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Navagraha Stotram (नवग्रह स्तोत्रम्)

नवग्रह स्तोत्र (Navagraha Stotram) – अर्थ और लाभ

नवग्रह स्तोत्र (Navagraha Stotram) – अर्थ, महत्त्व और संपूर्ण पाठ

नवग्रह स्तोत्र (Navagraha Stotram) हिंदू धर्म का एक अत्यंत प्रभावशाली और पवित्र स्तोत्र है। इसकी रचना महर्षि वेदव्यास ने नौ ग्रहों (नवग्रहों) को शांत करने और उनकी कृपा प्राप्त करने के लिए की थी। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, मनुष्य के जीवन में सुख-दुःख ग्रहों की चाल पर निर्भर करते हैं। इस स्तोत्र का नियमित पाठ करने से कुंडली के ग्रह दोष दूर होते हैं।

नवग्रह स्तोत्र के बारे में (About)

नवग्रह स्तोत्र संस्कृत भाषा में रचित है और इसमें नौ श्लोक हैं, जो क्रमशः सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु और केतु को समर्पित हैं। इसे ‘ग्रह शांति’ का एक अचूक उपाय माना जाता है। चाहे शनि की साढ़ेसाती हो या राहु-केतु का दोष, श्रद्धालु सदियों से इस स्तोत्र का पाठ करके राहत और मानसिक शांति प्राप्त करते आ रहे हैं।

इतिहास (History)

इस दिव्य स्तोत्र की रचना महर्षि वेदव्यास (Maharishi Veda Vyasa) ने की थी। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, व्यास जी ने मानव कल्याण के लिए वेदों और पुराणों के साथ-साथ ऐसे स्तोत्रों की रचना भी की जो आम जनमानस को दैवीय प्रकोपों से बचा सकें। ‘नवग्रह स्तोत्र’ में ऋषि व्यास ने यह आश्वासन दिया है कि इसका पाठ करने से न केवल ग्रहों की पीड़ा शांत होती है, बल्कि चोर, अग्नि और बुरे सपनों का भय भी मिट जाता है।


नवग्रह स्तोत्र (मूल संस्कृत और हिंदी अर्थ)

१. सूर्य (Sun)

मूल श्लोक:
जपाकुसुम संकाशं काश्यपेयं महद्युतिम् ।
तमोऽरिं सर्वपापघ्नं प्रणतोऽस्मि दिवाकरम् ॥ १ ॥

हिंदी अर्थ:
जिनकी कांति गुडहल (जपा) के फूल के समान लाल है, जो कश्यप ऋषि के पुत्र हैं, जो महातेजस्वी हैं, अंधकार के शत्रु हैं और सब पापों का नाश करने वाले हैं, उन सूर्य देव (दिवाकर) को मैं प्रणाम करता हूँ।

२. चन्द्र (Moon)

मूल श्लोक:
दधिशंखतुषाराभं क्षीरोदार्णव सम्भवम् ।
नमामि शशिनं सोमं शम्भोर्मुकुट भूषणम् ॥ २ ॥

हिंदी अर्थ:
जिनका रंग दही, शंख और बर्फ (तुषार) के समान श्वेत है, जो क्षीरसागर से उत्पन्न हुए हैं और भगवान शिव के मुकुट की शोभा हैं, उन चन्द्र देव (सोम) को मैं नमस्कार करता हूँ।

३. मंगल (Mars)

मूल श्लोक:
धरणीगर्भ संभूतं विद्युत्कान्ति समप्रभम् ।
कुमारं शक्तिहस्तं तं मंगलं प्रणमाम्यहम् ॥ ३ ॥

हिंदी अर्थ:
जो पृथ्वी देवी के गर्भ से उत्पन्न हुए हैं, जिनकी चमक बिजली की कौंध के समान है, जो कुमार स्वरूप हैं और हाथों में शक्ति (आयुध) धारण करते हैं, उन मंगल देव को मैं प्रणाम करता हूँ।

४. बुध (Mercury)

मूल श्लोक:
प्रियंगुकलिकाश्यामं रूपेणाप्रतिमं बुधम् ।
सौम्यं सौम्यगुणोपेतं तं बुधं प्रणमाम्यहम् ॥ ४ ॥

हिंदी अर्थ:
जिनका वर्ण ‘प्रियंगु’ की कली के समान गहरा साँवला है, जिनका रूप अनुपम है, जो सौम्य हैं और सौम्य गुणों से संपन्न हैं, उन बुध देव को मैं प्रणाम करता हूँ।

५. गुरु (Jupiter)

मूल श्लोक:
देवानांच ऋषीणांच गुरुं कांचनसन्निभम् ।
बुद्धिभूतं त्रिलोकेशं तं नमामि बृहस्पतिम् ॥ ५ ॥

हिंदी अर्थ:
जो देवताओं और ऋषियों के गुरु हैं, जिनकी आभा सोने (कांचन) के समान है, जो साक्षात बुद्धि के स्वरूप हैं और तीनों लोकों के स्वामी हैं, उन बृहस्पति देव को मैं नमन करता हूँ।

६. शुक्र (Venus)

मूल श्लोक:
हिमकुन्दमृणालाभं दैत्यानां परमं गुरुम् ।
सर्वशास्त्रप्रवक्तारं भार्गवं प्रणमाम्यहम् ॥ ६ ॥

हिंदी अर्थ:
जिनकी कांति बर्फ, कुंद के फूल और कमलनाल (मृणाल) के समान श्वेत है, जो दैत्यों के परम गुरु हैं और सभी शास्त्रों के ज्ञाता/वक्ता हैं, उन भार्गव (शुक्र) को मैं प्रणाम करता हूँ।

७. शनि (Saturn)

मूल श्लोक:
नीलांजनसमाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम् ।
छायामार्तण्ड संभूतं तं नमामि शनैश्चरम् ॥ ७ ॥

हिंदी अर्थ:
जिनकी आभा नीले अंजन (काजल) के समान है, जो सूर्यपुत्र हैं और यमराज के बड़े भाई हैं, जो छाया और सूर्य (मार्तण्ड) से उत्पन्न हुए हैं, उन शनि देव को मैं नमन करता हूँ।

८. राहु (Rahu)

मूल श्लोक:
अर्धकायं महावीर्यं चन्द्रादित्य विमर्दनम् ।
सिंहिकागर्भसंभूतं तं राहुं प्रणमाम्यहम् ॥ ८ ॥

हिंदी अर्थ:
जिनका शरीर आधा है, जो महापराक्रमी हैं, जो सूर्य और चन्द्रमा को भी पीड़ित (ग्रहण) करते हैं और सिंहिका के गर्भ से उत्पन्न हुए हैं, उन राहु को मैं प्रणाम करता हूँ।

९. केतु (Ketu)

मूल श्लोक:
पलाशपुष्पसंकाशं तारकाग्रहमस्तकम् ।
रौद्रं रौद्रात्मकं घोरं तं केतुं प्रणमाम्यहम् ॥ ९ ॥

हिंदी अर्थ:
जिनकी चमक पलाश के फूल के समान (धूम्र/लाल) है, जो तारों और ग्रहों में प्रधान हैं, जो रौद्र रूप वाले और भयानक हैं, उन केतु को मैं प्रणाम करता हूँ।


फलश्रुति (Benefits)

इति व्यासमुखोद्गीतं यः पठेत् सुसमाहितः ।
दिवा वा यदि वा रात्रौ विघ्नशान्तिर्भविष्यति ॥
नरनारीनृपाणांच भवेत् दुःस्वप्ननाशनम् ।
ऐश्वर्यमतुलं तेषां आरोग्यं पुष्टिवर्धनम् ॥

अर्थ:
व्यास जी के मुख से निकले इस स्तोत्र का जो भी व्यक्ति एकाग्रचित्त होकर (दिन या रात में) पाठ करता है, उसकी सभी बाधाएं शांत हो जाती हैं। स्त्री, पुरुष या राजा—सभी के बुरे सपने नष्ट हो जाते हैं और उन्हें अतुलनीय ऐश्वर्य, आरोग्य और पुष्टि (बल) की प्राप्ति होती है। व्यास जी कहते हैं कि इसमें कोई संदेह नहीं है।

रोचक तथ्य (Trivia)

  • रचयिता: इस स्तोत्र के रचयिता महर्षि वेदव्यास हैं, जिन्होंने महाभारत की रचना भी की थी।
  • पुष्प उपमा: सूर्य देव के लिए ‘जपाकुसुम’ (गुडहल) और केतु के लिए ‘पलाश पुष्प’ की उपमा का प्रयोग उनके रंग और तीव्रता को दर्शाने के लिए किया गया है।
  • शनि-यम संबंध: इस स्तोत्र में शनि देव को ‘यमाग्रज’ (यमराज का बड़ा भाई) कहकर संबोधित किया गया है, जो सूर्य की संतानों के रूप में उनके संबंध को दर्शाता है।
  • सुरक्षा कवच: फलश्रुति में विशेष रूप से उल्लेख है कि यह ‘दुःस्वप्न नाशनम्’ है, यानी यह बुरे सपनों और अज्ञात भय को दूर करता है।

शिव पंचाक्षर स्तोत्र (Shiv Panchakshar Stotra)

शिव पंचाक्षर स्तोत्र – अर्थ और बोल | Shiv Panchakshar Stotra Lyrics & Meaning in Hindi

शिव पंचाक्षर स्तोत्र (Shiv Panchakshar Stotra)

रचयिता: आदि शंकराचार्य (Adi Shankaracharya)

परिचय (About)

शिव पंचाक्षर स्तोत्र भगवान शिव की उपासना में रचित सबसे लोकप्रिय और प्रभावशाली स्तोत्रों में से एक है। इसकी रचना आदि शंकराचार्य ने की थी। यह स्तोत्र भगवान शिव के पंचाक्षर मंत्र ‘नमः शिवाय’ पर आधारित है। इसमें कुल 5 मुख्य श्लोक हैं, और प्रत्येक श्लोक मंत्र के एक अक्षर (न, म, शि, वा, य) को समर्पित है। यह न केवल भक्ति का प्रतीक है, बल्कि यह पंचतत्वों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) के साथ शिव के संबंध को भी दर्शाता है।

गीत के बोल (Lyrics)

