का आह्वान करते हुए बजरंग बाण की रचना की। इसमें उन्होंने हनुमान जी को श्रीराम की सौगंध दी, जिसके फलस्वरूप वे तुरंत स्वस्थ हो गए। हरिहरन का यह संस्करण 90 के दशक में गुलशन कुमार द्वारा प्रस्तुत किया गया था और आज भी घर-घर में गूंजता है।

बजरंग बाण लिरिक्स (Bajrang Baan Lyrics in Hindi)

(दोहा) निश्चय प्रेम प्रतीति ते, बिनय करैं सनमान। तेहि के कारज सकल शुभ, सिद्ध करैं हनुमान॥ (चौपाई) जय हनुमंत संत हितकारी। सुन लीजै प्रभु अरज हमारी॥ जन के काज बिलंब न कीजै। आतुर दौरि महा सुख दीजै॥ जैसे कूदि सिंधु महिपारा। सुरसा बदन पैठि बिस्तारा॥ आगे जाय लंकिनी रोका। मारेहु लात गई सुरलोका॥ जाय विभीषण को सुख दीन्हा। सीता निरखि परमपद लीन्हा॥ बाग उजारि सिंधु महँ बोरा। अति आतुर यमकातर तोरा॥ अक्षय कुमार मारि संहारा। लूम लपेटि लंक को जारा॥ लाह समान लंक जरि गई। जय जय धुनि सुरपुर नभ भई॥ अब बिलंब केहि कारन स्वामी। कृपा करहु उर अंतरयामी॥ जय कपिीश जय पवन कुमारा। जय जगवंदन जय जयकारा॥ जय आदित्य अमर अभयकारी। अरि मर्दन मोचन अघहारी॥ जय जय जय हनुमंत अगाधा। दुःख पावत जन केहि अपराधा॥ पूजा जप तप नेम अचारा। नहिं जानत कछु दास तुम्हारा॥ वन उपवन मग गिरि गृह माहीं। तुम्हरे बल हम डरपत नाहीं॥ जनकसुता हरि दास कहावो। ताकी शपथ विलंब न लावो॥ जय जय जय धुनि होत अकाशा। सुमिरत होत दुसह दुःख नाशा॥ चरण पकरि, कर जोरि मनावौं। यहि अवसर अब केहि गोहरावौं॥ अथु मरुतसुत दास तुम्हारा। व्याकुल देखि निपट नहिं हारा॥ उठु उठु चलु तोहि राम दुहाई। पायँ परौं कर जोरि मनाई॥ ॐ चं चं चं चं चपल चलंता। ॐ हनु हनु हनु हनु हनुमंता॥ ॐ हं हं हाँक देत कपि चंचल। ॐ सं सं सहमि पराने खल-दल॥ अपने जन को तुरत उबारौ। सुमिरत आनन्द हमारौ॥ यह बजरंग बाण जेहि मारै। ताहि कहौ फिरि कवन उबारै॥ पाठ करै बजरंग बाण की। हनुमत रक्षा करैं प्राण की॥ यह बजरंग बाण जो जापै। तासों भूत-प्रेत सब काँपै॥ धूप देय जो जपै हमेशा। ताके तन नहिं रहै कलेशा॥ (दोहा) उर प्रतीति दृढ़, सरन ह्वै, पाठ करै धरि ध्यान। बाधा सब हर, करैं सब काम सफल हनुमान॥

भावार्थ और विश्लेषण (Meaning Analysis)

बजरंग बाण का प्रत्येक शब्द शक्ति से ओत-प्रोत है।

  • भक्त की व्याकुलता: भक्त कहता है कि मैं पूजा-पाठ के नियम नहीं जानता (पूजा जप तप नेम अचारा…), मैं केवल आपका दास हूँ।
  • श्रीराम की शपथ: इस पाठ का सबसे शक्तिशाली पहलू वह है जहाँ भक्त हनुमान जी को ‘राम दुहाई’ (राम की कसम) देता है। यह हनुमान जी को विवश करता है कि वे तुरंत अपने भक्त की रक्षा करें।
  • बीज मंत्र: इसमें ‘ॐ चं चं चं चं’ और ‘ॐ हं हं’ जैसे बीज मंत्रों का उपयोग किया गया है, जो ध्वनि विज्ञान (Sound Therapy) के अनुसार वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करते हैं।

रोचक तथ्य (Trivia)

  • रोग निवारक: मान्यता है कि असाध्य रोगों में, विशेषकर शारीरिक पीड़ा में, बजरंग बाण का पाठ अचूक होता है।
  • तांत्रिक महत्व: इसमें प्रयुक्त बीज मंत्र इसे सामान्य भजन से अलग एक तांत्रिक स्तोत्र का दर्जा देते हैं।
  • हरिहरन का प्रभाव: हरिहरन ने इसे भारतीय शास्त्रीय संगीत की ‘ध्रुपद’ अंग जैसी गंभीरता के साथ गाया है, जो इसे अन्य फिल्मी भजनों से अलग करता है।
  • सावधानी: कई विद्वान मानते हैं कि इसमें भगवान को शपथ दी जाती है, इसलिए इसका पाठ तभी करना चाहिए जब आप भारी संकट में हों।

लिङ्गाष्टकम् – Lingashtakam

Shiva Lingashtakam: Lyrics, Meaning & Significance

लिङ्गाष्टकम् – Lingashtakam

ब्रह्ममुरारिसुरार्चितलिङ्गं निर्मलभासितशोभितलिङ्गम् ।

जन्मजदुःखविनाशकलिङ्गं तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम् ॥१॥

देवमुनिप्रवरार्चितलिङ्गं कामदहं करुणाकरलिङ्गम् ।
रावणदर्पविनाशनलिङ्गं तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम् ॥२॥

सर्वसुगन्धिसुलेपितलिङ्गं बुद्धिविवर्धनकारणलिङ्गम् ।
सिद्धसुरासुरवन्दितलिङ्गं तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम् ॥३॥

कनकमहामणिभूषितलिङ्गं फणिपतिवेष्टितशोभितलिङ्गम् ।
दक्षसुयज्ञविनाशनलिङ्गं तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम् ॥४॥

