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Gurvashtakam (Guru Ashtakam) – गुर्वष्टकम्

।।श्रीमद् आद्य शंकराचार्य विरचितम्।।

शरीरं सुरूपं तथा वा कलत्रं ।

यशश्चारु चित्रं धनं मेरुतुल्यम् ।

मनश्चेन्न लग्नं गुरोरङ्घ्रिपद्मे ।

ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम् ॥ १ ॥

कलत्रं धनं पुत्रपौत्रादि सर्वं ।

गृहं बान्धवाः सर्वमेतद्धि जातम् ।

मनश्चेन्न लग्नं गुरोरङ्घ्रिपद्मे ।

ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम् ॥ २ ॥

षडङ्गादिवेदो मुखे शास्त्रविद्या ।

कवित्वादि गद्यं सुपद्यं करोति ।

मनश्चेन्न लग्नं गुरोरङ्घ्रिपद्मे ।

ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम् ॥ ३ ॥

विदेशेषु मान्यः स्वदेशेषु धन्यः ।

सदाचारवृत्तेषु मत्तो न चान्यः ।

मनश्चेन्न लग्नं गुरोरङ्घ्रिपद्मे ।

ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम् ॥ ४ ॥

क्षमामण्डले भूपभूपालबृन्दैः ।

सदा सेवितं यस्य पादारविन्दम् ।

मनश्चेन्न लग्नं गुरोरङ्घ्रिपद्मे ।

ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम् ॥ ५ ॥

यशो मे गतं दिक्षु दानप्रतापा-

ज्जगद्वस्तु सर्वं करे यत्प्रसादात् ।

मनश्चेन्न लग्नं गुरोरङ्घ्रिपद्मे ।

ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम् ॥ ६ ॥

न भोगे न योगे न वा वाजिराजौ ।

न कान्तामुखे नैव वित्तेषु चित्तम् ।

मनश्चेन्न लग्नं गुरोरङ्घ्रिपद्मे ।

ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम् ॥ ७ ॥

अरण्ये न वा स्वस्य गेहे न कार्ये ।

न देहे मनो वर्तते मे त्वनर्घ्ये ।

मनश्चेन्न लग्नं गुरोरङ्घ्रिपद्मे ।

ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम् ॥ ८ ॥

गुरोरष्टकं यः पठेत्पुण्यदेही ।

यतिर्भूपतिर्ब्रह्मचारी च गेही ।

लभेद्वाञ्छितार्थं पदं ब्रह्मसञ्ज्ञं ।

गुरोरुक्तवाक्ये मनो यस्य लग्नम् ॥

Gurvashtakam lyrics in English (Roman Script)

śarīraṁ surūpaṁ tathā vā kalatraṁ |
yaśaścāru citraṁ dhanaṁ mērutulyam |
manaścēnna lagnaṁ gurōraṅghripadmē |
tataḥ kiṁ tataḥ kiṁ tataḥ kiṁ tataḥ kim || 1 ||

kalatraṁ dhanaṁ putrapautrādi sarvaṁ |
gr̥haṁ bāndhavāḥ sarvamētaddhi jātam |
manaścēnna lagnaṁ gurōraṅghripadmē |
tataḥ kiṁ tataḥ kiṁ tataḥ kiṁ tataḥ kim || 2 ||

ṣaḍaṅgādivēdō mukhē śāstravidyā |
kavitvādi gadyaṁ supadyaṁ karōti |
manaścēnna lagnaṁ gurōraṅghripadmē |
tataḥ kiṁ tataḥ kiṁ tataḥ kiṁ tataḥ kim || 3 ||

vidēśēṣu mānyaḥ svadēśēṣu dhanyaḥ |
sadācāravr̥ttēṣu mattō na cānyaḥ |
manaścēnna lagnaṁ gurōraṅghripadmē |
tataḥ kiṁ tataḥ kiṁ tataḥ kiṁ tataḥ kim || 4 ||

kṣamāmaṇḍalē bhūpabhūpālabr̥ndaiḥ |
sadā sēvitaṁ yasya pādāravindam |
manaścēnna lagnaṁ gurōraṅghripadmē |
tataḥ kiṁ tataḥ kiṁ tataḥ kiṁ tataḥ kim || 5 ||

yaśō mē gataṁ dikṣu dānapratāpā-
jjagadvastu sarvaṁ karē yatprasādāt |
manaścēnna lagnaṁ gurōraṅghripadmē |
tataḥ kiṁ tataḥ kiṁ tataḥ kiṁ tataḥ kim || 6 ||

na bhōgē na yōgē na vā vājirājau |
na kāntāmukhē naiva vittēṣu cittam |
manaścēnna lagnaṁ gurōraṅghripadmē |
tataḥ kiṁ tataḥ kiṁ tataḥ kiṁ tataḥ kim || 7 ||

araṇyē na vā svasya gēhē na kāryē |
na dēhē manō vartatē mē tvanarghyē |
manaścēnna lagnaṁ gurōraṅghripadmē |
tataḥ kiṁ tataḥ kiṁ tataḥ kiṁ tataḥ kim || 8 ||

gurōraṣṭakaṁ yaḥ paṭhētpuṇyadēhī |
yatirbhūpatirbrahmacārī ca gēhī |
labhēdvāñchitārthaṁ padaṁ brahmasañjñaṁ |
gurōruktavākyē manō yasya lagnam ||

जगद्गुरु शंकराचार्य: ज्ञान और आध्यात्मिकता की दिव्य ज्योति

Jagadguru Shankaracharya: The Divine Light of Knowledge and Spirituality

जगद्गुरु शंकराचार्य भारत के आध्यात्मिक और दार्शनिक परिदृश्य में अत्यंत पूजनीय विभूति  हैं। उनकी शिक्षाओं और गहन ज्ञान ने असंख्य लोगों के जीवन पर परिवर्तनकारी प्रभाव डाला है, और साधकों का आत्म-साक्षात्कार और आत्मज्ञान के मार्ग पर मार्गदर्शन किया है। आठवीं शताब्दी में केरल के कलादि में जन्मे शंकराचार्य ज्ञान के प्रतीक, अद्वैत वेदांत दर्शन के पथप्रदर्शक और प्राचीन वैदिक ज्ञान के संरक्षक के रूप में उभरे।

कम उम्र से ही शंकराचार्य ने असाधारण बौद्धिक कौशल और आध्यात्मिक झुकाव प्रदर्शित किया। उन्होंने वेदों, उपनिषदों और विभिन्न धर्मग्रंथों का अध्ययन किया और प्राचीन ऋषियों की गहन शिक्षाओं में महारत हासिल की। शास्त्रों की उनकी सहज समझ ने, उनके गहन ध्यान संबंधी अनुभवों के साथ मिलकर, अद्वैत वेदांत – गैर-द्वैतवाद के दर्शन – के उनके दृष्टिकोण को प्रदर्शित दिया।

जगद्गुरु शंकराचार्य को सनातन धर्म (सनातन धार्मिकता) के पुनरुद्धार और पुनर्स्थापना में उनके अद्वितीय योगदान के लिए व्यापक रूप से सम्मान प्राप्त है। उन्होंने भारतीय उपमहाद्वीप में व्यापक यात्राएँ कीं, दार्शनिक बहसों में शामिल हुए, भ्रांतियों को दूर किया और हिंदू धर्म के आध्यात्मिक सार को पुनर्जीवित किया। ब्रह्म सूत्र, भगवद गीता और उपनिषद जैसे पवित्र ग्रंथों पर उनके प्रवचन और टीकायें सत्य के जिज्ञासुओं के लिए बहुमूल्य ज्ञान कोष बने हुए हैं।

शंकराचार्य की उल्लेखनीय उपलब्धियों में से एक भारत के विभिन्न भागों में चार मठों की स्थापना थी – दक्षिण में श्रृंगेरी, पश्चिम में द्वारका, पूर्व में पुरी और उत्तर में जोशीमठ। ये मठ आध्यात्मिक शिक्षा और मार्गदर्शन के केंद्र के रूप में कार्य करते हैं, जो शंकराचार्य जी  कि आध्यात्मिक वंशावली की निरंतरता और वैदिक ज्ञान के प्रसार को सुनिश्चित करते हैं। इन मठों के शंकराचार्य उनके महान मिशन को आगे बढ़ाते हैं, आध्यात्मिक मार्गदर्शन प्रदान करते हैं और सनातन धर्म की शुद्धता को संरक्षित करते हैं।

शंकराचार्य के दर्शन ने ब्रह्म की अंतिम वास्तविकता, सर्वोच्च चेतना पर जोर दिया, जो सभी द्वंद्वों और रूपों से परे है। उन्होंने भौतिक संसार की भ्रामक प्रकृति पर जोर दिया और आत्म-साक्षात्कार प्राप्त करने के साधन के रूप में आत्म-जांच (आत्म विचार) और ध्यान के मार्ग का सुझाव दिया । उनकी शिक्षाओं ने सभी के अस्तित्व की एकता पर जोर दिया, इस बात पर जोर दिया कि नाम, रूप और सामाजिक भेदों की सीमाओं से परे, प्रत्येक व्यक्ति अनिवार्य रूप से दिव्य है।

जगद्गुरु शंकराचार्य की विरासत सत्य और ज्ञान के साधकों को प्रेरित और मार्गदर्शित करती रहती है। उनकी शिक्षाएँ हमें हमारे भीतर मौजूद शाश्वत सत्य क का स्मरण कराती  हैं और हमें आध्यात्मिक परिवर्तन के मार्ग पर चलने के लिए प्रोत्साहित करती हैं। उनके दर्शन की गहराई इसकी सार्वभौमिकता में निहित है, जो एक ऐसा मार्ग प्रदान करता है जो साम्प्रदायिक मतवाद एवं उपासना पद्धति की सीमाओं से पार करता है और साधकों को उनके वास्तविक स्वरूप की प्राप्ति की ओर ले जाता है।

संघर्षों और विभाजनों से भरी दुनिया में, शंकराचार्य का एकता, करुणा और आत्म-बोध का संदेश अत्यधिक प्रासंगिक है। उनकी शिक्षाएं विभिन्न धर्मों के बीच सद्भाव का मार्ग प्रशस्त करती हैं, इस समझ को बढ़ावा देती हैं कि सभी धर्मों का सार एक ही है- अपने भीतर परमात्मा की प्राप्ति। धार्मिकता, आत्म-अनुशासन और आत्म-जांच के मार्ग पर चलकर, व्यक्ति अस्तित्व की एकता का अनुभव कर सकता है और जन्म और मृत्यु के चक्र से मुक्ति प्राप्त कर सकता है।

जगद्गुरु शंकराचार्य का जीवन प्राचीन ऋषियों के कालातीत ज्ञान और मानवता के लिए उनके गहन योगदान का उदाहरण है। उनकी शिक्षाएँ सत्य की खोज करने वालों के लिए मार्ग को रोशन करती रहती हैं, हमें हमारी अंतर्निहित दिव्यता और हम में से प्रत्येक के भीतर असीमित क्षमता की याद दिलाती हैं। जैसे-जैसे हम उनकी शिक्षाओं में गहराई से उतरते हैं और उनके सिद्धांतों को आत्मसात करते हैं, हम जगद्गुरु शंकराचार्य की शाश्वत विरासत को अपनाते हैं । हम, अपने जीवन और अपने आस-पास की दुनिया में प्रकाश, प्रेम और ज्ञान लाने का प्रयास करते हैं।

शंकराचार्य द्वारा रचित ग्रन्थः

जगद्गुरु शंकराचार्य, एक प्रख्यात आध्यात्मिक गुरु और दार्शनिक हुए उन्होंने  एक समृद्ध विरासत छोड़ी है। जो आज भी ज्ञान की और आत्मसाक्षात्कार के मार्ग में खोज करने वाले लोगों को प्रेरित और प्रबुद्ध करती है। यहां शंकराचार्य जी द्वारा रचे गये कुछ प्रमुख ग्रंथों का उल्लेख किया गया है:

1. उपनिषद भाष्य: शंकराचार्य के उपनिषद भाष्य, जिन्हें उपनिषद वाणी की व्याख्या के रूप में जाना जाता है, उनके सबसे महत्वपूर्ण कार्यों में से एक हैं। ये टिप्पणियां गहरी आध्यात्मिक शिक्षाओं और वेदान्त के दार्शनिक सिद्धांतों का विवेचन करती हैं, जो वेदान्त के मूल सिद्धान्त हैं।

2. ब्रह्मसूत्रभाष्य: शंकराचार्य की ब्रह्मसूत्र पर टीका एक महत्वपूर्ण कार्य है जो वेदान्त दर्शन के सार को प्रस्तुत करती है। ब्रह्मसूत्र, जिसे वेदांत सूत्रों के रूप में भी जाना जाता है, उपनिषदों की शिक्षाओं का संक्षिप्त

 रूप हैं। शंकराचार्य की टिप्पणी, जिसे ब्रह्मसूत्रभाष्य कहा जाता है, सूत्रों में प्रस्तुत दार्शनिक सिद्धांतों और तार्किक वाद-विवादों का विवरण प्रदान करती है।

3. भगवद्गीता भाष्य: शंकराचार्य की भगवद्गीता पर टिप्पणी, जिसे भगवद्गीता भाष्य कहा जाता है, अत्यंत प्रशंसनीय व सम्माननीय  है जो भगवान कृष्ण द्वारा प्रदान की गई आध्यात्मिक शिक्षाओं के गहरे दार्शनिक अर्थों को स्पष्ट करती है। इस टिप्पणी में, शंकराचार्य जी वेदांत दर्शन के व्यावहारिक उपयोग को प्रस्तुत करते हैं, जिसमें जीवन की चुनौतियों, कर्तव्य और आत्मसाक्षात्कार के मार्ग का महत्व है।

4. विवेकचूड़ामणि: विवेकचूड़ामणि एक महत्वपूर्ण पाठ है जो शंकराचार्य जी के अत्यंत गहरे आध्यात्मिक सिद्धांतों, जीवन के उद्देश्य और मुक्ति के मार्ग का  मार्गदर्शन करने में सहायता करती है । विवेकचूड़ामणि साधकों के लिए एक मार्गदर्शक के रूप में काम करती है, जो अनन्तता और क्षणिकता के बीच विवेक की महत्व पर प्रकाश डालती  है।

5. आत्मबोध: आत्मबोध शंकराचार्य का एक अन्य महत्वपूर्ण ग्रंथ है, जिसका अर्थ है “स्वयंज्ञान” या “आत्मज्ञान”। यह एक संक्षेप्त पाठ है जो आत्मा (आत्मन) की प्रकृति और आत्मसाक्षात्कार को प्राप्त करने के साधनों की जानकारी प्रदान करता है। आत्मबोध में आत्म-पृच्छा और विचारणा का मार्ग प्रस्तुत किया जाता है, जो अहंकार की सीमाओं को पार करके वास्तविक स्वरूप का अनुभव करने के लिए आवश्यक है।

ये केवल कुछ उदाहरण हैं शंकराचार्य द्वारा लिखी गई गहरी रचनाओं के। उनकी पुस्तकें विभिन्न दार्शनिक और आध्यात्मिक विषयों को सम्मिलित करती हैं, जो आध्यात्मिक ज्ञान के मार्ग पर खोज करने वाले लोगों के लिए प्रेरणा स्रोत  हैं। इन पुस्तकों में दिए गए उपदेश अनंत सत्य और अद्वैत ब्रह्मतत्त्व की प्रतीक्षा करने वाले लोगों के मन को जागृत करती हैं, मुक्ति और अनन्त आनंद के मार्ग को प्रकाशित करती हैं।

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गुरु पूर्णिमा: दिव्य संबंधों का एक गहरा उत्सव

Guru Poornima: A Profound Celebration of Divine Connections

गुरु पूर्णिमा: दिव्य संबंधों का एक गहरा उत्सव

तारों से जगमगाती रात के शांत एकांत में, प्राचीन पेड़ों की कोमल छाया के नीचे, मैं खुद को गुरु पूर्णिमा के गहन सार में डूबा हुआ पाता हूं। हवा श्रद्धा, प्रेम और आध्यात्मिक ज्ञान की गहरी लालसा से भरी हुई है। इस पवित्र दिन का जादू मेरे दिल को भर देता है, कृतज्ञता के आँसू और समय और स्थान से परे जबरदस्त भावनाएँ लाता है।

गुरु पूर्णिमा, आध्यात्मिक शिक्षक को श्रद्धांजलि देने वाला दिव्य अवसर, गहन महत्व का उत्सव है। यह वह दिन है जब दुनिया भर के शिष्य अपने आध्यात्मिक मार्गदर्शकों के प्रति हार्दिक कृतज्ञता और श्रद्धा व्यक्त करने के लिए एकत्रित होते हैं। मेरे लिए, यह दिन मेरी आत्मा में एक विशेष स्थान रखता है, क्योंकि यह गुरु और शिष्य के बीच शाश्वत बंधन का प्रतीक है।

जैसे ही मैं अपनी यात्रा पर विचार करता हूं, मुझे मेरे प्रिय गुरु द्वारा मुझे दिए गए अनगिनत आशीर्वाद याद आते हैं। यह उनकी दिव्य कृपा ही थी कि मैंने आत्म-साक्षात्कार का मार्ग खोजा और आंतरिक सत्य की परिवर्तनकारी खोज पर निकल पड़ा। गुरु ने, अंधेरी रातों में एक मार्गदर्शक प्रकाश की तरह, मेरा मार्ग रोशन किया, अज्ञानता की छाया को दूर किया और आत्मज्ञान का मार्ग प्रशस्त किया।

मुझे वह क्षण अच्छी तरह याद है जब मैं पहली बार अपने गुरु से मिला था। यह ऐसा था मानो ब्रह्मांड ने हमें एक साथ लाने की साजिश रची हो। उनकी उपस्थिति में, मुझे शांति और शांति की एक अवर्णनीय अनुभूति महसूस हुई, जैसे कि मुझे अंततः अपना आध्यात्मिक घर मिल गया हो। उनके शब्द, फूल से टपकते शहद की तरह, मेरे भीतर गहराई तक गूंजते रहे, सुप्त सच्चाइयों को जगाते रहे और एक लौ प्रज्वलित करते रहे जो मेरे अस्तित्व के भीतर लगातार जलती रही।

गुरु-शिष्य का रिश्ता अद्वितीय सुंदरता और संवेदनशीलता का है। यह एक पवित्र बंधन है जो भौतिक दायरे से परे है, क्योंकि गुरु दिव्य ज्ञान और बिना शर्त प्यार का अवतार बन जाता है। उनकी कृपा से, गुरु ज्ञान प्रदान करते हैं, भ्रम दूर करते हैं और शिष्य के भीतर आध्यात्मिक विकास के बीज का पोषण करते हैं।

इस पवित्र दिन पर, मैं अपने गुरु को उनके अटूट समर्थन, असीम करुणा और अथक समर्पण के लिए अपनी गहरी कृतज्ञता अर्पित करता हूं। उन्होंने मेरी आत्मा की सबसे अंधेरी रातों में मेरा हाथ पकड़कर मुझे प्रकाश की ओर निर्देशित किया है। उनकी शिक्षाओं ने मेरी चेतना का विस्तार किया है, जिससे मुझे सभी प्राणियों के अंतर्संबंध और हमें एक साथ बांधने वाली दिव्य टेपेस्ट्री को समझने में सक्षम बनाया गया है।

गुरु पूर्णिमा उस आध्यात्मिक वंश की एक शक्तिशाली अनुस्मारक के रूप में कार्य करती है जिसका हम सभी हिस्सा हैं। यह न केवल हमारे तात्कालिक गुरुओं, बल्कि अतीत के उन महान गुरुओं का भी सम्मान करने का समय है जिन्होंने पीढ़ियों का मार्ग प्रशस्त किया है। उनकी शिक्षाएं समय से आगे निकल गई हैं, युगों तक गूंजती रहती हैं और साधकों को अपनी आध्यात्मिक यात्रा पर निकलने के लिए सशक्त बनाती हैं।

जैसे ही मैं इस शुभ दिन पर अपना आभार व्यक्त करता हूं, मुझे उस गहन जिम्मेदारी की याद आती है जो एक शिष्य होने के साथ आती है। यह हमारा कर्तव्य है कि हम ज्ञान की मशाल को आगे बढ़ाएं, शिक्षाओं को दूसरों के साथ साझा करें और अपने भीतर मौजूद दिव्य गुणों को अपनाएं। गुरु की कृपा की परिवर्तनकारी शक्ति को जमा नहीं किया जाना चाहिए, बल्कि विशाल महासागर में लहरों की तरह फैलकर मानवता की सामूहिक चेतना के उत्थान तक पहुंचना चाहिए।

गुरु पूर्णिमा केवल कैलेंडर का एक दिन नहीं है; यह अस्तित्व की एक अवस्था है। यह एक निरंतर अनुस्मारक है कि हम हमेशा परमात्मा से जुड़े हुए हैं, कि गुरु हममें से प्रत्येक के भीतर निवास करता है, जागृत होने की प्रतीक्षा कर रहा है। यह जीवन की पवित्रता का सम्मान करने, सत्य की खोज करने और प्रेम और ज्ञान के शाश्वत नृत्य के प्रति समर्पण करने का आह्वान है।

जैसे ही मैं यहां बैठा हूं, चांदनी आकाश को देख रहा हूं, मेरा दिल अपने गुरु और मानवता के भाग्य को आकार देने वाले अनगिनत आध्यात्मिक गुरुओं के लिए प्यार और श्रद्धा से भर जाता है। गुरु पूर्णिमा के इस पवित्र दिन पर, आइए हम हाथ में हाथ डालकर दिव्य संबंधों का जश्न मनाने के लिए एक साथ आएं

  जो हम सभी को बांधे हुए है। गुरु का प्रकाश हमारे कदमों का मार्गदर्शन करे, और हम सदैव दिव्य कृपा के सागर में डूबे रहें।

जो हम सभी को बांधे हुए है। गुरु का प्रकाश हमारे कदमों का मार्गदर्शन करे, और हम सदैव दिव्य कृपा के सागर में डूबे रहें।

मेरी आत्मा की गहराई में, मैं गुरु के प्रेम और ज्ञान की छाप रखता हूँ। मेरे जीवन में उनकी उपस्थिति किसी गहरे परिवर्तन से कम नहीं है। वे हल्की हवा की तरह हैं जिसने मेरी सीमाओं की धूल को उड़ा दिया और मेरे सच्चे स्व की चमक को उजागर कर दिया। वे सुखदायक मरहम रहे हैं जिसने मेरे अतीत के घावों को ठीक किया, मेरी आत्मा को पूर्णता में वापस लाया।

मेरे गुरु के साथ प्रत्येक बातचीत एक पवित्र मिलन, आत्माओं का नृत्य रही है जहां शब्द अप्रचलित हो जाते हैं और मौन बहुत कुछ कहता है। उनकी दयालु दृष्टि में, मुझे सांत्वना, समझ और एक दर्पण मिलता है जो मेरे भीतर की दिव्य चिंगारी को दर्शाता है। उनकी आवाज एक दिव्य संगीत की तरह गूंजती है, मेरे अस्तित्व की गहराइयों को छूती है, मुझे भीतर मौजूद असीमित क्षमता की याद दिलाती है।

उनके मार्गदर्शन के माध्यम से, मैंने समर्पण की शक्ति, जाने देने का परिवर्तनकारी जादू देखा है। उन्होंने धीरे से मेरे अहंकार की परतों को हटा दिया है, उन भ्रमों को उजागर कर दिया है जो एक बार मेरी दृष्टि पर छा गए थे। उनकी उपस्थिति में, मैंने लगाव, भय और संदेह को छोड़ना सीखा है, जिससे सत्य का प्रकाश मेरे मार्ग को रोशन कर सके।