श्लोक १

नागेन्द्रहाराय त्रिलोचनाय, भस्माङ्गरागाय महेश्वराय। नित्याय शुद्धाय दिगम्बराय, तस्मै ‘न’ काराय नमः शिवाय॥१॥

Nagendraharaya Trilochanaya, Bhasmangaragaya Maheshvaraya. Nityaya Shuddhaya Digambaraya, Tasmai ‘Na’ karaya Namah Shivaya. ||1||

श्लोक २

मन्दाकिनीसलिलचन्दनचर्चिताय, नन्दीश्वरप्रमथनाथमहेश्वराय। मन्दारपुष्पबहुपुष्पसुपूजिताय, तस्मै ‘म’ काराय नमः शिवाय॥२॥

Mandakini salila chandana charchitaya, Nandishvara pramathanatha maheshvaraya. Mandara pushpa bahupushpa supoojitaya, Tasmai ‘Ma’ karaya Namah Shivaya. ||2||

श्लोक ३

शिवाय गौरीवदनाब्जवृन्द-, सूर्याय दक्षाध्वरनाशकाय। श्रीनीलकण्ठाय वृषध्वजाय, तस्मै ‘शि’ काराय नमः शिवाय॥३॥

Shivaya Gauri vadanabja vrinda-, Suryaya dakshadhvara nashakaya. Shri Nilakanthaya Vrishadhvajaya, Tasmai ‘Shi’ karaya Namah Shivaya. ||3||

श्लोक ४

वसिष्ठकुम्भोद्भवगौतमार्य-, मुनीन्द्रदेवार्चितशेखराय। चन्द्रार्कवैश्वानरलोचनाय, तस्मै ‘व’ काराय नमः शिवाय॥४॥

Vasistha kumbhodbhava gautamarya-, Munindra devarchita shekharaya. Chandrarka vaishvanara lochanaya, Tasmai ‘Va’ karaya Namah Shivaya. ||4||

श्लोक ५

यक्षस्वरूपाय जटाधराय, पिनाकहस्ताय सनातनाय। दिव्याय देवाय दिगम्बराय, तस्मै ‘य’ काराय नमः शिवाय॥५॥

Yaksha svaroopaya jatadharaya, Pinakahastaya sanatanaya. Divyaya devaya digambaraya, Tasmai ‘Ya’ karaya Namah Shivaya. ||5||

फलश्रुति

पञ्चाक्षरमिदं पुण्यं यः पठेच्छिवसंनिधौ। शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते॥

Panchaksharamidam punyam yah pathechchiva sannidhau, Shivalokamavapnoti shivena saha modate.

इतिहास (History)

शिव पंचाक्षर स्तोत्र की रचना 8वीं शताब्दी के महान दार्शनिक आदि शंकराचार्य द्वारा की गई थी। उस समय भारत में कई मत-मतांतर प्रचलित थे, और शंकराचार्य ने अद्वैत वेदांत और पंचायतन पूजा को पुनः स्थापित किया। उन्होंने वेदों के सार को आम जनमानस तक पहुँचाने के लिए सरल संस्कृत में कई स्तोत्र रचे। यह स्तोत्र यजुर्वेद में वर्णित ‘नमः शिवाय’ मंत्र की व्याख्या करता है।

अर्थ विश्लेषण (Meaning Analysis)

  • ‘न’ कार (पृथ्वी तत्व): जो नागराज को हार के रूप में धारण करते हैं, जिनके तीन नेत्र हैं, और जो भस्म लगाए हुए हैं। ऐसे ‘न’ अक्षर स्वरूप भगवान शिव को नमस्कार है।
  • ‘म’ कार (जल तत्व): जो गंगाजल और चंदन से सुशोभित हैं, जो नंदी और गणों के स्वामी हैं, और मंदार पुष्पों से पूजे जाते हैं। ऐसे ‘म’ अक्षर स्वरूप शिव को नमस्कार है।
  • ‘शि’ कार (अग्नि तत्व): जो माता पार्वती (गौरी) के मुख कमल को खिलाने के लिए सूर्य समान हैं, जिन्होंने दक्ष के यज्ञ का नाश किया, और जिनका कंठ नीला है। ऐसे ‘शि’ अक्षर स्वरूप शिव को नमस्कार है।
  • ‘व’ कार (वायु तत्व): जिनकी पूजा वसिष्ठ, अगस्त्य और गौतम जैसे महान ऋषि करते हैं, और जिनके नेत्र सूर्य, चंद्रमा और अग्नि हैं। ऐसे ‘व’ अक्षर स्वरूप शिव को नमस्कार है।
  • ‘य’ कार (आकाश तत्व): जो यक्ष का रूप धारण करने वाले (या यक्षों द्वारा पूजित), जटाधारी, हाथ में पिनाक धनुष लिए हुए सनातन देव हैं। ऐसे ‘य’ अक्षर स्वरूप शिव को नमस्कार है।

रोचक तथ्य (Trivia)

  • यह स्तोत्र ‘नमः शिवाय’ मंत्र के प्रत्येक अक्षर (न, म, शि, वा, य) पर आधारित है।
  • माना जाता है कि इन 5 श्लोकों का संबंध पंचमहाभूतों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) से है।
  • आदि शंकराचार्य ने 8वीं शताब्दी में अद्वैत वेदांत के प्रचार के दौरान इसकी रचना की थी।
  • इस स्तोत्र को शिव मानस पूजा और शिव तांडव स्तोत्र के साथ भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए सबसे प्रभावी माना जाता है।

सिद्ध कुंजिका स्तोत्र (Siddha Kunjika Stotram)

सिद्ध कुंजिका स्तोत्रम् (Siddha Kunjika Stotram) – अर्थ और महत्व

सिद्ध कुंजिका स्तोत्रम्: दुर्गा सप्तशती की गुप्त कुंजी

कलाकार/स्रोत: परंपरागत (रुद्रयामल तन्त्र)

परिचय (About)

सिद्ध कुंजिका स्तोत्र (Siddha Kunjika Stotram) हिंदू धर्म में शाक्त परंपरा का एक अत्यंत प्रभावशाली और पवित्र स्तोत्र है। रुद्रयामल तंत्र के अंतर्गत गौरी तंत्र में वर्णित यह स्तोत्र भगवान शिव द्वारा माता पार्वती को प्रदान किया गया था। ‘कुंजिका’ का अर्थ है चाबी। शास्त्रों के अनुसार, दुर्गा सप्तशती के मंत्र कीलित (locked) हैं। सिद्ध कुंजिका स्तोत्र का पाठ उन मंत्रों के कीलन को हटाकर उनकी सुप्त शक्ति को जगाता है।

इतिहास (History)

इस स्तोत्र का उद्गम रुद्रयामल तन्त्र से है। यह भगवान शिव और पार्वती के संवाद के रूप में है। शिव जी, देवी पार्वती को बताते हैं कि यह स्तोत्र देवताओं के लिए भी दुर्लभ है और इसे अत्यंत गुप्त रखा जाना चाहिए। यह दुर्गा सप्तशती पाठ का सार तत्व है।

सिद्ध कुंजिका स्तोत्रम् (मूल पाठ)

शिव उवाच शृणु देवि प्रवक्ष्यामि, कुंजिकास्तोत्रमुत्तमम्। येन मन्त्रप्रभावेण चण्डीजापः शुभो भवेत्॥१॥ न कवचं नार्गलास्तोत्रं कीलकं न रहस्यकम्। न सूक्तं नापि ध्यानं च न न्यासो न च वार्चनम्॥२॥ कुंजिकापाठमात्रेण दुर्गापाठफलं लभेत्। अति गुह्यतरं देवि देवानामपि दुर्लभम्॥३॥ गोपनीयं प्रयत्नेन स्वयोनिरिव पार्वति। मारणं मोहनं वश्यं स्तम्भनोच्चाटनादिकम्। पाठमात्रेण संसिद्ध्येत् कुंजिकास्तोत्रमुत्तमम्॥४॥ अथ मन्त्रः
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे। ॐ ग्लौं हुं क्लीं जूं सः ज्वालय ज्वालय ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ज्वल हं सं लं क्षं फट् स्वाहा॥
॥इति मन्त्रः॥ नमस्ते रुद्ररूपिण्यै नमस्ते मधुमर्दिनि। नमः कैटभहारिण्यै नमस्ते महिषार्दिनि॥१॥ नमस्ते शुम्भहन्त्र्यै च निशुम्भासुरघातिनि। जाग्रतं हि महादेवि जपं सिद्धं कुरुष्व मे॥२॥ ऐंकारी सृष्टिरूपायै ह्रींकारी प्रतिपालिका। क्लींकारी कामरूपिण्यै बीजरूपे नमोऽस्तु ते॥३॥ चामुण्डा चण्डघाती च यैकारी वरदायिनी। विच्चे चाभयदा नित्यं नमस्ते मन्त्ररूपिणि॥४॥ धां धीं धूं धूर्जटेः पत्नी वां वीं वूं वागधीश्वरी। क्रां क्रीं क्रूं कालिका देवि शां शीं शूं मे शुभं कुरु॥५॥ हुं हुं हुंकाररूपिण्यै जं जं जं जम्भनादिनी। भ्रां भ्रीं भ्रूं भैरवी भद्रे भवान्यै ते नमो नमः॥६॥ अं कं चं टं तं पं यं शं वीं दुं ऐं वीं हं क्षं। धिजाग्रं धिजाग्रं त्रोटय त्रोटय दीप्तं कुरु कुरु स्वाहा॥७॥ पां पीं पूं पार्वती पूर्णा खां खीं खूं खेचरी तथा। सां सीं सूं सप्तशती देव्या मन्त्रसिद्धिं कुरुष्व मे॥८॥ इदं तु कुंजिकास्तोत्रं मन्त्रजागर्तिहेतवे। अभक्ते नैव दातव्यं गोपितं रक्ष पार्वति॥ यस्तु कुंजिकया देवि हीनां सप्तशतीं पठेत्। न तस्य जायते सिद्धिररण्ये रोदनं यथा॥ ॥इति श्रीरुद्रयामले गौरीतन्त्रे शिवपार्वतीसंवादे कुंजिकास्तोत्रं सम्पूर्णम्॥