कुङ्कुमचन्दनलेपितलिङ्गं पङ्कजहारसुशोभितलिङ्गम् ।
सञ्चितपापविनाशनलिङ्गं तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम् ॥५॥

देवगणार्चितसेवितलिङ्गं भावैर्भक्तिभिरेव च लिङ्गम् ।
दिनकरकोटिप्रभाकरलिङ्गं तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम् ॥६॥

अष्टदलोपरिवेष्टितलिङ्गं सर्वसमुद्भवकारणलिङ्गम् ।
अष्टदरिद्रविनाशितलिङ्गं तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम् ॥७॥

सुरगुरुसुरवरपूजितलिङ्गं सुरवनपुष्पसदार्चितलिङ्गम् ।
परात्परं परमात्मकलिङ्गं तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम् ॥८॥

लिङ्गाष्टकमिदं पुण्यं यः पठेत् शिवसन्निधौ।
शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते॥

Lingashtakam By S.P. Balasubrahmaniam [Full Song] – Shiva Roopa Darshan

Lingastakam – Song Download from Shiva Sthuthi & Shiva Stothramala @ JioSaavn

हिंदी में अर्थ के साथ लिंगाष्टकम 

Lingashtakam Lyrics with Meaning in Hindi

अथ श्रीलिंगाष्टकम्

ब्रह्ममुरारि सुरार्चितलिङ्गं निर्मलभाषित शोभितलिङ्गम् ।
जन्मज दुःख विनाशकलिङ्गं तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम्।1।

[मैं शिवलिंग को प्रणाम करता हूँ] जो ब्रह्मा, विष्णु और देवताओं द्वारा पूजित है, जो निर्मल, उज्जवल और शोभित (सुहावना) है। जो जन्म जन्मों के पापों का नाश करता है, मैं उस सदाशिवलिंग को प्रणाम करता हूँ।

देवमुनि प्रवरार्चित लिङ्गं कामदहं करुणाकर लिङ्गम् ।
रावण दर्पविनाशन लिङ्गं तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम्।2।

जो देवों और मुनिवरों द्वारा पूजा जाता है, जो सभी काम-इच्छा आदि का नाश करता है और करुणावान है। जिसने रावण के अहंकार का नाश किया था, मैं उस सदाशिवलिंग को प्रणाम करता हूँ।

सर्व सुगन्धि सुलेपितलिङ्गं बुद्धिविवर्धन कारणलिङ्गम् ।
सिद्ध सुरासुर वन्दितलिङ्गं तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम्।3।

सभी प्रकार की सुगंधों से जिसका लेपन होता है, जो (आध्यात्मिक) बुद्धि और विवेक के उत्थान का कारण है। सिद्धों, देवता, असुरों सभी के द्वारा जिसकी वंदना की जाती है, मैं उस सदाशिवलिंग को प्रणाम करता हूँ।

कनकमहामणि भूषितलिङ्गं फणिपति वेष्टितशोभित लिङ्गम् ।
दक्ष सुयज्ञ विनाशनलिङ्गं तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम्।4।

स्वर्ण और मणियों द्वारा जिसका श्रृंगार होता है, लिपटे सर्पों से जिसकी शोभा बढ़ जाती है। जिसने दक्ष के महायज्ञ का विनाश किया था, मैं उस सदाशिवलिंग को प्रणाम करता हूँ।

कुङ्कुम चन्दन लेपितलिङ्गं पङ्कजहार सुशोभितलिङ्गम् ।
सञ्चित पापविनाशन लिङ्गं तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम्।5।

जिस पर कुंकुम और चन्दन का लेपन होता है, जो कमलों के हार से सुशोभित होता है, जो सभी जन्मों के पापों का नाश करता है, मैं उस सदाशिवलिंग को प्रणाम करता हूँ।

देवगणार्चित सेवितलिङ्गं भावैर्भक्तिभिरेव च लिङ्गम् ।
दिनकर कोटिप्रभाकर लिङ्गं तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम्।6।

देवगणों के द्वारा भक्ति और सच्चे भाव से जिसकी सेवा होती है, जिसका वैभव और तेज करोड़ों सूर्यों के समान है, मैं उस सदाशिवलिंग को प्रणाम करता हूँ।

अष्टदलो परिवेष्टित लिङ्गं सर्व समुद्भवकारण लिङ्गम् ।
अष्टदरिद्र विनाशित लिङ्गं तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम्।7।

आठ पंखुड़ियों वाले फूलों से घिरा हुआ है, सम्पूर्ण सृष्टि की रचना जिससे आरम्भ हुई थी, जो आठ प्रकार के दारिद्र्य को दूर करने वाला है, मैं उस सदाशिवलिंग को प्रणाम करता हूँ।

सुरगुरुसुरवर पूजित लिङ्गं सुरवनपुष्प सदार्चित लिङ्गम्।
परात्परं परमात्मक लिङ्गं तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम् ।8।

जो देवताओं के गुरु ( बृहस्पति ) द्वारा पूजित है, स्वर्ग के वन के फूलों द्वारा जिसकी पूजा-अर्चना होती है, जो श्रेष्ठ से भी श्रेष्ठ है और जो महानतम है, मैं उस शाश्वत शिवलिंग को प्रणाम करता हूं।

फलश्रुतिः-
लिङ्गाष्टकमिदं पुण्यं यः पठेत् शिव सन्निधौ।
शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते।।

जो भी लिंगाष्टक को शिव के समीप बैठकर पढता है, वह अंत में शिवलोक को प्राप्त होकर शिव के साथ सुखी रहता है। 

इस प्रकार लिंगाष्टकम पूरा हुआ।

लिंगाष्टक का महत्त्व-

शिव पूजा करते समय लिंगाष्टक का पाठ अत्यंत शुभ माना जाता है, श्रावण मास के समय लिंगाष्टक का पाठ करने से मन की असीम शान्ति प्राप्त होती है।

लिंगाष्टकम कथा:

किसी गांव में एक गरीब ब्राह्मण परिवार रहता था। उनका नाम धर्मदत्त था। वह और उनकी पत्नी विशेषा अत्यंत निष्ठावान थे और शिव के दीवाने थे। वे हमेशा ही अपने जीवन को शिव की भक्ति, ध्यान और पूजा में समर्पित रखते थे।