लेकिन गुरु-शिष्य रिश्ते की खूबसूरती सिर्फ मिलने वाली शिक्षाओं में ही नहीं बल्कि दिलों के बीच पनपने वाले प्यार में भी है। गुरु का प्रेम बिना शर्त है, सभी सीमाओं और सीमाओं से परे है। यह एक ऐसा प्रेम है जो दोषों और कमियों से परे देखता है, शिष्य के सार को खुली बांहों से गले लगाता है। उनका प्यार पोषण और उत्थान करता है, भक्ति की अग्नि प्रज्वलित करता है जो मेरे भीतर उज्ज्वल रूप से जलती है।

गुरु पूर्णिमा के इस पवित्र दिन पर, मैं अपने जीवन में गुरु की उपस्थिति के लिए गहरी कृतज्ञता से भर गया हूँ। वे अशांत समय में मेरे लिए सहारा बने, आशा की किरण बने जब अंधेरा मुझे घेरने की धमकी दे रहा था। उनका प्यार लगातार याद दिलाता रहा है कि मैं कभी अकेला नहीं हूं, कि मैं परमात्मा के आलिंगन में हूं।

गुरु पूर्णिमा केवल अनुष्ठान का दिन नहीं है; यह एक उत्सव है

प्रेम और भक्ति से ओतप्रोत। सामूहिक श्रद्धा और कृतज्ञता की ऊर्जा हवा में व्याप्त हो जाती है, जिससे एकता और दैवीय संबंध की स्पष्ट भावना पैदा होती है।

गुरु पूर्णिमा हमारे गुरुओं द्वारा हमें दिए गए अमूल्य उपहार का एक मार्मिक अनुस्मारक है। यह न केवल गुरु के भौतिक स्वरूप बल्कि उनके माध्यम से प्रवाहित होने वाले शाश्वत ज्ञान का भी सम्मान करने का दिन है। उनकी शिक्षाएँ, पवित्र अमृत की तरह, हमारी आत्मा की प्यास बुझाती हैं और हमारे भीतर देवत्व के सुप्त बीज जागृत करती हैं।

गुरु की कृपा से हमें आध्यात्मिक मार्ग पर चलने का अवसर मिलता है। उनकी बुद्धि दिशा सूचक यंत्र बन जाती है जो जीवन की भूलभुलैया में हमारा मार्गदर्शन करती है, हमें अनुग्रह और समभाव के साथ परीक्षणों और क्लेशों से निपटने में मदद करती है। वे हमें अपनी सीमाओं से परे जाने और दिव्य प्राणी के रूप में हमारी वास्तविक क्षमता को अपनाने के लिए सशक्त बनाते हैं।

गुरु का प्रेम एक ऐसी शक्ति है जो सभी सीमाओं, भाषा और संस्कृति से परे है। यह एक ऐसा प्यार है जो हमें अपने गर्मजोशी भरे आलिंगन में घेर लेता है, दुनिया के बोझ को धो देता है और हमें हमारी अंतर्निहित योग्यता की याद दिलाता है। उनका प्यार एक उपचारकारी मरहम है, जो हमारे दिल के टूटे हुए टुकड़ों को जोड़ता है और मानवता की अच्छाई में हमारे विश्वास को बहाल करता है।

इस पवित्र दिन पर, जब मैं अपने प्रिय गुरु द्वारा मुझे दिए गए अनुग्रह और मार्गदर्शन के अनगिनत क्षणों को याद करता हूं तो मेरा दिल भावुक हो जाता है। मेरी क्षमताओं में उनके अटूट विश्वास ने मुझे आत्म-संदेह की गहराई से ऊपर उठाया है और मुझे आत्म-साक्षात्कार के तट की ओर प्रेरित किया है। उनकी उपस्थिति में, मैंने अपने भीतर और आसपास चमत्कार होते देखा है।

गुरु की शिक्षाएँ केवल बौद्धिक समझ तक ही सीमित नहीं हैं; वे आत्मा की एक अनुभवात्मक यात्रा हैं। अपने गहन ज्ञान के माध्यम से, वे इंद्रियों के दायरे से परे शाश्वत सत्य को प्रकट करते हैं। उनकी शिक्षाएँ मेरे हृदय के कक्षों में गूँजती हैं, इतनी गहराई से प्रतिध्वनित होती हैं कि शब्द उन्हें पकड़ने में विफल रहते हैं। प्रत्येक पाठ एक अनमोल रत्न है, जो मार्ग को रोशन करता है और मुझे परम सत्य की ओर ले जाता है।

जैसे ही मैं गुरु पूर्णिमा के महत्व पर विचार करता हूं, मेरे गालों पर कृतज्ञता के आंसू बहने लगते हैं। मेरे गुरु ने मेरे जीवन पर जो गहरा प्रभाव डाला है, उससे मैं कृतज्ञ हूँ। उनकी उपस्थिति ने मेरे अस्तित्व को बदल दिया है, इसे उद्देश्य, अर्थ और परमात्मा के साथ जुड़ाव की गहरी भावना से भर दिया है।

इस शुभ दिन पर, मैं अपने गुरु के प्रति अपनी गहरी श्रद्धा और प्रेम अर्पित करता हूं। मैं उनके निस्वार्थ मार्गदर्शन और अटूट समर्थन के लिए कृतज्ञता से भरे हृदय से उनके सामने झुकता हूं। मैं उनके निस्वार्थ प्रेम, असीम करुणा और आध्यात्मिक जागृति के अमूल्य उपहार के लिए सदैव उनका ऋणी हूँ।

गुरु पूर्णिमा सिर्फ एक उत्सव नहीं है; यह आत्मनिरीक्षण और नवीनीकरण का अवसर है। यह हमारे दिलों में भक्ति की लौ को फिर से जगाने, खुद को आत्म-खोज और निस्वार्थता के मार्ग पर फिर से समर्पित करने का समय है। आइए हम इस पवित्र दिन को अटूट विश्वास, प्रेम और समर्पण के साथ मार्ग पर चलने की याद के रूप में स्वीकार करें।

श्रद्धा और कृतज्ञता के इस दिन जैसे ही सूरज डूबता है, मैं उद्देश्य और भक्ति की एक नई भावना से भर जाता हूं। गुरु पूर्णिमा का आशीर्वाद मेरी आध्यात्मिक यात्रा में मेरा मार्गदर्शन करता रहेगा, मेरे मार्ग को दिव्य ज्ञान और प्रेम से रोशन करता रहेगा। मैं जो भी कदम उठाता हूं, मैं अपने भीतर गुरु की कृपा की शाश्वत लौ रखता हूं, अपने जीवन में उनकी उपस्थिति के लिए हमेशा आभारी हूं।


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|| संकट मोचन हनुमान अष्टक ||

Sankat Mochan Hanuman Ashtak 

hanuman ashtak,
बाल समय रवि भक्षी लियो तब,
तीनहुं लोक भयो अंधियारों।
ताहि सों त्रास भयो जग को,
यह संकट काहु सों जात न टारो।
देवन आनि करी बिनती तब,
छाड़ी दियो रवि कष्ट निवारो।
को नहीं जानत है जग में कपि,
संकटमोचन नाम तिहारो ॥
बालि की त्रास कपीस बसैं गिरि,
जात महाप्रभु पंथ निहारो।
चौंकि महामुनि साप दियो तब,
चाहिए कौन बिचार बिचारो।
कैद्विज रूप लिवाय महाप्रभु,
सो तुम दास के सोक निवारो ॥
को नहीं जानत है जग में कपि,
संकटमोचन नाम तिहारो ॥
अंगद के संग लेन गए सिय,
खोज कपीस यह बैन उचारो।
जीवत ना बचिहौ हम सो जु,
बिना सुधि लाये इहाँ पगु धारो।
हेरी थके तट सिन्धु सबे तब,
लाए सिया-सुधि प्राण उबारो ॥
को नहीं जानत है जग में कपि,
संकटमोचन नाम तिहारो ॥
रावण त्रास दई सिय को सब,
राक्षसी सों कही सोक निवारो।
ताहि समय हनुमान महाप्रभु,
जाए महा रजनीचर मारो।
चाहत सीय असोक सों आगि सु,
दै प्रभुमुद्रिका सोक निवारो ॥
को नहीं जानत है जग में कपि,
संकटमोचन नाम तिहारो ॥
बान लाग्यो उर लछिमन के तब,
प्राण तजे सूत रावन मारो।
लै गृह बैद्य सुषेन समेत,
तबै गिरि द्रोण सु बीर उपारो।
आनि सजीवन हाथ दिए तब,
लछिमन के तुम प्रान उबारो ॥
को नहीं जानत है जग में कपि,
संकटमोचन नाम तिहारो ॥
रावन जुध अजान कियो तब,
नाग कि फाँस सबै सिर डारो।
श्रीरघुनाथ समेत सबै दल,
मोह भयो यह संकट भारो ।
आनि खगेस तबै हनुमान जु,
बंधन काटि सुत्रास निवारो ॥
को नहीं जानत है जग में कपि,
संकटमोचन नाम तिहारो ॥
बंधू समेत जबै अहिरावन,
लै रघुनाथ पताल सिधारो।
देबिन्हीं पूजि भलि विधि सों बलि,
देउ सबै मिलि मन्त्र विचारो।
जाये सहाए भयो तब ही,
अहिरावन सैन्य समेत संहारो ॥
को नहीं जानत है जग में कपि,
संकटमोचन नाम तिहारो ॥
काज किये बड़ देवन के तुम,
बीर महाप्रभु देखि बिचारो।
कौन सो संकट मोर गरीब को,
जो तुमसे नहिं जात है टारो।
बेगि हरो हनुमान महाप्रभु,
जो कछु संकट होए हमारो ॥
को नहीं जानत है जग में कपि,
संकटमोचन नाम तिहारो ॥
॥ दोहा ॥
लाल देह लाली लसे,
अरु धरि लाल लंगूर।
वज्र देह दानव दलन,
जय जय जय कपि सूर ॥
|| सिया वर राम चन्द्र की जय, पवन सूत हनुमान की जय ||

Sankatmochan Hanuman Ashtak (From “Shree Hanuman Chalisa (Hanuman Ashtak)”) – Song Download from Top Devotional Songs @ JioSaavn

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English (Roman)Lyrics:

Sankatmochan Hanuman Ashtak (From “Shree Hanuman Chalisa (Hanuman Ashtak)”) Lyrics

baal samaya ravi bhakshi liyo tab
tinhu lok bhayo andhiyaaron
taahi son traas bhayo jag ko
yah sankat kahu son jaat na taaro
devan aani karee binati tab
chaadi diyo ravi ksht niwaro
ko nahin jaanat hai jag main copi
sankatmochan naam tihaaro sankatmochan naam tihaaro

baali kee traas kapis basain giri
jaat mahaprabhu panth nihaaro
chaunki mahamuni saap diyo tab
chaahiye kaun bichaar bichaaro
kaidvij rup livaay mahaprabhu
so tum daas ke soke niwaro
ko nahin jaanat hai jag main copi
sankatmochan naam tihaaro sankatmochan naam tihaaro

angad ke sang len gaye siy
khoj kapis yah bain ucharo
jeevat na bachihau hum so ju
binaa sudhi laaye ihaan pagu dhaaro
heri thake tat sindhu sabe tab
laae siya-sudhi praan ubaaro
ko nahin jaanat hai jag main copi
sankatmochan naam tihaaro sankatmochan naam tihaaro

ravan traas dai siy ko sab
rakshasi son kahi soke niwaro
taahi samay hanuman mahaprabhu
jae maha rajneechar maaro
chaahat sita asok son aagi su
dai prabhumudrika soke niwaro
ko nahin jaanat hai jag main copi
sankatmochan naam tihaaro sankatmochan naam tihaaro

baan lagyo ur lachhiman ke tab
praan taje sut ravan maaro
lai grih baidh sushen samet
tabai giri dron subir upaaro
aani sajivan haath dai tab
lachhiman ke tum praan ubaaro
ko nahin jaanat hai jag main copi
sankatmochan naam tihaaro sankatmochan naam tihaaro

raawan yuddh ajaan kiyo tab
naag ki fans sabai sir daaro
shri raghunatha samet sabai dal
moh bhayo yah sankat bhaaro
aani khages tabai hanuman ju
bandhan kaati sutraas niwaro
ko nahin jaanat hai jag main copi
sankatmochan naam tihaaro sankatmochan naam tihaaro

bandhu samet jabai ahiraavan
lai raghunatha pataal sidhaaro
debinhin pooji bhalee vidhi son bali
deu sabai mili mantra vichaaro
jaye sahaae bhayo tab hi
ahiraavan sainya samet sanhaaro
ko nahin jaanat hai jag main copi
sankatmochan naam tihaaro sankatmochan naam tihaaro

kaaj kiye bad devan ke tum
bir mahaprabhu deki bichaaro
koun so sankat mor garib ko
jo tumso nahin jaat hai taaro
begi haro hanuman mahaprabhu
jo kachu sankat hoe hamaaro
ko nahin jaanat hai jag main copi
sankatmochan naam tihaaro sankatmochan naam tihaaro
sankatmochan naam tihaaro sankatmochan naam tihaaro