अर्थ और विश्लेषण (Meaning & Analysis)

सिद्ध कुंजिका स्तोत्र केवल शब्दों का संग्रह नहीं, बल्कि बीजाक्षरों का एक विद्युत-पुंज है।

  • सर्वोपरि महत्व: भगवान शिव कहते हैं कि इस स्तोत्र के पाठ से कवच, अर्गला, कीलक, ध्यान, और न्यास की आवश्यकता गौण हो जाती है, क्योंकि यह ‘कुंजी’ सीधे शक्ति को खोल देती है।
  • बीजाक्षर रहस्य:
    • ऐं (Aim): यह वाग्बीज है, जो ज्ञान और सृष्टि का प्रतीक है।
    • ह्रीं (Hreem): यह मायाबीज है, जो भुवनेश्वरश्वरी और पालन शक्ति का प्रतीक है।
    • क्लीं (Kleem): यह कामबीज है, जो आकर्षण और इच्छा पूर्ति का प्रतीक है।
  • चेतावनी: अंतिम श्लोक चेतावनी देता है कि कुंजिका के बिना सप्तशती का पाठ ‘अरण्य रोदन’ (जंगल में रोने) के समान व्यर्थ हो सकता है।

रोचक तथ्य (Trivia)

  • 📚 समय की बचत: नवरात्रि में समयाभाव होने पर, भक्त अक्सर पूर्ण चंडी पाठ के विकल्प के रूप में केवल ‘सिद्ध कुंजिका स्तोत्र’ का पाठ करते हैं।
  • 🔐 गुप्त साधना: इसे ‘स्वयोनिरिव’ गुप्त रखने को कहा गया है, जिसका अर्थ है कि यह अत्यंत व्यक्तिगत साधना है।
  • 🔥 अग्नि तत्व: इसमें ‘ज्वालय ज्वालय’ जैसे शब्दों का प्रयोग अग्नि तत्व को प्रज्वलित करने और नकारात्मकता को भस्म करने के लिए किया गया है।

श्रीरामरक्षास्तोत्रम् (Ram Raksha Stotra)

श्रीरामरक्षास्तोत्रम् (Ram Raksha Stotra) – अर्थ और महात्म्य

श्रीरामरक्षास्तोत्रम् (Ram Raksha Stotra): सुरक्षा और भक्ति का दिव्य कवच

रचियता: बुधकौशिक ऋषि (Budha Kaushika Rishi)

📜 श्रीरामरक्षास्तोत्रम् (मूल पाठ – संस्कृत)

विनियोगः अस्य श्रीरामरक्षास्तोत्रमन्त्रस्य बुधकौशिक ऋषिः, श्रीसीतारामचन्द्रो देवता, अनुष्टुप् छन्दः, सीता शक्तिः, श्रीमद्हनुमान् कीलकम्, श्रीरामचन्द्रप्रीत्यर्थे रामरक्षास्तोत्रजपे विनियोगः ॥ ध्यानम् ध्यायेदाजानुबाहुं धृतशरधनुषं बद्धपद्मासनस्थं पीतं वासो वसानं नवकमलदलस्पर्धिनेत्रं प्रसन्नम् । वामाङ्कारूढसीतामुखकमलमिलल्लोचनं नीरदाभं नानालङ्कारदीप्तं दधतमुरुजटामण्डलं रामचन्द्रम् ॥ (स्तोत्रम्) चरितं रघुनाथस्य शतकोटिप्रविस्तरम् । एकैकमक्षरं पुंसां महापातकनाशनम् ॥ १॥ ध्यात्वा नीलोत्पलश्यामं रामं राजीवलोचनम् । जानकीलक्ष्मणोपेतं जटामुकुटमण्डितम् ॥ २॥ रामरक्षां पठेत्प्राज्ञः पापघ्नीं सर्वकामदाम् । शिरो मे राघवः पातु भालं दशरथात्मजः ॥ ४॥ कौसल्येयो दृशौ पातु विश्वामित्रप्रियः श्रुती । घ्राणं पातु मखत्राता मुखं सौमित्रिवत्सलः ॥ ५॥ … (कृपया संपूर्ण पाठ के लिए धार्मिक पुस्तकों का संदर्भ लें) फलश्रुति (प्रसिद्ध श्लोक): राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे । सहस्रनाम तत्तुल्यं रामनाम वरानने ॥ ३८॥

📖 इतिहास (History)

श्रीरामरक्षास्तोत्रम् की रचना बुधकौशिक ऋषि द्वारा वैदिक काल में की गई थी। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान शिव (शंकर) ने स्वयं बुधकौशिक ऋषि के स्वप्न में आकर उन्हें यह शक्तिशाली स्तोत्र सुनाया था। ऋषि ने सुबह जागने पर तुरंत उस दिव्य स्तोत्र को भोजपत्र पर लिख लिया। यह घटना इस स्तोत्र की दिव्यता और प्रमाणिकता को सिद्ध करती है।

ℹ️ परिचय (About)

यह भगवान श्री राम को समर्पित एक अत्यंत शक्तिशाली स्तोत्र है। ‘रक्षा’ का अर्थ है सुरक्षा, और इस स्तोत्र का पाठ करने से भक्त को श्री राम का दिव्य संरक्षण प्राप्त होता है। इसमें भगवान राम के विभिन्न नामों और उनके गुणों का वर्णन किया गया है।

🧐 अर्थ और विश्लेषण (Meaning Analysis)

श्रीरामरक्षास्तोत्रम् का अर्थ अत्यंत गहरा है। इसे मुख्य रूप से एक ‘वज्र-पंजर’ (अभेद्य कवच) के रूप में देखा जाता है।

  • कवच भाग: श्लोक 4 से 9 तक भक्त भगवान के विभिन्न नामों का स्मरण करते हुए शरीर के अंगों की सुरक्षा मांगता है। जैसे, “मेरे कंठ की रक्षा भरत-वंदित (राम) करें”।
  • राम नाम का महत्व: यह स्तोत्र सिखाता है कि राम का नाम ही कलयुग में सबसे बड़ा सहारा है। अंतिम श्लोक में बताया गया है कि “राम” नाम का तीन बार जाप करना विष्णु सहस्त्रनाम के 1000 नामों के बराबर फल देता है।

💡 रोचक तथ्य (Trivia)

  • यह उन दुर्लभ स्तोत्रों में से है जिसकी रचना जाग्रत अवस्था में नहीं, बल्कि स्वप्न में प्राप्त ज्ञान के आधार पर हुई।
  • इसका अंतिम श्लोक (“राम रामेति…”) भगवान शिव द्वारा माता पार्वती को बताया गया था।
  • इसे ‘वज्रपंजर’ भी कहा जाता है, जिसका अर्थ है ‘हीरे का पिंजरा’, जिसे कोई अस्त्र-शस्त्र नहीं भेद सकता।
  • इस स्तोत्र के पाठ में हनुमान जी को ‘कीलक’ (स्तंभ) माना गया है।

इस स्तोत्र का नियमित पाठ करने से भय, रोग और दोषों का नाश होता है। जय श्री राम!

श्रीरामरक्षास्तोत्रम्

श्रीरामरक्षास्तोत्रम् 

॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥

अस्य श्रीरामरक्षास्तोत्रमन्त्रस्य । बुधकौशिक ऋषिः ।
श्रीसीतारामचन्द्रो देवता । अनुष्टुप् छन्दः ।
सीता शक्तिः । श्रीमद् हनुमान कीलकम् ।
श्रीरामचन्द्रप्रीत्यर्थे रामरक्षास्तोत्रजपे विनियोगः ॥

अथ ध्यानम् ।
ध्यायेदाजानुबाहुं धृतशरधनुषं बद्धपद्मासनस्थं
पीतं वासो वसानं नवकमलदलस्पर्धिनेत्रं प्रसन्नम् ।
वामाङ्कारूढ सीतामुखकमलमिलल्लोचनं नीरदाभं
नानालङ्कारदीप्तं दधतमुरुजटामण्डनं रामचन्द्रम् ॥

इति ध्यानम् ॥

चरितं रघुनाथस्य शतकोटि प्रविस्तरम् ।
एकैकमक्षरं पुंसां महापातकनाशनम् ॥ १॥

ध्यात्वा नीलोत्पलश्यामं रामं राजीवलोचनम् ।
जानकीलक्ष्मणोपेतं जटामुकुटमण्डितम् ॥ २॥

सासितूणधनुर्बाणपाणिं नक्तञ्चरान्तकम् ।
स्वलीलया जगत्त्रातुमाविर्भूतमजं विभुम् ॥ ३॥

रामरक्षां पठेत्प्राज्ञः पापघ्नीं सर्वकामदाम् ।
शिरो मे राघवः पातु भालं दशरथात्मजः ॥ ४॥

कौसल्येयो दृशौ पातु विश्वामित्रप्रियः श्रुती ।
घ्राणं पातु मखत्राता मुखं सौमित्रिवत्सलः ॥ ५॥

जिह्वां विद्यानिधिः पातु कण्ठं भरतवन्दितः ।
स्कन्धौ दिव्यायुधः पातु भुजौ भग्नेशकार्मुकः ॥ ६॥

करौ सीतापतिः पातु हृदयं जामदग्न्यजित् ।
मध्यं पातु खरध्वंसी नाभिं जाम्बवदाश्रयः ॥ ७॥

सुग्रीवेशः कटी पातु सक्थिनी हनुमत्प्रभुः ।
ऊरू रघूत्तमः पातु रक्षःकुलविनाशकृत् ॥ ८॥

जानुनी सेतुकृत्पातु जङ्घे दशमुखान्तकः ।
पादौ बिभीषणश्रीदः पातु रामोऽखिलं वपुः ॥ ९॥

एतां रामबलोपेतां रक्षां यः सुकृती पठेत् ।
स चिरायुः सुखी पुत्री विजयी विनयी भवेत् ॥ १०॥

पातालभूतलव्योमचारिणश्छद्मचारिणः ।
न द्रष्टुमपि शक्तास्ते रक्षितं रामनामभिः ॥ ११॥

रामेति रामभद्रेति रामचन्द्रेति वा स्मरन् ।
नरो न लिप्यते पापैः भुक्तिं मुक्तिं च विन्दति ॥ १२॥