धर्मदत्त की आराधना की एक विशेषता थी। उन्होंने अपने घर में लिंग की मूर्ति अपनाई थी और रोज़ाना उसकी सेवा करते थे। उन्होंने शिव लिंग को अपना ईश्वर मान लिया था और उसे पूजा करके अपने जीवन को धन्य बना लिया था।

एक बार, गांव में अचानक एक महामारी फैल गई। बहुत से लोग बीमार पड़ गए और उनकी स्थिति गंभीर हो गई। धर्मदत्त की पत्नी विशेषा भी बीमार पड़ गई और उसकी स्थिति दिन प्रतिदिन बिगड़ती जा रही थी। धर्मदत्त अत्यंत चिंतित हो गए और रो-रोकर शिव लिंग की आराधना करने लगे।

एक रात, जब धर्मदत्त शिव लिंग की सेवा कर रहे थे, एक देवी उनके सामने प्रकट हुई। वह देव अत्यंत सुंदर और प्रकाशमयी थी। धर्मदत्त को उनकी दिव्यता का अनुभव हुआ और उन्होंने उनकी पूजा की। देवी ने धर्मदत्त को वरदान दिया कि तुम्हारी पत्नी को विशेष चमत्कारिक औषधि मिलेगी और वह जल्द ही स्वस्थ हो जाएगी।

यह सुनकर धर्मदत्त अत्यधिक प्रसन्न हुए और उन्होंने धन्यवाद देते हुए पूछा, “परमेश्वरी, आप कौन हो? कृपया अपनी पहचान बताइए।”

देवी ने उसे आश्चर्यजनक स्वर में जवाब दिया, “हे धर्मदत्त, मैं शिव की स्वयंभू मूर्ति हूँ। तुम्हारी पूजा और भक्ति ने मेरा हृदय प्रसन्न किया है। अब तुम्हारे सामर्थ्य से लिंगाष्टकम का पाठ करो और अपने पूर्वजों की दृष्टि में और दैवीय आशीर्वाद से शिव की अनंत कृपा को प्राप्त करो।”

इसके बाद से धर्मदत्त लिंगाष्टकम का नियमित पाठ करने लगे। वह गर्भवती विशेषा की बीमारी से मुक्त हो गई और स्वस्थ हो गई। धर्मदत्त और विशेषा का जीवन फिर से खुशहाल हो गया और उनका आत्मविश्वास और भक्ति और भी मजबूत हुए।

लिंगाष्टकम कथा हमें यह शिक्षा देती है कि शिव की आराधना, भक्ति और लिंगाष्टकम का पाठ हमें अपार शक्ति और आनंद प्रदान कर सकता है। यह हमें रोगों से मुक्ति, सुख, समृद्धि और मुक्ति की प्राप्ति में सहायता कर सकता है। इसलिए, हमें नियमित रूप से लिंगाष्टकम का पाठ करना चाहिए और शिव के प्रति हमारी आत्मीय भावना को प्रकट करना चाहिए। शिव की कृपा हमेशा हमारे साथ बनी रहे और हमें उच्चतम सच्चिदानंद स्थिति तक ले जाए।

धर्मदत्त और विशेषा जी के दिल में एक अद्भुत आनंद बस गया था। वे शिव की अनंत कृपा के आभास में जीवन जीने लगे। हर वक्त वे शिव की महिमा के गान में खो जाते थे, और उनकी आत्मा भक्ति के ऊर्ध्वमुखी हो गई।

एक दिन, धर्मदत्त ने अपने बच्चों को भी शिव की भक्ति के लिए प्रेरित किया। उन्होंने उन्हें लिंगाष्टकम का पाठ करने के महत्व के बारे में बताया और उन्हें यह सिखाया कि शिव की प्रसन्नता और कृपा प्राप्त करने के लिए वे भी इसे नियमित रूप से पढ़ें।

बच्चों ने आदेश ग्रहण करके लिंगाष्टकम का पाठ करना शुरू किया। उनकी खुशी और भक्ति की भावना देखकर धर्मदत्त का हृदय फूल गया। वे शिव की कृपा से अत्युच्च संतुष्ट हो गए क्योंकि अब वे जानते थे कि उनके पूरे परिवार को शिव की आशीर्वाद मिल रहा है।

सालों बीत गए, धर्मदत्त और उनका परिवार शिव की भक्ति में जीने का आनंद लेते रहे। उन्होंने जीवन के सभी कठिनाइयों को शिव के द्वारा पार कर लिया और उनकी आत्मा शिवत्व के साथ एकीकृत हो गई। वे शिव की कृपा, मार्गदर्शन और सहायता के लिए हमेशा आभारी रहें।

लिंगाष्टकम कथा हमें यह सिखाती है कि जब हम शिव की भक्ति, आदर्श और पूजा में समर्पित होते हैं, तो हमें उनकी अपार कृपा, सुख और संतोष प्राप्त होता है। यह कथा हमें यह दिखाती है कि जब हम शिव की प्रेम और भक्ति से ओतप्रोत होते हैं, तो हमारी आत्मा शिव के साथ मिल जाती है। वह हमें आंतरिक शांति, प्रबुद्धता और आनंद का अनुभव कराते हैं।

धर्मदत्त और उनके परिवार की जीवन यात्रा एक आदर्श बन गई है। उन्होंने अपने जीवन को शिव की सेवा और भक्ति में समर्पित किया है और उन्होंने शिव की कृपा के बहुमुखी लाभों को प्राप्त किया है। वे अब खुशहाल और समृद्ध जीवन जी रहे हैं और उनकी आत्मा शिव के दिव्य सन्देश के प्रकाश में चमक रही है।

इस कथा से हमें यह समझने को मिलता है कि हमारे जीवन में भगवान शिव की महिमा, आराधना और भक्ति का महत्व अपार है। हमें निरंतर उनके चरणों में ध्यान और पूजा करनी चाहिए और उनके शांतिपूर्ण आदर्शों का अनुसरण करना चाहिए। यह हमें अपार आनंद, स्वयंप्रकाश और उच्चतम सत्य के प्रतीक में बदल सकती है।