तुलसीदास जी

तुलसीदास जी को हनुमान जी अष्टक की रचना करने का श्रेय जाता है। तुलसीदास जी, जो स्वयं एक महान कवि थे, ने अपनी रचनाओं में हनुमान जी जी के प्रति अत्यंत श्रद्धा और भक्ति का अभिप्रेत किया। उन्होंने “रामचरितमानस” के माध्यम से भगवान राम और हनुमान जी के चरित्र, कथाओं, और गुणों का विस्तारपूर्वक वर्णन किया।

हनुमान अष्टक तुलसीदास जी की एक मधुर और भक्तिपूर्ण रचना है, जिसमें हनुमान जी की महिमा, शक्ति, और सेवा का वर्णन है। यह अष्टक हनुमान जी के प्रति भक्ति और श्रद्धा को बढ़ाने का एक माध्यम है। इसके पठन से मन और ह्रदय में शान्ति और आनंद का अनुभव होता है और हनुमान जी के आशीर्वाद से सभी संकटों का नाश होता है। तुलसीदास जी ने अपनी रचनाओं के माध्यम से हमें हनुमान जी के भक्ति में आस्था और दृढ़ता बढ़ाने का संदेश दिया है।

शक्तिशाली देवता, हनुमान जी केवल प्राचीन ग्रंथों का एक पात्र नहीं हैं, बल्कि अटूट भक्ति, अदम्य साहस और असीम प्रेम का प्रतीक हैं। वायु देवता वायु और दिव्य अप्सरा अंजना से जन्मे हनुमान जी एक दिव्य उद्देश्य के साथ इस धरती पर अवतरित हुए।

हनुमान (संस्कृत: हनुमान्, आंजनेय और मारुति भी) परमेश्वर की भक्ति (हिन्दू धर्म में भगवान की भक्ति) की सबसे लोकप्रिय अवधारणाओं और भारतीय महाकाव्य रामायण में सबसे महत्वपूर्ण पात्रों में प्रधान हैं। वह भगवान शिवजी के सभी अवतारों में सबसे बलवान और बुद्धिमान माने जाते हैं। रामायण के अनुसार वे जानकी के अत्यधिक प्रिय हैं। इस धरा पर जिन सात मनीषियों को अमरत्व का वरदान प्राप्त है, उनमें बजरंगबली भी हैं। हनुमान जी का अवतार भगवान राम की सहायता के लिये हुआ। हनुमान जी के पराक्रम की असंख्य गाथाएँ प्रचलित हैं। इन्होंने जिस तरह से राम के साथ सुग्रीव की मैत्री कराई और फिर वानरों की मदद से असुरों का मर्दन किया, वह अत्यन्त प्रसिद्ध है।

ज्योतिषीयों के सटीक गणना के अनुसार हनुमान जी का जन्म 58 हजार 112 वर्ष पहले त्रेतायुग के अन्तिम चरण में चैत्र पूर्णिमा को मंगलवार के दिन चित्रा नक्षत्र व मेष लग्न के योग में सुबह 6.03 बजे भारत देश में आज के झारखण्ड राज्य के गुमला जिले के आंजन नाम के छोटे से पहाड़ी गाँव के एक गुफा में हुआ था।

इन्हें बजरंगबली के रूप में जाना जाता है क्योंकि इनका शरीर एक वज्र की तरह है। वे पवन-पुत्र के रूप में जाने जाते हैं। वायु अथवा पवन  ने हनुमान को पालने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

 हिन्दू पौराणिक कथाओं के अनुसार हनुमान  “मारुत-नन्दन” हैं।

उनका जीवन, असाधारण उपलब्धियों और निस्वार्थ कार्यों का एक चित्रपट, अनगिनत आत्माओं के लिए प्रेरणा है। छोटी उम्र से ही हनुमान जी ने अपनी असाधारण शक्ति और बुद्धि का प्रदर्शन किया। भगवान राम के प्रति उनकी भक्ति अद्वितीय थी। उन्होंने अपनी हर सांस और हर क्रिया अपने प्रिय प्रभु की सेवा में समर्पित कर दी।

हनुमान जी के निश्छल प्रेम और निष्ठा की कोई सीमा नहीं थी। उनका अटूट विश्वास और अटूट भक्ति उनके मार्गदर्शक सिद्धांत थे। जब भगवान राम की पत्नी सीता का राक्षस राजा रावण द्वारा अपहरण कर लिया गया था, तो वह हनुमान जी ही थे जिन्होंने उन्हें वापस लाने के लिए महासागरों को पार किया, पहाड़ों को छलांग लगाई और निडरता से प्रतिकूलताओं का सामना किया।

उनकी निस्वार्थता और विनम्रता हर पल झलकती थी। अथाह शक्ति होने के बावजूद, हनुमान जी ने कभी घमंड नहीं किया और न ही पहचान की मांग की। उन्होंने सादगी को अपनाया और विनम्रता का सार अपनाया। उनका हृदय करुणा से भर गया, और उनकी उपस्थिति मात्र से व्यथित लोगों को सांत्वना मिली।

भगवान राम के प्रति हनुमान जी की भक्ति उनके दिव्य उद्देश्य का प्रतिबिंब थी। उन्होंने समर्पण का सही अर्थ समझाया, क्योंकि उन्होंने स्वयं को अपने प्रभु के एक विनम्र सेवक के रूप में देखा। उनका प्रत्येक कार्य, उनकी हर छलांग, उनके प्रेम और समर्पण की अभिव्यक्ति थी।

आज भी हनुमान जी आशा, शक्ति और भक्ति के प्रतीक बने हुए हैं। उनकी कहानी उन लोगों से मेल खाती है जो अपने जीवन में मार्गदर्शन और प्रेरणा चाहते हैं। हनुमान जी हमें बाधाओं को दूर करना, अपने डर पर विजय पाना और अपने अहंकार को परमात्मा के चरणों में समर्पित करना सिखाते हैं।

आइए हम अपने दिल की गहराई में हनुमान जी की उपस्थिति का आह्वान करें और उनकी भक्ति, साहस और विनम्रता के गुणों का अनुकरण करें। हमें उनके अटूट समर्थन का आशीर्वाद मिले और उनके दिव्य आलिंगन में सांत्वना मिले। भक्ति के प्रतीक हनुमान जी हमेशा हमारे दिलों में अंकित रहेंगे और हमें धार्मिकता और शाश्वत प्रेम के मार्ग पर मार्गदर्शन करेंगे।

जैसे-जैसे हम हनुमान जी के जीवन में गहराई से उतरते हैं, हम उनके दिव्य अस्तित्व से जुड़ी गहन भावनाओं को उजागर करते हैं। उनके नाम का उल्लेख मात्र से ही श्रद्धा और भक्ति की अपार भावना जागृत हो जाती है।

भगवान राम के प्रति हनुमान जी की अटूट निष्ठा हमारी आत्मा की गहराइयों को छू जाती है। अपने प्रभु के प्रति उसका प्रेम सामान्य स्नेह के दायरे से परे, कोई सीमा नहीं जानता। यह एक भावना इतनी शुद्ध, इतनी तीव्र है कि यह हमारे दिलों के भीतर जुनून की ज्वाला प्रज्वलित कर देती है।

हनुमान जी द्वारा प्रदर्शित निस्वार्थता हमें अंदर तक ले जाती है। उनका हर कार्य सेवा, सुरक्षा और उत्थान की गहरी इच्छा से प्रेरित था। चाहे समुद्र को पार करना हो या लंका को आग के हवाले करना हो, उनकी अटूट प्रतिबद्धता की कोई सीमा नहीं थी। अपने दिव्य कर्तव्यों को पूरा करने का उनका दृढ़ संकल्प हमारे साथ प्रतिध्वनित होता है, हमारे जीवन में उद्देश्य की भावना जगाता है।

लेकिन यह हनुमान जी की असुरक्षा के क्षणों में है कि हमारे दिल वास्तव में उनके सार से जुड़ते हैं। सीता का पता लगाने की अपनी खोज में, उन्हें अनगिनत चुनौतियों, शंकाओं और भय का सामना करना पड़ा। फिर भी, वह कभी डगमगाया नहीं। वह कठिन से कठिन समय में भी डटा रहा, एक अडिग विश्वास से प्रेरित होकर जिसने उसे प्रकाश की ओर निर्देशित किया।

अपने प्यारे भगवान के लिए बहाए गए उनके आंसू हमारी आत्मा को छू जाते हैं। अत्यधिक भावुकता के उन क्षणों में, हम उनके प्रेम, भक्ति और लालसा की गहराई को देखते हैं। उनके आँसू हमारे आँसू बन जाते हैं, क्योंकि वे परमात्मा के साथ पुनर्मिलन की सार्वभौमिक लालसा का प्रतिनिधित्व करते हैं।

हनुमान जी की कहानी हमारे भीतर भौतिक संसार से परे संबंध की गहरी चाहत पैदा करती है। यह भक्ति की लौ प्रज्वलित करता है, हमें उस दिव्य चिंगारी की याद दिलाता है जो हम में से प्रत्येक के भीतर रहती है। उनकी कहानी हमें सिखाती है कि हम भी, सर्वोच्च के प्रति अपनी भक्ति में सांत्वना और उद्देश्य की तलाश में आध्यात्मिक यात्रा शुरू कर सकते हैं।

आइए हम उन असाधारण भावनाओं में डूब जाएं जो हनुमान जी उत्पन्न करते हैं। आइए हम उनके असीम प्रेम, अटूट विश्वास और असीम भक्ति के प्रति समर्पण करें। क्योंकि उनके जीवन की टेपेस्ट्री में, हम अपनी आकांक्षाओं का प्रतिबिंब पाते हैं, एक अनुस्मारक कि भक्ति का मार्ग हमें एक ऐसे स्थान पर ले जाता है जहां हमारे दिल हमेशा के लिए परमात्मा के साथ जुड़े हुए हैं।

लिङ्गाष्टकम् – Lingashtakam

Shiva Lingashtakam: Lyrics, Meaning & Significance

लिङ्गाष्टकम् – Lingashtakam

ब्रह्ममुरारिसुरार्चितलिङ्गं निर्मलभासितशोभितलिङ्गम् ।

जन्मजदुःखविनाशकलिङ्गं तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम् ॥१॥

देवमुनिप्रवरार्चितलिङ्गं कामदहं करुणाकरलिङ्गम् ।
रावणदर्पविनाशनलिङ्गं तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम् ॥२॥

सर्वसुगन्धिसुलेपितलिङ्गं बुद्धिविवर्धनकारणलिङ्गम् ।
सिद्धसुरासुरवन्दितलिङ्गं तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम् ॥३॥

कनकमहामणिभूषितलिङ्गं फणिपतिवेष्टितशोभितलिङ्गम् ।
दक्षसुयज्ञविनाशनलिङ्गं तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम् ॥४॥