जगज्जैत्रैकमन्त्रेण रामनाम्नाभिरक्षितम् ।
यः कण्ठे धारयेत्तस्य करस्थाः सर्वसिद्धयः ॥ १३॥

वज्रपञ्जरनामेदं यो रामकवचं स्मरेत् ।
अव्याहताज्ञः सर्वत्र लभते जयमङ्गलम् ॥ १४॥

आदिष्टवान् यथा स्वप्ने रामरक्षामिमां हरः ।
तथा लिखितवान् प्रातः प्रबुद्धो बुधकौशिकः ॥ १५॥

आरामः कल्पवृक्षाणां विरामः सकलापदाम् ।
अभिरामस्त्रिलोकानां रामः श्रीमान् स नः प्रभुः ॥ १६॥

तरुणौ रूपसम्पन्नौ सुकुमारौ महाबलौ ।
पुण्डरीकविशालाक्षौ चीरकृष्णाजिनाम्बरौ ॥ १७॥

फलमूलाशिनौ दान्तौ तापसौ ब्रह्मचारिणौ ।
पुत्रौ दशरथस्यैतौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ ॥ १८॥

शरण्यौ सर्वसत्त्वानां श्रेष्ठौ सर्वधनुष्मताम् ।
रक्षः कुलनिहन्तारौ त्रायेतां नो रघूत्तमौ ॥ १९॥

आत्तसज्जधनुषाविषुस्पृशावक्षयाशुगनिषङ्गसङ्गिनौ ।
रक्षणाय मम रामलक्ष्मणावग्रतः पथि सदैव गच्छताम् ॥ २०॥

सन्नद्धः कवची खड्गी चापबाणधरो युवा ।
गच्छन्मनोरथोऽस्माकं रामः पातु सलक्ष्मणः ॥ २१॥

रामो दाशरथिः शूरो लक्ष्मणानुचरो बली ।
काकुत्स्थः पुरुषः पूर्णः कौसल्येयो रघूत्तमः ॥ २२॥

वेदान्तवेद्यो यज्ञेशः पुराणपुरुषोत्तमः ।
जानकीवल्लभः श्रीमान् अप्रमेय पराक्रमः ॥ २३॥

इत्येतानि जपन्नित्यं मद्भक्तः श्रद्धयान्वितः ।
अश्वमेधाधिकं पुण्यं सम्प्राप्नोति न संशयः ॥ २४॥

रामं दूर्वादलश्यामं पद्माक्षं पीतवाससम् ।
स्तुवन्ति नामभिर्दिव्यैः न ते संसारिणो नराः ॥ २५॥

रामं लक्ष्मणपूर्वजं रघुवरं सीतापतिं सुन्दरम् ।
काकुत्स्थं करुणार्णवं गुणनिधिं विप्रप्रियं धार्मिकम् ।
राजेन्द्रं सत्यसन्धं दशरथतनयं श्यामलं शान्तमूर्तिम् ।
वन्दे लोकाभिरामं रघुकुलतिलकं राघवं रावणारिम् ॥ २६॥

रामाय रामभद्राय रामचन्द्राय वेधसे ।
रघुनाथाय नाथाय सीतायाः पतये नमः ॥ २७॥

श्रीराम राम रघुनन्दन राम राम
श्रीराम राम भरताग्रज राम राम ।
श्रीराम राम रणकर्कश राम राम
श्रीराम राम शरणं भव राम राम ॥ २८॥

श्रीरामचन्द्रचरणौ मनसा स्मरामि
श्रीरामचन्द्रचरणौ वचसा गृणामि ।
श्रीरामचन्द्रचरणौ शिरसा नमामि
श्रीरामचन्द्रचरणौ शरणं प्रपद्ये ॥ २९॥

माता रामो मत्पिता रामचन्द्रः
स्वामी रामो मत्सखा रामचन्द्रः ।
सर्वस्वं मे रामचन्द्रो दयालु-
र्नान्यं जाने नैव जाने न जाने ॥ ३०॥

दक्षिणे लक्ष्मणो यस्य वामे तु जनकात्मजा ।
पुरतो मारुतिर्यस्य तं वन्दे रघुनन्दनम् ॥ ३१॥

लोकाभिरामं रणरङ्गधीरं
राजीवनेत्रं रघुवंशनाथम् ।
कारुण्यरूपं करुणाकरं तं
श्रीरामचन्द्रम् शरणं प्रपद्ये ॥ ३२॥

मनोजवं मारुततुल्यवेगं
जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम् ।
वातात्मजं वानरयूथमुख्यं
श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये ॥ ३३॥

कूजन्तं रामरामेति मधुरं मधुराक्षरम् ।
आरुह्य कविताशाखां वन्दे वाल्मीकिकोकिलम् ॥ ३४॥

आपदामपहर्तारं दातारं सर्वसम्पदाम् ।
लोकाभिरामं श्रीरामं भूयो भूयो नमाम्यहम् ॥ ३५॥

भर्जनं भवबीजानामर्जनं सुखसम्पदाम् ।
तर्जनं यमदूतानां रामरामेति गर्जनम् ॥ ३६॥

रामो राजमणिः सदा विजयते रामं रमेशं भजे
रामेणाभिहता निशाचरचमू रामाय तस्मै नमः ।
रामान्नास्ति परायणं परतरं रामस्य दासोऽस्म्यहं
रामे चित्तलयः सदा भवतु मे भो राम मामुद्धर ॥ ३७॥

रामरामेति रामेति रमे रामे मनोरमे । (श्रीरामरामरामेति)
सहस्रनामतत्तुल्यं रामनाम वरानने ॥ ३८॥

इति श्रीबुधकौशिकविरचितं श्रीरामरक्षास्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्रार्पणमस्तु ॥

Jai Ambe Gauri (जय अम्बे गौरी)

By Anuradha Paudwal (अनुराधा पौडवाल)


जय अम्बे गौरी आरती – अनुराधा पौडवाल | Jai Ambe Gauri Lyrics & Meaning

जय अम्बे गौरी आरती: लिरिक्स और अर्थ

कलाकार: अनुराधा पौडवाल (Anuradha Paudwal) | शैली: भक्ति संगीत

यह पृष्ठ प्रसिद्ध दुर्गा आरती ‘जय अम्बे गौरी’ को समर्पित है। यहाँ आप इसके हिंदी लिरिक्स, रोमन लिप्यंतरण, और इसके गहरे अर्थ को पढ़ सकते हैं।

🎵 जय अम्बे गौरी लिरिक्स (Hindi Lyrics)

जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी। तुमको निशिदिन ध्यावत, हरि ब्रह्मा शिवरी॥ मांग सिन्दूर विराजत, टीको मृगमद को। उज्ज्वल से दो नैना, चन्द्रवदन नीको॥ कनक समान कलेवर, रक्ताम्बर राजै। रक्तपुष्प गल माला, कण्ठन पर साजै॥ केहरि वाहन राजत, खड्ग खप्पर धारी। सुर-नर-मुनिजन सेवत, तिनके दुखहारी॥ कानन कुण्डल शोभित, नासाग्रे मोती। कोटिक चन्द्र दिवाकर, राजत सम ज्योति॥ शुम्भ-निशुम्भ विदारे, महिषासुर घाती। धूम्रविलोचन नैना, निशदिन मदमाती॥ चण्ड-मुण्ड संहारे, शोणित बीज हरे। मधु-कैटभ दोउ मारे, सुर भयहीन करे॥ ब्रह्माणी, रुद्राणी, तुम कमला रानी। आगम निगम बखानी, तुम शिव पटरानी॥ चौंसठ योगिनी मंगल गावत, नृत्य करत भैरों। बाजत ताल मृदंगा, अरु बाजत डमरू॥ तुम ही जग की माता, तुम ही हो भरता। भक्तन की दुख हरता, सुख सम्पत्ति करता॥ भुजा चार अति शोभित, वरमुद्रा धारी। मनवांछित फल पावत, सेवत नर नारी॥ कंचन थाल विराजत, अगर कपूर बाती। श्रीमालकेतु में राजत, कोटि रतन ज्योति॥ श्री अम्बेजी की आरती, जो कोई नर गावे। कहत शिवानन्द स्वामी, सुख-सम्पत्ति पावे॥

📖 Romanized Lyrics

Jai Ambe Gauri, Maiya Jai Shyama Gauri. Tumko Nishidin Dhyavat, Hari Brahma Shivri. Mang Sindoor Virajat, Tiko Mrigmad Ko. Ujjwal Se Do Naina, Chandravadan Neeko. Kanak Saman Kalevar, Raktambar Raje. Raktapushp Gal Mala, Kanthan Par Saje. Kehari Vahan Rajat, Khadg Khappar Dhari. Sur-Nar-Munijan Sevat, Tinke Dukhhari. Kanan Kundal Shobhit, Nasagre Moti. Kotik Chandra Divaker, Rajat Sam Jyoti. Shumbh-Nishumbh Vidare, Mahishasur Ghati. Dhumravilochan Naina, Nishadin Madmati. Chand-Mund Sanhare, Shonit Beej Hare. Madhu-Kaitabh Dou Mare, Sur Bhayheen Kare. Brahmani, Rudrani, Tum Kamala Rani. Agam Nigam Bakhani, Tum Shiv Patrani. Chausath Yogini Mangal Gavat, Nritya Karat Bhairon. Bajat Tal Mridanga, Aru Bajat Damru. Tum Hi Jag Ki Mata, Tum Hi Ho Bharta. Bhaktan Ki Dukh Harta, Sukh Sampatti Karta. Bhuja Char Ati Shobhit, Varamudra Dhari. Manvanchhit Phal Pavat, Sevat Nar Nari. Kanchan Thal Virajat, Agar Kapoor Bati. Shrimalketu Mein Rajat, Koti Ratan Jyoti. Shri Ambeji Ki Aarti, Jo Koi Nar Gave. Kahat Shivanand Swami, Sukh-Sampatti Pave.