चाहे हम अपने जीवन में कितनी भी कठिनाइयाँ आएं, हमें शिव की सच्ची भक्ति और निष्ठा से आगे बढ़ना चाहिए। हमें सदैव शिवत्व की अनुभूति और आत्मसात का अनुभव करना चाहिए, जो हमें जीवन के हर पहलू में सफलता और सुख प्रदान करेगा।

शिव तांडव स्तोत्रम् – Shiv Tandav Stotram

सार्थशिवताण्डवस्तोत्रम्

शिव तांडव स्तोत्रम् – Shiv Tandav Stotram

सार्थशिवताण्डवस्तोत्रम्
॥ श्रीगणेशाय नमः ॥

जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले
गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजङ्गतुङ्गमालिकाम् ।
डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्वयं
चकार चण्डताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम् ॥१॥

जटाकटाहसम्भ्रमभ्रमन्निलिम्पनिर्झरी
विलोलवीचिवल्लरीविराजमानमूर्धनि ।
धगद्धगद्धगज्ज्वलल्ललाटपट्टपावके
किशोरचन्द्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम ॥२॥

धराधरेन्द्रनंदिनीविलासबन्धुबन्धुर
स्फुरद्दिगन्तसन्ततिप्रमोदमानमानसे ।
कृपाकटाक्षधोरणीनिरुद्धदुर्धरापदि
क्वचिद्दिगम्बरे(क्वचिच्चिदम्बरे) मनो विनोदमेतु वस्तुनि ॥३॥

जटाभुजङ्गपिङ्गलस्फुरत्फणामणिप्रभा
कदम्बकुङ्कुमद्रवप्रलिप्तदिग्वधूमुखे ।
मदान्धसिन्धुरस्फुरत्त्वगुत्तरीयमेदुरे
मनो विनोदमद्भुतं बिभर्तु भूतभर्तरि ॥४॥

सहस्रलोचनप्रभृत्यशेषलेखशेखर
प्रसूनधूलिधोरणी विधूसराङ्घ्रिपीठभूः ।
भुजङ्गराजमालया निबद्धजाटजूटक
श्रियै चिराय जायतां चकोरबन्धुशेखरः ॥५॥

ललाटचत्वरज्वलद्धनञ्जयस्फुलिङ्गभा
निपीतपञ्चसायकं नमन्निलिम्पनायकम् ।
सुधामयूखलेखया विराजमानशेखरं
महाकपालिसम्पदेशिरोजटालमस्तु नः ॥६॥

करालभालपट्टिकाधगद्धगद्धगज्ज्वल
द्धनञ्जयाहुतीकृतप्रचण्डपञ्चसायके ।
धराधरेन्द्रनन्दिनीकुचाग्रचित्रपत्रक
प्रकल्पनैकशिल्पिनि त्रिलोचने रतिर्मम ॥७॥

नवीनमेघमण्डली निरुद्धदुर्धरस्फुरत्
कुहूनिशीथिनीतमः प्रबन्धबद्धकन्धरः ।
निलिम्पनिर्झरीधरस्तनोतु कृत्तिसिन्धुरः
कलानिधानबन्धुरः श्रियं जगद्धुरंधरः ॥८॥

प्रफुल्लनीलपङ्कजप्रपञ्चकालिमप्रभा
वलम्बिकण्ठकन्दलीरुचिप्रबद्धकन्धरम् ।
स्मरच्छिदं पुरच्छिदं भवच्छिदं मखच्छिदं
गजच्छिदांधकच्छिदं तमन्तकच्छिदं भजे ॥९॥

अगर्व सर्वमङ्गलाकलाकदम्बमञ्जरी
रसप्रवाहमाधुरी विजृम्भणामधुव्रतम् ।
स्मरान्तकं पुरान्तकं भवान्तकं मखान्तकं
गजान्तकान्धकान्तकं तमन्तकान्तकं भजे ॥१०॥

जयत्वदभ्रविभ्रमभ्रमद्भुजङ्गमश्वस
द्विनिर्गमत्क्रमस्फुरत्करालभालहव्यवाट् ।
धिमिद्धिमिद्धिमिध्वनन्मृदङ्गतुङ्गमङ्गल
ध्वनिक्रमप्रवर्तित प्रचण्डताण्डवः शिवः ॥११॥

दृषद्विचित्रतल्पयोर्भुजङ्गमौक्तिकस्रजोर्
गरिष्ठरत्नलोष्ठयोः सुहृद्विपक्षपक्षयोः ।
तृणारविन्दचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः
समं प्रव्रितिक: कदा सदाशिवं भजाम्यहम ॥१२॥

कदा निलिम्पनिर्झरीनिकुञ्जकोटरे वसन्
विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरः स्थमञ्जलिं वहन् ।
विमुक्तलोललोचनो ललामभाललग्नकः
शिवेति मंत्रमुच्चरन् कदा सुखी भवाम्यहम् ॥१३॥

निलिम्प नाथनागरी कदम्ब मौलमल्लिका-
निगुम्फनिर्भक्षरन्म धूष्णिकामनोहरः ।
तनोतु नो मनोमुदं विनोदिनींमहनिशं
परिश्रय परं पदं तदङ्गजत्विषां चयः ॥१४॥

प्रचण्ड वाडवानल प्रभाशुभप्रचारणी
महाष्टसिद्धिकामिनी जनावहूत जल्पना ।
विमुक्त वाम लोचनो विवाहकालिकध्वनिः
शिवेति मन्त्रभूषगो जगज्जयाय जायताम् ॥१५॥

इमं हि नित्यमेवमुक्तमुत्तमोत्तमं स्तवं
पठन्स्मरन्ब्रुवन्नरो विशुद्धिमेतिसंततम् ।
हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नान्यथा गतिं
विमोहनं हि देहिनां सुशङ्करस्य चिंतनम् ॥१६॥

पूजावसानसमये दशवक्त्रगीतं
यः शम्भुपूजनपरं पठति प्रदोषे ।
तस्य स्थिरां रथगजेन्द्रतुरङ्गयुक्तां
लक्ष्मीं सदैव सुमुखिं प्रददाति शम्भुः ॥१७॥

इति श्रीरावण कृतम्

शिव ताण्डव स्तोत्रम्स म्पूर्णम्

DOWNLOAD pdf

शिव तांडव स्तोत्रम् (Shiva Tandav Stotram) अर्थ हिंदी में:

शिव तांडव स्तोत्र – Hindi Lyrics and Meaning

जटा टवी गलज्जलप्रवाह पावितस्थले गलेऽव लम्ब्यलम्बितां भुजंगतुंग मालिकाम्‌।
डमड्डमड्डमड्डमन्निनाद वड्डमर्वयं चकारचण्डताण्डवं तनोतु नः शिव: शिवम्‌ ॥१॥

उनके बालों से बहने वाले जल से उनका कंठ पवित्र है,
और उनके गले में सांप है जो हार की तरह लटका है,
और डमरू से डमट् डमट् डमट् की ध्वनि निकल रही है,
भगवान शिव शुभ तांडव नृत्य कर रहे हैं, वे हम सबको संपन्नता प्रदान करें।

 जटाकटा हसंभ्रम भ्रमन्निलिंपनिर्झरी विलोलवीचिवल्लरी विराजमानमूर्धनि।
धगद्धगद्धगज्ज्वल ल्ललाटपट्टपावके किशोरचंद्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम: ॥२॥

मेरी शिव में गहरी रुचि है,
जिनका सिर अलौकिक गंगा नदी की बहती लहरों की धाराओं से सुशोभित है,
जो उनकी बालों की उलझी जटाओं की गहराई में उमड़ रही हैं?
जिनके मस्तक की सतह पर चमकदार अग्नि प्रज्वलित है,
और जो अपने सिर पर अर्ध-चंद्र का आभूषण पहने हैं।

 धराधरेंद्रनंदिनी विलासबन्धुबन्धुर स्फुरद्दिगंतसंतति प्रमोद मानमानसे।
कृपाकटाक्षधोरणी निरुद्धदुर्धरापदि क्वचिद्विगम्बरे मनोविनोदमेतु वस्तुनि ॥३॥

मेरा मन भगवान शिव में अपनी खुशी खोजे,
अद्भुत ब्रह्माण्ड के सारे प्राणी जिनके मन में मौजूद हैं,
जिनकी अर्धांगिनी पर्वतराज की पुत्री पार्वती हैं,
जो अपनी करुणा दृष्टि से असाधारण आपदा को नियंत्रित करते हैं, जो सर्वत्र व्याप्त है,
और जो दिव्य लोकों को अपनी पोशाक की तरह धारण करते हैं।

 जटाभुजंगपिंगल स्फुरत्फणामणिप्रभा कदंबकुंकुमद्रव प्रलिप्तदिग्व धूमुखे।
मदांधसिंधु रस्फुरत्वगुत्तरीयमेदुरे मनोविनोदद्भुतं बिंभर्तुभूत भर्तरि ॥४॥

मुझे भगवान शिव में अनोखा सुख मिले, जो सारे जीवन के रक्षक हैं,
उनके रेंगते हुए सांप का फन लाल-भूरा है और मणि चमक रही है,
ये दिशाओं की देवियों के सुंदर चेहरों पर विभिन्न रंग बिखेर रहा है,
जो विशाल मदमस्त हाथी की खाल से बने जगमगाते दुशाले से ढंका है।

 सहस्रलोचन प्रभृत्यशेषलेखशेखर प्रसूनधूलिधोरणी विधूसरां घ्रिपीठभूः।
भुजंगराजमालया निबद्धजाटजूटकः श्रियैचिरायजायतां चकोरबंधुशेखरः ॥५॥

भगवान शिव हमें संपन्नता दें,
जिनका मुकुट चंद्रमा है,
जिनके बाल लाल नाग के हार से बंधे हैं,
जिनका पायदान फूलों की धूल के बहने से गहरे रंग का हो गया है,
जो इंद्र, विष्णु और अन्य देवताओं के सिर से गिरती है।

 ललाटचत्वरज्वल द्धनंजयस्फुलिंगभा निपीतपंच सायकंनम न्निलिंपनायकम्‌।
सुधामयूखलेखया विराजमानशेखरं महाकपालिसंपदे शिरोजटालमस्तुनः ॥६॥

शिव के बालों की उलझी जटाओं से हम सिद्धि की दौलत प्राप्त करें,
जिन्होंने कामदेव को अपने मस्तक पर जलने वाली अग्नि की चिनगारी से नष्ट किया था,
जो सारे देवलोकों के स्वामियों द्वारा आदरणीय हैं,
जो अर्ध-चंद्र से सुशोभित हैं।

करालभालपट्टिका धगद्धगद्धगज्ज्वल द्धनंजया धरीकृतप्रचंड पंचसायके।
धराधरेंद्रनंदिनी कुचाग्रचित्रपत्र कप्रकल्पनैकशिल्पिनी त्रिलोचनेरतिर्मम ॥७॥

मेरी रुचि भगवान शिव में है, जिनके तीन नेत्र हैं,
जिन्होंने शक्तिशाली कामदेव को अग्नि को अर्पित कर दिया,
उनके भीषण मस्तक की सतह डगद् डगद्… की घ्वनि से जलती है,
वे ही एकमात्र कलाकार है जो पर्वतराज की पुत्री पार्वती के स्तन की नोक पर,
सजावटी रेखाएं खींचने में निपुण हैं।

 नवीनमेघमंडली निरुद्धदुर्धरस्फुर त्कुहुनिशीथनीतमः प्रबद्धबद्धकन्धरः।
निलिम्पनिर्झरीधरस्तनोतु कृत्तिसिंधुरः कलानिधानबंधुरः श्रियं जगंद्धुरंधरः ॥८॥

भगवान शिव हमें संपन्नता दें,
वे ही पूरे संसार का भार उठाते हैं,
जिनकी शोभा चंद्रमा है,
जिनके पास अलौकिक गंगा नदी है,
जिनकी गर्दन गला बादलों की पर्तों से ढंकी अमावस्या की अर्धरात्रि की तरह काली है।

 प्रफुल्लनीलपंकज प्रपंचकालिमप्रभा विडंबि कंठकंध रारुचि प्रबंधकंधरम्‌।
स्मरच्छिदं पुरच्छिंद भवच्छिदं मखच्छिदं गजच्छिदांधकच्छिदं तमंतकच्छिदं भजे ॥९॥