कुङ्कुमचन्दनलेपितलिङ्गं पङ्कजहारसुशोभितलिङ्गम् ।
सञ्चितपापविनाशनलिङ्गं तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम् ॥५॥

देवगणार्चितसेवितलिङ्गं भावैर्भक्तिभिरेव च लिङ्गम् ।
दिनकरकोटिप्रभाकरलिङ्गं तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम् ॥६॥

अष्टदलोपरिवेष्टितलिङ्गं सर्वसमुद्भवकारणलिङ्गम् ।
अष्टदरिद्रविनाशितलिङ्गं तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम् ॥७॥

सुरगुरुसुरवरपूजितलिङ्गं सुरवनपुष्पसदार्चितलिङ्गम् ।
परात्परं परमात्मकलिङ्गं तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम् ॥८॥

लिङ्गाष्टकमिदं पुण्यं यः पठेत् शिवसन्निधौ।
शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते॥

Lingashtakam By S.P. Balasubrahmaniam [Full Song] – Shiva Roopa Darshan

Lingastakam – Song Download from Shiva Sthuthi & Shiva Stothramala @ JioSaavn

हिंदी में अर्थ के साथ लिंगाष्टकम 

Lingashtakam Lyrics with Meaning in Hindi

अथ श्रीलिंगाष्टकम्

ब्रह्ममुरारि सुरार्चितलिङ्गं निर्मलभाषित शोभितलिङ्गम् ।
जन्मज दुःख विनाशकलिङ्गं तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम्।1।

[मैं शिवलिंग को प्रणाम करता हूँ] जो ब्रह्मा, विष्णु और देवताओं द्वारा पूजित है, जो निर्मल, उज्जवल और शोभित (सुहावना) है। जो जन्म जन्मों के पापों का नाश करता है, मैं उस सदाशिवलिंग को प्रणाम करता हूँ।

देवमुनि प्रवरार्चित लिङ्गं कामदहं करुणाकर लिङ्गम् ।
रावण दर्पविनाशन लिङ्गं तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम्।2।

जो देवों और मुनिवरों द्वारा पूजा जाता है, जो सभी काम-इच्छा आदि का नाश करता है और करुणावान है। जिसने रावण के अहंकार का नाश किया था, मैं उस सदाशिवलिंग को प्रणाम करता हूँ।

सर्व सुगन्धि सुलेपितलिङ्गं बुद्धिविवर्धन कारणलिङ्गम् ।
सिद्ध सुरासुर वन्दितलिङ्गं तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम्।3।

सभी प्रकार की सुगंधों से जिसका लेपन होता है, जो (आध्यात्मिक) बुद्धि और विवेक के उत्थान का कारण है। सिद्धों, देवता, असुरों सभी के द्वारा जिसकी वंदना की जाती है, मैं उस सदाशिवलिंग को प्रणाम करता हूँ।

कनकमहामणि भूषितलिङ्गं फणिपति वेष्टितशोभित लिङ्गम् ।
दक्ष सुयज्ञ विनाशनलिङ्गं तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम्।4।

स्वर्ण और मणियों द्वारा जिसका श्रृंगार होता है, लिपटे सर्पों से जिसकी शोभा बढ़ जाती है। जिसने दक्ष के महायज्ञ का विनाश किया था, मैं उस सदाशिवलिंग को प्रणाम करता हूँ।

कुङ्कुम चन्दन लेपितलिङ्गं पङ्कजहार सुशोभितलिङ्गम् ।
सञ्चित पापविनाशन लिङ्गं तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम्।5।

जिस पर कुंकुम और चन्दन का लेपन होता है, जो कमलों के हार से सुशोभित होता है, जो सभी जन्मों के पापों का नाश करता है, मैं उस सदाशिवलिंग को प्रणाम करता हूँ।

देवगणार्चित सेवितलिङ्गं भावैर्भक्तिभिरेव च लिङ्गम् ।
दिनकर कोटिप्रभाकर लिङ्गं तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम्।6।

देवगणों के द्वारा भक्ति और सच्चे भाव से जिसकी सेवा होती है, जिसका वैभव और तेज करोड़ों सूर्यों के समान है, मैं उस सदाशिवलिंग को प्रणाम करता हूँ।

अष्टदलो परिवेष्टित लिङ्गं सर्व समुद्भवकारण लिङ्गम् ।
अष्टदरिद्र विनाशित लिङ्गं तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम्।7।

आठ पंखुड़ियों वाले फूलों से घिरा हुआ है, सम्पूर्ण सृष्टि की रचना जिससे आरम्भ हुई थी, जो आठ प्रकार के दारिद्र्य को दूर करने वाला है, मैं उस सदाशिवलिंग को प्रणाम करता हूँ।

सुरगुरुसुरवर पूजित लिङ्गं सुरवनपुष्प सदार्चित लिङ्गम्।
परात्परं परमात्मक लिङ्गं तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम् ।8।

जो देवताओं के गुरु ( बृहस्पति ) द्वारा पूजित है, स्वर्ग के वन के फूलों द्वारा जिसकी पूजा-अर्चना होती है, जो श्रेष्ठ से भी श्रेष्ठ है और जो महानतम है, मैं उस शाश्वत शिवलिंग को प्रणाम करता हूं।

फलश्रुतिः-
लिङ्गाष्टकमिदं पुण्यं यः पठेत् शिव सन्निधौ।
शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते।।

जो भी लिंगाष्टक को शिव के समीप बैठकर पढता है, वह अंत में शिवलोक को प्राप्त होकर शिव के साथ सुखी रहता है। 

इस प्रकार लिंगाष्टकम पूरा हुआ।

लिंगाष्टक का महत्त्व-

शिव पूजा करते समय लिंगाष्टक का पाठ अत्यंत शुभ माना जाता है, श्रावण मास के समय लिंगाष्टक का पाठ करने से मन की असीम शान्ति प्राप्त होती है।

लिंगाष्टकम कथा:

किसी गांव में एक गरीब ब्राह्मण परिवार रहता था। उनका नाम धर्मदत्त था। वह और उनकी पत्नी विशेषा अत्यंत निष्ठावान थे और शिव के दीवाने थे। वे हमेशा ही अपने जीवन को शिव की भक्ति, ध्यान और पूजा में समर्पित रखते थे।

धर्मदत्त की आराधना की एक विशेषता थी। उन्होंने अपने घर में लिंग की मूर्ति अपनाई थी और रोज़ाना उसकी सेवा करते थे। उन्होंने शिव लिंग को अपना ईश्वर मान लिया था और उसे पूजा करके अपने जीवन को धन्य बना लिया था।

एक बार, गांव में अचानक एक महामारी फैल गई। बहुत से लोग बीमार पड़ गए और उनकी स्थिति गंभीर हो गई। धर्मदत्त की पत्नी विशेषा भी बीमार पड़ गई और उसकी स्थिति दिन प्रतिदिन बिगड़ती जा रही थी। धर्मदत्त अत्यंत चिंतित हो गए और रो-रोकर शिव लिंग की आराधना करने लगे।

एक रात, जब धर्मदत्त शिव लिंग की सेवा कर रहे थे, एक देवी उनके सामने प्रकट हुई। वह देव अत्यंत सुंदर और प्रकाशमयी थी। धर्मदत्त को उनकी दिव्यता का अनुभव हुआ और उन्होंने उनकी पूजा की। देवी ने धर्मदत्त को वरदान दिया कि तुम्हारी पत्नी को विशेष चमत्कारिक औषधि मिलेगी और वह जल्द ही स्वस्थ हो जाएगी।

यह सुनकर धर्मदत्त अत्यधिक प्रसन्न हुए और उन्होंने धन्यवाद देते हुए पूछा, “परमेश्वरी, आप कौन हो? कृपया अपनी पहचान बताइए।”

देवी ने उसे आश्चर्यजनक स्वर में जवाब दिया, “हे धर्मदत्त, मैं शिव की स्वयंभू मूर्ति हूँ। तुम्हारी पूजा और भक्ति ने मेरा हृदय प्रसन्न किया है। अब तुम्हारे सामर्थ्य से लिंगाष्टकम का पाठ करो और अपने पूर्वजों की दृष्टि में और दैवीय आशीर्वाद से शिव की अनंत कृपा को प्राप्त करो।”

इसके बाद से धर्मदत्त लिंगाष्टकम का नियमित पाठ करने लगे। वह गर्भवती विशेषा की बीमारी से मुक्त हो गई और स्वस्थ हो गई। धर्मदत्त और विशेषा का जीवन फिर से खुशहाल हो गया और उनका आत्मविश्वास और भक्ति और भी मजबूत हुए।

लिंगाष्टकम कथा हमें यह शिक्षा देती है कि शिव की आराधना, भक्ति और लिंगाष्टकम का पाठ हमें अपार शक्ति और आनंद प्रदान कर सकता है। यह हमें रोगों से मुक्ति, सुख, समृद्धि और मुक्ति की प्राप्ति में सहायता कर सकता है। इसलिए, हमें नियमित रूप से लिंगाष्टकम का पाठ करना चाहिए और शिव के प्रति हमारी आत्मीय भावना को प्रकट करना चाहिए। शिव की कृपा हमेशा हमारे साथ बनी रहे और हमें उच्चतम सच्चिदानंद स्थिति तक ले जाए।

धर्मदत्त और विशेषा जी के दिल में एक अद्भुत आनंद बस गया था। वे शिव की अनंत कृपा के आभास में जीवन जीने लगे। हर वक्त वे शिव की महिमा के गान में खो जाते थे, और उनकी आत्मा भक्ति के ऊर्ध्वमुखी हो गई।

एक दिन, धर्मदत्त ने अपने बच्चों को भी शिव की भक्ति के लिए प्रेरित किया। उन्होंने उन्हें लिंगाष्टकम का पाठ करने के महत्व के बारे में बताया और उन्हें यह सिखाया कि शिव की प्रसन्नता और कृपा प्राप्त करने के लिए वे भी इसे नियमित रूप से पढ़ें।

बच्चों ने आदेश ग्रहण करके लिंगाष्टकम का पाठ करना शुरू किया। उनकी खुशी और भक्ति की भावना देखकर धर्मदत्त का हृदय फूल गया। वे शिव की कृपा से अत्युच्च संतुष्ट हो गए क्योंकि अब वे जानते थे कि उनके पूरे परिवार को शिव की आशीर्वाद मिल रहा है।

सालों बीत गए, धर्मदत्त और उनका परिवार शिव की भक्ति में जीने का आनंद लेते रहे। उन्होंने जीवन के सभी कठिनाइयों को शिव के द्वारा पार कर लिया और उनकी आत्मा शिवत्व के साथ एकीकृत हो गई। वे शिव की कृपा, मार्गदर्शन और सहायता के लिए हमेशा आभारी रहें।

लिंगाष्टकम कथा हमें यह सिखाती है कि जब हम शिव की भक्ति, आदर्श और पूजा में समर्पित होते हैं, तो हमें उनकी अपार कृपा, सुख और संतोष प्राप्त होता है। यह कथा हमें यह दिखाती है कि जब हम शिव की प्रेम और भक्ति से ओतप्रोत होते हैं, तो हमारी आत्मा शिव के साथ मिल जाती है। वह हमें आंतरिक शांति, प्रबुद्धता और आनंद का अनुभव कराते हैं।

धर्मदत्त और उनके परिवार की जीवन यात्रा एक आदर्श बन गई है। उन्होंने अपने जीवन को शिव की सेवा और भक्ति में समर्पित किया है और उन्होंने शिव की कृपा के बहुमुखी लाभों को प्राप्त किया है। वे अब खुशहाल और समृद्ध जीवन जी रहे हैं और उनकी आत्मा शिव के दिव्य सन्देश के प्रकाश में चमक रही है।

इस कथा से हमें यह समझने को मिलता है कि हमारे जीवन में भगवान शिव की महिमा, आराधना और भक्ति का महत्व अपार है। हमें निरंतर उनके चरणों में ध्यान और पूजा करनी चाहिए और उनके शांतिपूर्ण आदर्शों का अनुसरण करना चाहिए। यह हमें अपार आनंद, स्वयंप्रकाश और उच्चतम सत्य के प्रतीक में बदल सकती है।