🕉️ आरती का इतिहास (History)

यह आरती ‘जय अम्बे गौरी’ हिंदू धर्म में देवी दुर्गा की उपासना का एक प्रधान अंग है। सदियों से मंदिरों और घरों में, विशेषकर नवरात्रि के पावन पर्व पर इसे गाया जाता है। आरती के रचयिता के रूप में ‘शिवानन्द स्वामी’ का नाम आता है, जैसा कि अंतिम छंद में उल्लेखित है। अनुराधा पौडवाल, जिन्हें भक्ति संगीत की सम्राज्ञी माना जाता है, ने इसे अपनी सुरीली आवाज देकर अमर कर दिया है। 90 के दशक में टी-सीरीज (T-Series) द्वारा जारी किए गए भक्ति एल्बमों के माध्यम से यह संस्करण अत्यंत लोकप्रिय हुआ।

ℹ️ गीत के बारे में (About)

यह आरती माँ दुर्गा की महिमा, उनके रूप और उनकी शक्तियों का वर्णन करती है। अनुराधा पौडवाल का गायन अत्यंत भावपूर्ण और स्पष्ट है, जो श्रोता को भक्ति रस में सराबोर कर देता है। इसमें देवी के सौम्य रूप (गौरी) और संहारक रूप (महिषासुर मर्दिनी) दोनों का संतुलन है। वाद्य यंत्रों में पारंपरिक घंटियों, मृदंग और शंख का उपयोग इसे एक पूर्ण धार्मिक अनुभव बनाता है।

🧐 भावार्थ (Meaning Analysis)

  • दिव्य स्वरूप: आरती की शुरुआत में माता के सुंदर रूप का वर्णन है—स्वर्ण समान शरीर (कनक समान कलेवर), लाल वस्त्र (रक्ताम्बर), और गले में लाल फूलों की माला।
  • असुर संहारक: मध्य भाग में माता की वीरता का गान है। उन्होंने शुम्भ-निशुम्भ, महिषासुर, चण्ड-मुण्ड, और मधु-कैटभ जैसे भयानक राक्षसों का वध करके देवताओं को भयमुक्त किया।
  • त्रिशक्ति: माता को ब्रह्माणी (सरस्वती), रुद्राणी (पार्वती) और कमला रानी (लक्ष्मी) के रूप में संबोधित किया गया है, जो दर्शाता है कि वे ही सर्वोच्च शक्ति हैं।
  • फलश्रुति: अंत में, आरती करने का फल बताया गया है—सुख और संपत्ति की प्राप्ति। यह केवल एक गीत नहीं, बल्कि मनवांछित फल पाने की प्रार्थना है।

💡 रोचक तथ्य (Trivia)

  • रचनाकार: आरती की अंतिम पंक्ति “कहत शिवानन्द स्वामी” से पता चलता है कि इसके मूल रचयिता स्वामी शिवानन्द थे।
  • लोकप्रियता: उत्तर भारत में शायद ही कोई ऐसा दुर्गा मंदिर हो जहाँ सुबह-शाम यह आरती न गाई जाती हो।
  • धुन: इस आरती की गायन शैली और मीटर (meter) प्रसिद्ध आरती “ओम जय जगदीश हरे” के समान है।
  • योगिनी: “चौंसठ योगिनी” का संदर्भ तांत्रिक परंपराओं से जुड़ा है, जो देवी की 64 सहचरियों को दर्शाता है।

सैयारा (Saiyaara) – 2025

सैयारा (Saiyaara) – 2025 Lyrics & Meaning

सैयारा (Saiyaara) – 2025: गीत, अर्थ और विश्लेषण

कलाकार: फहीम अब्दुल्ला, तनिष्क बागची, अर्सलान निज़ामी
फिल्म: सैयारा (2025)
गीतकार: इरशाद कामिल


गाने के बोल (हिंदी में)

तू पास है, मेरे पास है ऐसे
मेरा कोई एहसास है जैसे
तू पास है, मेरे पास है ऐसे
मेरा कोई एहसास है जैसे

हाय मैं मर ही जाऊं
जो तुझको न पाऊं
बातों में तेरी मैं रातें बिताऊं
होंठों पे लम्हा-लम्हा
है नाम तेरा हाय
तुझको ही गाऊं मैं, तुझको पुकारूं

कोरस:
सैयारा तू तो बदला नहीं है
मौसम ज़रा सा रूठा हुआ है
सैयारा तू तो बदला नहीं है
मौसम ज़रा सा रूठा हुआ है

बीते लम्हों से दुनिया बसा लूं
मैं तो तेरे आंसुओं का बना हूं
मेरी हंसी में तेरी सदाएं
तेरी कहानी खुद को सुनाऊं

यादों के तारे, यादों के तारे टूटेंगे कैसे
मेरे हैं जो वो रूठेंगे कैसे
बीते दिनों की खोली किताबें
गुज़रे पलों को कैसे भुला दें

हाय मैं मर ही जाऊं
जो तुझको न पाऊं
बातों में तेरी मैं रातें बिताऊं
होंठों पे लम्हा-लम्हा
है नाम तेरा हाय
तुझको ही गाऊं मैं, तुझको पुकारूं

सैयारा तू तो बदला नहीं है
मौसम ज़रा सा रूठा हुआ है
सैयारा तू तो बदला नहीं है
मौसम ज़रा सा रूठा हुआ है


Romanized Lyrics

Tu paas hai, mere paas hai aise
Mera koi ehsaas hai jaise
Tu paas hai, mere paas hai aise
Mera koi ehsaas hai jaise

Haaye main mar hi jaaun
Jo tujhko na paaun
Baaton mein teri main raatein bitaaun
Honthon pe lamha-lamha
Hai naam tera haaye
Tujhko hi gaaun main, tujhko pukaarun

Chorus:
Saiyaara tu toh badla nahi hai
Mausam zara sa rootha hua hai
Saiyaara tu toh badla nahi hai
Mausam zara sa rootha hua hai

Beete lamhon se duniya basa loon
Main toh tere aansuon ka bana hoon
Meri hansi mein teri sadaayein
Teri kahaani khud ko sunaaun

Yaadon ke taare, yaadon ke taare tootenge kaise
Mere hain jo woh roothenge kaise
Beete dinon ki kholi kitaabein
Guzre palon ko kaise bhula dein

Haaye main mar hi jaaun
Jo tujhko na paaun
Baaton mein teri main raatein bitaaun
Honthon pe lamha-lamha
Hai naam tera haaye
Tujhko hi gaaun main, tujhko pukaarun

Saiyaara tu toh badla nahi hai
Mausam zara sa rootha hua hai
Saiyaara tu toh badla nahi hai
Mausam zara sa rootha hua hai


इतिहास (History)

यह गीत 2025 की आगामी बॉलीवुड फिल्म ‘सैयारा’ (Saiyaara) का शीर्षक गीत (Title Track) है। यह फिल्म यश राज फिल्म्स (YRF) के बैनर तले बनी है और मोहित सूरी द्वारा निर्देशित है। इस गाने को फहीम अब्दुल्ला ने अपनी आवाज़ दी है, जो इससे पहले अपने वायरल हिट गाने ‘इश्क़’ के लिए चर्चा में रहे थे। संगीत तनिष्क बागची, फहीम अब्दुल्ला और अर्सलान निज़ामी ने मिलकर तैयार किया है, और इसके बोल इरशाद कामिल ने लिखे हैं।

गाने के बारे में (About)

‘सैयारा’ एक बेहद भावुक और रोमांटिक गीत है जो दो प्रेमियों के बीच के अटूट बंधन और जुदाई के दर्द को बयां करता है। गाने का संगीत धीमा और दिल को छू लेने वाला है, जो श्रोता को एक पुरानी यादों (nostalgia) की दुनिया में ले जाता है। इसमें गायक अपनी प्रेमिका को अपनी पूरी दुनिया मानता है और उसे खोने के डर को व्यक्त करता है।

अर्थ विश्लेषण (Meaning Analysis)

इस गीत में ‘सैयारा’ शब्द का प्रयोग प्रेमी ने अपनी प्रेमिका के लिए एक रूपक (metaphor) के तौर पर किया है। ‘सैयारा’ का अर्थ होता है ‘ग्रह’ (Planet) या ‘सैर करने वाला’ (Wanderer), यानी प्रेमी के लिए उसकी प्रेमिका ही उसकी पूरी दुनिया है। पंक्ति ‘सैयारा तू तो बदला नहीं है, मौसम ज़रा सा रूठा हुआ है’ का अर्थ है कि उनका प्यार और वो व्यक्ति आज भी वही है, बस हालात (मौसम) थोड़े विपरीत हो गए हैं। ‘मैं तो तेरे आंसुओं का बना हूं’ जैसी पंक्तियाँ यह दर्शाती हैं कि प्रेमी का अस्तित्व उसकी प्रेमिका के सुख-दुख से पूरी तरह जुड़ा हुआ है।

रोचक तथ्य (Trivia)

  • यह फिल्म अहान पांडेय (Ahaan Panday) की बॉलीवुड में डेब्यू फिल्म है।
  • फहीम अब्दुल्ला और अर्सलान निज़ामी कश्मीरी कलाकार हैं, जिन्होंने इस बड़े बॉलीवुड प्रोजेक्ट में अपनी छाप छोड़ी है।
  • गाने के संगीत में आधुनिक वाद्ययंत्रों के साथ-साथ पारंपरिक कश्मीरी संगीत की हल्की झलक भी महसूस की जा सकती है।
  • 2012 की फिल्म ‘एक था टाइगर’ में भी ‘सैयारा’ नाम का एक सुपरहिट गाना था, लेकिन यह गाना उससे बिल्कुल अलग है।


Ye Tune Kya Kiya Lyrics

Ye Tune Kya Kiya Lyrics

Ishq woh balaa hai
Ishq woh balaa hai
Jisko chhua jisne woh jalaa hai

Dil se hota hai shuru
Dil se hota hai shuru
Par kambakht sar pe chadha hai

Kabhi khud se, kabhi khuda se
Kabhi zamaane se ladaa hai
Itna hua badnaam phir bhi
Har zubaan pe adaa hai

Ishq ki saazishein
Ishq ki baaziyaan
Haara main khel ke
Do dilon ka juaa

Kyun tune meri fursat ki
Kyun dil mein itni harkat ki
Ishaq mein itni barqat ki
Ye tune kya kiya

Phiroon ab maara maara main
Chaand se bichhda taara main
Dil se itna kyun haara main
Yeh tune kya kiya