मैं भगवान शिव की प्रार्थना करता हूं, जिनका कंठ मंदिरों की चमक से बंधा है,
पूरे खिले नीले कमल के फूलों की गरिमा से लटकता हुआ,
जो ब्रह्माण्ड की कालिमा सा दिखता है।
जो कामदेव को मारने वाले हैं, जिन्होंने त्रिपुर का अंत किया,
जिन्होंने सांसारिक जीवन के बंधनों को नष्ट किया, जिन्होंने बलि का अंत किया,
जिन्होंने अंधक दैत्य का विनाश किया, जो हाथियों को मारने वाले हैं,
और जिन्होंने मृत्यु के देवता यम को पराजित किया।

 अखर्वसर्वमंगला कलाकदम्बमंजरी रसप्रवाह माधुरी विजृंभणा मधुव्रतम्‌।
स्मरांतकं पुरातकं भावंतकं मखांतकं गजांतकांधकांतकं तमंतकांतकं भजे ॥१०॥

मैं भगवान शिव की प्रार्थना करता हूं, जिनके चारों ओर मधुमक्खियां उड़ती रहती हैं
शुभ कदंब के फूलों के सुंदर गुच्छे से आने वाली शहद की मधुर सुगंध के कारण,
जो कामदेव को मारने वाले हैं, जिन्होंने त्रिपुर का अंत किया,
जिन्होंने सांसारिक जीवन के बंधनों को नष्ट किया, जिन्होंने बलि का अंत किया,
जिन्होंने अंधक दैत्य का विनाश किया, जो हाथियों को मारने वाले हैं,
और जिन्होंने मृत्यु के देवता यम को पराजित किया।

 जयत्वदभ्रविभ्रम भ्रमद्भुजंगमस्फुरद्ध गद्धगद्विनिर्गमत्कराल भाल हव्यवाट्।
धिमिद्धिमिद्धि मिध्वनन्मृदंग तुंगमंगलध्वनिक्रमप्रवर्तित: प्रचण्ड ताण्डवः शिवः ॥११॥

शिव, जिनका तांडव नृत्य नगाड़े की ढिमिड ढिमिड
तेज आवाज श्रंखला के साथ लय में है,
जिनके महान मस्तक पर अग्नि है, वो अग्नि फैल रही है नाग की सांस के कारण,
गरिमामय आकाश में गोल-गोल घूमती हुई।

 दृषद्विचित्रतल्पयो र्भुजंगमौक्तिकमस्र जोर्गरिष्ठरत्नलोष्ठयोः सुहृद्विपक्षपक्षयोः।
तृणारविंदचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः समं प्रवर्तयन्मनः कदा सदाशिवं भजे ॥१२॥

मैं भगवान सदाशिव की पूजा कब कर सकूंगा, शाश्वत शुभ देवता,
जो रखते हैं सम्राटों और लोगों के प्रति समभाव दृष्टि,
घास के तिनके और कमल के प्रति, मित्रों और शत्रुओं के प्रति,
सर्वाधिक मूल्यवान रत्न और धूल के ढेर के प्रति,
सांप और हार के प्रति और विश्व में विभिन्न रूपों के प्रति?

 कदा निलिंपनिर्झरी निकुंजकोटरे वसन्‌ विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरःस्थमंजलिं वहन्‌।
विमुक्तलोललोचनो ललामभाललग्नकः शिवेति मंत्रमुच्चरन्‌ कदा सुखी भवाम्यहम्‌ ॥१३॥

मैं कब प्रसन्न हो सकता हूं, अलौकिक नदी गंगा के निकट गुफा में रहते हुए,
अपने हाथों को हर समय बांधकर अपने सिर पर रखे हुए,
अपने दूषित विचारों को धोकर दूर करके, शिव मंत्र को बोलते हुए,
महान मस्तक और जीवंत नेत्रों वाले भगवान को समर्पित?

 इमं हि नित्यमेव मुक्तमुक्तमोत्तम स्तवं पठन्स्मरन्‌ ब्रुवन्नरो विशुद्धमेति संततम्‌।
हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नान्यथागतिं विमोहनं हि देहिनां सुशंकरस्य चिंतनम् ॥१६॥

इस स्तोत्र को, जो भी पढ़ता है, याद करता है और सुनाता है,
वह सदैव के लिए पवित्र हो जाता है और महान गुरु शिव की भक्ति पाता है।
इस भक्ति के लिए कोई दूसरा मार्ग या उपाय नहीं है।
बस शिव का विचार ही भ्रम को दूर कर देता है।

Audio Link Shanker Mahadewan: Shiv Tandav Stotram by Shankar Mahadevan & Shailesh Dani @JioSaavn

Shiv Tandav Strotam by Ravana – (English Lyrics)Meaning


Jatatavigalajjala pravahapavitasthale
Galeavalambya lambitam bhujangatungamalikam
Damad damad damaddama ninadavadamarvayam
Chakara chandtandavam tanotu nah shivah shivam

With his neck consecrated by the flow of water that flows from his hair,
And on his neck a snake, which is hung like a garland,
And the Damaru drum that emits the sound “Damat Damat Damat Damat”,
Lord Shiva did the auspicious dance of Tandava. May he give prosperity to all of us.

Jata kata hasambhrama bhramanilimpanirjhari
Vilolavichivalarai virajamanamurdhani
Dhagadhagadhagajjva lalalata pattapavake
Kishora chandrashekhare ratih pratikshanam mama

I have a deep interest in Shiva
Whose head is glorified by the rows of moving waves of the celestial Ganga river,
Which stir in the deep well of his hair in tangled locks.
Who has the brilliant fire burning on the surface of his forehead,
And who has the crescent moon as a jewel on his head.

Dharadharendrana ndinivilasabandhubandhura
Sphuradigantasantati pramodamanamanase
Krupakatakshadhorani nirudhadurdharapadi
Kvachidigambare manovinodametuvastuni

May my mind seek happiness in Lord Shiva,
In whose mind all the living beings of the glorious universe exist,
Who is the companion of Parvati (daughter of the mountain king),
Who controls unsurpassed adversity with his compassionate gaze, Which is all-pervading
And who wears the Heavens as his raiment.