चाहे हम अपने जीवन में कितनी भी कठिनाइयाँ आएं, हमें शिव की सच्ची भक्ति और निष्ठा से आगे बढ़ना चाहिए। हमें सदैव शिवत्व की अनुभूति और आत्मसात का अनुभव करना चाहिए, जो हमें जीवन के हर पहलू में सफलता और सुख प्रदान करेगा।

शिव तांडव स्तोत्रम् – Shiv Tandav Stotram

सार्थशिवताण्डवस्तोत्रम्

शिव तांडव स्तोत्रम् – Shiv Tandav Stotram

सार्थशिवताण्डवस्तोत्रम्
॥ श्रीगणेशाय नमः ॥

जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले
गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजङ्गतुङ्गमालिकाम् ।
डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्वयं
चकार चण्डताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम् ॥१॥

जटाकटाहसम्भ्रमभ्रमन्निलिम्पनिर्झरी
विलोलवीचिवल्लरीविराजमानमूर्धनि ।
धगद्धगद्धगज्ज्वलल्ललाटपट्टपावके
किशोरचन्द्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम ॥२॥

धराधरेन्द्रनंदिनीविलासबन्धुबन्धुर
स्फुरद्दिगन्तसन्ततिप्रमोदमानमानसे ।
कृपाकटाक्षधोरणीनिरुद्धदुर्धरापदि
क्वचिद्दिगम्बरे(क्वचिच्चिदम्बरे) मनो विनोदमेतु वस्तुनि ॥३॥

जटाभुजङ्गपिङ्गलस्फुरत्फणामणिप्रभा
कदम्बकुङ्कुमद्रवप्रलिप्तदिग्वधूमुखे ।
मदान्धसिन्धुरस्फुरत्त्वगुत्तरीयमेदुरे
मनो विनोदमद्भुतं बिभर्तु भूतभर्तरि ॥४॥

सहस्रलोचनप्रभृत्यशेषलेखशेखर
प्रसूनधूलिधोरणी विधूसराङ्घ्रिपीठभूः ।
भुजङ्गराजमालया निबद्धजाटजूटक
श्रियै चिराय जायतां चकोरबन्धुशेखरः ॥५॥

ललाटचत्वरज्वलद्धनञ्जयस्फुलिङ्गभा
निपीतपञ्चसायकं नमन्निलिम्पनायकम् ।
सुधामयूखलेखया विराजमानशेखरं
महाकपालिसम्पदेशिरोजटालमस्तु नः ॥६॥

करालभालपट्टिकाधगद्धगद्धगज्ज्वल
द्धनञ्जयाहुतीकृतप्रचण्डपञ्चसायके ।
धराधरेन्द्रनन्दिनीकुचाग्रचित्रपत्रक
प्रकल्पनैकशिल्पिनि त्रिलोचने रतिर्मम ॥७॥

नवीनमेघमण्डली निरुद्धदुर्धरस्फुरत्
कुहूनिशीथिनीतमः प्रबन्धबद्धकन्धरः ।
निलिम्पनिर्झरीधरस्तनोतु कृत्तिसिन्धुरः
कलानिधानबन्धुरः श्रियं जगद्धुरंधरः ॥८॥

प्रफुल्लनीलपङ्कजप्रपञ्चकालिमप्रभा
वलम्बिकण्ठकन्दलीरुचिप्रबद्धकन्धरम् ।
स्मरच्छिदं पुरच्छिदं भवच्छिदं मखच्छिदं
गजच्छिदांधकच्छिदं तमन्तकच्छिदं भजे ॥९॥

अगर्व सर्वमङ्गलाकलाकदम्बमञ्जरी
रसप्रवाहमाधुरी विजृम्भणामधुव्रतम् ।
स्मरान्तकं पुरान्तकं भवान्तकं मखान्तकं
गजान्तकान्धकान्तकं तमन्तकान्तकं भजे ॥१०॥

जयत्वदभ्रविभ्रमभ्रमद्भुजङ्गमश्वस
द्विनिर्गमत्क्रमस्फुरत्करालभालहव्यवाट् ।
धिमिद्धिमिद्धिमिध्वनन्मृदङ्गतुङ्गमङ्गल
ध्वनिक्रमप्रवर्तित प्रचण्डताण्डवः शिवः ॥११॥

दृषद्विचित्रतल्पयोर्भुजङ्गमौक्तिकस्रजोर्
गरिष्ठरत्नलोष्ठयोः सुहृद्विपक्षपक्षयोः ।
तृणारविन्दचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः
समं प्रव्रितिक: कदा सदाशिवं भजाम्यहम ॥१२॥

कदा निलिम्पनिर्झरीनिकुञ्जकोटरे वसन्
विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरः स्थमञ्जलिं वहन् ।
विमुक्तलोललोचनो ललामभाललग्नकः
शिवेति मंत्रमुच्चरन् कदा सुखी भवाम्यहम् ॥१३॥

निलिम्प नाथनागरी कदम्ब मौलमल्लिका-
निगुम्फनिर्भक्षरन्म धूष्णिकामनोहरः ।
तनोतु नो मनोमुदं विनोदिनींमहनिशं
परिश्रय परं पदं तदङ्गजत्विषां चयः ॥१४॥

प्रचण्ड वाडवानल प्रभाशुभप्रचारणी
महाष्टसिद्धिकामिनी जनावहूत जल्पना ।
विमुक्त वाम लोचनो विवाहकालिकध्वनिः
शिवेति मन्त्रभूषगो जगज्जयाय जायताम् ॥१५॥

इमं हि नित्यमेवमुक्तमुत्तमोत्तमं स्तवं
पठन्स्मरन्ब्रुवन्नरो विशुद्धिमेतिसंततम् ।
हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नान्यथा गतिं
विमोहनं हि देहिनां सुशङ्करस्य चिंतनम् ॥१६॥

पूजावसानसमये दशवक्त्रगीतं
यः शम्भुपूजनपरं पठति प्रदोषे ।
तस्य स्थिरां रथगजेन्द्रतुरङ्गयुक्तां
लक्ष्मीं सदैव सुमुखिं प्रददाति शम्भुः ॥१७॥

इति श्रीरावण कृतम्

शिव ताण्डव स्तोत्रम्स म्पूर्णम्

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शिव तांडव स्तोत्रम् (Shiva Tandav Stotram) अर्थ हिंदी में:

शिव तांडव स्तोत्र – Hindi Lyrics and Meaning

जटा टवी गलज्जलप्रवाह पावितस्थले गलेऽव लम्ब्यलम्बितां भुजंगतुंग मालिकाम्‌।
डमड्डमड्डमड्डमन्निनाद वड्डमर्वयं चकारचण्डताण्डवं तनोतु नः शिव: शिवम्‌ ॥१॥

उनके बालों से बहने वाले जल से उनका कंठ पवित्र है,
और उनके गले में सांप है जो हार की तरह लटका है,
और डमरू से डमट् डमट् डमट् की ध्वनि निकल रही है,
भगवान शिव शुभ तांडव नृत्य कर रहे हैं, वे हम सबको संपन्नता प्रदान करें।

 जटाकटा हसंभ्रम भ्रमन्निलिंपनिर्झरी विलोलवीचिवल्लरी विराजमानमूर्धनि।
धगद्धगद्धगज्ज्वल ल्ललाटपट्टपावके किशोरचंद्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम: ॥२॥

मेरी शिव में गहरी रुचि है,
जिनका सिर अलौकिक गंगा नदी की बहती लहरों की धाराओं से सुशोभित है,
जो उनकी बालों की उलझी जटाओं की गहराई में उमड़ रही हैं?
जिनके मस्तक की सतह पर चमकदार अग्नि प्रज्वलित है,
और जो अपने सिर पर अर्ध-चंद्र का आभूषण पहने हैं।

 धराधरेंद्रनंदिनी विलासबन्धुबन्धुर स्फुरद्दिगंतसंतति प्रमोद मानमानसे।
कृपाकटाक्षधोरणी निरुद्धदुर्धरापदि क्वचिद्विगम्बरे मनोविनोदमेतु वस्तुनि ॥३॥

मेरा मन भगवान शिव में अपनी खुशी खोजे,
अद्भुत ब्रह्माण्ड के सारे प्राणी जिनके मन में मौजूद हैं,
जिनकी अर्धांगिनी पर्वतराज की पुत्री पार्वती हैं,
जो अपनी करुणा दृष्टि से असाधारण आपदा को नियंत्रित करते हैं, जो सर्वत्र व्याप्त है,
और जो दिव्य लोकों को अपनी पोशाक की तरह धारण करते हैं।

 जटाभुजंगपिंगल स्फुरत्फणामणिप्रभा कदंबकुंकुमद्रव प्रलिप्तदिग्व धूमुखे।
मदांधसिंधु रस्फुरत्वगुत्तरीयमेदुरे मनोविनोदद्भुतं बिंभर्तुभूत भर्तरि ॥४॥

मुझे भगवान शिव में अनोखा सुख मिले, जो सारे जीवन के रक्षक हैं,
उनके रेंगते हुए सांप का फन लाल-भूरा है और मणि चमक रही है,
ये दिशाओं की देवियों के सुंदर चेहरों पर विभिन्न रंग बिखेर रहा है,
जो विशाल मदमस्त हाथी की खाल से बने जगमगाते दुशाले से ढंका है।

 सहस्रलोचन प्रभृत्यशेषलेखशेखर प्रसूनधूलिधोरणी विधूसरां घ्रिपीठभूः।
भुजंगराजमालया निबद्धजाटजूटकः श्रियैचिरायजायतां चकोरबंधुशेखरः ॥५॥

भगवान शिव हमें संपन्नता दें,
जिनका मुकुट चंद्रमा है,
जिनके बाल लाल नाग के हार से बंधे हैं,
जिनका पायदान फूलों की धूल के बहने से गहरे रंग का हो गया है,
जो इंद्र, विष्णु और अन्य देवताओं के सिर से गिरती है।

 ललाटचत्वरज्वल द्धनंजयस्फुलिंगभा निपीतपंच सायकंनम न्निलिंपनायकम्‌।
सुधामयूखलेखया विराजमानशेखरं महाकपालिसंपदे शिरोजटालमस्तुनः ॥६॥

शिव के बालों की उलझी जटाओं से हम सिद्धि की दौलत प्राप्त करें,
जिन्होंने कामदेव को अपने मस्तक पर जलने वाली अग्नि की चिनगारी से नष्ट किया था,
जो सारे देवलोकों के स्वामियों द्वारा आदरणीय हैं,
जो अर्ध-चंद्र से सुशोभित हैं।

करालभालपट्टिका धगद्धगद्धगज्ज्वल द्धनंजया धरीकृतप्रचंड पंचसायके।
धराधरेंद्रनंदिनी कुचाग्रचित्रपत्र कप्रकल्पनैकशिल्पिनी त्रिलोचनेरतिर्मम ॥७॥

मेरी रुचि भगवान शिव में है, जिनके तीन नेत्र हैं,
जिन्होंने शक्तिशाली कामदेव को अग्नि को अर्पित कर दिया,
उनके भीषण मस्तक की सतह डगद् डगद्… की घ्वनि से जलती है,
वे ही एकमात्र कलाकार है जो पर्वतराज की पुत्री पार्वती के स्तन की नोक पर,
सजावटी रेखाएं खींचने में निपुण हैं।

 नवीनमेघमंडली निरुद्धदुर्धरस्फुर त्कुहुनिशीथनीतमः प्रबद्धबद्धकन्धरः।
निलिम्पनिर्झरीधरस्तनोतु कृत्तिसिंधुरः कलानिधानबंधुरः श्रियं जगंद्धुरंधरः ॥८॥