Saari duniya se jeet ke main aaya hoon idhar
Tere aage hi main haara kiya tune kya asar

Main dil ka raaz kehta hoon
Ke jab jab saansein leta hoon
Tera hi naam leta hoon
Yeh tune kya kiya

Meri baahon ko teri saanson ki jo
Aadatein lagi hain waisi
Jee leta hoon ab main thoda aur
Mere dil ki rait pe aankhon ki jo
Pade parchhai teri
Pee leta hoon tab main thoda aur

Jaane kaun hai tu meri
Main na jaanu yeh magar
Jahaan jaaoon main karoon main wahaan
Tera hi zikar

Mujhe tu raazi lagti hai
Jeeti hui baazi lagti hai
Tabeeyat taazi lagti hai
Ye tune kya kiya

Main dil ka raaz kehta hoon
Ke jab jab saansein leta hoon
Tera hi naam leta hoon
Yeh tune kya kiya

Dil karta hai teri baatein sunu
Saude main adhoore chunu
Muft ka hua yeh faayda
Kyun khud ko main barbaad karoon
Fanaa hoke tunhse miloon
Ishq ka ajab hai kaayda

Teri raahon se jo guzri hain meri dagar
Main aage badh gaya hoon hoke thoda befikar

Kaho to kis se marzi loon
Kaho to kis ko arzi doon
Hansta ab thoda farzi hoon
Yeh tune kya kiya

Main dil ka raaz kehta hoon
Ke jab jab saansein leta hoon

Ishq ki saazishein
Ishq ki baaziyaan
Haara main khel ke
Do dilon ka juaa

Jo Tum Mere Ho

Song by Anuv Jain ‧ 2024

Lyrics

हैरान हूँ

कि कुछ भी न मांगूं कभी मैं

जो तुम मेरे हो

ऐसा हो क्यों?

कि लगता है हासिल सभी है

जो तुम मेरे हो

जो तुम मेरे हो

तो मैं कुछ नहीं मांगूं दुनिया से

और तुम हो ही नहीं

तो मैं जीना नहीं चाहूं दुनिया में

और नजरों में मेरे

एक जहान है जहाँ तुम और मैं अब साथ हैं

और वहाँ कोई नहीं

तुम और मैं हैं

हाय

और आओगे ऐसे आओगे

तेरी मेरी क्या ये राहें

यूँ जुड़ी हैं

और राहों में ही

जो तुम आए कभी

हम तो प्यार से ही मर जाएंगे

और आओगे ऐसे आओगे

तेरी मेरी अब ये राहें यूँ जुड़ी हैं

और राहों में ही

जो तुम आए नहीं

हम तो फिर भी तुम्हें ही चाहेंगे

जो तुम मेरे हो

तो मैं कुछ नहीं मांगूं दुनिया से

पूछे ये तुम

कि तुम्हें मैं क्या देखता हूँ?

जब चारों तरफ आज कितने ही सारे नज़ारे हैं

जानें ना तुम

खुद को यूँ ना जानें क्यों?

नज़रों से मेरी यहाँ

देखो न खुद को ज़रा

देखो न देखो न ज़ुल्फों से कैसे ज़ुल्फों से

तेरी छुपती प्यारी प्यारी सी मुस्कान है

और नज़रे झुकी और नज़रे उठी

तो मैं क्या ही करूँ?

बर्बाद मैं

तेरे होठों को तेरे होठों को

जिनसे रखती मेरे प्यारे प्यारे नाम है

और दिल का तेरे

और दिल का तेरे

अब मैं क्या ही कहूँ?

क्या बात है

और हाँ देखो यहाँ

कैसे आई दो दिलों की

यह बारात है

पर क्या खुला आसमान

या फिर लाई यहाँ जोरो से

बरसात है?

चाहे हों चाहे भी बादल तो

चाहे फिर भी तुम्हें

क्या पता तुमको?

मांगूँ ना कुछ और जो

तुम मेरे हो आ आ आ आ


🎤 Song Lyrics: Anuv Jain – JO TUM MERE HO

[Verse 1]

Hairan hun ki kuch bhi naa maangoon kabhi main

Jo tum mere ho

Aisa ho kyun ki lagta hai haasil sabhi hai

Jo tum mere ho

[Chorus]

Jo tum mere ho

Toh main kuch nahi maangoon duniya se

Aur tum ho hi nahi

Toh main jeena nahi chahoon duniya mei

[Verse 2]

Aur nazron mei mere

Ek jahan hai, jahan tu aur main ab saath hain

Aur wahan koi nahi

Tu aur main hi, haaye

[Verse 3]

Aur aaoge, kaise aaoge

Teri-meri kya yeh raahein yun judi hain?

Aur raahon mei bhi jo tum aaye kabhi

Hum toh pyaar se hi mar jaayenge

Aur aaoge, aise aaoge

Teri-meri kya yeh raahein yun judi hain?

Aur raahon mei hi jo tum aaye nahi

Hum toh phir bhi tumhe hi chahenge

[Chorus]

Jo tum mere ho

Toh main kuch nahi maangoon duniya se

[Bridge]

Puchhe tu

Ki tujhmei main kya dekhta hoon

Jab chaaron taraf aaj kitne hi saare nazaarein hain?

Jaane naa tu

Khud ko yun, naa jaane kyun?

Nazron se mere yahan dekho naa khud ko zara

[Verse 4]

Dekho naa, dekho naa

Zulfon se, kaise zulfon se

Teri chhupti pyaari-pyaari si muskaan hai

Aur nazrein jhuki aur nazrein uthi

Toh main kya hi karoon? Barbaad main

Tere honthon ko, tere honthon ko

Jinse rakhti mere pyaare-pyaare naam hain

Aur dil ka tere, aur dil ka tere

Ab main kya hi kahoo, kya baat hai!

[Outro]

Aur haan, dekho yahaan

Kaise aayi do dilon ki yeh baarat hai

Par kya khula aasmaan

Ya phir layi yahan zoron se barsaat hai?

Chahe ho chhaye bhi baadal toh

Chahein phir bhi tumhe, kya pata tumko?

Maangoon naa kuch aur jo

Tum mere ho

Joke in hindi

joke in hindi -जोक (Joke) का मतलब है हंसी-मजाक, चुटकुला या विनोदपूर्ण बात। यह एक ऐसी कहानी या वाक्य होता है जिसे सुनकर लोग हंसते हैं। जोक्स का इस्तेमाल मनोरंजन के लिए किया जाता है और हंसी-खुशी का माहौल बनाने में मदद करते हैं।

भज गोविन्दं  (BHAJ GOVINDAM)

आदि गुरु श्री शंकराचार्य विरचित 

Adi Shankara’s Bhaja Govindam

Bhaj Govindam In Sanskrit Verse Only

PDF Download Link in Sanskrit-Hindi  SanskritDocuments.org Link

Bhaj Govindam | भज गोविन्दम् | चर्पटपञ्जरिका स्तोत्र | Mohamudgara Stotram | Madhvi Madhukar Jha


भज गोविन्दम्  (हिंदी भावानुवाद)