Jata bhujan gapingala sphuratphanamaniprabha
Kadambakunkuma dravapralipta digvadhumukhe
Madandha sindhu rasphuratvagutariyamedure
Mano vinodamadbhutam bibhartu bhutabhartari

May I find wonderful pleasure in Lord Shiva, who is the advocate of all life,
With his creeping snake with its reddish brown hood and the shine of its gem on it
Spreading variegated colors on the beautiful faces of the Goddesses of the Directions,
Which is covered by a shimmering shawl made from the skin of a huge, inebriated elephant.

Sahasra lochana prabhritya sheshalekhashekhara
Prasuna dhulidhorani vidhusaranghripithabhuh
Bhujangaraja malaya nibaddhajatajutaka
Shriyai chiraya jayatam chakora bandhushekharah

May Lord Shiva give us prosperity,
Who has the Moon as a crown,
Whose hair is bound by the red snake-garland,
Whose footrest is darkened by the flow of dust from flowers
Which fall from the heads of all the gods – Indra, Vishnu and others.

Lalata chatvarajvaladhanajnjayasphulingabha
nipitapajnchasayakam namannilimpanayakam
Sudha mayukha lekhaya virajamanashekharam
Maha kapali sampade shirojatalamastunah

May we obtain the riches of the Siddhis from the tangled strands Shiva’s hair,
Who devoured the God of Love with the sparks of the fire that burns on his forehead,
Which is revered by all the heavenly leaders,
Which is beautiful with a crescent moon.

Karala bhala pattikadhagaddhagaddhagajjvala
Ddhanajnjaya hutikruta prachandapajnchasayake
Dharadharendra nandini kuchagrachitrapatraka
Prakalpanaikashilpini trilochane ratirmama

My interest is in Lord Shiva, who has three eyes,
Who offered the powerful God of Love to fire.
The terrible surface of his forehead burns with the sound “Dhagad, Dhagad …”
He is the only artist expert in tracing decorative lines
on the tips of the breasts of Parvati, the daughter of the mountain king.

navina megha mandali niruddhadurdharasphurat
Kuhu nishithinitamah prabandhabaddhakandharah
nilimpanirjhari dharastanotu krutti sindhurah
Kalanidhanabandhurah shriyam jagaddhurandharah

May Lord Shiva give us prosperity,
The one who bears the weight of this universe,
Who is enchanting with the moon,
Who has the celestial river Ganga
Whose neck is dark as midnight on a new moon night, covered in layers of clouds.

Praphulla nila pankaja prapajnchakalimchatha
Vdambi kanthakandali raruchi prabaddhakandharam
Smarachchidam purachchhidam bhavachchidam makhachchidam
Gajachchidandhakachidam tamamtakachchidam bhaje

I pray to Lord Shiva, whose neck is bound with the brightness of the temples
hanging with the glory of fully bloomed blue lotus flowers,
Which look like the blackness of the universe.
Who is the slayer of Manmatha, who destroyed the Tripura,
Who destroyed the bonds of worldly life, who destroyed the sacrifice,
Who destroyed the demon Andhaka, who is the destroyer of the elephants,
And who has overwhelmed the God of death, Yama.

Akharvagarvasarvamangala kalakadambamajnjari
Rasapravaha madhuri vijrumbhana madhuvratam
Smarantakam purantakam bhavantakam makhantakam
Gajantakandhakantakam tamantakantakam bhaje

I pray to Lord Siva, who has bees flying all around because of the sweet
Scent of honey coming from the beautiful bouquet of auspicious Kadamba flowers,
Who is the slayer of Manmatha, who destroyed the Tripura,
Who destroyed the bonds of worldly life, who destroyed the sacrifice,
Who destroyed the demon Andhaka, who is the destroyer of the elephants,
And who has overwhelmed the God of death, Yama.

Jayatvadabhravibhrama bhramadbhujangamasafur
Dhigdhigdhi nirgamatkarala bhaal havyavat
Dhimiddhimiddhimidhva nanmrudangatungamangala
Dhvanikramapravartita prachanda tandavah shivah

Shiva, whose dance of Tandava is in tune with the series of loud
sounds of drum making the sound “Dhimid Dhimid”,
Who has fire on his great forehead, the fire that is spreading out because of the
breath of the snake, wandering in whirling motions in the glorious sky.

Drushadvichitratalpayor bhujanga mauktikasrajor
Garishtharatnaloshthayoh suhrudvipakshapakshayoh
Trushnaravindachakshushoh prajamahimahendrayoh
Sama pravartayanmanah kada sadashivam bhaje

When will I be able to worship Lord Sadashiva, the eternally auspicious God,
With equanimous vision towards people or emperors,
Towards a blade of grass and a lotus, towards friends and enemies,
Towards the most precious gem and a lump of dirt,
Toward a snake or a garland and towards the varied forms of the world?

Kada nilimpanirjhari nikujnjakotare vasanh
Vimuktadurmatih sada shirah sthamajnjalim vahanh
Vimuktalolalochano lalamabhalalagnakah
Shiveti mantramuchcharan sada sukhi bhavamyaham

When I can be happy, living in a cave near the celestial river Ganga,
Bringing my hands clasped on my head all the time,
With my impure thoughts washed away, uttering the mantra of Shiva,
Devoted to the God with a glorious forehead and with vibrant eyes?

Imam hi nityameva muktamuttamottamam stavam
Pathansmaran bruvannaro vishuddhimeti santatam
Hare gurau subhaktimashu yati nanyatha gatim
Vimohanam hi dehinam sushankarasya chintanam

Anyone who reads, remembers and recites this stotra as stated here
Is purified forever and obtains devotion in the great Guru Shiva.
For this devotion, there is no other way or refuge.
Just the mere thought of Shiva removes the delusion.