भगवान शिव हमें संपन्नता दें,
वे ही पूरे संसार का भार उठाते हैं,
जिनकी शोभा चंद्रमा है,
जिनके पास अलौकिक गंगा नदी है,
जिनकी गर्दन गला बादलों की पर्तों से ढंकी अमावस्या की अर्धरात्रि की तरह काली है।

 प्रफुल्लनीलपंकज प्रपंचकालिमप्रभा विडंबि कंठकंध रारुचि प्रबंधकंधरम्‌।
स्मरच्छिदं पुरच्छिंद भवच्छिदं मखच्छिदं गजच्छिदांधकच्छिदं तमंतकच्छिदं भजे ॥९॥

मैं भगवान शिव की प्रार्थना करता हूं, जिनका कंठ मंदिरों की चमक से बंधा है,
पूरे खिले नीले कमल के फूलों की गरिमा से लटकता हुआ,
जो ब्रह्माण्ड की कालिमा सा दिखता है।
जो कामदेव को मारने वाले हैं, जिन्होंने त्रिपुर का अंत किया,
जिन्होंने सांसारिक जीवन के बंधनों को नष्ट किया, जिन्होंने बलि का अंत किया,
जिन्होंने अंधक दैत्य का विनाश किया, जो हाथियों को मारने वाले हैं,
और जिन्होंने मृत्यु के देवता यम को पराजित किया।

 अखर्वसर्वमंगला कलाकदम्बमंजरी रसप्रवाह माधुरी विजृंभणा मधुव्रतम्‌।
स्मरांतकं पुरातकं भावंतकं मखांतकं गजांतकांधकांतकं तमंतकांतकं भजे ॥१०॥

मैं भगवान शिव की प्रार्थना करता हूं, जिनके चारों ओर मधुमक्खियां उड़ती रहती हैं
शुभ कदंब के फूलों के सुंदर गुच्छे से आने वाली शहद की मधुर सुगंध के कारण,
जो कामदेव को मारने वाले हैं, जिन्होंने त्रिपुर का अंत किया,
जिन्होंने सांसारिक जीवन के बंधनों को नष्ट किया, जिन्होंने बलि का अंत किया,
जिन्होंने अंधक दैत्य का विनाश किया, जो हाथियों को मारने वाले हैं,
और जिन्होंने मृत्यु के देवता यम को पराजित किया।

 जयत्वदभ्रविभ्रम भ्रमद्भुजंगमस्फुरद्ध गद्धगद्विनिर्गमत्कराल भाल हव्यवाट्।
धिमिद्धिमिद्धि मिध्वनन्मृदंग तुंगमंगलध्वनिक्रमप्रवर्तित: प्रचण्ड ताण्डवः शिवः ॥११॥

शिव, जिनका तांडव नृत्य नगाड़े की ढिमिड ढिमिड
तेज आवाज श्रंखला के साथ लय में है,
जिनके महान मस्तक पर अग्नि है, वो अग्नि फैल रही है नाग की सांस के कारण,
गरिमामय आकाश में गोल-गोल घूमती हुई।

 दृषद्विचित्रतल्पयो र्भुजंगमौक्तिकमस्र जोर्गरिष्ठरत्नलोष्ठयोः सुहृद्विपक्षपक्षयोः।
तृणारविंदचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः समं प्रवर्तयन्मनः कदा सदाशिवं भजे ॥१२॥

मैं भगवान सदाशिव की पूजा कब कर सकूंगा, शाश्वत शुभ देवता,
जो रखते हैं सम्राटों और लोगों के प्रति समभाव दृष्टि,
घास के तिनके और कमल के प्रति, मित्रों और शत्रुओं के प्रति,
सर्वाधिक मूल्यवान रत्न और धूल के ढेर के प्रति,
सांप और हार के प्रति और विश्व में विभिन्न रूपों के प्रति?

 कदा निलिंपनिर्झरी निकुंजकोटरे वसन्‌ विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरःस्थमंजलिं वहन्‌।
विमुक्तलोललोचनो ललामभाललग्नकः शिवेति मंत्रमुच्चरन्‌ कदा सुखी भवाम्यहम्‌ ॥१३॥

मैं कब प्रसन्न हो सकता हूं, अलौकिक नदी गंगा के निकट गुफा में रहते हुए,
अपने हाथों को हर समय बांधकर अपने सिर पर रखे हुए,
अपने दूषित विचारों को धोकर दूर करके, शिव मंत्र को बोलते हुए,
महान मस्तक और जीवंत नेत्रों वाले भगवान को समर्पित?

 इमं हि नित्यमेव मुक्तमुक्तमोत्तम स्तवं पठन्स्मरन्‌ ब्रुवन्नरो विशुद्धमेति संततम्‌।
हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नान्यथागतिं विमोहनं हि देहिनां सुशंकरस्य चिंतनम् ॥१६॥

इस स्तोत्र को, जो भी पढ़ता है, याद करता है और सुनाता है,
वह सदैव के लिए पवित्र हो जाता है और महान गुरु शिव की भक्ति पाता है।
इस भक्ति के लिए कोई दूसरा मार्ग या उपाय नहीं है।
बस शिव का विचार ही भ्रम को दूर कर देता है।

Audio Link Shanker Mahadewan: Shiv Tandav Stotram by Shankar Mahadevan & Shailesh Dani @JioSaavn

Shiv Tandav Strotam by Ravana – (English Lyrics)Meaning


Jatatavigalajjala pravahapavitasthale
Galeavalambya lambitam bhujangatungamalikam
Damad damad damaddama ninadavadamarvayam
Chakara chandtandavam tanotu nah shivah shivam

With his neck consecrated by the flow of water that flows from his hair,
And on his neck a snake, which is hung like a garland,
And the Damaru drum that emits the sound “Damat Damat Damat Damat”,
Lord Shiva did the auspicious dance of Tandava. May he give prosperity to all of us.

Jata kata hasambhrama bhramanilimpanirjhari
Vilolavichivalarai virajamanamurdhani
Dhagadhagadhagajjva lalalata pattapavake
Kishora chandrashekhare ratih pratikshanam mama

I have a deep interest in Shiva
Whose head is glorified by the rows of moving waves of the celestial Ganga river,
Which stir in the deep well of his hair in tangled locks.
Who has the brilliant fire burning on the surface of his forehead,
And who has the crescent moon as a jewel on his head.

Dharadharendrana ndinivilasabandhubandhura
Sphuradigantasantati pramodamanamanase
Krupakatakshadhorani nirudhadurdharapadi
Kvachidigambare manovinodametuvastuni

May my mind seek happiness in Lord Shiva,
In whose mind all the living beings of the glorious universe exist,
Who is the companion of Parvati (daughter of the mountain king),
Who controls unsurpassed adversity with his compassionate gaze, Which is all-pervading
And who wears the Heavens as his raiment.

Jata bhujan gapingala sphuratphanamaniprabha
Kadambakunkuma dravapralipta digvadhumukhe
Madandha sindhu rasphuratvagutariyamedure
Mano vinodamadbhutam bibhartu bhutabhartari

May I find wonderful pleasure in Lord Shiva, who is the advocate of all life,
With his creeping snake with its reddish brown hood and the shine of its gem on it
Spreading variegated colors on the beautiful faces of the Goddesses of the Directions,
Which is covered by a shimmering shawl made from the skin of a huge, inebriated elephant.

Sahasra lochana prabhritya sheshalekhashekhara
Prasuna dhulidhorani vidhusaranghripithabhuh
Bhujangaraja malaya nibaddhajatajutaka
Shriyai chiraya jayatam chakora bandhushekharah

May Lord Shiva give us prosperity,
Who has the Moon as a crown,
Whose hair is bound by the red snake-garland,
Whose footrest is darkened by the flow of dust from flowers
Which fall from the heads of all the gods – Indra, Vishnu and others.

Lalata chatvarajvaladhanajnjayasphulingabha
nipitapajnchasayakam namannilimpanayakam
Sudha mayukha lekhaya virajamanashekharam
Maha kapali sampade shirojatalamastunah

May we obtain the riches of the Siddhis from the tangled strands Shiva’s hair,
Who devoured the God of Love with the sparks of the fire that burns on his forehead,
Which is revered by all the heavenly leaders,
Which is beautiful with a crescent moon.

Karala bhala pattikadhagaddhagaddhagajjvala
Ddhanajnjaya hutikruta prachandapajnchasayake
Dharadharendra nandini kuchagrachitrapatraka
Prakalpanaikashilpini trilochane ratirmama

My interest is in Lord Shiva, who has three eyes,
Who offered the powerful God of Love to fire.
The terrible surface of his forehead burns with the sound “Dhagad, Dhagad …”
He is the only artist expert in tracing decorative lines
on the tips of the breasts of Parvati, the daughter of the mountain king.

navina megha mandali niruddhadurdharasphurat
Kuhu nishithinitamah prabandhabaddhakandharah
nilimpanirjhari dharastanotu krutti sindhurah
Kalanidhanabandhurah shriyam jagaddhurandharah

May Lord Shiva give us prosperity,
The one who bears the weight of this universe,
Who is enchanting with the moon,
Who has the celestial river Ganga
Whose neck is dark as midnight on a new moon night, covered in layers of clouds.

Praphulla nila pankaja prapajnchakalimchatha
Vdambi kanthakandali raruchi prabaddhakandharam
Smarachchidam purachchhidam bhavachchidam makhachchidam
Gajachchidandhakachidam tamamtakachchidam bhaje

I pray to Lord Shiva, whose neck is bound with the brightness of the temples
hanging with the glory of fully bloomed blue lotus flowers,
Which look like the blackness of the universe.
Who is the slayer of Manmatha, who destroyed the Tripura,
Who destroyed the bonds of worldly life, who destroyed the sacrifice,
Who destroyed the demon Andhaka, who is the destroyer of the elephants,
And who has overwhelmed the God of death, Yama.

Akharvagarvasarvamangala kalakadambamajnjari
Rasapravaha madhuri vijrumbhana madhuvratam
Smarantakam purantakam bhavantakam makhantakam
Gajantakandhakantakam tamantakantakam bhaje

I pray to Lord Siva, who has bees flying all around because of the sweet
Scent of honey coming from the beautiful bouquet of auspicious Kadamba flowers,
Who is the slayer of Manmatha, who destroyed the Tripura,
Who destroyed the bonds of worldly life, who destroyed the sacrifice,
Who destroyed the demon Andhaka, who is the destroyer of the elephants,
And who has overwhelmed the God of death, Yama.

Jayatvadabhravibhrama bhramadbhujangamasafur
Dhigdhigdhi nirgamatkarala bhaal havyavat
Dhimiddhimiddhimidhva nanmrudangatungamangala
Dhvanikramapravartita prachanda tandavah shivah

Shiva, whose dance of Tandava is in tune with the series of loud
sounds of drum making the sound “Dhimid Dhimid”,
Who has fire on his great forehead, the fire that is spreading out because of the
breath of the snake, wandering in whirling motions in the glorious sky.

Drushadvichitratalpayor bhujanga mauktikasrajor
Garishtharatnaloshthayoh suhrudvipakshapakshayoh
Trushnaravindachakshushoh prajamahimahendrayoh
Sama pravartayanmanah kada sadashivam bhaje

When will I be able to worship Lord Sadashiva, the eternally auspicious God,
With equanimous vision towards people or emperors,
Towards a blade of grass and a lotus, towards friends and enemies,
Towards the most precious gem and a lump of dirt,
Toward a snake or a garland and towards the varied forms of the world?

Kada nilimpanirjhari nikujnjakotare vasanh
Vimuktadurmatih sada shirah sthamajnjalim vahanh
Vimuktalolalochano lalamabhalalagnakah
Shiveti mantramuchcharan sada sukhi bhavamyaham

When I can be happy, living in a cave near the celestial river Ganga,
Bringing my hands clasped on my head all the time,
With my impure thoughts washed away, uttering the mantra of Shiva,
Devoted to the God with a glorious forehead and with vibrant eyes?