SANSKRIT WITH HINDI AND ENGLISH TRANSLATION

भज गोविन्दं भज गोविन्दं, गोविन्दं भज मूढ़मते। 
संप्राप्ते सन्निहिते काले, न हि न हि रक्षति डुकृञ् करणे॥1॥
हे मोह से ग्रसित बुद्धि (-सोचने समझने, राह निकलने में असमर्थ व्यक्ति) वाले मनुष्य ! गोविंद को भजो, गोविन्द का नाम लो, गोविन्द से प्रेम करो; क्योंकि मृत्यु के समय व्याकरण के नियम याद रखने से आपकी रक्षा नहीं हो सकती है।
O deluded-confused-unable to find a way out, chant the names of Almighty-Govind, worship Govind, love Govind, since memorising the rules of grammar (-daily chores-routine) cannot save one at the time of death. One who is not thoughtful, insensitive, irresponsible should pray to the God.
मूढ़ जहीहि धनागमतृष्णाम्, कुरु सद्बुद्धिमं मनसि वितृष्णाम्।
यल्लभसे निजकर्मोपात्तम्,वित्तं तेन विनोदय चित्तं॥2॥
हे मोहित बुद्धि! धन एकत्र करने के लोभ को त्यागो। अपने मन से इन समस्त कामनाओं का त्याग करो। सत्य के पथ का अनुसरण करो, अपने परिश्रम से जो धन प्राप्त हो, उससे ही अपने मन को प्रसन्न रखो।
O deluded-illusioned! Give up the lust to amass wealth. Reject all desires such desires from the mind and take up the path of virtuousness-piousity-righteousness. One should be content-satisfied happy with the money earned through honest means. One should earn money through righteous means without fraud, cheating, deceiving, forgery etc.
नारीस्तनभरनाभीदेशम्, दृष्ट्वा मागा मोहावेशम्।
एतन्मान्सवसादिविकारम्, मनसि विचिन्तय वारं वारम्॥3॥
स्त्री शरीर पर मोहित होकर आसक्त मत हो। अपने मन में निरंतर स्मरण करो कि वह मांस-वसा आदि के विकार के अतिरिक्त कुछ और नहीं हैं।
One should not be governed by lust, sexuality, sensuality, passions towards women since they are nothing except a means to corrupt the mind.
The woman’s anatomy is nothing more than flesh. Under the influence of delusion, one is not able to isolate himself from vulgarity, wretchedness.One should deliberate-meditate over this again and again mentally.
नलिनीदलगतजलमतितरलम्, तद्वज्जीवितमतिशयचपलम्।
विद्धि व्याध्यभिमानग्रस्तं, लोक शोकहतं च समस्तम्॥4॥
जीवन कमल-पत्र पर पड़ी हुई पानी की बूंदों के समान अनिश्चित एवं अल्प (-क्षणभंगुर) है। यह समझ लो कि समस्त विश्व रोग, अहंकार और दु:ख में डूबा हुआ है।
Life is as ephemeral as water drops on a lotus leaf. Be aware that the whole world is troubled by disease, ego and grief. One did not exist before and he will not exist thereafter, as well.
यावद्वित्तोपार्जनसक्त:, तावन्निजपरिवारो रक्तः। पश्चाज्जीवति जर्जरदेहे, वार्तां कोऽपि न पृच्छति गेहे॥5॥
जब तक व्यक्ति धनोपार्जन में समर्थ है, तब तक परिवार में सभी उसके प्रति स्नेह प्रदर्शित करते हैं, परन्तु अशक्त हो जाने पर उसे सामान्य बातचीत में भी नहीं पूछा जाता है।
As long as one is fit and capable to earn money, everyone in the family show affection- respect towards him. But afterwards, when his body becomes weak-he turns old, no one cares-inquiries about him. No one feels the need to consult him. Even the servants ignore him.
यावत्पवनो निवसति देहे, तावत् पृच्छति कुशलं गेहे।
गतवति वायौ देहापाये, भार्या बिभ्यति तस्मिन्काये॥6॥
जब तक शरीर में प्राण रहते हैं तब तक ही लोग कुशल पूछते हैं। शरीर से प्राण वायु के निकलते ही पत्नी भी उस शरीर से डरती है।
People are concerned about one till he alive. As soon as the soul-vital air -Pran Vayu, escape the body, near and dear too wish to remain away-aloof from it. On the other hand they are afraid of it. Even the wife prefer to remain away from the corpse-dead body-remains, out of fear (-ghost).
बालस्तावत् क्रीडासक्तः, तरुणस्तावत् तरुणीसक्तः।
वृद्धस्तावच्चिन्तासक्तः, परे ब्रह्मणि कोऽपि न सक्तः॥7॥
बचपन में खेल में रूचि होती है, युवावस्था में युवा स्त्री के प्रति आकर्षण होता है, वृद्धावस्था में चिंताओं से घिरे रहते हैं, पर प्रभु से कोई प्रेम नहीं करता है।
One idles away-waste childhood in sports-play, during youth, he is attached to woman, in old age he keeps worrying about future, but it seldom that he prefers to be engrossed with Govind-the Par Brahmn Parmeshwar at any stage. In fact, he does not know, understand the significance-importance of it.
का ते कांता कस्ते पुत्रः, संसारोऽयमतीव विचित्रः।
कस्य त्वं वा कुत अयातः, तत्त्वं चिन्तय तदिह भ्रातः॥8॥
कौन तुम्हारी पत्नी है, कौन तुम्हारा पुत्र है, ये संसार अत्यंत विचित्र है, तुम कौन हो, कहाँ से आये हो, बन्धु ! इस बात पर तो पहले विचार कर लो।
Who is your wife ? Who is your son? Indeed, strange is this world. O dear, think again and again who are you and from where have you come. One does not know his origin, earlier incarnations-previous births.
सत्संगत्वे निस्संगत्वं, निस्संगत्वे निर्मोहत्वं। निर्मोहत्वे निश्चलतत्त्वं निश्चलतत्त्वे जीवन्मुक्तिः॥9॥
सत्संग से वैराग्य, वैराग्य से विवेक, विवेक से स्थिर तत्त्वज्ञान और तत्त्वज्ञान से मोक्ष की प्राप्ति होती है।
Interaction with saints brings detachment, detachment leads to gist-nectar-elixir pertaining to the Almighty and this leads to Salvation-Liberation-Assimilation in the Ultimate-Almighty.
वयसि गते कः कामविकारः, शुष्के नीरे कः कासारः। क्षीणे वित्ते कः परिवारः, ज्ञाते तत्त्वे कः संसारः॥10॥
आयु बीत जाने के बाद काम भाव नहीं रहता, पानी सूख जाने पर तालाब नहीं रहता, धन चले जाने पर परिवार नहीं रहता और तत्त्व ज्ञान होने के बाद संसार नहीं रहता।
As soon as one grows old he looses potency-vigour-strength, after drying ponds-lakes loose their status as reservoirs, loss of wealth-poverty drives away the relatives and with the awakening of gist of the understanding of the Almighty; one looses charm of this world.
मा कुरु धनजनयौवनगर्वं, हरति निमेषात्कालः सर्वं।
मायामयमिदमखिलम् हित्वा, ब्रह्मपदम् त्वं प्रविश विदित्वा॥11॥
धन, शक्ति और यौवन पर गर्व मत करो, समय क्षण भर में इनको नष्ट कर देता है| इस विश्व को माया से घिरा हुआ जान कर तुम ब्रह्म पद में प्रवेश करो।
One should not boast of wealth, strength-power-might and youth-vigor-vitality. The time-Kal will perish all these in a fraction of moment. He should consider this world to be illusion-perishable-destructible and make efforts to attain-achieve the Par Brahmn Parmeshwar.
दिनयामिन्यौ सायं प्रातः, शिशिरवसन्तौ पुनरायातः।
कालः क्रीडति गच्छत्यायुस्तदपि न मुन्च्त्याशावायुः॥12॥
दिन और रात, शाम और सुबह, सर्दी और बसंत बार-बार आते-जाते रहते हैं। काल की इस क्रीडा के साथ जीवन नष्ट होता रहता है; परन्तु इच्छाओ का अंत कभी नहीं होता है।
Desires never vanish-diminish-satisfied from the mind of one with the expiry of time. He has to control-rein them. This can be achieved by diverting oneself towards the Almighty, through prayers-devotion. Day and night, dusk and dawn, winter and spring come and go, cyclically. In this sport of Time entire life goes away, but the storm of desire never departs or diminishes.
द्वादशमंजरिकाभिरशेषः कथितो वैयाकरणस्यैषः।
उपदेशोऽभूद्विद्यानिपुणैः, श्रीमच्छंकरभगवच्चरणैः॥12-1॥
बारह गीतों का ये उपदेश (-पुष्पहार, bouquet, garland), सर्वज्ञ प्रभुपाद श्री शंकराचार्य द्वारा एक वैयाकरण को प्रदान किया गया।
This bouquet of twelve verses-Shlok-rhymes was imparted to a grammarian by the all-knowing, god-like Shri Shankrachary. This is apiece of preaching.
काते कान्ता धन गतचिन्ता, वातुल किं तव नास्ति नियन्ता।
त्रिजगति सज्जनसं गतिरैका, भवति भवार्णवतरणे नौका॥13॥
तुम्हें पत्नी और धन की इतनी चिंता क्यों है, क्या उनका कोई नियंत्रक नहीं है। तीनों लोकों में केवल सज्जनों का साथ ही इस भवसागर से पार जाने की नौका है।
One should not worry about his wealth, family all the time. He should have faith in God who controls every thing. The virtuous company of the diligent-righteous-pious helps one in sailing through this vast reservoir of deeds-actions-mistakes-vices. Oh deluded! Why do you worry about your wealth and wife? Is there no one to take care of them? Only the company of saints can act as a boat in three worlds to take you out from this ocean-cycle of births and rebirths.
जटिलो मुण्डी लुञ्छितकेशः, काषायाम्बरबहुकृतवेषः।
पश्यन्नपि च न पश्यति मूढः, उदरनिमित्तं बहुकृतवेषः॥14॥
बड़ी जटाएं, केश रहित सिर, बिखरे बाल, काषाय (-भगवा) वस्त्र और भांति भांति के वेश; ये सब अपना पेट भरने के लिए ही धारण किये जाते हैं, अरे मोहित मनुष्य तुम इसको देख कर भी क्यों नहीं देख पाते हो!
Matted and untidy hair, shaven heads, orange-saffron coloured cloths are all a way to earn livelihood by those who do not wish to earn their bread through righteous-honest means-hard work. O deluded man why don’t you understand it, even after seeing.
अङ्गं गलितं पलितं मुण्डं, दशनविहीनं जतं तुण्डम्।
वृद्धो याति गृहीत्वा दण्डं, तदपि न मुञ्चत्याशापिण्डम्॥15॥
क्षीण अंगों, पके हुए बालों, दांतों से रहित मुख और हाथ में दंड लेकर चलने वाला वृद्ध भी आशा-पाश से बंधा रहता है।
Even an old man with weak limbs, hairless head, toothless mouth, walking with the help of a stick, still has high hopes-unfulfilled desires. Desires are unending. Fulfilment of one desire leads to yet another new one.
अग्रे वह्निः पृष्ठेभानुः, रात्रौ चुबुकसमर्पितजानुः।
करतलभिक्षस्तरुतलवासः, तदपि न मुञ्चत्याशापाशः॥16॥
सूर्यास्त के बाद, रात्रि में आग जला कर और घुटनों में सर छिपाकर सर्दी बचाने वाला, हाथ में भिक्षा का अन्न खाने वाला, पेड़ के नीचे रहने वाला भी अपनी इच्छाओं के बंधन को छोड़ नहीं पाता है।