शिव महिम्न स्तोत्र कथा:

एक बार की बात है, एक युवक था जिसका नाम वसुगुप्त था। वह बहुत ही आदर्शवान और धार्मिक जीवन जीने वाला था। वह शिव भक्त था और रोज़ाना शिव मंदिर जाकर पूजा करता था।

एक दिन वसुगुप्त ने विचार किया कि क्या वह शिव के लिए कुछ विशेष कर सकता है। उसने अपने गुरु से पूछा और गुरु ने उसे शिव महिम्न स्तोत्र के बारे में बताया। यह स्तोत्र शिव की महिमा और शक्ति का वर्णन करता है। गुरु ने वसुगुप्त से कहा कि वह इस स्तोत्र का पाठ करें और शिव की कृपा प्राप्त करें।

वसुगुप्त ने गुरु के कहे अनुसार रोज़ाना शिव महिम्न स्तोत्र का पाठ करना शुरू किया। वह इसे पूरे मन और श्रद्धा से पढ़ता था। धीरे-धीरे, वह अपने जीवन में शिव की प्रत्यक्षता को महसूस करने लगा।

जब वसुगुप्त शिव मंदिर जाता था, तो उसे ऐसा लगता था कि शिव मंदिर में वहीं विराजमान हैं और उसकी समस्त आराधनाएं शिव खुद कर रहे हैं। उसे अनु

भव होता था कि उसके आस-पास एक दिव्यता की वातावरण होती है और शिव की कृपा सदैव उसके साथ रहती है।

धीरे-धीरे वसुगुप्त की जीवन में सभी कठिनाइयां और संकट समाप्त हो गए। उसे सब प्रकार की सफलताएं प्राप्त होने लगीं और उसका आत्मविश्वास बढ़ गया। शिव महिम्न स्तोत्र के प्रतिदिनी पाठ से वह अपने जीवन को समृद्धि, शांति और सुख के साथ भर दिया।

इस कथा से हमें यह सीख मिलती है कि शिव महिम्न स्तोत्र के नियमित पाठ से हम अपने जीवन में शिव की कृपा और आशीर्वाद को प्राप्त कर सकते हैं। यह स्तोत्र हमें अंतरंग शांति, मन की स्थिरता और आत्मिक उन्नति प्रदान करता है। इसलिए, हमें नियमित रूप से शिव महिम्न स्तोत्र का पाठ करना चाहिए और शिव की अनन्य भक्ति के माध्यम से उसकी कृपा को प्राप्त करना चाहिए।

वसुगुप्त की इस स्तुति और शिव के प्रति उसका अटूट भक्तिभाव, उसे अपरिमित आनंद और आत्मतृप्ति की प्राप्ति करवाता था। उसके मन में शिव के प्रति गहरी आस्था और भक्ति की ज्योति प्रकट होती थी।

यह कथा हमें यह बताती है कि शिव की महिमा, शक्ति और सामर्थ्य को महसूस करने के लिए हमें उनकी भक्ति को सच्ची और पक्की करनी चाहिए। शिव महिम्न स्तोत्र के माध्यम से हम अपने आप को शिव के अद्भुत गुणों और दिव्यताओं के प्रति संवेदनशील बना सकते हैं। इसके द्वारा हम शिव के प्रति अपार श्रद्धा और समर्पण विकसित कर सकते हैं और उनके आदेशों का पालन करके उनकी कृपा प्राप्त कर सकते हैं।

इस प्रकार, वसुगुप्त ने शिव महिम्न स्तोत्र की मदद से अपने जीवन को प्रकाशमय और सुखमय बना लिया। वह अपने समस्त कर्तव्यों को ध्यान से निभाता था और समाज के लिए नेक कार्यों में लगा रहता था। उसकी आत्मा में शांति, प्रेम, त्याग और उदारता की प्रवृत्ति हो गई। वह सभी को ध्यान और

 सहानुभूति से देखने लगा और उनकी सेवा करने का अवसर प्राप्त होता था।

इस रूप में, शिव महिम्न स्तोत्र ने वसुगुप्त की जीवन में बदलाव लाया और उसे अपने आप को अद्वितीय शिव से जुड़े हुए महसूस कराया। यह स्तोत्र हमें शिव की महानता, करुणा और अनंत शक्ति का अनुभव कराता है और हमें आदर्श जीवन जीने की प्रेरणा देता है। इसलिए, हमें नियमित रूप से शिव महिम्न स्तोत्र का पाठ करना चाहिए और अपने जीवन को शिव के दिव्य आदर्शों के अनुरूप बनाना चाहिए।

  • Navagraha Stotram (नवग्रह स्तोत्रम्)

    नवग्रह स्तोत्र (Navagraha Stotram) – अर्थ और लाभ नवग्रह स्तोत्र (Navagraha Stotram) – अर्थ, महत्त्व और संपूर्ण पाठ नवग्रह स्तोत्र (Navagraha Stotram) हिंदू धर्म का एक अत्यंत प्रभावशाली और पवित्र स्तोत्र है। इसकी रचना महर्षि वेदव्यास ने नौ ग्रहों (नवग्रहों) को शांत करने और उनकी कृपा प्राप्त करने के लिए की थी। ज्योतिष शास्त्र के…


  • शिव पंचाक्षर स्तोत्र (Shiv Panchakshar Stotra)

    शिव पंचाक्षर स्तोत्र – अर्थ और बोल | Shiv Panchakshar Stotra Lyrics & Meaning in Hindi शिव पंचाक्षर स्तोत्र (Shiv Panchakshar Stotra) रचयिता: आदि शंकराचार्य (Adi Shankaracharya) परिचय (About) शिव पंचाक्षर स्तोत्र भगवान शिव की उपासना में रचित सबसे लोकप्रिय और प्रभावशाली स्तोत्रों में से एक है। इसकी रचना आदि शंकराचार्य ने की थी। यह…


  • सिद्ध कुंजिका स्तोत्र (Siddha Kunjika Stotram)

    सिद्ध कुंजिका स्तोत्रम् (Siddha Kunjika Stotram) – अर्थ और महत्व सिद्ध कुंजिका स्तोत्रम्: दुर्गा सप्तशती की गुप्त कुंजी कलाकार/स्रोत: परंपरागत (रुद्रयामल तन्त्र) परिचय (About) सिद्ध कुंजिका स्तोत्र (Siddha Kunjika Stotram) हिंदू धर्म में शाक्त परंपरा का एक अत्यंत प्रभावशाली और पवित्र स्तोत्र है। रुद्रयामल तंत्र के अंतर्गत गौरी तंत्र में वर्णित यह स्तोत्र भगवान शिव…


Newer posts »

© 2026 कविता

Theme by Anders NorénUp ↑