Imam hi nityameva muktamuttamottamam stavam
Pathansmaran bruvannaro vishuddhimeti santatam
Hare gurau subhaktimashu yati nanyatha gatim
Vimohanam hi dehinam sushankarasya chintanam

Anyone who reads, remembers and recites this stotra as stated here
Is purified forever and obtains devotion in the great Guru Shiva.
For this devotion, there is no other way or refuge.
Just the mere thought of Shiva removes the delusion.

शिव महिम्न स्तोत्र कथा:

एक बार की बात है, एक युवक था जिसका नाम वसुगुप्त था। वह बहुत ही आदर्शवान और धार्मिक जीवन जीने वाला था। वह शिव भक्त था और रोज़ाना शिव मंदिर जाकर पूजा करता था।

एक दिन वसुगुप्त ने विचार किया कि क्या वह शिव के लिए कुछ विशेष कर सकता है। उसने अपने गुरु से पूछा और गुरु ने उसे शिव महिम्न स्तोत्र के बारे में बताया। यह स्तोत्र शिव की महिमा और शक्ति का वर्णन करता है। गुरु ने वसुगुप्त से कहा कि वह इस स्तोत्र का पाठ करें और शिव की कृपा प्राप्त करें।

वसुगुप्त ने गुरु के कहे अनुसार रोज़ाना शिव महिम्न स्तोत्र का पाठ करना शुरू किया। वह इसे पूरे मन और श्रद्धा से पढ़ता था। धीरे-धीरे, वह अपने जीवन में शिव की प्रत्यक्षता को महसूस करने लगा।

जब वसुगुप्त शिव मंदिर जाता था, तो उसे ऐसा लगता था कि शिव मंदिर में वहीं विराजमान हैं और उसकी समस्त आराधनाएं शिव खुद कर रहे हैं। उसे अनु

भव होता था कि उसके आस-पास एक दिव्यता की वातावरण होती है और शिव की कृपा सदैव उसके साथ रहती है।

धीरे-धीरे वसुगुप्त की जीवन में सभी कठिनाइयां और संकट समाप्त हो गए। उसे सब प्रकार की सफलताएं प्राप्त होने लगीं और उसका आत्मविश्वास बढ़ गया। शिव महिम्न स्तोत्र के प्रतिदिनी पाठ से वह अपने जीवन को समृद्धि, शांति और सुख के साथ भर दिया।

इस कथा से हमें यह सीख मिलती है कि शिव महिम्न स्तोत्र के नियमित पाठ से हम अपने जीवन में शिव की कृपा और आशीर्वाद को प्राप्त कर सकते हैं। यह स्तोत्र हमें अंतरंग शांति, मन की स्थिरता और आत्मिक उन्नति प्रदान करता है। इसलिए, हमें नियमित रूप से शिव महिम्न स्तोत्र का पाठ करना चाहिए और शिव की अनन्य भक्ति के माध्यम से उसकी कृपा को प्राप्त करना चाहिए।

वसुगुप्त की इस स्तुति और शिव के प्रति उसका अटूट भक्तिभाव, उसे अपरिमित आनंद और आत्मतृप्ति की प्राप्ति करवाता था। उसके मन में शिव के प्रति गहरी आस्था और भक्ति की ज्योति प्रकट होती थी।

यह कथा हमें यह बताती है कि शिव की महिमा, शक्ति और सामर्थ्य को महसूस करने के लिए हमें उनकी भक्ति को सच्ची और पक्की करनी चाहिए। शिव महिम्न स्तोत्र के माध्यम से हम अपने आप को शिव के अद्भुत गुणों और दिव्यताओं के प्रति संवेदनशील बना सकते हैं। इसके द्वारा हम शिव के प्रति अपार श्रद्धा और समर्पण विकसित कर सकते हैं और उनके आदेशों का पालन करके उनकी कृपा प्राप्त कर सकते हैं।

इस प्रकार, वसुगुप्त ने शिव महिम्न स्तोत्र की मदद से अपने जीवन को प्रकाशमय और सुखमय बना लिया। वह अपने समस्त कर्तव्यों को ध्यान से निभाता था और समाज के लिए नेक कार्यों में लगा रहता था। उसकी आत्मा में शांति, प्रेम, त्याग और उदारता की प्रवृत्ति हो गई। वह सभी को ध्यान और

 सहानुभूति से देखने लगा और उनकी सेवा करने का अवसर प्राप्त होता था।

इस रूप में, शिव महिम्न स्तोत्र ने वसुगुप्त की जीवन में बदलाव लाया और उसे अपने आप को अद्वितीय शिव से जुड़े हुए महसूस कराया। यह स्तोत्र हमें शिव की महानता, करुणा और अनंत शक्ति का अनुभव कराता है और हमें आदर्श जीवन जीने की प्रेरणा देता है। इसलिए, हमें नियमित रूप से शिव महिम्न स्तोत्र का पाठ करना चाहिए और अपने जीवन को शिव के दिव्य आदर्शों के अनुरूप बनाना चाहिए।

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दत्त आरती

Guru Dutta aarti marathi

जय देव जय देव जय श्री गुरुदत्ता,
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श्री भागवत भगवान की आरती

Shri Bhagwat Bhagwan Ki Aarti

आरति अतिपावन पुरान की,
धर्म–भक्ति-विज्ञान-खानकी ॥ टेक ॥

महापुराण भागवत निर्मल।
शुक-मुख-विगलित निगम-कल्प-फल।
परमानन्दसुधा-रसमय कल।
लीला-रति-रस-रसनिधान की॥
आरति अतिपावन पुरान की…

कलिमल-मथनि त्रिताप-निवारिणि।
जन्ममृत्युमय भव-भयहारिणि।
सेवत सतत सकल सुखकारिणि।
सुमहौषधि हरि-चरित गानकी॥
आरति अतिपावन पुरान की…

विषय-विलास-विमोह-विनाशिनि।
विमल विराग विवेक विकाशिनि।
भगवत्-तत्त्व-रहस्य-प्रकाशिनि।
परम ज्योति परमात्मज्ञानकी॥
आरति अतिपावन पुरान की…

परमहंस-मुनि-मन-उल्लासिनि।
रसिक-हृदय रस-रास-विलासिनि।
भुक्ति-मुक्ति-रति-प्रेम-सुदासिनि।
कथा अकिञ्चन प्रिय सुजानकी॥
आरति अतिपावन पुरान की…

आरति अतिपावन पुरान की,
धर्म–भक्ति-विज्ञान-खानकी ॥ टेक ॥

महापुराण भागवत निर्मल।
शुक-मुख-विगलित निगम-कल्प-फल।
परमानन्दसुधा-रसमय कल।
लीला-रति-रस-रसनिधान की॥
आरति अतिपावन पुरान की…

कलिमल-मथनि त्रिताप-निवारिणि।
जन्ममृत्युमय भव-भयहारिणि।
सेवत सतत सकल सुखकारिणि।
सुमहौषधि हरि-चरित गानकी॥
आरति अतिपावन पुरान की…

विषय-विलास-विमोह-विनाशिनि।
विमल विराग विवेक विकाशिनि।
भगवत्-तत्त्व-रहस्य-प्रकाशिनि।
परम ज्योति परमात्मज्ञानकी॥
आरति अतिपावन पुरान की…

परमहंस-मुनि-मन-उल्लासिनि।
रसिक-हृदय रस-रास-विलासिनि।
भुक्ति-मुक्ति-रति-प्रेम-सुदासिनि।
कथा अकिञ्चन प्रिय सुजानकी॥
आरति अतिपावन पुरान की…

आरती श्री रामायण जी की

Aarti Shri Ramayan Ji Ki

आरती श्री रामायण जी की।
कीरति कलित ललित सिया-पी की॥

गावत ब्रह्मादिक मुनि नारद।
बालमीक विज्ञान विशारद।
शुक सनकादि शेष अरु शारद।
बरनि पवनसुत कीरति नीकी॥

आरती श्री रामायण…
कीरति कलित ललित…

गावत वेद पुरान अष्टदस।
छओं शास्त्र सब ग्रन्थन को रस॥
मुनि-मन धन सन्तन को सरबस।
सार अंश सम्मत सबही की॥

आरती श्री रामायण…
कीरति कलित ललित…

गावत सन्तत शम्भू भवानी।
अरु घट सम्भव मुनि विज्ञानी॥
व्यास आदि कविबर्ज बखानी।
कागभुषुण्डि गरुड़ के ही की॥

आरती श्री रामायण…
कीरति कलित ललित…

कलिमल हरनि विषय रस फीकी।
सुभग सिंगार मुक्ति जुबती की॥
दलन रोग भव मूरि अमी की।
तात मात सब विधि तुलसी की॥

आरती श्री रामायण जी की।
कीरति कलित ललित सिया-पी की॥



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गीता जी की आरती – Bhagwat Geeta Ki Aarti

bhagwat geeta ki aarti lyrics

जय गीता माता श्री जय गीता माता।
सुख करनी दुःख हरनी तुमको जग गाता।
टेक- जय गीता माता, मैया जय गीता माता।
सुख करनी दुःख हरनी तुमको जग गाता।
अज्ञान मोह ममता को छिन में नाश करे,
सत्य ज्ञान का मन में तू प्रकाश करे।
शरण मेरी जो आवे तेरी मति ग्रहण करे,
पाप ताप मिट जावें निर्भय भव सिंधु तरे।
रणक्षेत्र में अर्जुन जब शोकाधीर हुआ,
कर्तव्य कर्म तज बैठा बहुत मलीन हुआ।
तब कृष्णचन्द्र के मुख से तुमने अवतार लिया,
तत्त्व बात समझाकर उसका उद्धार किया।
शरीर जन्मते मरते आत्मा अविनाशी,
शरीर को दुःख व्यापे आत्मा सुख राशी।
अतः शरीर की ममता मन से त्याग करो,
आत्मब्रह्म को चीन्हों उससे अनुराग करो।
निष्काम कर्म नित्य करके जग का उपकार करो,
फल वांछा को त्यागो सद्व्यवहार करो।
मन को वश में करके इच्छा त्याग करो,
निष्काम जग में रहकर हरि से अनुराग करो।
यह उपदेश तेरे जो नर मन में लावे,
भगवान भवसागर से वह क्यों न तर जावे।


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  • सिद्ध कुंजिका स्तोत्र (Siddha Kunjika Stotram)
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आरती कुंज बिहारी की

Aarti kunj bihari ki

आरती कुंज बिहारी की, श्री गिरधर कृष्णमुरारी की॥ (टेक)
गले में बैजंतीमाला, बजावै मुरलि मधुर बाला।
श्रवन में कुण्डल झलकाला, नंद के आनन्द नन्दलाला॥
श्री गिरधर कृष्णमुरारी की…

गगन सम अंग कांति काली, राधिका चमक रही आली,
लतन में ठाढ़े बनमाली, भ्रमर-सी अलक, कस्तूरी तिलक,
चन्द्र-सी झलक, ललित छवि स्यामा प्यारी की।
श्री गिरधर कृष्णमुरारी की…

कनकमय मोर-मुकुट बिलसै, देवता दरसन को तरसैं,
गगन सों सुमन रासि बरसै, बजे मुरचंग, मधुर मिरदंग,
ग्वालिनी संग, अतुल रति गोपकुमारीकी।
श्री गिरधर कृष्णमुरारी की…

जहाँ ते प्रगट भई गंगा, सकल-मल-हारिणि श्रीगंगा,
स्मरन ते होत मोह-भंगा, बसी सिव सीस, जटा के बीच,
हरै अघ कीच, चरन छबि श्री बनवारी की।
श्री गिरधर कृष्णमुरारी की…

चमकती उज्ज्वल तट रेनू, बज रही बृन्दाबन बेनू,
चहूँ दिसि गोपि ग्वाल धेनू, हँसत मृदु मंद, चाँदनी चंद,
कटत भव-फंद, टेर सुन दीन दुखारी की।
श्री गिरधर कृष्णमुरारी की…

आरती कुंज बिहारी की। श्री गिरधर कृष्णमुरारी की।
श्री गिरधर कृष्णमुरारी की…

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