One who warms his body by fire after sunset living in the open under the sky-homeless, curls his body to his knees to avoid cold; eats the begged food and sleeps beneath the tree, he is also bound by desires, even in these difficult situations. Desires never die.
कुरुते गङ्गासागरगमनं, व्रतपरिपालनमथवा दानम्।
ज्ञानविहिनः सर्वमतेन, मुक्तिं न भजति जन्मशतेन॥17॥
किसी भी धर्म के अनुसार ज्ञान रहित रह कर गंगासागर जाने से, व्रत रखने से और दान देने से सौ जन्मों में भी मुक्ति नहीं प्राप्त हो सकती है।
Its not possible to attain Salvation by visiting religious places of worship-pilgrimages, fasting, donations-charity, without understanding the gist of the religiosity, even in hundred births, by following any of the religion-Varnashram Dharm.
सुर मंदिर तरु मूल निवासः, शय्या भूतल मजिनं वासः।
सर्व परिग्रह भोग त्यागः, कस्य सुखं न करोति विरागः॥18॥
देव मंदिर या पेड़ के नीचे निवास, पृथ्वी जैसी शय्या, अकेले ही रहने वाले, सभी संग्रहों और सुखों का त्याग करने वाले वैराग्य से किसको आनंद की प्राप्ति नहीं होगी।
Renunciation-detachment-relinquishment leads to bliss-Parmanand-Ultimate pleasure-Salvation. Reside in a temple or below a tree, sleep on mother earth as your bed, stay alone, leave all the belongings and comforts, such renunciation can give all the pleasures to anybody.
योगरतो वाभोगरतोवा, सङ्गरतो वा सङ्गवीहिनः।
यस्य ब्रह्मणि रमते चित्तं, नन्दति नन्दति नन्दत्येव॥19॥
कोई योग में लगा हो या भोग में, संग में आसक्त हो या निसंग हो, पर जिसका मन ब्रह्म में लगा है; वो ही आनंद करता है, आनन्द ही आनंद करता है।
One may like meditative practice or worldly pleasures, may be attached or detached. But only one who fixing-trains his mind on God lovingly enjoys bliss, enjoys bliss, enjoys bliss.
भगवद् गीता किञ्चिदधीता, गङ्गा जललव कणिकापीता।
सकृदपि येन मुरारि समर्चा, क्रियते तस्य यमेन न चर्चा॥20॥
जिन्होंने भगवद् गीता का थोडा सा भी अध्ययन किया है, भक्ति रूपी गंगा जल का कण भर भी पिया है, भगवान कृष्ण की एक बार भी समुचित प्रकार से पूजा की है, यम के द्वारा उनकी चर्चा नहीं की जाती है।
Those who have studied-understood-learnt Geeta, worship Bhagwan Shri Krashn with love & affection even for a while-once-a little-fraction of second, drink just a drop of water from the holy Ganga, Yam Raj-the deity of death has no control over them.
पुनरपि जननं पुनरपि मरणं, पुनरपि जननी जठरे शयनम्।
इह संसारे बहुदुस्तारे, कृपयाऽपारे पाहि मुरारे॥21॥
बार-बार जन्म, बार-बार मृत्यु, बार-बार माँ के गर्भ में शयन, इस संसार से पार जा पाना बहुत कठिन है। हे कृष्ण! कृपा करके मेरी इससे रक्षा करें।
Repeated births and death, stay in the mother’s womb, makes it extremely difficult to go beyond this universe. Hey Murari! Please help me pass through all this by extending your grace-mercy.
रथ्या चर्पट विरचित कन्थः, पुण्यापुण्य विवर्जित पन्थः।
योगी योगनियोजित चित्तो, रमते बालोन्मत्तवदेव॥22॥
रथ के नीचे आने से फटे हुए कपडे पहनने वाले, पुण्य और पाप से रहित पथ पर चलने वाले, योग में अपने चित्त को लगाने वाले योगी, बालक के समान आनंद में रहते हैं।
One who wears rags-teared cloths by coming under the chariot, travel-move on the path free from virtues and sins- a state of equanimity, trains their minds in the devotion to the Almighty through Yog-meditation, enjoys like a carefree exuberant child.
कस्त्वं कोऽहं कुत आयातः, का मे जननी को मे तातः।
इति परिभावय सर्वमसारम्, विश्वं त्यक्त्वा स्वप्न विचारम्॥23॥
तुम कौन हो, मैं कौन हूँ, कहाँ से आया हूँ, मेरी माँ कौन है, मेरा पिता कौन है? सब प्रकार से इस विश्व को असार समझ कर इसको एक स्वप्न के समान त्याग दो।
Who are you ? Who am I ? From where have I come ? Who is my mother, who is my father ? Ponder over these and after understanding-realizing this world to be meaningless like a dream, relinquish it.
त्वयि मयि चान्यत्रैको विष्णुः, व्यर्थं कुप्यसि मय्यसहिष्णुः।
भव समचित्तः सर्वत्र त्वं, वाञ्छस्यचिराद्यदि विष्णुत्वम्॥24॥
तुममें, मुझमें और अन्यत्र भी सर्वव्यापक विष्णु ही हैं, तुम व्यर्थ ही क्रोध करते हो, यदि तुम शाश्वत विष्णु पद को प्राप्त करना चाहते हो तो सर्वत्र समान चित्त वाले हो जाओ।
Bhagwan Vishnu resides in me, you and everything-every one else. So, your anger is meaningless-useless. If you wish to attain the eternal status of Vishnu, practice equanimity all the time, in all the things.
शत्रौ मित्रे पुत्रे बन्धौ, मा कुरु यत्नं विग्रहसन्धौ।
सर्वस्मिन्नपि पश्यात्मानं, सर्वत्रोत्सृज भेदाज्ञानम्॥25॥
शत्रु, मित्र, पुत्र, बन्धु-बांधवों से प्रेम और द्वेष मत करो, सबमें अपने आप को ही देखो, इस प्रकार सर्वत्र ही भेद रूपी अज्ञान को त्याग दो।
Bhagwan Vishnu is present in each and every one of us, in the form of soul. Its only the body which discriminate between the two. Try not to win the love of your friends, brothers, relatives and son(s) or to fight with your enemies. See yourself in each and everyone and give up ignorance of duality everywhere. Practice equanimity. [One must be ready to protect his kith and kin and him self, in stead of surrendering to situations, till he is a household undergoing Grahasthashram (-गृहस्थाश्रम) Varnashram Dharm.
कामं क्रोधं लोभं मोहं, त्यक्त्वाऽत्मानं भावय कोऽहम्।
आत्मज्ञान विहीना मूढाः, ते पच्यन्ते नरकनिगूढाः॥26॥
काम, क्रोध, लोभ, मोह को छोड़ कर, स्वयं में स्थित होकर विचार करो कि मैं कौन हूँ ? जो आत्म-ज्ञान से रहित मोहित व्यक्ति हैं; वो बार-बार छिपे हुए इस संसार रूपी नरक में पड़ते हैं।
Give up desires, anger, greed and delusion. Ponder over your real self-nature. Those devoid of the knowledge of self, come in this world-a hidden hell, endlessly.
गेयं गीता नाम सहस्रं, ध्येयं श्रीपति रूपमजस्रम्।
नेयं सज्जन सङ्गे चित्तं, देयं दीनजनाय च वित्तम्॥27॥
भगवान विष्णु के सहस्त्र नामों को गाते हुए उनके सुन्दर रूप का अनवरत ध्यान करो, सज्जनों के संग में अपने मन को लगाओ और गरीबों की अपने धन से सेवा करो।
Sing thousand glories of Bhagwan Vishnu, constantly remembering his various forms in your heart. Enjoy the company of virtuous-righteous-pious-noble people and do acts of charity for the poor, down trodden and the needy.
सुखतः क्रियते रामाभोगः,पश्चाद्धन्त शरीरे रोगः।
यद्यपि लोके मरणं शरणं, तदपि न मुञ्चति पापाचरणम्॥28॥
सुख के लिए लोग आनंद-भोग करते हैं, जिसके बाद इस शरीर में रोग हो जाते हैं। यद्यपि इस पृथ्वी पर सबका मरण सुनिश्चित है, फिर भी लोग पापमय आचरण को नहीं छोड़ते।
People use this body for pleasure-enjoyment-passions-sexuality-sensuality-lust, which gets diseased in the end. Though in this world everything ends in death, man does not give up the sinful conduct. Greed, unfulfilled desires always keep him pushing to wretchedness-vices-sins-misconduct.
अर्थंमनर्थम् भावय नित्यं, नास्ति ततः सुखलेशः सत्यम्।
पुत्रादपि धनभजाम् भीतिः, सर्वत्रैषा विहिता रीतिः॥29॥
धन अकल्याणकारी है और इससे जरा सा भी सुख नहीं मिल सकता है, ऐसा विचार प्रतिदिन करना चाहिए। धनवान व्यक्ति तो अपने पुत्रों से भी डरते हैं; ऐसा सबको पता ही है।
Keep on thinking that money is root cause of all troubles. It cannot give even a bit of happiness-pleasure. A rich man fears even his own sons, who are willing to kill him for the sake of wealth, luxuries. This is the law nature pertaining to riches and applicable to every one-everywhere.
प्राणायामं प्रत्याहारं, नित्यानित्य विवेकविचारम्।
जाप्यसमेत समाधिविधानं, कुर्ववधानं महदवधानम्॥30॥
प्राणायाम, उचित आहार, नित्य इस संसार की अनित्यता का विवेक पूर्वक विचार करो, प्रेम से प्रभु-नाम का जाप करते हुए समाधि में ध्यान दो, बहुत ध्यान दो।
Perform-conduct-practice Pranayam, the regulation of life forces, take proper food, constantly distinguish the permanent from the fleeting. Chant the holy names of God with love and meditate, with utmost attention. One must utilize his prudence-intelligence to abandon vices-sins-wretchedness.
गुरुचरणाम्बुज निर्भर भक्तः, संसारादचिराद्भव मुक्तः।
सेन्द्रियमानस नियमादेवं, द्रक्ष्यसि निज हृदयस्थं देवम्॥31॥
गुरु के चरण कमलों का ही आश्रय मानने वाले भक्त बनकर सदैव के लिए इस संसार में आवागमन से मुक्त हो जाओ, इस प्रकार मन एवं इन्द्रियों का निग्रह कर अपने हृदय में विराजमान प्रभु के दर्शन करो।
One must take shelter-asylum-protection under the auspiciousness of his Guru-guide like a devotee and set him self free from the clutches of this perishable world. This will help him in acquiring control over sensuality-vulgarity-useless thoughts-dirty ideas-irrational thoughts. One should become free from repeated cycles of death and births. This will lead to self control over mind, ideas and retain the Almighty in the heart.
मूढः कश्चन वैयाकरणो, डुकृञ्करणाध्ययन धुरिणः।
श्रीमच्छम्कर भगवच्छिष्यै, बोधित आसिच्छोधितकरणः॥32॥
इस प्रकार व्याकरण के नियमों को कंठस्थ करते हुए किसी मोहित वैयाकरण के माध्यम से बुद्धिमान श्री भगवान शंकर के शिष्य बोध प्राप्त करने के लिए प्रेरित किये गए।
Thus through a deluded grammarian lost in memorising rules of the grammar, the all knowing Shri Shankar motivated his disciples for enlightenment.
भजगोविन्दं भजगोविन्दं, गोविन्दं भजमूढमते।
नामस्मरणादन्यमुपायं, नहि पश्यामो भवतरणे॥33॥
गोविंद को भजो, गोविन्द का नाम लो, गोविन्द से प्रेम करो क्योंकि भगवान के नाम जप के अतिरिक्त इस भव-सागर से पार जाने का अन्य कोई मार्ग नहीं है।
O the deluded minded, chant Govind, worship Govind, love Govind; as there is no other way to cross the life’s ocean except lovingly remembering the holy names of God.
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